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7 years of Agra jail radio: Launched in 2019: Tinka Tinka Foundation

Jul 19, 2010

टीवी पर मजहबी रिएलिटी शो की दस्तक

18 से 27 साल के 10 युवा बेहतरीन कपड़ों में, आत्म विश्वास से लबरेज। ये धर्म और कर्म की बात करते हैं और यह साबित करने की कोशिश में हैं कि वे इस्लाम के गहरे जानकार हैं। इनमें जो जीतेगा,वो सिकंदर मलेशिया का सर्वोत्तम इमाम बना दिया जाएगा। दरअसल ये सभी युवा मलेशिया के एक टीवी पर चल रहे रिएलिटी टीवी का हिस्सा हैं जिसका नाम है –इमाम मुदा दस हफ्ते तक चलने वाले इस शो का मकसद 10युवाओं में से सबसे योग्य युवक का चयन करना है। यहां योग्यता के मायने इस्लाम की समझ के अलावा बात-चीत, पहनावा और जनसंपर्क भी होगा।

हर शुक्रवार को दिखाए जाने वाले इस शो में युवा प्रतियोगी नाचते-गाते नहीं बल्कि कुरान की आयतें सुनाते हैं। पहले चरण में सभी प्रतियोगियों को इस्लामी रीति-रिवाज से शव को नहलाने और दफनाने की रीति करनी पड़ी और यह शपथ भी लेनी पड़ी कि वे मलेशिया के युवकों को अनैतिक सैक्स और ड्रगों के सेवन से बचाने की कोशिश करेंगें। बाद के एक एपिसोड में इन युवाओं को एक अविवाहित गर्भवती को समझाने का दायित्व भी सौंपा गया।

दुनिया में पहली बार किए जा रहे इस प्रयोग की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रसारण के पहले हफ्ते में ही फेसबुक पर स्टार हंट पर तकरीबन रोजाना रिपोर्टिंग कर रहा है। शो के प्रशंसक मान रहे हैं कि इसने उदारवाद को एक रूप में सामने लाकर खड़ा किया है। दूसरे,इस बहाने मलेशिया जैसे उदारवादी देश को एक युवा और स्मार्ट इमाम मिलेगा और इससे दुनिया भर में इस्लाम में और खुलापन लाने का संदेश भी जाएगा। चैनल इस शो को एक तरह के आध्यात्मिक भोजन की तरह प्रचारित कर ले रहा है और उम्मीद जता रहा है कि इसके जरिए उन्हें एक ऐसा इमाम तलाशने की उम्मीद है जिसमें पश्चिम की आधुनिकता के साथ ही धर्म को युवाओं के साथ जोड़ने की भी क्षमता होगी। यह दावा किया  रहा है कि इसके जरिए देश में इस्लाम की जड़ें और मजबूती हासिल करेंगीं।  

लेकिन इस शो के आलोचक भी कम नहीं। कई लोग इसे गैर-इस्लामी और -गंभीर प्रयोग मान रहे हैं जिससे आने वाले समय में इस्लाम की पुरानी परंपराओं के टूटने का भय उठने लगेगा।

लेकिन आलोचनाओं के परे फिलहाल यह शो जमकर टीआरपी बटोर रहा है। शो इस्लाम से जुड़ी जानकारियों को इस बखूबी दिखा रहा है कि मलेशिया की एक बड़ी आबादी शुक्रवार की रात टीवी के सामने सिमटने लगी है। अमेरिकन आइडल और इंडियन आइडल सरीखे कार्यक्रमों की तरह इस शो से भी हर हफ्ते एक प्रतियोगी बाहर जाएगा। लेकिन यहां फैसले का अधिकार जनता के वोटों के बजाय एक पुराने इमाम,हसन महमूद,पर केंद्रित है जो इन प्रतियोगियों को इस्लाम की कसौटियों पर कसता है।

मजे की बात यह भी है कि शो के प्रतियोगियों को एक मस्जिद में सबसे अलग रखा गया है जहां उनके पास फोन हैं, इंटरनेट और ही टीवी, अखबार या मनोरंजन का कोई भी साधन ताकि वे अकेले में विचार मंथन कर सकें।  

प्राइम टाइम में दिखाए जाने वाले इस शो में प्रतियोगी सुंदर सूट पहनकर और एक पारंपरिक टोपी लगाकर आते हैं और जमकर मुस्कुराते हैं। इसलिए इनमें स्टार इमाम भले ही एक ही बनेगा लेकिन बाकी के लिए कम से कम निकाह के प्रस्तावों की बाढ़ लगने लगी है। स्विस अखबार तागेसेंजर के मुताबिक आज की तारीख में ये सभी सुपर स्टार हैं और दुनिया भर में सैंकड़ों लड़कियों की नजरें इन पर टिकी हैं। 

लेकिन और प्रतियोगियाओं की तरह यहां भी ईनाम का इंतजाम है। जो जीतेगा, उसकी मक्का यात्रा का मुफ्त इंतजाम और एक कार दी जाएगी। इसके अलावा देश की सबसे प्रमुख मस्जिद में इमाम बनने, सऊदी अरब के एक विश्वविद्यालय में स्कॉलरशिप पाने, 6400 डॉलर नकद और एक लेपटॉप पाने का अवसर भी मिलेगा।

भारतीय चैनल जब पूरी तरह से मनोरंजन और रिएलिटी के आस-पास चक्कर काटते दिख रहे हैं,उस समय में मलेशिया के एक चैनल की यह अनूठी दस्तक यहां भी नए प्रयोगों का मैदान तैयार कर सकती है। प्रवचनों से भारी होते जा रहे आध्यात्मिक चैनलों में धर्म कई बार महज एक प्रोडक्ट बन जाता है। ऐसे में मलेशिया में इमाम मुदा के नतीजे और बाद में उसकी उपयोगिता को देखने के बाद हमारे यहां भी धर्मों की खिड़कियों को खोलने की जहमत उठाई जानी चाहिए।

