Mar 1, 2011

गुल्लक

 

हवा रोज़ जैसी ही थी

लेकिन उस रोज़ हुआ कुछ यूं

कि हथेली फैला दी और कर दी झटके से बंद

हवा के चंद अंश आएं होंगे शायद हथेली में

गुदगुदाए

फिर हो गए उड़नछू वहीं, जहां से आए थे

 

फूल भी क्यारी में रोज़ की तरह ही थे

लेकिन उस रोज़ जाने क्यों

एक पत्ते को उंगलियों में लिया

किताब की गोद में सुला दिया

लिख दिया उस पर तारीख, महीना, साल

पत्ता इतिहास हुआ पर दे गया कोई सुकून

कि जैसे

इतिहास को बांध लिया हो किताब की क़ब्र में

 

पल भी कई बार ऐसे ही समेटे कई बार

याद है शादी का वो एलबम

पहली किलकारी की तस्वीरें

होश में आते दिनों के ठुमकते दिन

 

मौसमों को भी कई बार बाहुपाश में समेटा

सर्द दोपहर की घाघरे सी फैली धूप में

बाहर बैठे

कैसे बातें लिपटती गई थीं

इतिहास की तह में जाकर भी

वो दोपहरें आबाद थीं

 

जाने क्यों इस जीवन को छोड़ने का मन ही नहीं करता


1 comment:

Mukesh Kumar Sinha said...

फूल भी क्यारी में रोज़ की तरह ही थे

लेकिन उस रोज़ जाने क्यों

एक पत्ते को उंगलियों में लिया

किताब की गोद में सुला दिया

लिख दिया उस पर तारीख, महीना, साल

पत्ता इतिहास हुआ पर दे गया कोई सुकून

कि जैसे

इतिहास को बांध लिया हो किताब की क़ब्र में

aisa bachpan me hamne bhi kiya, lekin aapne isko sabdo me bandh kar dikhaya ki kaise ek kavi, apne sabd aur soch ke vistar ko show karta hai.........superb!!

god bless...bahut achchha laga aapki iss kavita ko padh kar:)