Featured book on Jail

7 years of Agra jail radio: Launched in 2019: Tinka Tinka Foundation

Feb 7, 2011

भावनाओं की अभिव्यक्ति की उम्मीदें

राजेश तलवार पर हमला करने के बाद जब उसे गाजियाबाद की डासना जेल में लाया गया तो उसने जेल अधिकारियों से जानना चाहा कि निठारी का मुख्य आरोपी मोनिंदर सिंह पंढेर जेल में कहां पर है। उसके इतने पूछने भर से जेल अधिकारियों के पसीने छूट गए क्योंकि पंढेर इसी जेल में है। उत्सव की दिमागी हालत को देखते हुए उसे जेल के अस्पताल में रखा गया है जहां पंढेर को भी इंसुलिन के इंजेक्शन के लिए नियमित तौर पर लाया जाता है। मजे की बात यह है कि अब जेल अधिकारी बाकी कामों के अलावा इस काम में खास तौर पर लगे हैं कि उत्सव और पंढेर का आमना-सामना कतई हो और अगर हो भी जाए तो उत्सव को पढेर से कम से कम 50 मीटर की दूरी पर रखा जाए।

इस बीच एक और दिलचस्प बात हुई है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डाइन ने यह साफ कर दिया है कि वह उत्सव पर किसी भी तरह की कारर्वाई करने के मूड में नहीं है और दूसरी तरफ सोशल नेटवर्किंग साइट्स में उत्सव एक हीरो के तौर पर उभर कर गया है। बहुत से युवा उसकी हिमायत में सामने आए हैं और उन्होंने उत्सव की इस कथित हिम्मत की दाद दी है। उनके लिए उत्सव वह क्रांतिकारी है जिसके जिस्म में अब भी गर्म लहू बहता है और जो समाज की दीमक खाती व्यवस्था के खिलाफ बगावती होकर खड़ा हो गया है।

लेकिन यह बात भी है कि कानून को हाथ में लेने की हिमायत तो नहीं की जा सकती और ही आरोप के साबित होने तक किसी को भी गुनहगार कहा या माना जाना चाहिए पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था बहुत ही धीमे रफ्तार से आगे बढ़ती है। एक साइट में किसी युवा की टिप्पणी थी – मुझे हैरानी नहीं होगी अगर डीजीपी राठोर को 2 साल की और उत्सव शर्मा को 10 साल की सजा दे दी जाए। यह व्यवस्था पर एक क्रूर टिप्पणी है और यह भी एक विद्रूप सच है कि व्यवस्थाएं इन तीखी टिप्पणियों से आसानी से विचलित होती भी नहीं।

ढाई साल से चल रहे आरूषि कांड में उत्सव जब फारसे के हमले के साथ खबर के बीच मैदान पर उतर आता है तो खुद खबरें भी जैसे एक पल के लिए सकपका जाती हैं। उत्सव किसी फिल्म का किरदार नहीं है, वह हकीकी दुनिया का एक युवा नायक है जो उद्वेलित है। वह खबरों को गौर से देखता है। खबर में छिपी हुई खबर को पहचानता है और ढीली पड़ती न्यायिक व्यवस्था पर हाथ मसोस कर बैठ जाने की बजाय अपने गुस्से को ज्वालामुखी की तरह फटने देता है।

लेकिन यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि टीवी पर दोहराव के साथ आने वाली तस्वीरें और शब्द कई बार वाकई दूरगामी असर करती हैं। उत्सव घंटों खबरें देखता था और फिर बहुत सी खबरों की जुगाली करता था। टीवी पर आने वाली ऐसी कई तस्वीरें दिमाग पर चिपकती हैं और उत्सवों को उकसाती भी हैं। टीवी पर लगातार दिखता नकारात्मक रवैया, हारी हुई प्रणालियां, हांफता कानून, लाचार सरकारें युवा की हताशा को कई गुना बढ़ाने की क्षमता रखती हैं। सनसनी और अपराध कवरेज का यही मर्म है जो टीवी पर अपराध को बिकाऊ, टिकाऊ और सुखाऊ बनाता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि मीडिया इन खबरों को दिखाए। मतलब सिर्फ यह है कि इनके साथ आशा की किरणों को भी दिखाए। आखिर हर पल धड़कते इस समाज में बहुत कुछ सकारात्मक भी तो हो रहा है।

मीडिया की जरूरत से ज्यादा रिपोर्टिंग, न्याय की बेहद ढिलाई और डर पर पनपता खबर का व्यवसाय सामाजिक सेहत को कमजोर कर रहा है। उत्सव न्यूज चैनल देख कर परेशानी महसूस करता था। उसे सब कुछ काला दिखने लगा था। बतौर उसकी मां के, वह किसी लड़की पर अत्याचार नहीं देख सकता। एक ऐसा समाज जहां महिला पर अत्याचार फैशन और रोज के खाने जैसा जरूरी कर्म है, वहां उत्सव का यह बयान चौंकाता है।

दरअसल न्यूज मीडिया पहले खबर की तलाश में जुटा रहता है और फिर बड़ी खबर के आने पर और अगली खबर के आने तक मजबूरीवश उसके साथ ऐसा चिपका रहता है कि वह मानस पर हावी ही होने लगता है। जाने कितने उत्सवों ने इस उत्सव का कारनामा देख कर कोई प्रेरणा ली होगी। याद कीजिए बुश, आसिफ अली जरदारी, वेन जियाबाओ, अरूणधति राय और बाद में पी चिदंबरम पर चले जूते। एक जूते ने दुनिया भर में कई लोगों को जूता चलाने का मंत्र सा दे दिया था। बाद में तो हालत यह हो गई कि कई प्रेस कांफ्रेसों में पत्रकारों से अपने जूते बाहर उतारने के लिए कहा जाने लगा। लेकिन जूतों का फेंका जाना पूरी तरह से रूका नहीं और वो डर आज भी बदस्तूर कायम है।