(यह लेख 18 जुलाई को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ) 

Jul 5, 2010

यह है इंडिया वालों के लिए मेरा फोन नंबर

यात्रा और अनुभव से बढ़कर जिंदगी का असल शब्दकोष शायद कुछ और हो ही नहीं सकता। इस बार भी यह विश्वास पुख्ता हुआ। अगरतला की हाल की एक संक्षिप्त यात्रा ने समझ की कई खिड़कियों को खोला।

अगरतला से 7 किलोमीटर दूर जब एक अधिकारी ने वहां के अन्नानास की खूबियां गिनाईं तो वो जरा अतिरेक लगीं। दिल्ली वालों के विश्वास के स्तर का अंदाजा लगते ही पास खड़ा माली भाग कर खेत में से दो अन्नानास ले आया। पल भर में उसने उन्हें छील दिया और अन्नानास हमारे हाथ में आने से पहले टपकते हुए रस में भीगा दिखा। उसे खाते ही समझ में आ गया कि जो तारीफ अभी की गई थी, अन्नानास वाकई उससे कहीं ज्यादा काबिल था।

दरअसल विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर एक सेमिनार में बोलने के बहाने पहली बार अगरतला देखने का मौका मिला। छोटी सी यात्रा से समझ में आया कि कैसे और क्यों उत्तर पूर्व अपनी तमाम काबलियत के बावजूद कई बार खुद को छूटा हुआ महसूस करता है। अर्पण नाम की एक संस्था ने ही इस सेमिनार का आयोजन किया था और अपने सामर्थ्य से कहीं बढ़कर इसे सफल बना डाला था। पहले दिन सूचना तकनीक मंत्री की मौजूदगी में लोक मीडिया अच्छी तादाद में जमा हुआ लेकिन दूसरे दिन मंत्री की गैर-मौजूदगी और फिर रविवार का दिन मीडिया के भी लापरवाह होने की काफी बड़ी वजह बना। लेकिन यह साफ दिखा कि दिल्ली के मुकाबले वहां के नेता और लोकल मीडिया अभी भी काफी हद तक जमीनी ही हैं। यह लोकल मीडिया की सार्थक भूमिका का ही कमाल है कि उत्तर-पूर्व में आत्मविश्वास का स्तर काफी बढ़ा है। तमाम अखबारों और टीवी चैनलों के बीच अब भी यहां दूरदर्शन की कुछ साख बाकी है और तमाम तरह के सेमिनारों और उदघाटनों के कथित बोरियत भरे कार्यक्रमों के बीच लोग अब भी सरकारी चैनल की बाट जोहते हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उत्तर पूर्व की जो कवरेज होती है, उससे यहां के लोग और सियासत दोनों ही काफी असंतुष्ट दिखते हैं। कुछ साल पहले जब अगरतला की ही एक लड़की इंडियन आइडल में अपने झंडे गाढ़ती है तो यहां के लोग उसकी जीत के अलावा इस बात की भी खुशी मनाते हैं कि कम से कम इसी बहाने सही, मीडिया में अगरतला की सकारात्मक चर्चा तो होगी।

लौटते समय सिल्चर विश्वविद्यालय में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष, प्रोफेसर और जाने-माने शिक्षाविद् के वी नागराज ने अपना विजिटिंग कार्ड देते हुए टिप्पणी की कि यह मेरा ईमेल है और यह है इंडिया वालों के लिए मेरा फोन नंबर। बात दिल को छू गई। उत्तर पूर्व को लेकर खास तौर से उत्तर भारतीयों ने जो उपेक्षा भाव हमेशा रखा है, वह उन्हें वाकई इंडिया शाइनिंग जैसा नकारा ही बनाता है। यह इत्तेफाक ही है कि इन दिनों इंडिया वाले दलित एजेंडा, जाति एजेंडा, धर्म एजेंडा, गोत्र एजेंडा को लेकर बहसों में इतने उलझ गए हैं कि उनके पास उत्तर पूर्व को एक सार्थक एजेंडे में डालने का समय ही नहीं है। वायु और सड़क से पहले के मुकाबले अब कहीं बेहतर संपर्क स्थापित हो जाने के बावजूद उत्तर पूर्व के लोगों में एक उपेक्षित भाव सहज ही दिखता है जो राष्ट्रीय मीडिया और दिल्ली के गोल चबूतरे में बैठने वाले मसखरों की वजह से उपजा है। भौगौलिक दूरियों के सिमटने और केंद्र से मिलने वाले पैकेज के बावजूद अगर आज भी उत्तर पूर्व की यही हास्यास्पद स्थिति कायम है तो इस पर चिंता करना लाजमी बनता है। अब जबकि कालेजों के खुलने का समय आ गया है, कम से कम इतनी कोशिश तो होनी ही चाहिए कि उत्तर पूर्व से आने वाले छात्रों के प्रति थोड़ा अतिरिक्त सम्मान भाव बरता जाए ताकि उनके मन में उत्तर भारतीयों की जो अगंभीर छवि की बर्फ जमी हुई है, वो कुछ तो पिघले।

(यह लेख 2 जुलाई, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Jul 1, 2010

हम लोग


चिड़िया की खुशी का विस्तार
उसके आकार से होता है कहीं ज्यादा
लाल बत्ती होने के सेकेंड भर पहले
पार कर ली सड़क
खुश हो लिए
पानी जाने से पहले बचा लिया बालटी में
भोर तक के लिए पानी
सेल खत्म होने के ठीक पहले
खरीद ली
हमेशा मांगती ननद के लिए साड़ी
बेटे के लिए चमकती नकली कार
सिलेंडर खत्म होने से ठीक पहले बना लिया खाना
जोड़ ली ताकत रात में फिर से पति से पिटने के लिए

