Nov 18, 2010

स्त्री

 

कविता का ये दरवाजा नितांत निजी तरफ जाता है

मत आओ यहां

बाहर इनकी हवा आएगी नहीं

अंदर सुखी हैं ये अपनी गलबहियों में

 

ये कविताएं बुहार रहीं हैं अंदर आंगन

बतिया रही हैं आपस में

कुछ कर रहीं हैं गेहूं की छटाई

कुछ चरखे पर कात रही हैं सूत

और कोई लगाती लिपस्टिक सूरज को बनाए आईना

 

 

अंदर बहुत चेहरे हैं

शायद मायावी लगें ये तुम्हें

अंदर जंगल हैं कई, झीलें, नदियां, उपवन, शहर, गंवीली गलियां

कमल, फूल, सब्जियां और चरती-फकफकती बकरियां भी

 

इन संसार का नक्शा किसी देश के किसी मंत्रालय ने पास नहीं किया

यहां की लय, थरकन, स्पंदन दूसरा ही है

कहीं तुम अंदर आए

तो साथ चली आएगी बाहर की बिनबुलाई हवा

बंध जाएंगे यहां के सुखी झूले

 

स्त्री के अंदर की दुनिया

अंदर ही बुनी जाती है

रोज दर रोज

दस्तावेज नहीं मिलेंगें इनके कहीं

मिलेगी सिर्फ पायल की गूंज

ठकठकाते दिलों की धड़कन

खिलखिलाते चेहरे

सपनों की गठरियां

और उनके कहीं भीतर जाकर चिपके

बहुत से आंसू

1 comment:

वन्दना अवस्थी दुबे said...

स्त्री के अंदर की दुनिया
अंदर ही बुनी जाती है
रोज दर रोज
दस्तावेज नहीं मिलेंगें इनके कहीं
सच है. स्त्री खुद एक तिलिस्म है. एक ऐसा तिलिस्म, जिसके बाहर उसके दुख नहीं जाते, जिसे तोड़ने की कोई कोशिश भी कभी नहीं की जाती. बहुत सुन्दर कविता. उन खास महिलाओं की, जिनके दुख सबसे अलग हैं.