दरअसल जूते हो या फारसे, तस्वीरों के बार-बार के दोहराव से एक मानसिक जमीन को तैयार करते हैं। मीडिया अगर डर के पोषण या डर की तलाश का काम करता है तो जनता भी मीडिया के जरिए अपनी दबी हुई भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति की उम्मीदें पालती है। हताश होता युवा इसका सबसे बड़ा शिकार बनता है क्योंकि उसके पास युवा होने के आई कार्ड के सिवा कुछ नहीं। टीवी पर लगातार दिखने वाली काली तस्वीरें उसे यह मानने के लिए मजबूर करती चलती हैं कि पूरी दुनिया में हर तरफ, हर समय सिर्फ गोरखधंधा ही होता है। यहां शांत करने वाली, सुकून देती, सकारात्मक तस्वीरों की कमी हमेशा रहती है। डर, विद्रोह, विक्षोभ की तस्वीरों का यह पिटारा कभी तो हड़बड़ाते हुए फैसले सुनाए बिना जरा सब्र करे।    

(यह लेख 7 फरवरी, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Jan 30, 2011

तल-वार बड़ा या फारसा

रिपोर्टर चांदनी चौक में है और एक दुकानदार के साथ बैठा है। वहां से बताया जा रहा है कि जिस फरसे से राजेश तलवार पर हमला किया गया, वो चांदनी चौक से खरीदा गया था। उसकी कीमत 250 रूपए है। अब पूछा जाता है कि इस फरसे को खरीदा क्यों जाता है। दुकानदार हंसाने वाला जवाब देता है कि इससे सब्जियां काटी जाती हैं, वैसे मांस भी काटा जा सकता है। अगला सवाल है कि क्या ऐसे फरसों का इस्तेमाल हमले करने के लिए भी हो सकता है। अबकी बार जवाब है कि कोई भी किसी भी चीज का इस्तेमाल कैसे भी कर सकता है। यह सब तो इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है।

 

तो राजेश तलवार पर हमले की लाइव तस्वीरें शाम तक चलाने के बाद चैनल साइड स्टोरीज की तरफ जब मुड़ते हैं तो फारसेनुमा कहानियां आने लगती हैं। तलवार पर तीन बार चला फारसा शाम होने तक खबर का केंद्र-सा बनने लगता है, उसका क्लोज अप उसकी विद्रूप धार को दिखा कर डराता है।

 

ढाई साल से चल रहे आरूषि कांड में यह एक नया मोड़ है। आरूषि की हत्या के बाद परिवार से सहानुभूति, बाद में पिता का नाम उछलने और उन्हें गिरफ्तार किए जाने पर रिश्तों के छिलने, फिर उन्हें रिहा करे जाने पर अपराध बोध और सीबीआई का यह कहकर केस बंद कर देने की अपील कि शक तो पिता पर ही लेकिन पर्याप्त सुबूत नहीं, एक बार फिर रिशेतों के प्रति कड़वे घूंट का अहसास कराते हैं। इन सबके बीच उत्सव का फरसे से हमला करना एक बार फिर तलवार दंपत्ति को सहानुभूति के करीब ले आता है। लोग फारसे को देखते हैं, सहमते तलवार को देखते हैं, पिटते उत्सव को देखते हैं और एक लंबी सांस भरते हैं। अपराध कवरेज का यही मर्म है जो टीवी पर अपराध को बिकाऊ, टिकाऊ और सुखाऊ बनाता है।

 

उत्सव नेशनल स्कूल आफ डिजाइन का गोल्ड मेडलिस्ट है। पकड़े जाने पर उसने सभी सवालों के जवाब करीने से दिए। राठौर पर हमला करने का बाद भी ऐसा ही हुआ था। तो क्या वो वाकई पागल है।

 

बेशक अब इस मामले पर दिमागी रस्साकशी होगी लेकिन साथ ही यह घटना यह सोचने के लिए भी कुरचने लगती है कि क्या मीडिया की जरूरत से ज्यादा रिपोर्टिंग, न्याय की बेहद ढिलाई और डर पर पनपता खबर का व्यवसाय सामाजिक सेहत को कमजोर कर रही है। उत्सव पिछले कई दिनों से लगातार न्यूज चैनल देख रहा था। राठौर मामले में भी उसकी गहरी दिलचस्पी रही और बतौर उसकी मां के, वह किसी लड़की पर अत्याचार नहीं देख सकता। एक ऐसा समाज जहां महिला पर अत्याचार फैशन और रोज के खाने जैसा जरूरी कर्म है, वहां उत्सव का यह बयान चौंकाता है।

 

दरअसल न्यूज मीडिया पहले खबर की तलाश में जुटा रहता है और फिर बड़ी खबर के आने पर और अगली खबर के आने तक मजबूरीवश उसके साथ ऐसा चिपका रहता है कि वह मानस पर हावी ही होने लगता है। जाने कितने उत्सवों ने इस उत्सव का कारनामा देख कर कोई प्रेरणा ली होगी। याद कीजिए बुश, आसिफ अली जरदारी, वेन जियाबाओ, अरूणधति राय और बाद में पी चिदंबरम पर चले जूते। एक जूते ने दुनिया भर में कई लोगों को जूता चलाने का मंत्र सा दे दिया था। बाद में तो हालत यह हो गई कि कई प्रेस कांफ्रेसों में पत्रकारों से अपने जूते बाहर उतारने के लिए कहा जाने लगा। लेकिन जूतों का फेंका जाना पूरी तरह से रूका नहीं और वो डर आज भी बदस्तूर कायम है।

 

दरअसल जूते हो या फारसे, तस्वीरों के बार-बार के दोहराव से एक मानसिक जमीन को तैयार करते हैं। मीडिया अगर डर के पोषण या डर की तलाश का काम करता है तो जनता भी मीडिया के जरिए अपनी दबी हुई भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति की उम्मीदें पालती है। हताश होता युवा इसका सबसे बड़ा शिकार बनता है क्योंकि उसके पास युवा होने के आई कार्ड के सिवा कुछ नहीं। टीवी पर लगातार दिखने वाली काली तस्वीरें उसे यह मानने के लिए मजबूर करती चलती हैं कि पूरी दुनिया में हर तरफ, हर समय सिर्फ गोरखधंधा ही होता है। यहां शांत करने वाली, सुकून देती, सकारात्मक तस्वीरों की कमी हमेशा रहती है। डर, विद्रोह, विक्षोभ की तस्वीरों का यह पिटारा कभी तो हड़बड़ाते हुए फैसले सुनाए बिना जरा सब्र करे।    