चिड़िया इसी बचत में पूरी उम्र गुजार जाती है
चिडिया कब जानती है
भेड़िया तो यही चाहता है
चिड़िया की चाहतों का संसार
उसकी फुदकन जितना ही हो
लेकिन जरूरी नहीं
कि भेड़िया भी हमेशा सही ही हो

Jun 15, 2010

कहीं मजाक न बन जाए मौसम पर चैनल


दिल्ली में बारिश की पहली बूंदें पड़ते ही ख्याल आया कि जल्द ही मौसम खुद एक बड़ी खबर बनने जा रहा है। सूचना है कि मौसम विभाग को साल 2010-11 के लिए 156 करोड़ रूपए की राशि दी गई है ताकि मौसम से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तावित परियोजनाओं का प्रारूप अमली जामा पहन सके। यह राशि तीन परियोजनाओं के लिए दी गई है भूकंप से जुड़े खतरों की जानकारी, कॉमन वैल्थ गेम्स के दौरान खिलाड़ियों को मौसम की सूचना देने और मौसम पर आधारित एक चौबीसिया चैनल की शुरूआत के लिए। प्रस्तावित मौसम चैनल का काम मौसम से जुड़ी तमाम जरूरी जानकारियों को आपस में बांधना और उनसे जुड़ी खबरों को जनता तक पहुंचाना होगा।

 

बेशक यह एक स्वागत योग्य कदम है। वैसे भी 400 चैनलों के इस देश में अभी भी नए चैनलों की काफी गुंजाइश दिखाई देती है। भले ही मनोरंजन, फिल्म और न्यूज से संबंधित चैनलों की बाढ़-सी आ गई है लेकिन जहां तक मौसम का सवाल है, यह अभी भी काफी हद तक अनछुआ क्षेत्र ही है। याद कीजिए, दूरदर्शन जब इकलौता चैनल हुआ करता था, तब कैसे समाचारों के अंत में इनसैट 1-बी की तस्वीरों के जरिए मौसम की रटी-रटाई जानकारी दी जाती थी। तब उन रूखी-सूखी तस्वीरों को देखना भी कम रोमांचक नहीं था। हालांकि मौसम की कहानी बताने वाली भाषा भी दर्शक को तब रट चुकी थी। फलां-फलां राज्यों में गरज के साथ छींटे पड़ने की संभावना है, फलां में मौसम शुष्क बना रहेगा और फलां में धूल भरी आंधी चलेगी। यह बात अलग है कि दी जा रही भविष्यवाणियों में से आधी अक्सर गलत ही निकला करती थीं। इसलिए कई दर्शक मौसम की सूचना को भी अपने मनोरंजन के लिए ही सुना करते थे और शर्त लगाया करते थे कि दी जा रही जानकारियों में से कितनी वाकई सही साबित होंगी। (यह बात अलग है कि इसके ले मौसम विभाग को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता)।

 

बाद में निजी चैनल आए तो उन्होंने खूब नए प्रयोग किए। एनडीटीवी तो अपने दफ्तर की छत से ही मौसम की खबर देने लगा और मजे की बात यह कि मौसम का एंकर इतनी लंबी सूचना को याद करके ही देता था। इसके लिए टेलीप्रांप्टर का इस्तेमाल नहीं होता था। इसलिए मौसम की एंकरिंग काफी मशक्कत का काम थी। उन दिनों मौसम की सूचना देने वाला एंकर सारा दिन इसी रेलमपेल में व्यस्त दिखाई दिया करता था। बाद में आज तक ने मौसम को लेकर कई प्रयोग किए। यहां तक कि मौसम के ग्राफिक पर ट्रैक्टर ही चला दिया। ट्रक्टर हर शहर को छूता जाता और उसके साथ ही अधिकतम और न्यूनतम तापमान जिन्न की तरह प्रकट हुए चले जाते। इस प्रक्रिया में एंकर को ही किनारे कर दिया गया।

 

दरअसल लोगों में मौसम का हाल जानने की उत्सुकता हमेशा ही रही है। दूसरे, मौसम पर टिप्पणी संवाद शुरू करने का भी एक सदाबहार तरीका है। जब लोगों के पास संवाद के लायक ज्यादा कुछ नहीं होता, तब भी मौसम पर बात कर अक्सर संवाद को आगे बढ़ा दिया जाता है। हमारे यहां यह कहना बहुत ही आम है कि आज सर्दी बहुत है या गर्मी बहुत है या बारिश पता नहीं कब होगी। मौसम के नाम पर भारतीय आम तौर पर असंतुष्टि और बेहतर मौसम के इंतजार का भाव लिए हुए ही रहते हैं। मौसमों से जुड़े पर्व और पकवान भी मौसम की अहमियत को दिखाते हैं। हमारे यहां मौसम सिर्फ किसान के काम की बात नहीं है, मौसम जिंदगी का फलसफा है।  

 

खैर, तो अब मौसम चैनल आने वाला है। खुशी की बात है। लेकिन इस खुशी को बनाए रखना कोई आसान काम नहीं होगा क्योंकि हमारे यहां मौसम की भविष्यवाणी वैसे ही गाहे-बेगाहे मजाक का विषय बनती रही है। फिर कामन वेल्थ गेम्स की वजह से इसके साथ इस बार प्रतिष्ठा भी जुड़ी होगी।

 

दरअसल चैनल शुरू करने की योजना बनाना और सरकारी खजाने से लबालब पैसा पा लेना आसान हो सकता है लेकिन चौबीसों घंटे के सफेद हाथी को खिलाते-पिलाते-पालते रहना नहीं। चैनल के लिए प्रोग्रामिंग क्या और कैसी होगी, टीम कैसी होगी, कंटेट पर फैसला कौन लेगा, रीसर्च कहां से होगी, पुरानी फुटेज का जुगाड़ कहां से होगा, यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनसे चैनल शुरू करने से काफी पहले निपटना होगा।

