Oct 11, 2026
Jun 14, 2025
दरकते संबंधों की दहक: हस्तक्षेप: प्रोफेसर (डॉ.) वर्तिका नन्दा, मीडिया विश्लेषक: 14 June, 2025
शब्द-संख्या:1091
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जब तक अपराध की कोई नई खबर नहीं आएगी, तब तक सुर्खियों में रहेगी सोनम. सोनम के बहाने एक पूरी फिल्मी कहानी तैयार है. इसमें सस्पेंस, थ्रिलर, खौफ, साजिश, हत्या, जेल- सब कुछ है और खास बात यह कि एक अलग तरह का नैरेटिव है. केंद्र में एक युवती, नई नवेली व्याहता और वो ही कथित तौर पर हत्यारिन. मेघालय में अंजाम पर पहुंची इस कहानी का अतीत और उसका निकट भविष्य भी चर्चा में है.
अब तक इस कथा का जो सार बुना गया है, उसके कुछ बीज शब्द हैं- आधुनिक युवतियों का स्वार्थी, निष्ठुर, गैर-संस्कारी और यहां तक कि हत्यारिन भी होना. अब सैट किए गए इसी नैरेटिव के आधार पर अगले कुछ दिनों तक कहानियों के प्लॉट लिखे जाएंगे. खास तौर पर तब तक जब तक कि मीडिया के हाथ कोई नई आपराधिक कहानी नहीं लगती.
अपराध कैसे, कब, क्यों हुआ- इस पर खबरों की कोई कमी नहीं लेकिन मैं बात इस एक खबर के प्रभाव पर करना चाहूंगी.
टेलीविजन एक खबर को कई बार दिखाता है, अलग-अलग तरीकों से दिखाता है, खबर को परोसने के लिए हर संभव मसाले का उपयोग करता है ताकि टीआरपी के जरिए मालिक की तिजोरी लबालब रहे. सोनम जैसी घटना को मिलने वाली प्राथमिकता और रिपोर्टिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द विवाह जैसी गंभीर संस्था को अब गैर-जरूरी बताने लगे हैं. एक घटना मानो यह साबित करने के लिए काफी है कि विवाह से बचा जाए.
नैरेटिव यह भी बन रहा है कि मानो महिलाएं अब हत्या करने से गुरेज नहीं करतीं. वे आपराधिक हो गईं है. अब उन्हें पुरुष के साथ की जरूरत नहीं. वे क्रूर हैं. अपनी बात न माने जाने पर वे साजिश रच सकती हैं, किसी गंभीर अपराध को अंजाम दे सकती हैं. इसे साबित करने की कोशिश करने वाला मीडिया यह भूल जाता है कि पूरी दुनिया में महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अपराध की प्रवृत्ति बेहद कम होती है. भारत की जेलों में पुरुषों की तुलना में औसतन 4 प्रतिशत महिलाएं जेलों में बंद होती हैं.
किसी महिला का अपने ही पति की हत्या में संलिप्त पाया जाना एक अस्वाभाविक घटना है जिसमें समाज की स्वाभाविक रुचि बनती है लेकिन घटना की तह तक पहुंचने से पहले ही या फिर अपराध के साबित होने पर भी मीडिया की रिपोर्टिंग की टोन आने वाले समय में महिला अधिकारों और महिलाओं पर होने वाले अपराधों पर लिए जाने वाले फैसलों को प्रभावित करेगी. महिलाओं के अहित में सोचने वालों के लिए सोनम एक हथियार साबित होगी.
मीडिया और समाज का ध्यान साजिश, अपराध, पुलिस, अदालत और जेल तक सीमित रह जाता है. वह न तो पारिवारिक पृष्ठभूमि पर गहन चिंतन करता है, न जेल औऱ पश्चाताप पर. किसी भी परिवार में कोई भी एकाएक न अपराधी बनता है, न अपराध करता है. उसके कुछ लक्षण और संकेत होते हैं जिन्हें परिवार या तो नजरअंंदाज करता है या छिपा जाता है. आपराधिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को इससे सहज शह मिलती है. बाद में अपराध होने पर परिवार को वे सभी संकेत याद आने लगते हैं.