 


Jan 19, 2011

गोवा के बीच पर राष्ट्रपति

गोवा के एक बीच पर इत्मीनान से कुछ सुस्ताती सी राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का फोटो जिस रोज अखबार में छपता है, बहुत से पाठक उसे देख कर मुस्कुराते हैं। यह एक मानवीय तस्वीर है। देश की महामहिम का एक सामान्य इंसान की तरह छुट्टी मनाता यह चेहरा जनता को बड़ा भला लगता है।

लेकिन भलमानसहत से ली गई यह तस्वीर उनकी किलेबंदी में लगे सुरक्षा अधिकारियों को भली नहीं लगती। लिहाजा गोवा पुलिस को बीच में डाला जाता है और वह उन तीनों फोटो पत्रकारों को तलब करती है जिन्होंने यह गुस्ताखी की है। गगनदीप श्लेडेकर, अरविंद टेंग्से और सोरू कोमारपांत- इन तीनों पत्रकारों के बयान रिकार्ड किए जाते हैं और पूछा जाता है कि इतनी कड़ी सुरक्षा को देखने के बावजूद उन्होंने महामहिम की तस्वीर खींचने की गलती क्यों की। अलग-अलग पूछताछ के दौरान ये तीनों पत्रकार बताते हैं कि सुरक्षा अधिकारियों के निर्देश के मुताबिक ये तस्वीरें 200 मीटर की दूरी से ली गईं थीं और इन्हें 400 एमएम के जूम लैंस से खींचा गया था। यहां इन्होंने एक रोचक बात यह भी जोड़ी कि इतनी कड़ी सुरक्षा के बावजूद राष्ट्रपति के पास बिकनी पहने दो अनजाने विदेशियों को बैठने की अनुमति पता नहीं कैसे और क्यों दे दी गई। जिन फोटो पत्रकारों की वजह से सुरक्षा तंत्र की यह चूक उजागर हुई है, उसकी जांच की बजाय उन पत्रकारों से पूछताछ की जा रही है जिन्होंने कोई अपराध नहीं किया है। उन्होंने मर्यादा में रहकर अपना काम किया है। खैर, गोवा पत्रकार संघ के अध्यक्ष प्रकाश कामत पुलिस के इस दखल को मीडिया की आजादी पर प्रहार बताते हैं और भाजपा के प्रवक्ता रजेंद्र अरलेकर भी इसे अलोकतांत्रिक ठहराते हैं। वैसे एक सवाल यह भी उठता है कि इस देश की पुलिस कब तक ऐसी बड़ी जिम्मेदारियों को निभाने में व्यस्त रहेगी।

बेशक इस मामले पर कोई केस दर्ज नहीं होता और न ही कोई केस बनता भी है, लेकिन इसके जरिए यह जतला देने की कोशिश जरूर कर दी जाती है कि ऐसा किया जाना ठीक नहीं। पत्रकारों को यूं इस तरह अपनी सीमा का उल्लंघन कतई नहीं करना चाहिए और बात-बेबात अपने पत्रकारीय गुण दिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

यहां कई बातें जहन में आती हैं। सबसे जरूरी तो यह कि सत्ताओं में सहनशीलता इतनी कम क्यों होती है। वे खुद पर हल्की सी हसीं, थोड़ा कटाक्ष, थोड़ी नजरअंदाजी या ऐसे मामलों में थोड़ा सा नटखटपन क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते। दूसरे ये भी कि सत्ता खुद अपने लिए जो मापदंड खड़े करती है, वह उन आम लोगों के लिए भी क्यों लागू नहीं होने देती जिनकी बदौलत उन्हें प्रत्यक्ष या फिर अप्रत्यक्ष तौर से सत्तारूढ़ होने का तोहफा नसीब होता है। अगर बड़े नेताओं के लिए एक छोटी सी निजता एक बड़ा मसला है तो आम आदमी की बड़ी निजता इतनी छोटी कैसे आंक दी जाती है।

राष्ट्रपति ने शायद अपने सुरक्षा अधिकारियों से ऐसा करने के लिए कहा भी न हो। हो सकता है कि ये अधिकारी किसी बड़े राष्ट्रीय खतरे की आशंका से खुद ही सक्रिय हो उठे हों लेकिन इसके बावजूद सच यही है कि सारा कारनामा तो राष्ट्रपति के नाम पर ही किया गया। राष्ट्रपति को तो शायद इस बात का इल्म तक नहीं होगा कि इस एक घटना ने उनकी छवि पर एक हलका छींटा डाला है क्योंकि वे आम तौर पर एक मानवीय राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर ही देखी जाती रही हैं और उन्हें गोवा के बीच में शांत मुद्रा में बैठे देखकर जनता में भी कहीं न कहीं एक सुख का भाव ही उमड़ा था। जनता उन्हें मान देती है और एक स्त्री के पहली बार राष्टप्रपति बनने पर उसके जीवन के हलके-फुलके क्षणों को देखने के लिए भी थोड़ी सी बेताब रहती है। लेकिन जैसा कि आम तौर पर होता ही है, सत्ताओं के आस-पास के घेरे ही घटनाओं के घूमने का चक्र तय करने लगते हैं। जहां थोड़ा सा सरकारी दांव-पेंच चला, बस वहीं सारा स्वाद भी किरकिरा हो गया।

तो राष्ट्र्पति की अगली निजी यात्रा की कवरेज के लिए अब कोई नियमावली तय करने का समय आ गया है क्या?