 

अगर ऐसा न हुआ तो मौसम चैनल को महज कॉमेडी बनने में कोई ज्यादा देर नहीं लगेगी। उम्मीद है कि चैनल के विचारकों और नीति-निर्धारकों तक गरज के साथ छींटे पहुंच रहे होंगे।

Jun 13, 2010

शब्दहीन

पानी का उफान तेज था
अंदर भी, बाहर भी
फर्क एक ही था
बाहर का उफान सबको दिखता था
अंदर का पानी अंदर ही बहा
उसे कौन बांधता
न पत्थर, न बांध
अंदर का तूफान
खुद ही थमता है
खुद ही से थमता है
अंदर की आवाज भी
अंदर के कान ही सुनते हैं
वे ही जानते हैं
अंदर के मौसम का हाल
अंदर कभी चरमराहट होती है
कभी अकुलाहट
आहटें अंदर का सच हैं
अंदर अपने कदमों के निशान रोज पड़ते हैं
मिट भी जाते हैं
सिसकियां उठतीं हैं
सो जाती हैं

अंदर की तस्वीर भला कौन सा कैमरा खींचे
खुद का अंतस जानने में भी
गुजर जाते हैं बरसों बरस
अंदर की सुरंगें, गलियां, महल, चौबारे, हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो,जनपथ,राजपथ
कितने टांगे हिनहिनाते हैं रोजमरोज
किसे पकड़ूं, किसे छोड़ूं
ये ख्याली तितलियां हैं
कभी उड़ेंगीं, कभी मीनार बन जाएंगी
क्यों न आज
हंस लिया जाए
इसी ख्याल पर।

Jun 10, 2010

हवा हुआ रोमांच


10वीं और 12वीं दोनों के ही नतीजे डाक से स्कूल पहुंचे थे। उस दिन मंदिर होते हुए स्कूल पहुंचे तो उत्साह चरम पर था। उंगली से एक-एक विषय पर हाथ रखते हुए मार्क्स नोट किए थे,तब भी डर बना था कि ऊपर या नीचे वाले के नंबर न लिख बैठें। साल दल साल स्कूलों में नतीजों के आने पर उत्साह, उत्सव, चुप्पी, निराशा का एक मजेदार माहौल बनता था। कुछ वहीं रोने लगते, कुछ भागड़ा डालने लगते। अनगिनत स्कूलों की दीवारों को यह सब कभी भी भूल नहीं सकता। यह साल का सबसे ज्यादा रोमांचक पल होता था।

अब ये बीती बातें हो गई हैं। बीते कुछ सालों से नतीजे कंप्यूटर देता है। निर्धारित दिन पर साइट क्लक कीजिए और नतीजा सामने। दो मिनट के लिए कंप्यूटर के सामने ही नाच-रो लीजिए। फिर खुद भी कंप्यूटर की तरह ही बन जाइए, भावशून्य।

एक और मजे की बात है। कंप्यूटर सुख-दुख के सामाजिक आदान-प्रदान से भी वंचित करता है। न दूसरे को ढांढस बंधाने का मौका देता है, न गले मिलने का। इस बार एक अखबार की चटपटी खबरों के कोने में पढ़ा कि कैसे इस बार सीबीएसई ने प्रेस कांफ्रेस कर पत्रकारों को खास न्यौता नहीं दिया। कंप्यूटर पर आने वाले इन नतीजों ने दरअसल मीडिया के हाथों से भी खबरों के विजुअल छीन लिए हैं। अब विजुअल दिखाएंगे भला क्या। पहले विजुअल के नाम पर सारे नाटकीय रंग घुले-मिले मिलते थे। रिजल्ट की रिपोर्टिंग के लिए चैनलों और अखबारों में कई दिन पहले ही टीमों का गठन होने लगता था। फिर कोशिश की जाती थी कि बोर्ड पर नतीजे देख रही सुंदर लड़कियों की तस्वीरें खास तवज्जो के साथ दिखाई जाएं। उसके बाद वहीं पर उनकी बाइट, प्रिंसिपल का इंटरव्यू, टीचरों की टिप्पणियां, मां-बाप की बधाइयां, मिठाई के डिब्बे और संगीत की धुनें। सब कुछ एक फिल्मी कहानी की तरह जैसे सामने घटता चला जाता। अखबारों की रिपोर्टें भी अगले दिन बड़ा सटीक आंखों देखा हाल देतीं। किस स्कूल में रिजल्ट के दौरान क्या-क्या खास रहा, कहां नतीजे देर से पहुंचे या देर से बोर्ड पर लगे,कहां पीने को पानी भी नहीं था,कहां कोई लड़का बेहोश हो गया और कैसे कुछ पब्लिक स्कूलों के बाहर बच्चों से ज्यादा कारों का हुजूम मौजूद था वगैरह। रिपोर्टिंग सिलसिलेवार ढंग से खूब रसीली बातें कहती दिखती और आकर्षित करती।   

अब वो मजा कंप्यूटर वाले कमरे में सिमट कर रह गया है। अपनी भावना उसी के सामने जाहिर कीजिए और फिर कुछ ही पलों में फेसबुक पर खो जाइए। साल भर की पढ़ाई के बाद नतीजे का दौर अब एकाकी हो चला है। यहां खुद ही को बधाई दीजिए और खुद ही अपने आंसू पोंछिए। फिर धीरे-धीरे बाकी दोस्तों के नंबर देखने में जुट जाइए। दूसरे के अंदर उस समय क्या भाव उमड़ रहे हैं, इसका सही अंदाजा भी यहां क्या मिले।