जेल पर ध्यान वहीं तक जाता है, जब तक कोई व्यक्ति उस दहलीज को पार कर अंदर चला जाता है. उसके बाद अंदाजों की रिपोर्टिंग होती है और फिर अगली खबर की तलाश शुरु. मीडिया को जेल तब ही लुभाती है जब उसे जेल से या तो सनसनी मिले या फिर टीआरपी के तौर पर पैसा. सामाजिक सरोकार की यहां कोई जगह नहीं.
2016-2017 में तिनका तिनका मध्यप्रदेश पर काम हो रहा था. तिनका तिनका फाउंडेशन से प्रकाशित यह किताब आज भी भारतीय जेलों पर इकलौती कॉफी टेबल बुक है. उस दौरान कई ऐसे बंदियों से मिलने का अवसर मिला जो आजीवन कारावास पर थे. 2017 में केंद्रीय जेल, भोपाल में जन्माष्टमी पर कुछ बंदियों की रिहाई के आदेश आए थे. अगली सुबह रिहाई थी. वे जेल की देहरी पर बैठे थे. उन सभी बंदियों के स्वर में एक ही बात थी- अपराध करके गलती की. एक अपराध ने उनसे जैसे सब कुछ छीन लिया था. उनमें 75 साल के एक बंदी से 14 साल में कोई भी मिलने नहीं आया था. वो देहरी पर बैठे-बैठे कई बार कह चुका था कि वो रिहा नहीं होना चाहता. जेल के बाहर उसे एक और बड़ी जेल मिलने का अंदेशा था.
अपराध के बाद का अगला पड़ाव पश्चाताप और जिंदगी पर हमेशा के लिए लगने वाला विराम भी हो सकता है लेकिन मीडिया और समाज जैसे यह जतलाने की कोशिश करता है कि कानून लचीला है, अपराधी चालाक. इसलिए अपराधी के बचने के आसार ज्यादा हैं. ऐसा अक्सर होता नहीं.
1995 में सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी नैना साहनी की हत्या की थी. फिर उसके शव को टुकड़ों मे काटकर तंदूर में जलाने की कोशिश की थी. बाद में पकड़ा गया. उसने तिहाड़ जेल में उम्रकैदी के तौर पर 23 साल काटे. आज भी यह मामला लोगों के जहन में है. तब भी एक कथानक सेट किया गया था लेकिन सच यही है कि सभी पति सुशील की तरह हत्या नहीं करते.
2022 में दिल्ली पुलिस ने – किस्सा खाकी का- पॉडकास्ट सीरीज की शुरुआत की थी. इसके अब 175 अंक पूरे हो गए हैं. – किस्सा खाकी का- अपराध के सुलझने की सच्ची कहानियों को हर रविवार प्रसारित करता है. इनमें ऐसी कई कहानियां हैं जिनमें पुलिस ने अपराधियों के बेहद शातिर होने के बावजूद उन्हें दबोच लिया. सनसनी के बिना प्रसारित होने वाली यह कहानियां समाज को सचेत और जागरुक करती हैं. यहां मकसद मानवीय सरोकारों का है. सरोकार और व्यापारिक मंशाओं के बीच का लंबा फासला अपराध रिपोर्टिंग के स्वर को प्रभावित करता है.
2025 में सोनम के मामले में जो कहानी बनेगी, उसे लेकर भी सावधान रहना होगा. इसलिए भी कि मुख्यधारा की मीडिया कई बार अपराधों की अतिरेक रिपोर्टिंग करते हुए देश-विदेश के कई अहम जरूरी मुद्दों को नजरअंदाज कर जाती है. पर्यावरण से लेकर परीक्षाओं तक, बदलाव से लेकर विकास तक की कई कहानियां टीवी या अखबार में अपनी जगह सिर्फ इसलिए खो देती है कि उस समय केंद्र में होता है किसी एक खबर से मिलने वाली लोकप्रियता.
बहरहाल, सोनम और राजा की यह घटना डर, शक और अविश्वास की जमीन तैयार कर रही है. स्त्री-पुरुष के दरकते संबंध, शोर मचाता मीडिया, रिपोर्टिंग को देख रहे समाज की संवेदनहीनता, तत्परता से जज बन बैठने की प्रवृत्ति, रोते चेहरों को दिखाने की होड़, अदालती फैसले से पहले खुद ही न्यायाधीश बन जाने की हड़बड़ी और महिलाओं के शोषण के गंभीर मामलों को अब मौका पाकर टंडे बक्से में डाल देने की कोशिश से हम एक ऐसे समाज को तैयार कर रहे हैं जो ठीक वैसा ही है जैसा उसे नहीं होना चाहिए.