Jan 12, 2011

खबरों के माध्यम पर लगा सूर्यग्रहण

4 जनवरी को तकरीबन सारा दिन कई न्यूज चैनल यही बताते-समझाते रहे कि आंशिक सूर्य ग्रहण पर क्या करें, क्या न करें। कब कौन सा मंत्र पढ़ें, क्या खाएं, क्या न खाएं, आज क्या पहनें, ग्रहण के दौरान और बाद में क्या-क्या उपाय करें। दिशाओं का बोध दिया गया और धर्म कर्म के हिसाब से लंबी विवेचनाएं की गईं।

ये कहानियां ऐसी रोचक-सरस और क्रमवार कर दी गईं, ग्रहण के दौरान स्नान के इतनी बार विजुअल दिखाए गए और कथित आस्थाओं के ऐसे कलश सजा दिए गए कि सचिन का अपने करियर का 51वां टेस्ट शतक पूरा करना भी टीवी चैनलों की इस बाबानुमा आपाधापी को रोक नहीं पाया। सचिन पर ब्रेकिंग न्यूज आई, फोनो, वीओ हुए और फिर ग्रहण की डुबकी लगने लगी। सचिन चैनलों पर ग्रहण के खत्म होने और बाबाओं की अपनी दुकान के समेटने के बाद ही चैनलों पर पूरी तरह से हावी हो सके।

इससे ठीक पहले नए साल की शुरूआत पर जब देश-दुनिया में गाजे-बाजे बज रहे थे और तमाम चैनल ठुमकने में लगे थे, तब भी न्यूज परोसने वाले चैनल मुफ्त में यह ज्ञान देने से खुद को रोक नहीं पा रहे थे कि इस साल के पहले दिन क्या करना शुभ या अशुभ होगा। किस राशि के लिए यह साल खुशियां बरसाएगा, किसके लिए मातम आने की आशंका है। फिर उपायों की झड़ी भी लगी कि क्या करने या न करने से दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। कौन से रत्न कैसा कायापलट कर सकते हैं और किन रंगों से जिंदगी की कहानी ही बदल सकती है।

यह एक अजीब कहानी है। जिन चैनलों को खबर देने के लिए 24 घंटे का बने रहने की अनुमति दी गई थी, वे कई बार विशुद्ध खबर कम और कर्मकांड ज्यादा बताते हैं। इस काम में वे जितनी ताकत लगाते हैं, उसे देख कर कई बार आह निकलती है कि काश इतनी ताकत चैनल अपने कंटेट को परिष्कृत करने में लगा देते या फिर इतना पैसा उन पत्रकारों के कल्याण में लगा देते जो चैनल के स्वभाव के अनुरूप खबर की तलाश में दिनभर खाक छानते फिरते हैं।

यहां एक बात बहुत खास है। यह सारा तामझाम इंसानी फितरत की उपज है। सारा मामला डर का है। सच बात तो यह है कि खबर जितना लुभाती, सुझाती, बताती, जतलाती है, ठीक उतना ही कई बार डराती भी है। धर्म का कथित धंधा भी इसी डर की जमीन पर टिका है। यह  बाहरी ठोस विश्वास की तलाश, आत्मविश्वास की कमी और डर के व्यापार पर टिका है। इसे गणित साबित नहीं कर सकता। यहां गणित का चुप रहना ही बेहतर है। लेकिन जिसके पास डर है, उसके लिए यह किसी संबल से कम नहीं। यही इसकी नींव है, इसका आधार है।

लेकिन एक बात भूलनी नहीं चाहिए। धर्म के इस भव्य, मोबाइल और स्मार्ट होते बाजार ने कई बार ऐसे शानदार नुस्खे दिए हैं जिसने व्यकितगत लाभ भले ही न दिए हों लेकिन मानव-पशु जाति का कुछ उद्धार जरूर किया है, साथ ही पर्यावरण का भी। गाय,काले कुत्ते या चिड़िया को रोटी खिलाना, किसी जरूरतमंद का पेट भरना, तुलसी के पौधे या पीपल के पेड़ को पानी देना यह सब यह सब उन पुरानी मान्यताओं की तरफ लोगों को मोड़ते हैं जो ग्लोबल दुनिया जाने कब की भूल गई होती।

इसमें एक बात और मजे की है। इन्हें देखने वाले लोग खुलकर कहते नहीं कि वे इन्हें देखते हैं या बाबाओं के फार्मूलों का अनुसरण करते हैं। वे इस बात को छिपा कर रखते हैं। यहां जैसे स्टेटस आड़े आ जाता है। जैसे लगता है कि यह आधुनिक बनती छवि को खा न ले। यही वे लोग जो न्यूज चैनलों की टीआरपी को उस वक्त बढ़ा देते हैं जब बाबाओं के प्रवचन चरम पर होते हैं।

पर इन सबके बीच यह बात जरूर सोचने की है कि क्या जरूरत से ज्यादा परोसे जाने वाला यह डर, विश्वास या अंधविश्वास न्यूज चैनलों के कर्तव्यों की परिधि में आता है। बाबा लोगों के पास धार्मिक चैनलों का प्लैटफार्म है ही और वे ब्रांड एंबैसेडर के तौर पर वहां अपना तंबू तान कर दिन भर बैठते भी हैं। ऐसे में न्यूज चैनलों को क्या अपनी खुद की गढ़ी इस मजबूरी से बाहर आने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कभी राजू का मसखरापन तो कभी राखी की नौटंकी दिखाते इन चैनलों को क्या अब न्यूजवाला बने रहने का पाठ दोबारा याद करने की जरूरत तो नहीं। क्या अब यह सोचने का वक्त नहीं है कि उन्हें अब वही करना चाहिए जिसके लिए भारत सरकार ने उन्हें लाइसेंस दे रखा है।

(यह लेख 9 जनवरी, 2011 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)

Jan 6, 2011

सबसे ताकतवर होता है........

मेरे सपने अपनी जमीन ढूंढ ही लेते हैं

बारिश की नमी

सूखे की तपी

रेतीले मन

और बाहरी थपेड़ों के बावजूद

 

खाली पेट होने पर भी

सपने मेरा साया नहीं छोड़ते

चांद के बादलों से लिपट जाने

सूरज के माथे पर बल आने

अपनों के गुस्साने

आवाज के भर्राने पर भी

ये सपने अपना पता-ठिकाना नहीं बदलते

 

सपनों की पंखुड़ी

किसी के भारी बूटों से कुचलती नहीं

हंटर से छिलती नहीं

बेरूखी से मिटती नहीं

 

सपनों का ओज

उदासी में घुलता नहीं

टूट कर बिखरता नहीं

अतीत की रौशनियों की याद में

पीला पड़ता नहीं

 

क्योंकि वे सपने ही क्या

गर वो छिटक जाएं

मौसमों के उड़नखटोलों से

क्या हो सकता है

इतना निजी, इतना मधुर, इतना प्यारा

सपनों की ओढ़नी

सपनों की बिछावन

सपनों की पाजेब

सपनों का घूंघट

सपनों की गगरी

 

काश!, कि तुम होते आज पास पाश

तो एक सुर में कहते

सबसे खतरनाक होता है

सपनों का मर जाना

और मैं कहती

सबसे ताकतवर होता है

सपनों का खिल-मिल जाना

हिम्मती हो जाना

फौलादी बन जाना

कवच हो जाना

हथेलियों की लकीरों को

आलिंगन में भर लेना कुछ इस तरह कि

सपने बस अपने ही हो जाएं

कि सपने

अपनों से भी ज्यादा अपने हो जाएं

 

हां, सबसे ताकतवर होता है

सपनों का खिल-मिल जाना


Jan 4, 2011

आह!