बेशक कंप्यूटर और इंटरनेट ने दिमागी खिड़कियां खोलने का अंचभेभरा काम किया है लेकिन इस अचंभे की दुनिया से भावनाएं भी बह कर निकल आएं, यह सोचना ही गलत है। बच्चों की दुनिया में नतीजे बड़ी चीज हैं। इंटरनेट ने रोचकता और ज्ञान के एक से बढ़ कर एक अजूबे किए हैं लेकिन इस अजूबे से जब नतीजे की पोटली निकलती है तो बेरंगी ही लगती है।  

May 31, 2010

मंगलौर के दर्द के बीच

हादसे एक ही बात कहते हैं
मंगलौर में हो या मुंबई में
इंसान के रचे हों
या कुदरत से भुगते
कि सांसों का कोई भरोसा नहीं
सबसे अनजानी, अपरिचित सांसें ही हैं
कभी भी, कहीं भी फिसल सकती हैं
अनुलोम-विलोम के बीच
जब रोकती हूं
सांसों को कुछ पलों के लिए अंदर ही
तो लगता है कई बार
कि जाने ये सांसें
अंदर शरीर में कर रही होंगीं क्या गुफ्तगू
क्या बताती होंगी
दिल को
दिमाग को
पेट को
अंतड़ियों को
कि कब छूटने वाली है
सांसों की गठरी

इन सांसों का क्या भरोसा
हो सकता है
जाने की तैयारी का
एक पल भी न दें

अब इन सांसों से मोह भी नहीं होता
दिखती है हर रोज मौत
कितनी-कितनी बार
इनसे दिल करता है
अब खेलूं
पिट्ठूगरम
टेनिस की बॉल की तरह उठाऊं
उछाल दूं आसमान पर
लिख कर अपना पता

हादसे हर बार खुद अपने करीब ले जाते हैं
रूला जाते हैं
किसी और के हिस्से के आंसू
जब बहते हैं
अपनी आंखों से
तो मन की कितनी परतें जानो कैसे खुल-खुल जाती हैं
कितने दिन रहता है मन मुरझाया सा

हादसे रेतीली जमीन को
और पथरा जाते हैं
मौत से मिला जाते हैं गले

भरोसा नहीं अगले पल का
तब भी इतने सामान का ढोना
मौत के रूदन के सामने
इससे बड़ा हास्य भला और क्या होगा

(यह कविता 30 मई, 2010 को जनसत्ता में प्रकाशित हुई)

May 21, 2010

राजधानी के युवा और उनकी दो दुनिया

दिल्ली के एक बड़े रेस्त्रां समूह के किसी भी रेस्त्रां में गर्मी के इन महीनों में जाना बड़ा सुखद लगता है। वजह वहां के पकवान या फिर ठंडे पेय नहीं हैं। वजह है वहां पर उन युवाओं को देखना जो इन दो महीनों में यहां इंटरन्शिप के लिए आते हैं। ये युवा रिसेप्शन पर दिखाई देते हैं, खाने का आर्डर लेते हैं, सामान देते हैं, टेबल से झूठे बर्तन उठाते हैं और ग्राहक की शिकायत को भी अदब से सुनते और तर्क से उनका जवाब देते हैं। इन युवाओं के पास किसी से बतियाने का समय नहीं है। ये अपनी धुन में तल्लीन हैं। इनक पास भरपूर काम है। अगर आप इनसे बहुत इसरार करके बात करना चाहेगें तो ये कारपोरेट मुस्कान के साथ आपको बताएंगें कि ये कुछ सीखने के लिए और पूरे साल के अपने खर्च का कुछ हिस्सा कमाने के लिए यहां पर काम कर रहे हैं। इनके लिए यह काम छोटा नहीं है बल्कि कुछ कर पाने का बेहतरीन अवसर है। ज्यादा टटोलेंगे तो आपको पता चलेगा कि इनमे से कुछेक युवा सिर्फ यहीं पर काम नहीं कर रहे बल्कि वे दूसरी पारी का काम कहीं और भी कर रहे हैं और अपने काम पर इन्हें फख्र है।

इन युवाओं के इस जज्बे को सलाम करने के लिए बार-बार इनसे मिलने जाने का मन करता है। लेकिन ठीक इसी समय दिल्ली के पाश इलाकों में रहने वाले वे युवा भी याद आ जाते हैं जिनकी गर्मी की छुट्टियां थकान उतारने में ही निकल जाती हैं। इन्हें घर से बाहर आने में लू लग जाती है, सुबह जल्दी उठने से रात की बीयर का मजा बेस्वाद हो जाता है और जिनके चेहरे पर एसी के चौबीसों घंटे के पालने के बावजूद मुर्झाहट पसरी रहती है। यह दूसरे किस्म के युवा हैं। ये जिन घरों में पलते हैं, वहां पर कुत्तों और बच्चों की जिंदगी में बहती हुई सुविधाएं होती हैं और इन्हीं में से कई बाद में दलितों की बस्ती में जाकर अपने फोटू छपवा कर बड़े नेता या फिर सरकारी बाबू का दायित्व भी निभा आते हैं। ये दो अलग तरह की जिंदगियां हैं जिनसे तकरीबन रोज ही वास्ता पड़ता है लेकिन मन निराश नहीं होता। मन बार-बार कहता है कि ऐसे रेस्त्रां में काम कर रहे युवाओं की जिंदगी के संघर्ष की कहानी बार-बार दोहराती चली जाए। इसलिए नहीं कि मन उनका शुभ नहीं चाहता,बल्कि इसलिए कि मन उनका बेहद स्थाई शुभ चाहता है। रेस्त्रां में काम करते ये बच्चे जब सिविल सर्विस पास कर जाते हैं या फिर किसी बड़ी कंपनी के कर्ता-धर्ता बन बैठते हैं तो जमीनी हकीकत की पाठशाला में पढ़े सबक भी उनके साथ चलते हैं। ये नहीं भूलते कि कैसे हर रोज इनका सामना जिंदगी के कई जालों से होता था और उनसे गुजर कर कैसे इन्होंने खुद अपने पसीने से अपनी दुनिया को बुना है।