Newspaper Link: http://www.rashtriyasahara.com/imageview_77583_106143350_4_9_14-06-2025_0_i_1_sf.html
YouTube Link: https: साजिश, अपराध, पुलिस और जेल ।Sonam and Raja Story । Crime । Vartika Nanda - YouTube
प्रोफेसर (डॉ.) वर्तिका नन्दा
Dec 29, 2022
2022: Yearend special on Media: वैकल्पिक मीडिया में है एक तिनका उम्मीद
Apr 2, 2022
गंगूबाई के बहाने जीबी रोड और तिनका तिनका जेल की बात
एक बार रमणीक मिल जाता तो उससे पूछती। इस बात को गंगूबाई जब फिल्म के एक दूसरे प्रमुख किरदार और पत्रकार के आगे कहती है तो उसका जवाब होता है कि उसका न मिलना ही बेहतर है। जब तक रमणीक नही मिलेगा, मन की आग बनी रहेगी।
शायद यही इस फिल्म का सार है और जिंदगी का एक बड़ा फलसफा भी। जिस इंसान की वजह से दुख मिला हो, वो दोबारा न मिले तो अच्छा है।
गंगुबाई काठियावाड़ी मुंबई के रेड लाइट एरिया में काम करने वाली गंगुबाई पर संजय लीला भंसाली की फिल्म है। इस फिल्म को देखते हुए मैं जीबी रोड की उन गलियों की तरफ बरबस खींची चली गई जिन्हें मैंने 1998 के आसपास बहुत करीब से देखा था। एक दिन मैं और दिल्ली पुलिस की एक महिला अधिकारी रिक्शे में वहां पर गए थे। हम दोनों ने तकरीबन पूरा दिन जीबी रोड में गुजारा था। दूसरी बार मैं टेलीविजन की एक कैमरा टीम के साथ वहां गई थी। उसके बाद मैंने इसी टीवी चैनल के दफ्तर में रहते हुए कई महीनों तक एक उपन्यास को लिखा जो काफी हद तक पूरा हो गया था लेकिन उसे कुछ वजहों से मैंने वहीं रोक दिया लेकिन जीबी रोड की वो तंग गलियां मेरे दिमाग पर हावी रहीं। बाद में भी अपराध बीट की प्रमुख के तौर पर स्याह-सफेद कई पगडॉडियां दिखती रहीं।
अपराध पर ही पीएचडी करने और फिर जेलों पर उपजे- तिनका तिनका- में जीबी रोड के अंश बने रहे। कई ऐसी महिलाएं भी मेरे संपर्क में रहीं जो जेल से छूटने के बाद इन कोठों पर पहुंच गईं क्योंकि समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया था। वे एक जेल से निकलीं और दूसरी जेल में पहुंच गईं। बहुत ही कम लोगों को इस बात का अहसास था कि जेल पर मेरे काम को एक बड़ा हिस्सा जीबी रोड को देखने और महसूस करने के उस अनुभव से निकला था। बहरहाल, फिल्म की बात।
गंगूबाई के हाथों में तांबे का एक पारंपरिक डिब्बा है। वो रमणीक के साथ अपना शहर छोड़ कर मुंबई भाग रही है। हाथों में पकड़े हुए उसके डिब्बे में उसके मां-बाप की जमा पूंजी है और उनके जेवर। घरवालों को बिना-बताए भाग कर जाने वाली यह लड़की बरसो पहले की उन लड़कियों की कहानी बताती है जिन्हें फिल्मी चमक अपनी तरफ खींचती है। गंगूबाई, यानी कि गंगा, रमणीक को जब वो डिब्बा देती है, तभी अचानक उसकी नजर अलमारी की चाबी की तरफ जाती है जो वो गलती से अपने साथ ले आई है। इस चाबी को वो ता-उम्र अपने सीने से लगाए रखती है। करीब 11 साल बाद वो अपने घर पर फोन करती है तो अपनी मां को इस बात को कहना नहीं भूलती कि घर से भागते वक्त चाबी उसके साथ चली आई थी। फोन की दूसरी तरफ मां की आवाज में रूखापन है, एक अजनबीपन, बीच-बीच में टेलीफोन ऑपरेटर की टोकती आवाज कि अब महज 30 सेकंड बचे हैं, गंगूबाई को अपनी बात को पूरा नहीं करने देती। फोन कट जाता है, कसक बनी रहती है।
