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J se Jail at IGNCA, New Delhi: 21 July, 2026

Jul 21, 2026

J se Jail at IGNCA, New Delhi: 21 July, 2026

Celebrating J se Jail – A Landmark on prison literature by Vartika Nanda released by Justice Sandeep Mehta, Judge, Supreme Court of India

J Se Jail, authored by Vartika Nanda was released at the Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA). This book is published by Prabhat Prakashan. Chief Guest at the event was Justice Sandeep Mehta, Honourable Judge of the Supreme Court of India. The programme was chaired by Shri Rambahadur Rai, President of IGNCA, while Professor Sachchidanand Joshi, Member Secretary of IGNCA was the Guest of Honour.  The programme was conducted by Shri Prabhat Kumar of Prabhat Prakashan.

Speaking on the occasion, Justice Sandeep Mehta said that prisons and prisoners are often considered taboo subjects in Indian society. He congratulated Prof. Vartika Nanda for writing a book on such an important topic. He said that the way prison life has been presented in the book is remarkable and that the effort to bring hope and light into the lives of prisoners is truly inspiring. 

Justice Mehta read out a poignant story of a child from the book who stepped outside prison for the first time during her mother’s court hearing and saw a cat for the first time. The child mistook the cat for a “ghost”. He reflected on how J Se Jail brings readers face-to-face with the pain and realities of prison life while highlighting the importance of reformative justice.



Chairing the programme, Shri Rambahadur Rai described the book as an excellent novel from the perspective of an ordinary reader. He said that Prof. Vartika Nanda has written the book to present prisons as places where learning and positive change are also possible. Sharing memories from his own period of imprisonment, he remarked that if political prisoners had continued to be present in jails, prisons might not have become so frightening and prison reforms would have received greater attention. 

Guest of Honour Dr. Sachchidanand Joshi said that the book is not merely a novel but a living document of prison life. Sharing some of his own experiences related to prisons, he observed that one can truly understand prisons only by seeing them from the inside, and that such an experience changes one’s perspective completely.

Speaking about the journey of writing the book, Prof. Vartika Nanda said that all the characters in the novel are inspired by people she met in different prisons. She shared that she had visited many prisons and had never returned empty-handed. She carried back with her the sadness, pain, and struggles of the inmates. She described prison as her greatest teacher, saying that it had given her invaluable experiences and had made her stronger and more capable. Prof. Vartika Nanda made an appeal: “After reading this book, make sure it reaches someone in a barrack.”

Despite protests in the city, the auditorium was fully packed. A Tinka Tinka exhibition, showcasing creativity and reform in prisons was also displayed on the occasion. 





The programme was conducted by Shri Prabhat Kumar of Prabhat Prakashan, who also delivered the vote of thanks. The event was organised by the Kalanidhi Division of the Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA), Ministry of Culture.


Book Release Ceremony: 


YouTube Playlist: https://www.youtube.com/playlist?list=PLRDEv1SC5hpmOVAHduz1br6RcCyXZI1H9

YouTube Prabhat Prakashan on Book Release: 
https://www.youtube.com/watch?v=wRxEITk_iL8



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नई दिल्ली में ‘ज से जेल’  21 जुलाई, 2026
'ज से जेल' पुस्तक विमोचन कार्यक्रम

‘ज से जेल’- जेल की जिंदगी का एक ठोस दस्तावेज है- जस्टिस संदीप मेहता

वर्तिका नंदा की जेल साहित्य पर एक अहम पुस्तक है जिसका विमोचन भारत के सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस संदीप मेहता ने  किया।

किसी जेल तक जरूर पहुंचाइए- ज  से जेल

वर्तिका नंदा की लिखी पुस्तक 'ज से जेल का विमोचन इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA)  किया गया। यह पुस्तक प्रभात प्रकाशन ने छापी गयी है। इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि भारत के सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति  संदीप मेहता थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता IGNCA के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की, जबकि IGNCA के सदस्य सचिव प्रोफ़ेसर सच्चिदानंद जोशी विशिष्ट अतिथि थे। कार्यक्रम का संचालन प्रभात प्रकाशन के श्री प्रभात कुमार ने किया।