तलाश सब जगह की

लेकिन तुम मठ में मिले

नदी की धार में

गुफा की ओट में

हवा की सरकन में

ओस की बूंद में

हथेली में चुपके उस आंसू में

जो सिर्फ तुम्हारी वजह से ही ढलका था

 

फिर तलाश क्यों की

भीड़ में इतने साल

खुद भीड़ बन कर

 

अकेले होकर, अकेले बनकर, अकेलेपन में समाकर

कितने ही मानचित्र घुमड़ आते हैं अंदर

 

इतने गीले दिन, इतनी सूखी रातें, इतने श्मशान, इतने गट्ठर

अपने अंदर उठाकर चलने की वाकई जरूरत थी क्या

 

हिम्मत का न होना

न बांध पाना सब्र

संवाद का न बना पाना कोई पुल

दबे-दबे से कितने दबावों में

सबको खुश रखने की कोशिश

ख्वाहिशों को जीतने की जद्दोजहत

खींच ले गई है कितने ही साल

झुर्रियां पीछे छोड़कर

 

इतना सब होने पर भी पिलपिले होते कागज

उस फूल को अब तक सीने से लगाए धड़क क्यों रहे हैं

जो दशकों पहले के

किसी नर्म अहसास की पुलक थे

 

इतने साल जीकर भी

जीना सीखा कहां

कब्र पर पांव लटके

तो ख्याल आया

अरे, जाना भी तो था

 

लेकिन ये जाना भी कोई जाना हुआ

न नगाड़े बजे, न मन की मांग भरी

न पहना कभी खुशी का लहंगा

 

चलो, जाने से पहले क्यों न

जी लिया जाए एक बार, एक आखिरी शाम

Jan 2, 2011

नव वर्ष में

चलो एक कोशिश फिर से करें

घरौंदे को सजाने की

मैं फिर से चोंच में लाऊंगी तिनके

तुम फिर से उन्हें रखना सोच-विचार कर

 

तुम फिर से पढ़ना मेरी कविता

और ढूंढना अपना अक्स उसमें

 

मैं फिर से बनाउंगी वही दाल, वही भात

तुम ढूंढना उसमें मेरी उछलती-मचलती सरगम

 

मैं फिर से ऊन के गोले लेकर बैठूंगी

फंदों से बनाउंगी फिर एक कवच

तुम तलाशना उसमें मेरी सांसों के उतार-चढ़ाव

 

आज की सुबह ये कैसे आई

इतनी खुशहाल

कुछ सुबहें ऐसी ही होती हैं

जो मंदिर की घंटियां झनझना जाती हैं

 

लेकिन रात का सन्नाटा

फिर क्यों साफ कर जाता है उस महकती स्लेट को

 

चलो, छोड़ो न

छोड़ो ये सब

चलो, किसी पहाड़ी के एक सिरे पर दुबक कर

फिर से सपनों को मुट्ठी में भर लें

चूम लें पास से गुजरते किसी खरगोश को

सरकती हवा को

गुजरते पल को

 

चलो, एक कोशिश और करें

एक बार और   

Dec 27, 2010

भूलना, भूलना और फिर भूलना

कितना अच्छा होता है भूल जाना

वो रातें जब भरपेट खाना नहीं मिला था

सुबहें जो सर्दी के ठिठुरे कोहरे से दबी होकर भी

भागती थीं

चाय की भाप से मुलाकात किए बिना

 

दोपहरिया इसी चिंता में कि                                                    

शाम का पहिया

जाने आज किस दिशा में घूमेगा

 

अच्छा ही होता है भूल जाना

फरेब के वो सारे पल

जब पूरब को बताया गया था पश्चिम

जब मंदिर के बाहर छोड़े जूते

न मिलने पर वापिस

सोचा था

शायद यह थी ईश्वर की मर्जी

 

अच्छा ही होता है भूल जाना

कि इम्तिहान दर इम्तिहान

यात्रा कभी खत्म नहीं होगी

 

इतना सामान समेटा

यहां से वहां से

चार सोने के कंगन दो बूंदे, बीसों साड़ियां

इन सब पर तब भी भारी थी

मांग पर पड़ी लाल बारीक रेखा

 

अच्छा होता है भूल जाना

कि यायवरी, हैरानी, परेशानियों के बीच

मुस्कुराहटें भी आती हैं मेहमानों की तरह

 

कि शाम के चुप क्षणों में

सफेद होते बाल

यह कहने के लिए अक्सर होते हैं आतुर

कि नहीं हुई है उनकी उम्र अभी ढल-ढल जाने की

 

अच्छा ही होता है

यह भी भूल जाना कि

बात सिर्फ इतनी है कि

ये सांसों का ठेला ही तो है

क्या अपना, क्या पराया

क्या मेरा, क्या तुम्हारा

 

हां, जब तक गठरी है कांधे पे अपने

तब तक तो अच्छा ही है

भूले रहना

भूले-भूले रहना

Dec 21, 2010

आज

 सूरज के गोले बनाकर

चांदी के फंदे डाल दिए

रात भर में बना डाला ऐसा स्वेटर

कि सुबह हुई

तो सूरज शरमा गया

 

गमों को हीरे के गिलास में डाला

एक सांस में गटका

सांस ठंडी हुई

फिर सामान्य

 

हिम्मत है अंधेरे की

कि रास्ते के दीए बुझाए

हम तो दीए हथेली पे लिए चले हैं

ऊर्जा मन में है

दीए बहाना हैं

 