-डॉ. वर्तिका नन्दा
Sep 22, 2020
प्रिंस से रिया तक मीडिया से एक तिनका उम्मीद
प्रिंस से रिया तक मीडिया से एक तिनका उम्मीद
डॉ. वर्तिका नन्दा
1994 से लेकर अब
तक अपराध पत्रकारिता से ताल्लुक रहा। 1994 में जब जी टीवी की शुरुआत हुई, यही वह समय था जब सुशील शर्मा का तंदूर कांड हुआ। सुशील शर्मा कई दिनों तक फरार रहा। आखिरकार वह
पुलिस की गिरफ्त में आया और तिहाड़ में आजीवन कारावास पर रहने के बाद हाल में रिहा
हुआ। अपराध की रिपोर्टिंग के असर की यह पहली मिसाल थी जिसकी मैं साक्षी बनी। जे 27
साउथ एक्स पार्ट 1, नई दिल्ली के रिहाइशी इलाके में बने फ्लैटनुमा दफ्तर में इस
खबर के पहले प्रसारण के बाद सुशील शर्मा के पकड़े जाने तक दफ्तर में फोन की कई
घंटियां बजीं। दर्शक चाहते थे कि अपनी पत्नी नैना को गोली मार कर टुकड़ों में काट
कर तंदूर में डाल कर जला देने वाले सुशील को कड़ी सजा जरूर मिले। मिली भी।
बाद में एनडीटीवी
के क्राइम बीट की प्रमुख के तौर पर अपराध के अलग- अलग रंगों को करीब
से देखा। फिर उसके बाद तिनका तिनका की शुरुआत हुई जिसके जरिए जेल की जिंदगी से अपराध को समझने की
कोशिश की। इस लिहाज से अपराध की कई परतों
को पत्रकार और अकादमिक के तौर पर नजदीकी से देखा और महसूस किया। पुलिस की तफ्तीश
और जेल सुधार के तौर पर जेल के अंदर किस तरह से अपराधी या फिर आरोपी एक दूसरी यात्रा तरह
करते हैं, उसे देखा।
इस बीच टीवी रिपोर्टिंग
को भी गौर से समझने की कोशिश की। हाल में रिया और कंगना की रिपोर्टिंग ने इस बात पर ध्यान
दिलाया कि शायद अब इस मुद्दे पर लिखना ज़रूरी है और इसलिए यह आलेख।
बात टीवी की उस खबर
से शुरू करनी चाहिए जहां एक टेलीविजन चैनल ब्रेकिंग न्यूज की पट्टी के साथ यह बताता है कि रिया जेल में
आने के बाद 11 बजे तक चहलकदमी करती रही और 2:30 बजे तक बिस्तर पर बैठी रही। उसे दाल,
रोटी और एक सब्जी दी गई। सुबह उसने मुंह धोया और फिर वो अपने बिस्तर पर बैठ गई। टीवी
चैनलों ने यह भी बताया कि रिया के बैरक में पंखा नहीं है, एक चटाई है, सराहना नहीं है वगैरह तो लगा
जैसे यह सब किसी
जेल में पहली बार होने
जा रहा हो। जिन्होंने जेल को कभी नहीं देखा, उनके
लिए यह बात एक
खबर हो सकती है और इसलिए भी कि ऐसी बताई बातों की पुष्टि करने वाला कभी कोई नहीं होता।
अपराध पत्रकारिता
की रिपोर्टिंग में इसे पत्रकारिता तो नहीं कहा जा सकता है। रिया के मामले से पहले भी और अब भी दर्शकों को अक्सर जो
परोसा जाता है, वह रिपोर्टिंग कम और मनोहर कहानियों का टीवी संस्करण ज्यादा दिखता
है। यह कहानी भी उसी की एक कड़ी है।
एक ज़रूरी बात यह
है कि जेल की कहानियां बताते समय कल्पनाओं का सहारा लेना भारतीय
टीवी पत्रकारों की एक पुरानी आदत रही है। वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि जेलें आमतौर
पर सामने आकर न तो ऐसी बेतुकी
कहानियों पर कोई हामी भरेंगी और न ही इनकार
करेंगी क्योंकि जेलों
को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि पत्रकार जेल के बाहर क्या कह रहा है। जेल अधिकारी बखूबी जानते हैं कि जिन पत्रकारों