इस मौके पर बोलते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि भारतीय समाज में जेल और कैदियों को अक्सर वर्जित विषय माना जाता है। उन्होंने इतने अहम विषय पर पुस्तक लिखने के लिए प्रोफ़ेसर वर्तिका नंदा को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पुस्तक में जेल की ज़िंदगी को जिस तरह से दिखाया गया है, वह काबिले-तारीफ़ है और कैदियों की ज़िंदगी में उम्मीद और रोशनी लाने की कोशिश  प्रेरणादायक है।

जस्टिस मेहता ने किताब से एक बच्चे की दिल को छू लेने वाली कहानी सुनाई, जो अपनी माँ की कोर्ट सुनवाई के दौरान पहली बार जेल से बाहर निकला और पहली बार बिल्ली देखी। बच्चे ने बिल्ली को "भूत" समझ लिया। उन्होंने बताया कि कैसे 'ज से जेल पाठकों को जेल की ज़िंदगी के दर्द और असलियत से रूबरू कराती है और साथ ही सुधारात्मक न्याय की अहमियत को भी उजागर करती है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री रामबहादुर राय ने एक आम पाठक के नज़रिए से इस किताब को एक बेहतरीन उपन्यास बताया। उन्होंने कहा कि प्रोफ़ेसर वर्तिका नंदा ने यह किताब जेलों को ऐसी जगहों के तौर पर दिखाने के लिए लिखी है जहाँ सीखना और सकारात्मक बदलाव भी मुमकिन है। अपनी जेल की ज़िंदगी की यादें साझा करते हुए उन्होंने कहा कि अगर राजनीतिक कैदी जेलों में बने रहते, तो शायद जेलें इतनी डरावनी नहीं होतीं और जेल सुधारों पर ज़्यादा ध्यान दिया जाता।

विशिष्ट अतिथि डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यह किताब सिर्फ़ एक उपन्यास नहीं, बल्कि जेल की ज़िंदगी का एक जीता-जागता दस्तावेज़ है।  जेलों से जुड़े अपने कुछ अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जेलों को असल में तभी समझा जा सकता है जब उन्हें अंदर से देखा जाए और ऐसा अनुभव इंसान का नज़रिया पूरी तरह बदल देता है।

किताब लिखने के सफ़र के बारे में बात करते हुए प्रोफ़ेसर वर्तिका नंदा ने कहा कि उपन्यास के सभी किरदार उन लोगों से प्रेरित हैं जिनसे वह अलग-अलग जेलों में मिली थीं। उन्होंने बताया कि वह कई जेलों में गईं और कभी भी खाली हाथ नहीं लौटीं। वह अपने साथ कैदियों का दुख, दर्द और संघर्ष लेकर आईं। उन्होंने जेल को अपना सबसे बड़ा गुरु बताया और कहा कि इसने उन्हें अनमोल अनुभव दिए हैं और उन्हें ज़्यादा मज़बूत और काबिल बनाया है। प्रोफ़ेसर वर्तिका नंदा ने अपील की: "इस किताब को पढ़ने के बाद, यह वादा करें कि यह किसी बैरक में रहने वाले व्यक्ति तक पहुँचे।"

शहर में विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद, ऑडिटोरियम पूरी तरह भरा हुआ था। इस मौके पर जेलों में रचनात्मकता और सुधार को दिखाने वाली तिनका तिनका फाउंडेशन के जेलों के कामों की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।

कार्यक्रम का संचालन प्रभात प्रकाशन के श्री प्रभात कुमार ने किया, जिन्होंने धन्यवाद प्रस्ताव भी पेश किया। यह कार्यक्रम संस्कृति मंत्रालय के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के कलानिधि विभाग द्वारा आयोजित किया गया था।
इससे पहले वर्तिका नन्दा तिनका तिनका तिहाड़, तिनका तिनका डासना, तिनका तिनका मध्यप्रदेश और नेशनल बुक ट्रस्ट से  प्रकाशित- Radio in Prison-  लिख चुकी हैं। वे भारत की जेलों में संवाद की जरूरतों को पूरा करने करने की अपनी अवैतनिक कोशिशों के लिए जानी जाती हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्री राम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग में प्रोफेसर हैं। 

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In Press: 


Amar Ujala: https://www.amarujala.com/kavya/halchal/j-se-jail-is-a-powerful-and-authentic-documentary-account-of-life-behind-bars-2026-07-23