अहा

इससे बेहतर तस्वीर क्या होगी जिंदगी की

पूछो तो इस नन्हे शावक से

यहां मुस्कुराहटें खुद चली आती हैं

खुशी का सबक लेने

Dec 19, 2010

2010

 जाते हुए साल से एक पठार मांग लिया है उधार में

पठार होंगें

तो प्रार्थनाएं भी रहेंगी

 

कहा है छोड़ जाए

आंसू की दो बूंदें भी

जो चिपकी रह गईं थीं

एक पुरानी बिंदी के छोर पर

 

कुछ इतिहासी पत्ते भी चाहिए मुझे अपने पास

वो सूखे हुए से

शादी की साड़ी के साथ पड़े

सूख कर भी भीगे से

 

वो पुराना फोन भी

जो बरसों बाद भी डायल करता है

सिर्फ तुम्हारा ही नंबर

 

हां, वो तकिया भी छोड़ देना पास ही कहीं

कुछ सांसों की छुअन है उसमें अब भी

 

इसके बाद जाना जब तुम

तो आना मत याद

न फड़फड़ाना किसी कोने पर पड़े हुए

 

कि इतने समंदरों, दरख्तों, रेगिस्तानों, पहाड़ों के बीच

सूरज की रौशनी को आंचल में भर-भर लेने के लिए

नाकाफी होता है

कोई भी साल

Dec 13, 2010

संवेदना के धागों से बुनी एक खबर

एक अकेला भारत ही संवेदनशील है, भावनाओं के समुंद्र में बहता है और वह उफान में रोज गहराता है, ऐसा नहीं है। कार्ला ब्रूनी जब फतेहपुर सीकरी जाती हैं तो अपनी दूसरी शादी और पहले से एक बच्चे की मां होने के बावजूद यह जानकर भावुक हो उठती हैं कि यहां मुराद मांगने से झोली जरूर भरती है। हाथ में चादर लिए वे माथा टेक कर कई मिनट लगातार सरकोजी के जरिए एक बच्चे की मुराद मांगती चली जाती हैं और जब चादर चढ़ा कर बाहर आती हैं तो उनके चेहरे पर नारी सुलभ संकोच और सौम्यता टपकती दिखती है। इलेक्ट्रानिक मीडिया इसी संकोच पर खबर दर खबर गढ़ता चला जाता है। कुछ जगह आधे घंटे के प्रोग्राम बना दिए जाते हैं। कार्ला और सरकोजी कव्वाली की धुन के बीच उस सलीम चिश्ती के रंग में सराबोर दिखते हैं जिसने बादशाह अकबर को भी खाली हाथ नहीं भेजा था। कार्ला बार-बार नमस्ते की मुद्रा में दिखाई देती हैं, कैमरों के सामने उनकी मुस्कुराहट और भी खिल कर सामने आती है। वे भाव विभोर हैं। कैमरे, संगीत का प्रभाव और दमदार एडिटिंग ऐसे माहौल को निर्मित कर देते हैं जहां दुनिया के एक प्रभावशाली देश का शासक भी महज एक याचक की तरह दिखाई देता है।

 

बाद में कार्ला उस वादे को दोहराते दिखती हैं कि अगली बार वे भारत प्रवास इतना छोटा नहीं बनाएंगीं बल्कि कुछ हफ्तों के लिए यहां रूकना चाहेंगीं। भारत ने उन्हें खींच लिया है। एड्स पीड़ितों से मिलते समय कार्ला ब्रूनी में यही नारीत्व झलकता है। वे एड्स से पीड़ित गर्भवती महिलाओं को दिलासा और हौसला देती हैं कि उनके बच्चे पूरी तरह से स्वस्थ होंगे। कार्ला की बातचीत, उनकी चाल और उनके चेहरे के भावों में ममत्व उमड़ता दिखता है। वे भारत में आकर मुग्ध हैं, शब्दहीन हैं और सरोकारों से भरपूर हैं।

 

इस सबका प्रभाव यह होता है कि जो रिपोर्टिंग महज दिमागी या फिर सिर्फ राजनीतिक रंग में रंगी होनी चाहिए थी, वह मानवीय सरोकारों में बुनी जाने लगती है।

 

यह मीडिया का एक नया युग है। यहां चौबीसों घंटे राजनीति नहीं परोसी जा सकती। किसी राजनियक, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या सेलिब्रिटी की यात्रा के ऊबाऊ भाषण जनता को ज्यादा खींच नहीं सकता। यह रिपोर्टिंग का मानवीयकरण है। यहां खबर को संवदनाओं के धागे में ऐसा बुना जाता है कि सारे समीकरण ही बदले नजर आने लगते हैं। वे ऐसा बदलते हैं कि यात्रा का अंत आते-आते राष्ट्रपति ओबामा पर मिशेल भारी पड़ जाती हैं। काटेज इंपोरियम में एक माला पहनतीं या मुंबई में एक बच्ची से यह कहतीं मिशेल कि मेरे पति से जरा मुश्किल सवाल पूछो, नारीत्व के ग्लोबल परिदृश्य को साबित करती हैं। वे कह देती हैं कि भाई घर पर तो मेरी ही चलती है। यहां की बॉस मैं ही हूं। यहां कार्ला भी अपने पति सरकोजी पर साफ तौर पर हावी दिखती हैं। लगता है कि जैसे सरकोजी उनके पीछे कदमताल कर रहे हैं। कार्ला सर्वेसर्वा हैं। पति की बागडोर अपने हाथों में लिए हुए उनकी अदा निराली हो उठती है। यहां तक कि रिपोर्टिंग में भी वे ही छाई दिखने लगी हैं। उनका साथ इस यात्रा में रस भरने और भारत के साथ संबंध को पक्का बनाने का काम कर रहा है अन्यथा इस यात्रा के बोझिल दिखने की आशंका बन सकती थी।

 