और मजे की बात यह कि ये मेहनतकश युवा मीडिया की कवरेज के लायक तब तक नहीं बनते, जब तक इनके हाथ में कोई तमगा आ नहीं जाता। दूसरी तरफ झुनझुने वाले नवाबजादे खबर तब बनते हैं जब किसी रात शराब के नशे में वे किसी फुटपाथी को कुचल कर भाग रहे होते हैं और फिर उनके पिता उन्हें बचाने की जुगत में लगते हैं।

ये दो अलग-अलग किस्म के युवा असल में इंडिया और भारत हैं। इन दोनों से मिल कर देखिए। जिंदगी का फलसफा समझ में आने लगेगा।  

(यह लेख 21 मई, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

May 19, 2010

झोंका जो आया अतीत की खिड़की से

अनार के दाने ही थे
वो पल
गिलहरी की तरह गुदगुदाते आए
फिर बह गए

वो शहतूत की बेरियां
कच्चे आमों की नटखट अटखेलियां
आसमान के जितने टुकड़े दिखते
अपनेपन से भरे लगते
घर का फाटक और
फाटक के पास से गुजरते लोग
उनके चेहरे के भाव
जो घर आते, वो भी भले लगते
न आने वाले भी किसी सुख के साये में जीते ही लगते

असल में तब परिभाषा शायद सुख की ही थी
कहां जाना कौन थे बुद्धा, राम या रहीम
किसी का फलसफा पढ़ा ही कहां था
लेकिन मन में शांति की चादर ऐसी लंबी थी
कि तमाम सरहदें पार कर लेती

उन गुनगुने दिनों में रिश्ते जितने थे
अपने थे
शहरों गांवों-कस्बों की सीमाओं से परे

वो शहतूत अब दिखते नहीं
रिक्शे की ऊबड़-खाबर सवारी
कचनार के खिले से रंग
पेट में उठती उल्लास की हूक
हर शब्द से झरता प्यार

सब कुछ इतिहास क्या इतनी जल्दी हो जाता है?

Apr 28, 2010

राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाते खाली दिमाग

दिल्ली के एक मॉल में लोग फिल्म देखने गए थे लेकिन वहां उनका साक्षात्कार परदे की फिल्म की बजाय असली जिंदगी की फिल्म से ही हो गया। फिल्म शुरू होने से कुछ मिनटों पहले किसी ने एक न्यूज चैनल को एक फैक्स भेजा और धमकी लिखी कि मॉल में कुछ ही मिनटों में धमाका होने वाला है।

बस, इतना करने की देर थी कि दिल्ली पुलिस अपने लाव-लश्कर के साथ वहां पहुंच गई। फिल्म की स्क्रीनिंग कुछ समय के लिए टाल दी गई और तलाशी शुरू हो गई। तलाशी कुत्ते भी आए थे जो सूंघ-सूंघ कर बेहाल होते गए। कुछ घंटों की इस कवायद में 15 लाख रूपए का नुकसान हुआ और डॉग स्कवॉड, बम स्कवॉड से लेकर पुलिस के तमाम विशेषज्ञों का जो समय खर्च हुआ, सो अलग।

इस घटना की मीडिया में कवरेज हुई और अगले दिन की अखबारों में फोटो सहित विवरण भी मिला लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। पिछले दो दिनों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होक्स कॉल की यह छठी घटना है। जरा याद कीजए।। हर साल गर्मी कि शुरूआत होते ही खास तौर पर ऐसी होक्स कॉलों का सिलसिला जैसे चल निकलता है। ये फोन कौन करता है, क्यों करता है, इसके जरिए उसे हासिल क्या होता है। आम तौर पर ऐसी कॉलों के पीछे किसी आंतकी संगठन का हाथ शायद ही मिलता है। इन कॉलों को अक्सर वे युवा या छात्र करते हैं जिन्हें छुट्टी के दिन में करने को कुछ नहीं होता और जिन्हें रोमांच की तलाश होती है। ऐसे फोन करने के बाद या तो वे खुद मौके पर पहुंच कर कथित नजारे का मजा लेते हैं या फिर टीवी पर अपने कारनामे का लाइव तमाशा देखते हैं।