ने जेल को कभी देखा तक नहीं, उनके पास कल्पना ही इकलौता सहारा है औऱ दर्शकों के पास अधकचरी खबर देने वाले पत्रकारों का
सहारा। दूसरी बात यह भी है कि कुछ बातें स्वाभाविक हैं जिन्हें लिखने या बोलने का कोई औचित्य है ही नहीं। जो जेल में गया है, उसे स्वाभाविक तौर पर शुरुआती दिनों में नींद
नहीं आएगी, वह खाना नहीं खाएगा
और बेचैन रहेगा। इसमें ब्रेकिंग न्यूज जैसी कोई बात है ही नहीं।
इसलिए रिया का भी
जेल में रात में चहलकदमी करना या 2:30 बजे तक बैठे रहना कोई बड़ी बात नहीं
है। इसका खंडन करने कोई सामने आएगा नहीं और इसलिए इस तरह की खबर को
बार-बार बताते
रहने से टीवी चैनल का फायदा यह होता है कि वो उत्सुक जनता को कुछ ऐसा सौंपने में कामयाब
होता है जो उसके
लिए रोचक या दिलचस्प हो सकता है, यह समझे बिना कि टीवी न्यूज मनोरंजन की श्रेणी में जरूर आने लगा है लेकिन
जेलें मनोरंजन का सामान कतई नहीं हैं। जेल एक गंभीर जगह है और उसकी अपनी अंतहीन
पेचीदगियां हैं। उन पर हंसा नहीं जा सकता।
अपराध रिपोर्टिंग की अपनी एक प़ृष्ठभूमि के बाद यह बात कह सकती हूं
कि अपराध
की रिपोर्टिंग के जिस नये
चेहरे को
अब देख रही हूं, उसे अपराध पत्रकारिता मानना असान नही लगता। दूसरी छवि उस पोस्टमैन की है जो कंगना
के घर पर डाक लेकर आया था । वो बार-बार जोर देकर यह कह रहा
था कि वह महज़
एक पोस्टमैन है। उसका इस दफ्तर को तोड़ने से कोई ताल्लुक नहीं है ,लेकिन पत्रकार अपने
रटे-रटाये
सवाल को पूछ- पूछ कर शोर मचाते रहे और उस शोर के ज़रिए पत्रकारिता की छवियों का मज़ाक
उठाते रहे।
अंदाजे की यह पत्रकारिता
को ऐसे मौके किसी अवसर से कम नहीं लगते। अब सवाल यह उठता
है कि क्या पत्रकारिता
की यह स्थिति
अचानक आई है। ऐसा नहीं
है। प्रिंस के गढ़्ढे में गिरने से लेकर 2007 में स्कूल टीचर उमा खुराना पर हुए
गलत स्टिंग तक मीडिया ने कई बार अपनी ताकत का नाजायज फायदा उठाया है और फिर न तो
पलट कर देखा और न ही कभी माफी मांगी। बाद में भी कई प्रिंस गढ्ढे में गिरते रहे और
उमा खुराना अपने पर हुए उस मानसिक और शारीरिक हमले से आज भी उबर नहीं पाई हैं।
मीडिया ने इस बात की परवाह नहीं की कि एक गलत खबर कैसे किसी परिवार की आने वाले कई
नस्लों को तबाह कर सकती है। परवाह टीआरपी की हुई और उसके जरिए बरसने वाले रुपए की।
लेकिन ज्यादातर लोग कसमें खाते हैं कि वे इन चैनलोकं को देखते ही नहीं। और अगर
इस पत्रकारिता को लोग नकारते है तो फिर इन चैनलों को देखता कोंन है। जाहिर है कि या तो इन्हें देखने वाले झूठ कहते
हैं या फिर
टीआरपी जारी करने वाले या शायद यह कि झूठ बराबरी का है और
सच कहीं बीच में सर पर हाथ
रखे खड़ा हुआ है।
सुशांत मामले का सच जब सामने आएगा, तब आएगा लेकिन यह बात तो है कि अब तक परोसी
गई सभी थियोरीज तो सच साबित होंगी नहीं। कुछ अधूरा और कुछ गलत भी साबित होगा। तब
रिया और कंगना- दोनों में से ही जिसके साथ भी सच होगा, दूसरे की इज्जत के साथ जो
खिलवाड़ हुआ, उसका खामियाजा कौन भरेगा। जल्दबाजी में की जाने वाली खऱगोशी अपराध
रिपोर्टिंग का सबसे कड़वा सच यही है कि न्यूज रूम की अवैध अदालतें खुद ही जज बनती