शायद इसीलिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कूटनीतिक यात्राओं में पत्नी का साथ कई मायने रखता है और वह जरूरी भी है। ऐसा नहीं है कि दांपत्य भारतीय संदर्भ में ही बुनियादी जरूरत सा है बल्कि तमाम आधुनिकताओं के बावजूद पश्चिम भी इसकी जरूरत को महसूस करने लगा है। दरअसल यह वाक्यों के बीच में पढ़ने जैसा ही है। सफल दांपत्य बाहरी जिंदगी में भी पौधों को सींचने का काम करता है। यह बात अलग है कि दुनिया के कई नेताओं को ऐसा सौभाग्य मिल नहीं सका। अटल बिहारी वाजपेयी उन्हीं गिने-चुने नेताओं में से एक हैं। एक अदद पत्नी की मौजूदगी भर बोझिल होते माहौल में ताजगी ला सकती है और झुर्रियों से भरते देशों के आपसी रिश्तों में कसाव ला सकती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ज्यादातर विदेशी यात्राओं में जब अपनी पत्नी गुरशरण कौर के साथ नजर आते हैं तो उसके कई मजबूत संदेश जाते हैं। इस पर एक मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षण किया जाए तो हो सकता है कि कई दिलचस्प तथ्य सामने आएं।

 

बहरहाल, कार्ला और सरकोजी ने वादा किया है कि इस शादी से बच्चा होने पर वे सलीम चिश्ती की दरगाह में फिर से लौटेंगे। भारत और भारतीयों को इस वादे के पूरे होने का इंतजार रहेगा। तब शायद  मीडिया 2010 की इस फुटेज को नए सिरे से जोड़कर संवेदना की कोई नई पराकाष्ठा ही गढ़ दे।

 

(यह लेख 13 दिसंबर, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Dec 2, 2010

दिखा क्या ?

जो दिखता है वो होता नहीं

जो होता है, वो होता है और कहीं

परियों की कहानियों

यादों के संदूकों में बंद

कहीं छिपा

 

शहर ही की तरह होता है दिल

बड़ा भी, उतना ही कभी तंगदिल भी

 

मकबरे की तरह शिथिल भी

उत्सव की तरह खिल-खिल भी

 

किताब में जिस पत्ते को 1980 में सहेज रख छोड़ा था

उस दिन की याद में

वैसा ही गुमसुम भी

 

झुरझुरी की तरह निजी भी

उस बाल की तरह जिसकी सफेदी

अभी कालेपन के नीचे दबी है

पर वो भी है एक सच

 

चलो, इस सड़क को जरा खींच लिया जाए

बना दिया जाए यहां एक बांध

खोल दिया जाए तितलियों से भरा एक झोला

इत्र की बोतलों की कई सुरमई खुशियां

 

बस, बात सिर्फ इतनी थी

खुशबुओं की तैराई समझने के लिए

मूंदो तो पलकें पल भर को

रोको सांसें

जिंदगी खुद ही सरक आएगी

आंचल के छोर में बंधने

Nov 25, 2010

गोवा की शादी

दिल्ली से गोवा की फ्लाइट के चलने में अभी कुछ समय बाकी है। तभी एक नजारा मिलता है। पहले दो  कर्मचारीनुमा लोग दो अलग-अलग सूट थामे हुए सावधानी से चलते हुए, फिर करीब 30 लोगों का एक परिवार जैसा एक काफिला और उनके एक कोने में ठसक के साथ चलते हुए दो पंडित। पंडितों को देखते ही मामला समझ में आ जाता है। यह लड़के की बारात है।

 

फ्लाइट चलती है। बाराती रास्ते भर कुछ नहीं खाते(क्योंकि कुछ फ्लाइटों में खाने का पैसे खर्च होते हैं) हां, खुसफुसाहट जरूर कानों में पड़ती है कि वहां का इतजाम कैसा शानदार होगा।

 

गोवा आते ही कारवां खुशी से बाहर आता है। बेहद सावधानी से दूल्हे के कपड़े उठाए उन दोनों कर्मचारियों से मैं पूछती हूं क्यों भइया, इतने ध्यान से क्या उठाए हुए है। वे शर्मा कर कहते हैं (गोया यह शादी उन्हीं की हो) कि ये भइया जी के कपड़े हैं, उनकी शादी है। मेरा मन अभी भरा नहीं है। अबकी मैं पूछ बैठती हूं, भइया कपड़े बहुत महंगे हैं क्या। उनमें से एक शर्मा कर फिर से कहता है हां, बहुत महंगे हैं।

 

खैर,एयरपोर्ट पर बारातियों का भव्य स्वागत होता है। बताया जाता है कि उनके लिए गोवा के एक शानदार होटल में चार दिन और तीन रात ठहरने का इंतजाम किया गया है। जाहिर है खर्चा लड़की वालों का ही है। एक बाराती कहता है कि इंतजाम तो खास होना ही है जी। इतना तो बनता ही है। बाराती एक विशालकाय बस में जाते हैं। प्रस्तावित दूलहा अपने दोस्ते के साथ एक बड़ी कार में। एक-एक पल की वीडियो रिकार्डिंग होती है। लड़के के बैठने, हाथ हिलाने, हंसने सभी की।

 

यह कारपोरेट शादी है। यहां सब कुछ पैकेज में मिलता है। हवाई यात्रा, ठहरना, खाना-पीना, घूमना, लौटते में सोने के सिक्के पाना यह सब पैकेज का हिस्सा है। मैनें तो शादी से पहले के आयोजन की एक झलक भर ही देखी, शादी में जाने क्या हुआ होगा। लाजपतनगर के एक दुकानदार की बेटे की शादी के लिए जब यह पैकेज देखा तो सोचना पड़ा कि आजकल नेताओं, सरकारी अफसरों, बड़े व्यापारियों के बेटों के लिए जाने कैसे पैकेज होते होंगा। क्या हम वाकई तरक्की कर रहे हैं? वैसे सीबीआई है कहां और कहां है इंकम टैक्स विभाग? क्या यह विभाग उन्हीं लोगों को डराने के लिए हैं जिनके पास इंकम कम और डर ज्यादा है?

