"जेल की मिट्टी में वो ताक़त है कि वह असंभव को भी संभव कर सकती है, इंसान में 'जज़्बा' होना चाहिए।" रामधनी द्विवेदी
उपन्यास - ‘ ज से जेल’
लेखिका – वर्तिका नंदा
प्रकाशक – प्रभात प्रकाशन
मूल्य’- 400/- पेज 200
“कुछ के लिए रिहाई वो नहीं जो सरकार देती है, रिहाई वो जो स्थायी तौर पर ईश्वर देता है। ईश्वर का जीवंत रूप जेल में हो सकता है, यह कहां, किसने सोचा था। यहां पर आत्मा का परमात्मा से मिलन भी हो सकता है। जेल से दिखने वाले आधे आकाश से पूरी दुनिया का सीधा साक्षात्कार। अंधेरे में रौशनाई मिल गई तो फिर इस दुनिया की हस्ती ही क्या है। जेल की रिहाई से बड़ी है- दुनिया से रिहाई औऱ अध्यात्म में पिरोई सांसों की माला।“
(उपन्यास 'ज से जेल' से)
~ प्रो. डॉ. वर्तिका नंदा (प्रसिद्ध जेल सुधारक और मीडिया शिक्षक)
"ज से जेल" एक अत्यंत प्रभावशाली और आत्म-चिंतन से भरी रचना है। "ज से जेल" केवल एक शब्द का सफर नहीं है बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, संघर्षों और जीवन के उन अनकहे पहलुओं का दस्तावेज़ है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
पुस्तक का शीर्षक जितना सरल और वर्णमाला के एक अक्षर जैसा प्रतीत होता है, इसकी गहराई उतनी ही अगाध है। यह जेल के काले घेरों के भीतर की दुनिया को एक नई दृष्टि से देखता है। वर्तिका जी ने जेल के केवल भौतिक वातावरण का चित्रण नहीं किया है, बल्कि उन कैदियों के मन की घुटन, पछतावे, और उनसे भी परे—मानवीय गरिमा की तलाश को अत्यंत सूक्ष्मता से उकेरा है। उनकी वर्णनात्मक क्षमता इतनी सजीव है कि पाठक स्वयं को उस कालकोठरी की दीवारों के पास खड़ा महसूस करता है। जो भी संवाद हैं, वे सीधे हृदय को भेदते हैं। लेखिका ने जेल को केवल एक सज़ा के स्थान के रूप में नहीं, बल्कि आत्म-सुधार और आत्म-बोध के एक केंद्र के रूप में प्रस्तुत करने का साहसिक प्रयास किया है। पुस्तक कहीं भी भावुकता में बहकर यथार्थ से दूर नहीं होती।
जेल में बंद हर व्यक्ति एक कहानी है, और यहाँ हर कहानी को पूरी ईमानदारी से जगह दी गई है। साथ ही जेल की तिनका तिनका यात्रा की कुछ छवियां भी उकेरी गईं हैं जैसे कि जेल का रेडियो। इससे उपन्यास यथार्थ की जमीन पर दिखता है
"ज से जेल" उन पाठकों के लिए अनिवार्य है जो साहित्य में गहराई, संवेदनशीलता और समाज के उन हिस्सों को पढ़ना चाहते हैं जहाँ रोशनी कम पहुँचती है। यह पुस्तक आपको केवल पढ़नी नहीं है, बल्कि इसे महसूस करना है। यह आपको मजबूर करेगी कि आप न्याय, कानून और मानव स्वभाव के बारे में अपनी बनी-बनाई धारणाओं पर फिर से विचार करें। यह पुस्तक जेल की दीवारों के पीछे उपस्थित जेल अधिकारियों और बंदियों को भी पढ़नी चाहिए, संभव है कि उनकी प्रकृति, स्वभाव और संवेदना में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जाये।
"ज से जेल" एक पठनीय, विचारोत्तेजक, सार्थक और संग्रहणीय कृति है। यह पहला मौका कि जेल पर जिसने लिखा है, वह पत्रकार, लेखक, शिक्षक, जेल सुधारक और जेल पर लगातार काम करती बेहद सकारात्मक महिला है। तिनका तिनका का जेल में हो रहा यज्ञ इस किताब में उपस्थित है. शायद इसीलिए इस पुस्तक को एक प्रार्थना का नाम भी दिया गया है। भारत में कभी भी जेल साहित्य की बात होगी तो ज से जेल का जिक्र अब हर हाल में होगा।
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