हैं लेकिन जब उनके फैसले गलत साबित होते हैं तो न तो उन्हें कोई सजा होती है, न
कोई धारा लगती है। इस पूरे तमाशे में ताली पीटती जनता और आंखे मूंदे बैठी एनबीए की
स्थिति देखकर यह समझना मुश्किल लगता है कि मीडिया के पाठ्यक्रम में अब किस
पत्रकारिता को पढ़ाया जाए-वह जो बिकती है या वह जो टिकती है। पढ़ने वाले बिकने
वाली पत्रकारिता पढ़ने को आतुर होने लगे है और इंडस्ट्री भी वैसा ही अधपका पैकेज
पाने को। मीडिया की पढ़ाई और न्यूजरूम के इस फासले के बीच पत्रकारिता की एक धुंधली
रेखा कहीं मौजूद है। बस, उसे ढूंढना टेढ़ी खीर है।
( डॉ. वर्तिका नन्दा मीडिया विश्लेषक और जेल सुधारक हैं। देश की जेलों पर
तिनका तिनका की संस्थापक। उन्हें देश के राष्ट्रपति से स्त्री शक्ति सम्मान मिला
है। )
(19 सितंबर को
राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में प्रकाशित )
email:
tinkatinkaorg@gmail.com
Jun 5, 2020
Manu Sharma, Jessica Lal Case and the Days of Television Reporting
हौजखास थाने से लेकर पुलिस हेडक्वार्टर और बाद में कोर्ट की तक- मनु की रिपोर्टिंग का वह साल सीख से भरपूर था। मुझे याद है जब मनु को थाने में लाया गया था। हम सभी घंटों थाने में खड़े रहे। देर शाम तौलिए से उसे मुंह को ढक कर जब गाड़ी थाने पहुंची थी तो खबरों की आपाधापी का आलम अलग था। खबरों के चेहरे कैसे बदलते गए थे। तब रिपोर्टिंग का रोमांच, चुनौती और उसका प्रभाव अलग था।
मनु शर्मा जैसे कई मामले बार-बार यह याद दिलाते हैं कि सभी अपराध एकाएक नहीं होते। अचानक होने वाले अपराधों की तुलना में उन अपराधों की चर्चा कम होती है जिन्हें अपराधी धीरे-धीरे अपने अंदर पालता है। जिन परिवारों में आपराधिक प्रवृत्ति के बच्चे होते हैं, परिवारों को उनका पूरा इल्म होता है लेकिन वे उसे ढकते हैं या नजरंदाज करते हैं। आने वाले समय में बड़े अपराध को करने वाला शख्स बार-बार अपराध करने की अपनी प्रव़त्ति को जाहिर करता है। यकीन न हो, तो अपने आस-पास देखिए। सोचिए।
वह ऐतिहासिक था। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पहली बार तब किसी महिला पत्रकार को एक बड़े चैनल नें अपराध बीट का प्रमुख बनाया था। फिर अपराध के कितने ही नए रंगों को समझती गई। आज जब इस पोस्ट को लिख रही हूं, तो भी अपराध की एक नई परिभाषा के काम पर जुटी हूं। अपराध और अपराधी को समझने की कोशिश में जिंदगी की समझ बहुत बदली है।
अपराध और अपरधियों पर बात- किसी और दिन। तिनके वो बात लिख रहे हैं।
सोच रही हूं कि जेसिका लाल का परिवार आज क्या सोच रहा होगा।।।
लंबी कहानी है।।।
Mar 25, 2020
वो 21 दिन: कोरोना, जिंदगी और कुछ प्रार्थनाएं
डॉ. वर्तिका नंदा Updated Wed, 25 Mar 2020 04:36 PM ISTकोरोना ने उस कर्फ्यू की भयावहता को जिंदा कर दिया है। लेकिन कोरोना एक दूसरी तरह की भयावहता है। एकदम अविस्मरणीय। अविश्वसनीय। पिछले कई दिनों से कोरोना को लेकर अखबारें और मीडिया सना है। दुनिया में पहला ऐसा मौका है जब दुनिया के कई बड़े देश एकसाथ थम गए हैं।