खैर, ऐसा करने वाले अक्सर पकड़े भी जाते हैं और मैं बात इसी मुद्दे की करना चाहती हूं। जो पकड़े जाते हैं, उनके साथ होता क्या है। क्या उन्हें कोई सजा होती है, क्या उन पर कोई मुकद्दमा चलता है या उन पर कोई बड़ा जुर्माना लगाया जाता है या फिर उनका कोई सार्वजनिक बहिष्कार होता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इनमें से शायद कुछ भी ठोस होता ही नहीं। पुलिस की फटकार मिलती है, समाज अगले दिन ऐसा करने वालों को भुला देता है और आस-पास के युवाओं की नजर में ऐसा करने वाला एक हीरो की तरह उभर आता है। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि हमारे यहां खाली समय के धनी लोगों की कोई कमी है ही नहीं। फिरोजपुर में इकनोमिक्स के हमारे एक टीचर होते थे- राठौर सर। वो अक्सर एक बात कहते थे। युवाओं से अगर कहा जाए कि घास उखाड़नी है तो शायद ऐसा करने में उनकी इज्जत में कमी आ जाए लेकिन अगर उन सबको मैदान में बिठा कर कोई लेक्चर सुनाने लगे तो वे अनमने भाव में शायद सारे मैदान की घास की उखाड़ डालें। यहां भी यही मामला है। हमारे यहां स्कूलों के खाली बच्चों की जमात दिखाई देती है। हां, ऐसे बच्चे भी हैं जो गर्मियों की छुट्टों में कुछ सीखने में समय लगाते हैं, रेस्त्रां में नौकरी करते हैं या किसी सामाजिक काम से जुड़ जाते हैं लेकिन शहरों में ऐसे बच्चों की तादाद काफी कम हैं। यहां के मध्यमवर्ग औऱ उच्च वर्ग के बाब लोग गर्मी की पूरी छुट्टियां थकान उतारने में ऐसे लगाते हैं मानो निराला की कविता की महिला की तरह इलाहाबाद के पथ पर पूरे साल पत्थर ही तोड़ते रहे हों। यह खाली दिमागों का शैतानी अस्तबल है। एसी रूम में बैठ कर ये अपनी बोरियत मिटाने और हीरो बनने के लिए सामाजिक-सरकारी-राष्ट्रीय पूंजियों से खेलने में इन्हें कोई परहेज नहीं होता। और विडंबना तो देखिए। ऐसी खुराफातें करने वाले जब पकड़े जाते हैं तो मीडिया में इनकी छुटकिया से खबर भी मुश्किल से आती है। ये हर बार सजा से तब तक बचते चले जाते हैं जब तक कि ये कोई ऐसा बड़ा कारनामा नहीं कर डालते जहां इनके पापा लोगों का रूतबा काम नहीं आता।

लगता यही है कि अब ऐसे तमाशे न हों इसके लिए मीडिया को होक्स कॉलों को करने वालों पर सख्ती से स्टोरीज करनी चाहिए और पुलिस और कानून को भी इन्हें किसी हाल में बख्शना नहीं चाहिए। क्योंकि अपनी बोरियत मिटाने के लिए जिस पैसे को ये उड़ा डालते हैं, वो टैक्स देने वालों के पसीने की उपज हैं। इनसे हमदर्दी करना किसी दरिंदगी से कम नहीं होगा। सोचिए कि अगर कभी ऐसा हो कि होक्स कॉल की वजह से पुलिस किसी एक कोने में सिमटी हो और असली वारदात कहीं और हो जाए तो। इसलिए अब ऐसे सिरफिरों को माफी देने का समय जा चुका है।

(यह लेख दैनिक भास्कर में 28 अप्रैल, 2010 को प्रकाशित हुआ)

Apr 25, 2010

एक ख्वाब की कब्रगाह

लो मर गई मरजानी
तब भी चैन नहीं
देह से झांक कर देख रही है तमाशा
कुनबुना रहे हैं पति
बेवजह छूट गया दफ्तर सोमवार के दिन ही
बच्चों की छटपटाहट
काश मरतीं कल शाम ही
नहीं करनी पड़ती तैयारी टेस्ट की

अब कौन लाए फूलों की माला इस तपती धूप में
नई चादर
कौन करे फोन
कि आओ मरजानी पड़ी है यहां
देख जाओ जाने से पहले कि
तुम्हें पता लगेगा नहीं
वो मरी कि मारी गई

मरजानी जानती है
नौकरानी को नहीं मिल रहा
हल्दी का पैकेट
पति को अपनी बनियान
बेटे को अपनी छिपाई सीडी
कैसे बताए मरजानी
अलमारी के किन कोनों में
सरकी पड़ी हैं चीजें

मरजानी तो अभी है
पुराने कफन में
कि मौत से पहले
गर तैयार कर लिया होता बाकी का सामान भी खुद ही
तो न होता किसी का सोमवार बेकार

कौन जाने
आसान नहीं होता मरजानी होना
चुपके से मरना
हौले-हौले मरना
दब-दब कर मरना
और मरना
ये मरना सोमवार को कहां हुआ
मरना तो कब से रोज होता रहा
मरजानी को खबर थी
घर की दीवारों को
रंगों को
चिटकनियों को
बर्तनों को
गीले तकियों को
बस उसे ही खबर नहीं थी
जिसका हो गया सोमवार बेकार

Apr 24, 2010

संवाद


नहीं सुनी बाहर की आवाज
अंदर शोर काफी था
इतना बड़ा संसार
हरे पेड़, सूखे सागर भी
बहुत सी झीलें, चुप्पी साधतीं नदियां
अंदर रौशनी की मेला भी, सुरंगों की गिनती कोई नहीं
अपने कई, अपनेपन से दूर भी
खिलखिलाहटें अंतहीन, नाजुक लकीरें भी
सपने भर-भर छलकते रहे
नहीं समाए अंजुरी में
इस शोर में बड़ी तेज भागी जिंदगी
अंदर का हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो
चित्रकार-कलाकार
अंदर इतनी मछलियां, इतनी चिड़िया, इतने घोंसले
बताओ तुमसे बात कब करती
और क्यों?

Apr 13, 2010

आतंक के महिमामंडन से घबराया मंत्रालय

                    

 

जब से दंतेवाड़ा की घटना से सब सहमे हुए हैं,देश का सूचना और प्रसारण मंत्रालय अब आतंकियों के महिमामंडन को लेकर जाग उठा है। हाल ही में मंत्रालय ने देश के सभी टीवी चैनलों को निर्देश दिया कि वे आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों को जरूरत से ज्यादा कवरेज न दें और साथ ही उनसे जुड़ी घटनाओं को अतिरिक्त जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ कवर किया जाए। हालांकि यह निर्देश दंतेवाड़ा की घटना के पहले का है लेकिन इस घटना के बाद वह और भी ज्यादा प्रासंगिक हो उठा है।

 

