वर्तिका नन्दा ने तीस साल लगाए इस उपन्यास को लिखने में।
समीक्षक: प्रकाश हिंदुस्तानी, इंदौर, भोपाल.
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अच्छा उपन्यास उत्तर कम देता है, प्रश्न अधिक छोड़ जाता है। 'ज से जेल' भी ऐसे ही प्रश्न छोड़ता है, जो किताब बंद करने के बाद भी लंबे समय तक मन में खुले रहते हैं।
ये सिर्फ उपन्यास नहीं, उन आवाज़ों का नाम है जो सालों से सलाखों के पीछे दबी थीं। वर्तिका नन्दा ने तिहाड़ से लेकर हरियाणा, मध्य प्रदेश और विदेशों की जेलों तक का सफ़र किया। हर बार लौटीं तो साथ लेकर आईं, कैदियों का दर्द, उनकी अधूरी साँसें और उम्मीद की पतली किरणें। इन्हीं टुकड़ों से बुना गया ये उपन्यास।
करीब दस पेज की पठनीय और मर्मस्पर्शी प्रस्तावना में वर्तिका नंदा लिखती हैं कि जब भी किसी जेल के दौरे से लौटी तो वहाँ की कुछ धूप-छाँव मेरे साथ चली आई। यह उपन्यास अनुभवों के उन्हीं टुकड़ों की कुछ बूंदें हैं, जो इन कागजों ने सोखी हैं।”
किरदार सब सच हैं।
कोई माँ जेल में बच्चे को बड़ा कर रही है, कोई युवक बीस साल बाद भी जेल को ही घर समझता है, कोई औरत कलम से अपनी सजा को कविता बना रही है।
जेल सिर्फ दीवारें नहीं—वहाँ भी धूप आती है, हँसी खिलती है, और इंसान बाकी रह जाता है।पढ़ो तो दिल पर हाथ रख लो।
क्योंकि ये किताब सिर्फ कहानी नहीं सुनाती—
हमारी नज़रें बदल देती है।
ये उन आवाज़ों का नाम है जो सालों से चार दीवारों के अंदर दबी पड़ी थीं, और जिन्हें वर्तिका नन्दा ने धीरे-धीरे, बहुत प्यार से बाहर निकाला। 1993 में जब वे पहली बार तिहाड़ जेल गईं, तो शायद खुद नहीं जानती थीं कि वो चने खाने के साथ-साथ कुछ और भी खा जाएँगी - जेल की हवा, कैदियों की साँसें, उनके अधूरे सपने। फिर डासना, आगरा, मध्य प्रदेश, लखनऊ, बांदा, नैनी, हरियाणा… और यहाँ तक कि मॉरीशस और नॉर्वे की जेलें। हर बार जब वे लौटतीं, तो खाली हाथ नहीं लौटतीं। उनके साथ चलते थे दुख के टुकड़े, दर्द की बूँदें, और उम्मीद की कुछ पतली किरणें।
इन्हीं टुकड़ों को उन्होंने कागज़ पर रख दिया—और बन गया ‘ज से जेल’।ये उपन्यास कोई कल्पना नहीं है। इसमें जो किरदार हैं, वे सब उन लोगों से प्रेरित हैं जिन्हें वर्तिका ने जेलों में देखा, सुना, छुआ। कोई माँ है जो बच्चे को जेल की चारदीवारी में ही बड़ा कर रही है। कोई युवक है जिसने बीस साल काटे, बाहर आया, और फिर भी जेल को ही अपना घर समझने लगा। कोई औरत है जिसने कलम पकड़ी और अपनी सजा को कविता में बदल दिया। इन सबके अंदर एक ही चीज़ है इंसानियत। वो इंसानियत जो हम बाहर बैठे लोग अक्सर भूल जाते हैं।
जब आप इस किताब को पढ़ते हैं, तो महसूस होता है कि जेल सिर्फ सलाखें और लोहे के दरवाजे नहीं हैं। जेल में भी धूप आती है, पेड़ों पर मन्नतों के धागे बँधे होते हैं, और कभी-कभी किसी कैदी की हँसी इतनी शुद्ध होती है कि बाहर की दुनिया से ज्यादा सच्ची लगती है। वर्तिका ने इन्हीं धूप-छाँव को लिखा है।
वर्तिका ने दिखाया है कि अपराध और सजा के बीच भी इंसान बाकी रह जाता है। उसके अंदर भी प्यार है, पछतावा है, और जीने की चाह है।सुप्रीम कोर्ट के जज ने इस किताब का विमोचन करते हुए कहा था ये सिर्फ उपन्यास नहीं, जेल की ज़िंदगी का जीता-जागता दस्तावेज़ है। सच में, पढ़ते हुए दिल पर हाथ रखने का मन करता है। लगता है, हमने कितने साल से इन आवाज़ों को अनसुना किया है। कितने चेहरों को ‘कैदी’ कहकर भुला दिया है।‘ज से जेल’ पढ़ने के बाद एक बात साफ़ हो जाती है कि जेल दीवारों से नहीं, हमारी नज़रों से बनती है।
यह उपन्यास पढ़िए शायद आपके दिल में भी कोई खिड़की खुल जाए --- वो खिड़की जिससे कैदियों तक थोड़ी रोशनी पहुँच सके।
वर्तिका लिखती हैं : “मैं समझने लगी थी कि बुद्ध ने मेरे जीवन की दिशा इस अंधेरे में रोशनी भरने के लिए तय की है। मैं पत्रकार रहूँगी लेकिन आशा से लबरेज पत्रकार। सरोकारी पत्रकारिता मेरे जीवन का मिशन होगी।” इस उपन्यास ‘ज से जेल’ के बारे में लेखिका के ये अल्फ़ाज़ उपन्यास की आत्मा हैं।
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