किसी दूसरे के हिस्से के सुखों को बटोर कर रखने वाले कई बार यह जान नहीं पाते कि कायनात में कई आहें भी होती हैं जो अपने तरीके से लौटती हैं। क्यों न इन 21 दिनों में अब तक की जिंदगी का लेखा-जोखा ले लिया जाए। अब समय खुद से मिलने का है। समय के पास आहों का वजन है। वजन कैसे पिघले। इसलिए आइए पहले भूल-चूक के बहीखाते को ठीक कर दिया जाए और फिर आसमान की तरफ कुछ प्रार्थनाएं उछाल दी जाएं।
(डॉ. वर्तिका नन्दा देश की स्थापित जेल सुधारक हैं। तिनका तिनका देश की जेल के लिए उनकी एक मुहिम है। देश की जेलों की अमानवीय परिस्थितियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का हिस्सा भी बन चुकी हैं। )
Courtesy: https://www.amarujala.com/
Mar 20, 2020
फांसी की रिपोर्टिंग से परे एक फांसी
अपराधी पकड़ में आए कि नहीं। आए तो जेल कब जाएंगे। जेल गए तो सजा कब होगी। सजा हुई तो फांसी कब होगी। बैरक कौन-सी है। क्या वीआईपी इंतजाम मिल रहा है। उनको कैसा लग रहा है वगैरह वगैरह।
2012 में निर्भया के बलात्कार और उसकी मौत के बाद से फांसी चर्चा में रही है। पांच आरोपियों में से एक आरोपी की आत्महत्या से जहां तिहाड़ पर आरोपों का बोझ आया,
वहीं बाकी बचे
4 आरोपियों की सुरक्षा को लेकर चर्चाओं का बाजार गरम रहा। नाबालिग आरोपी पहले छूट गया और जो बचे,
उनकी फांसी खबर के केंद्र में रहीं। जेल और फांसी पर कहानियां गढ़ी जाने लगीं। उनकी पुष्टि के साधन कम थे। इसलिए जो परोसा गया,
वो माना भी जाने लगा। पर असल चिंता इस बात पर कम हुई कि क्या फांसी सभी समस्याओं का अंतिम जवाब है और क्या हम अपनी कानूनी और सामाजिक व्यवस्था को दुरुस्त कर पाए हैं। फांसी की गंभीरता सरस गाथाओं के जाल में उलझी दिखने लगी।
मैंने तीन फांसी घर देखे हैं। किसी भी जेल में,
जहां भी फांसी घर मौजूद हैं,
आमतौर पर बंदी वहां नहीं जा सकता। फांसी एक नियमित घटना न होने के बावजूद इनका रख-रखाव होता है और वे उस समय की याद दिलाते हैं जब इनका इस्तेमाल होता था। तकरीबन सभी जेलों ने फांसी घरों के वजूद बचा कर रखा है और बंदी इस बात से अक्सर सहमते भी हैं कि उनकी जेल में एक फांसी घर है।
हर जेल में बंदियों की कुछ श्रेणियां तय हैं। विचाराधीन कैदी या फिर सज़ायाफ्ता कैदी। कुछ जेलें केवल पुरुष बंदियों की हैं और कुछ में महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं। इनमें ट्रांसजेंडर रखे जाने का भी प्रावधान है। इन सबके अलावा जेल का स्टाफ भी है जो जेल के संचालन की देख-रेख करता है। इन सभी श्रेणियों में सभी लोग मिलकर जिस जेल को बनाते हैं,
उसमें सभी अपनी-अपनी तरह से सजा को भुगतते हैं। ऐसे में जेल भेजा जाना अपने आप के एक सजा है जिसकी गिनती करना हम भूल जाते हैं।
असल में पॉपुलर कल्चर के जमाने में जिस जेल को दिखाया गया,
वो फिल्मों और टेलीविजन न्यूज के जरिए लोगों तक पहुंचीं और दोनों की अपनी सीमाएं रहीं। सिनेमा ने या तो जेल के एकदम विद्रूप पक्ष को दिखाया या फिर भ्रष्टाचारी पक्ष को और खबरों ने जेल के उस पक्ष को दिखाया जो सुर्खियां बटोर सकता था लेकिन जेल असल में क्या है,
इसे समझने,