इस निर्देश में आतंकियों के साथ इंटरव्यू दिए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा गया है कि ऐसा होने से आंतकियों को अपना राजनीतिक एजेंडा स्थापित करने में मदद मिल सकती है। इस निर्देश में कड़ाई की आवाज को मिलाने के लिए केबल टीवी अधिनियम 1995 के प्रोग्राम कोड का हवाला भी दिया गया है। इसके साथ ही मंत्रालय ने यह सफाई भी दी है कि यह सुझाव राष्ट्रीय हित में और गृह मंत्रालय की सलाह पर दिए गए हैं।

 

यहां दो मुद्दे दिखाई देते हैं। एक तो है आतंक के दैत्यीकरण का और दूसरे उसके अप्रत्यक्ष तौर पर महिमामंडन का। जैसे फिल्मों में पुलिस के देर से आने की छवि पक चुकी है, वैसे ही आतंकवादी के आधुनिक, युवा और तकनीक में पारंगत होने की छवि ने अपनी पक्की जगह बना ली है। आतंकी मीडिया के भरपूर दोहन की कहानी समझ चुका है और हैरानी की बात यह कि कई बार वह संवेदना भी बटोर ले जाता है। कसाब की सुरक्षा पर हो रहा खर्च या उसे फांसी पर लटकाया जाना मानव अधिकार की विभिन्न परिधियों में आकर बहस की वजह बन सकता है।

  

 

लेकिन यहां एक मुद्दा और भी है और वह है खुद पत्रकारों की सुरक्षा का। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि दुनियाभर में पत्रकारों को आतंकवाद की एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है। अल्जीरिया,कोलंबिया,स्पेन से लेकर फिलीपींस तक में बहुत से पत्रकारों का अपहरण हुआ है,हत्याएं हुई हैं। वॉल स्ट्रीट जरनल के पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या ने खोजी पत्रकारिता से जुड़े जोखिम को जैसे उधेड़ कर ही रख दिया था। भारत में भी पत्रकार लगातार ऐसे जोखिमों से खेलते रहे हैं चाहे वो कश्मीर के मामले में हो या नक्सलवाद के मामले में। पत्रकारिता से जुड़े जोखिम से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर कभी बहुत हंगामा होते नहीं देखा गया।  

 

खैर,बात हो रही थी सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जारी हिदायत की। दरअसल पिछले दो-चार साल में मंत्रालय की तरफ से ऐसी हिदायतों को जारी करने का मौसम काफी जोर पकड़ चुका है। मुंबई हमले की लाइव कवरेज के दौरान जब दुनिया भर की नजरें हमारी कवरेज पर थीं, तब भी कवरेज के गैर-जिम्मेदाराना हो जाने की बातें उठी थीं। कहा गया कि टीवी पर अपराध लाइव प्रस्तुतिकरण की वजह से बचाव कार्य में बाधा तो आती ही है, साथ ही सुरक्षा पर सेंध लगाए जाने के आसार भी कई गुणा बढ़ जाते हैं। यह कहा गया कि मीडिया कई बार अपराध और आतंक को किंग साइज इमेज दे देता है जो सिविल सोसाइटी के लिए खतरनाक हो सकता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि किसी बच्चे को तेज कंप्यूटर गेम खेलने की आदत पड़ जाए और फिर बड़े होने पर वो खुद भी सड़क पर कुछ वैसे ही उच्छृंखल अंदाज में अपनी गाड़ी को दौड़ाने लग जाए और डरे भी न।

 

लेकिन यहां कुछ बातें समझ में नहीं आतीं। भारत में सूचना और प्रसारण से संबंधी तमाम नीतिगत अधिकार सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पास हैं और मंत्रालय के गठन से लेकर आज तक कभी भी मंत्रालय के आदेशों में न तो पूरी गंभीरता दिखाई दी और न ही कड़ाई। दूसरे, हिदायतें भी आधी-अधूरी ही दिखाई दीं और तीसरे, कभी भी इस बात का खुलासा ठीक से हुआ नहीं कि हिदायत के ठीक से लागू न होने पर मंत्रालय ने क्या एक्शन लिया।

 

यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवाद चाहे किसी भी किस्म का हो, खबर बनता ही है। लेकिन उस खबर का आकार क्या हो, इसे तय करने का अधिकार अब एडिटोरियल के हाथों से सरक कर अब अखबार की पूरी व्यवस्था के एख बड़े तंत्र के हाथों में पहुंच गया है।
 

इसके अलावा प्रेस की स्वतंत्रता की परिधि क्या हो, यह भी तय नहीं हो सका है। इसलिए लगता यही है कि समय हिदायतें देने या बंदिशें लगाने का नहीं है बल्कि एक खुले माहौल की जमीन को तैयार करने का है।

 

 

( यह लेख 11 अप्रैल, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)

Apr 3, 2010

वो बत्ती, वो रातें

बचपन में
बत्ती चले जाने में भी
गजब का सुख था
हम चारपाई पे बैठे तारे गिनते
एक कोने से उस कोने तक
जहां तक फैल जाती नजर
हर बार गिनती गड़बड़ा जाती
हर बार विशवास गहरा जाता
अगली बार होगी सही गिनती
बत्ती का न होना
सपनों के लहलहा उठने का समय होता
सपने उछल-मचल आते
बड़े होंगे तो जाने क्या-क्या न करेंगें
बत्ती के गुल होते ही
जुगनू बनाने लगते अपना घेरा
उनकी सरगम सुख भर देती
पापा कहते भर लो जुगनू हथेली में
अम्मा हंस के पूछती
कौन-सी पढ़ी नई कविता
पास से आती घास की खुशबू में
कभी पूस की रात का ख्याल आता
कभी गौरा का
तभी बत्ती आ जाती
उसका आना भी उत्सव बनता
अम्मा कहती
होती है जिंदगी भी ऐसी ही
कभी रौशन, कभी अंधेरी
सच में बत्ती का जाना
खुले आसमान में देता था जो संवाद
उसे वो रातें ही समझ सकती हैं
जब होती थी बत्ती गुल।