Nov 18, 2010

आखिर कहां है कला के लिए जगह

10 दिनों तक कवरेज कामनवेल्थ गेम्स के आस-पास घूमती रही। एतराज इस पर नहीं है। पर इस बात पर एतराज करने का हक तो बनता ही है कि इस कवरेज में मीडिया, खास तौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया इस कदर लोटपोट रहा कि दिल्ली में हो रहे बहुत से  दूसरे जरूरी उत्सव उसने तकरीबन नजरअंदाज ही कर दिए। खेल महाउत्सव तो थे लेकिन उसके साए में लगा कि जैसे कवरेज का संसार भी सीमित हो गया। संगीत नाटक अकादेमी का देशपर्व इसका सटीक उदाहरण है। 10 दिन तक चले इस उत्सव को 5 हिस्सों में बांटा गया। कुलवर्णिका, नृत्य रूपा, देसज, नाट्य दर्शन और संगीत मार्ग। सभी का मकसद कलाकारों को राष्ट्रीय मंच मुहैया कराना और उन्हें प्रोत्साहित करना था। 10 दिनों तक चले इस उत्सव में करीब 1500 कलाकारों ने कला की कई ऐसी विधाएं ऐसे अद्भुत ढंग से प्रस्तुत कीं कि कई बार दर्शक खुशी के चरम को महसूस करते दिखे। संगीत, नृत्य और नाटक की भारत की इस राष्ट्रीय अकादेमी की स्थापना1952 में हुई थी और तब से यह भारत के सांस्कृतिक कलेवर में रंग भर रहा है।     

 

इसी तरह दिल्ली की साहित्य अकादमी ने कामनवेल्थ गेम्स देखते हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया। मीडिया यहां भी तकरीबन नदारद दिखा। इंडिया इंटरनेशनल और हैबिटैट सेंटर दो हफ्तों में कई किताबों के विमोचन करने में व्यस्त रहे लेकिन वहां भी कवरेज का हाल तकरीबन यही रहा। हां, श्री राम कला केंद्र की हर साल होने वाली रामलीला को ठीक-ठाक कवरेज जरूर नसीब हुआ।

 

दरअसल कवरेज का ताल्लुक सीधे इस बात से होता है कि उसकी कवरेज की अनुमति देने वाले का खुद का रूझान किसमें है और कवरेज के लिए कही जा रही घटना में टीआरपी बटोरने की कितनी ताकत है। आम तौर पर कवरेज का नियंत्रण अपने हाथ में रखने वाले आका कलाकार नहीं, पत्रकार ही होते हैं, इसलिए यहां खबर का पलड़ा भारी पड़ता है। लेकिन अगर आका के चाहने पर कवरेज हो जाए तो उस कवरेज को चलाने का अधिकार आउटपुट वाले के पास होता है जो इन्हीं मापदंडों के हिसाब से चयन करता  है। नतीजतन कला और कलाकार के बड़ी खबर बनने के आसार आम तौर पर पस्त ही होते हैं, बशर्ते उस दिन राजनीतिक, खेल या दूसरे बड़े हलकों से बड़ी खबर की पैदावर न हुई हो। दूसरे, यह भी कि कला की बीट को कवर करने वाले कई बार ऐसी हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं कि कांग्रेस या भाजपा कवर कर रहे रिपोर्टर की अदनी सी खबर के आगे अपनी स्टोरी को जगह दिलाने के लिए पूरी तरह जिरह नहीं कर पाते।

 

तो क्या इसका मतलब यह माना जाए कि नया थियेटर की नगीन तनवीर को तभी जाना जाएगा जब वे पीपली लाइव में चोला माटी के राम गाएंगी और लोग उस आवाज को बड़े परदे पर सुनेंगे। तब तक 30 साल की यात्रा के सहभागी सिर्फ वो मुट्ठी भर लोग होंगें जो साल दर साल ऐसे कलाकारों को मंच पर देख कर हैरानी और खुशी के भाव से बाहर आया करेगें। तो क्या कला की दुनिया को कवरेज के लिए किसी ऐसे फीके दिन का इंतजार करना होगा जिस दिन कोई न्यूज ब्रेक न हो और खबर का बाजार मंदा पड़ा हो।

 

इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सांस्कृतिक बाजार को लेकर प्रिंट और उससे भी ज्यादा वेबमीडिया में काफी सरोकार दिखाई देता है।गेम्स को लेकर लगातार बनी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बीच भी वेब मीडियाकाफी हद तक अपने संतुलन को बनाए रखने में कायम रहा है। ब्लागरों की नई उपजी फौज चहुंमुखी कवरेज में भरपूर मुस्तैद दिखती रही। हां, उनकी तुलना टीवी या प्रिंट से करना सही नहीं क्योंकि वहां पैसे की ऐसी बंदिश होती नहीं, इसलिए वो आजादी लुभावनी भी लगती है।   

 

असल में हर माध्यम की अपनी उपयोगिता और अपनी सीमाएं हैं। इसलिए समुचित कवरेज न पाने वालों को भी नए सिरे से इस बात का अवलोकन करना चाहिए कि कौन से ऐसे माध्यम ईजाद किए जाएं जिनके जरिए सूचना का संप्रेषण सटीक, तुरंत और ज्यादा कारगर हो। कला का क्षेत्र प्रयोगधर्मिता का क्षेत्र है। जब मंच के हर कोण में प्रयोगधर्मिता के नए फार्मूले ईजाद किए जा सकते हैं तो फिर कवरेज को लेकर क्या परहेज।

 

(यह लेख 24 अक्तूबर, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)

Nov 3, 2010

गुल्लक

हवा रोज जैसी ही थी

लेकिन उस रोज हुआ कुछ यूं

कि हथेली फैला दी और कर दी झटके से बंद

हवा के चंद अंश आएं होंगे शायद हथेली में

गुदगुदाए

फिर हो गए उड़नछू वहीं, जहां से आए थे

 

फूल भी क्यारी में रोज की तरह ही थे

लेकिन उस रोज जाने क्यों

एक पत्ते को उंगलियों में लिया

किताब की गोद में सुला दिया

लिख दिया उस पर तारीख, महीना, साल

पत्ता इतिहास हुआ पर दे गया कोई सुकून

कि जैसे

इतिहास को बांध लिया हो किताब की कब्र में

 

पल भी कई बार ऐसे ही समेटे कई बार

याद है शादी का वो अलबम

पहली किलकारी की तस्वीरें

होश में आते दिनों के ठुमकते दिन

 

मौसमों को भी कई बार बाहुपाश में समेटा

सर्द दोपहर की घाघरे सी फैली धूप में

बाहर बैठे

कैसे बातें लिपटती गईं थीं

इतिहास की तह में जाकर भी

वो दोपहरें आबाद थीं

 

जाने क्यों इस जीवन को छोड़ने का मन ही नहीं करता