दिखाने और बताने की फुरसत और तसल्ली कम लोगों के पास रही। हम जेल को पर्यटन या आरामगाह जैसा कुछ मानने लगे हैं क्योंकि हमें यही दिखाया गया है लेकिन जेल कड़वी सच्चाइयों का भंडार है। यह बात आमतौर पर वे लोग नहीं समझ पाते जिन्होंने जेल को महसूस न किया हो।
खबरों की दुनिया ने जेल को रोचक,रसीला और बिकाऊ बनाने की कोशिश की ताकि पॉपुलर कल्चर उसे हाथों हाथ ले। जेल जाए बिना जेल को रंगों से भर दिया और जेल के बारे में वे लोग ज़्यादा बातें करने लगे जो कभी जेल गए ही नहीं। कभी उनसे पूछिए जिन्होंने जेल में कुछ घंटे गुजरे हों। वो बताएंगे कि दिखाई गई और भोगी जेल के बीच कितना बड़ा फर्क होता है।
न्यायपालिका अब जेल को अपराधी के सुधार गृह के तौर पर तो मानने लगी है लेकिन उसे आश्रम के तौर पर पूरी तरह से स्थापित करने में ज़ल्दबाज़ी देखी नहीं गई है। जस्टिस मदन बी लोकुर ने जेलों में अमानवीय परस्थितियों को लेकर सुनवाई का दौर चलाया,
तब भी बड़ी तादाद में जेलों ने ज्यादातर सवालों पर जवाब देना भी उचित नहीं समझा।
इस सारी बहस में यब बात छूट गई कि जिन लोगों को फांसी होनी है,
अब उनकी मानसिक स्थिति क्या है। वे अब क्या सोचते हैं। क्या पश्चाताप का कोई भाव है। परिवार से मुलाकात के समय यह लोग अपनी किस चिंता को साझा करते हैं। क्या जाते-
जाते उनके पास ऐसा कोई सबक है जो समाज को लेना चाहिए।
ऐसा लगता है जैसे फांसी की खबर विज्ञापन लाने का काम तो कर रही है और सनसनीखेज भी बना रही है लेकिन फांसी की गंभीरता हांफ गई है। फांसी देने वाला जल्लाद पवन मेरठ से आकर कहां रुका?
जेल के किस फ्लैट के किस कमरे में उसे रखा जायगा?
वो फांसी देने को लेकर कितना बेसब्र है और उसे कैसे फांसी देने के लिए एक लाख रुपए मिलेंगे। वह खबरनवीसों का चहेता बन गया। लगने लगा कि जैसे फांसी ना होकर मीडिया का कोई इवेंट होने वाला हो जिसका लाइव टेलीकास्ट देखने के लिए पूरी दुनिया बेचैन है और जैसे ऐसे लाइव टेलीकास्ट भारत जैसे देश में होते ही रहने चाहिए ताकि खबर का बाजार बना रहे।
भारत में फांसी रोजमर्रा की घटना नहीं है। फांसी की चर्चा को हमने जितना उथला बनाया,
मसला उससे ज्यादा गहरा है क्योंकि फांसी का मतलब सिर्फ एक जान का जाना नहीं है। उसके साथ कई सारी जानों का हमेशा के लिए किसी शून्य में चले जाना भी है। फांसी के फंदे पर एक जान के जाने के साथ ही कई उम्मीदें,
कई रोशनियां और आने वाले जीवन के कई सपने खत्म हो जाएंगे। मीडिया ने फांसी की रिपोर्टिंग करते हुए एक बार होने वाली फांसी को बार-बार फांसी दी,
यह विचारे बिना कि फांसी की रिपोर्टिंग संवेदनशील होनी चाहिए ताकि फांसी मजाक न बने।
फांसी के फंदे पर किसी की जान को लेना एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है और एक ऐतिहासिक घटना भी जिसे सबक की तरह देखे जाने में ही समझदारी है। वैसे भी फांसी के होने से हम इस अपराध बोध से मुक्त नहीं हो सकते कि जेल या फांसी की सजा पाने के हकदार कई अपराधी अब भी इसी समाज का हिस्सा हैं और गिरफ्त से परे हैं। एक फांसी पूरे समाज के अपराध-मुक्त हो जाने का गारंटी कार्ड हमें नहीं सौंपेगी। काश,
टीवी न्यूजरूम फांसी की रिपोर्टिंग को लेकर ज्यादा सजग और कम वाचाल हो सकें।





