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Aug 1, 2010

सपने

इस बार सपने
सीधे हथेली पर उतार दिए
फिर उन्हें तकिए पर रखा
खुशबू आने लगी
लगा उग आए सैंकड़ों रजनीगंधा
सपनों ने हौले से बालों का सहलाया
लगा मेरे साथ उत्सव मनाने चले हैं
आज की रात दावत भी सपनों की ही थी
रात की रानी, हरसिंगार, खुशियों के प्याले इतने छलके
सुबह का आना तो पता न चला
अगली रात की दस्तक बड़ी अखरी

10 comments:

M VERMA said...

बहुत खूबसूरत एहसास है
वाह

पंकज मिश्रा said...

bahoot sundar, kya kahne. shaandaar rachana ke liye badhai.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

इस बार सपने
सीधे हथेली पर उतार दिए
फिर उन्हें तकिए पर रखा
खुशबू आने लगी
बहुत सुन्दर कविता है वर्तिका जी, एकदम सपनों की खुश्बू से रची-बसी.

mai... ratnakar said...

wov!!!!!!!!!!!!!!!! vartika jee, bahut khoob likha hai
badhai, very good creation indeed

jaipurbuzz said...

बहूत खूब है ये सपनों की महफील... इन्हें यूं ही संवारते रहना...

jaipurbuzz said...

बहूत खूब है ये सपनों की महफील... इन्हें यूं ही संवारते रहना...

विजयप्रकाश said...

वाह...सुंदर भावों से सजी सपनीली कविता.

अनिल कान्त said...

बेहद खूबसूरत रचना है .

सुशीला पुरी said...

आपकी कवितायेँ हंस मे भी पढ़ी और यहाँ भी ....बहुत अच्छा लगा ।

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar said...

सपनों ने हौले से बालों का सहलाया
लगा मेरे साथ उत्सव मनाने चले हैं
वर्तिका जी , बहुत खूबसूरत और कोमल भावनाओं को आपने बड़ी सुन्दरता के साथ शब्दों में ढाला है। 1 अगस्त मेरा जन्मदिन था---अफ़सोस हुआ उस दिन इतनी सुन्दर कविता न पढ़ सकने का।