Vaishvik Hindi Parivar: 
https://vaishvikhindi.com/posts/22071



ज से जेल: संवेत सभागार, IGNCA, जनपथ: 21 जुलाई, 2026

 एक नई किताब, जेल की दुनिया को देखने का एक नया नज़रिया।

प्रो. वर्तिका नंदा के पहले उपन्यास ‘ज से जेल’ के लोकार्पण का हिस्सा बनिए। इस अवसर पर तिनका तिनका की जेल यात्रा पर आधारित एक विशेष फिल्म भी दिखाई जाएगी।

21 जुलाई 2026 | सायं 4 बजे

 संवेत सभागार, IGNCA, जनपथ, नई दिल्ली

आइए, मिलते हैं और जानते हैं जेल की उस दुनिया को, जो अक्सर हमारी नज़रों से दूर रह जाती है।







Jul 12, 2026

DD Bharti: J se Jail and other books on jails: 26 July, 2026

Date of Recording: 11 July, 2026

Date of Telecast: 26 July, 2026

दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम - साहित्य संवाद- के लिए कल एक दिलचस्प वार्ता रिकार्ड हुई. इस साहित्यिक कार्क्रम के प्रोड्यूसर हैं श्री संजय कुमार, एंकर रजनी.  संवाद के केंद्र में रहे- प्रभात प्रकाशन Prabhat Prakashan  से हाल ही में प्रकाशित मेरा उपन्यास- ज से जेल और नेशनल बुक ट्रस्ट  National Book Trust, India से प्रकाशित- Radio in Prison. तिनका तिनका जेल के बाकी काम में चर्चा में रहे.

यह वार्ता 26 जुलाई को डीडी भारती पर प्रसारित होगी. बाकी तस्वीरें कल शेयर  की जाएंगी.

3 Promos: YouTube Playlist: Novel on jail















Jul 9, 2026

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है। गुरुदत्त। साहिर। प्यासा। Film। अध्यात्म। Podcast। वर्तिका नन्दा

 जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला

हमने तो जब कलियाँ माँगी काँटों का हार मिला

1957 में आई थी फिल्म- प्यासा। निर्देशक, प्रोडूयूसर और अभिनेता थे- गुरुदत्त। इस नज्म को लिखा था- मशहूर शायर साहिर लुधियानवी (Sahir Ludhianvi) ने. संगीतकार थे-  एस.डी. बर्मन और आवाज़ थी हेमंत कुमार की।  यह कहा जाता है कि प्यासा गुरुदत्त की अपनी कहानी थी.  गुरुदत्त की जन्मतिथि पर पेश है यह विशेष प्रस्तुति. 

Poster: Jagtar Singh        Audio Edit: Dr. Suchit Narang







Jul 7, 2026

तिनका जेल पाठशाला: 8जुलाई, 2026


8 जुलाई, 2026
क्या आप खुद हमेशा उदास रहते हैं ?  क्या आप यह तय नहीं कर पाते कि दुनिया सुंदर है या बदसूरत?   कि इस दुनिया में किसी पर आपका भरोसा क्यों कायम नहीं हो पा रहा  या फिर कि सफलता के पैमाने क्या हैं ?  अगर आप भी इन सवालों से जूझ रहे हैं तो चलिए हमारे साथ जेल की एक अनूठी यात्रा पर और महसूस कीजिए खुद में ऐसे बदलाव जो आपकी दिशा को शायद पूरी तरह से बदल दें. 



 

एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है: Sahir Laudhianvi: Vartika Nanda

 संसार की इस शाह का बस एक ही फसाना है एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है। 

बी. आर. चोपड़ा की फिल्म 'धुंध' 1973 में आई थी।

साहिर साहब ने जब इस गाने को लिखा होगा, उस समय 

उनके अपने दिल की टीस, दर्द और कसक किसी गहराई तक रही होगी। दुनिया में पाठक होते हैं, दर्शक हो,  श्रोता और राहगीर भी और कुछ ऐसे होते हैं जो दर्द के बीच में जीते हुए रोज़ किसी धागे से किसी चीज़ को बुनते हैं, उधेड़ते हैं और फिर बुनने लग जाते हैं। उदास दिल का साहिर, एक उदास अमृता, एक उदास इमरोज और ऐसे ही बहुत से और उदास शायर, गीतकार, फनकार इन सब ने अपनी उदासियों के बीच में कुछ ऐसा गढ़ा कि फिर वो कभी मिट ना पाया। साहिर का ये गाना उसी की एक मिसाल है।

Poster: Jagtar Singh        Audio Edit: Dr. Suchit Narang