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7 years of Agra jail radio: Launched in 2019: Tinka Tinka Foundation

Aug 1, 2011

अब फेसबुक ने बनाई ‘ तीसरी दुनिया ’

एक नई दुनिया बन कर तैयार हो रही है। यह दुनिया एक दूसरे से मिले बिना एक दूसरे से जुड़ी रहती है। एक दूसरे के सपने, गुस्से और दुख को बांटती है और पल भर में एक दूसरे के साथ जुड़ भी जाती है। यह बात अलग है कि जितनी तेजी से जुड़ती है, उतनी ही तेजी से उन संबंधों को किसी डस्टबिन में फेंक आगे निकल भी जाती है।

नए आकंड़े बड़ी मजेदार बातें बताते हैं। अगर दुनिया भर के फेसबुक यूजर्स की संख्या को आपस में जोड़ लिया जाए तो दुनिया की तीसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश हमारे सामने खड़ा होगा। अब जबकि आबादी की 50 प्रतिशत हिस्सा 30 से कम उम्र का है, फेसबुक स्टेटस सिंबल बन चुका है। आधुनिक बाजार का 93 प्रतिशत हिस्सा सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करता है। भारतीय युवा तो इस नए नटखट खिलौने के ऐसे दीवाने हो गए हैं कि भारत दुनिया का चौथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी से आए श्री श्रीनिवासन हाल ही में दिल्ली के अमरीकन सेंटर में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब खुलकर बोले। देश के कुछ बड़े कालेजों के छात्रों के बीच उनकी कही बातें फेसबुक के बड़े होते कद को बार-बार साबित करती चली गईँ। एकबारगी तो ऐसा लगा कि जैसे फेसबुक का पीआर ही हो रहा हो। यहां पारंपरिक साधनों का कोई जिक्र नहीं था। यहां फेसबुक एक ऐसे राजा की तरह उभरा जो प्रजा भी खुद है और शहंशाह भी।

छात्रों से भरे इस हाल में एक टिप्पणी ऐसी थी जिसने चौंका दिया। एक युवक ने कहा कि फेसबुक को अब बड़ी उम्र के लोग यानी 35 पार वाले भी इस्तेमाल करते हैं। यानी छात्रों को यह मुगालता है कि फेसबुक शायद सिर्फ उन्हीं के लिए ईजाद किया गया और दूसरे 35 से पार वाले लोग बुजुर्ग हैं। यह संकेत एक ऐसे माहौल के तैयार होने का है जहां मुस्कुराहट भले ही हो पर यथार्थ और गरमाहट यहां से नदारद है।

फेसबुक जिस आपसी जुड़ाव की कथित जमीन को तैयार कर रहा है, यह उसके खोखलेपन का एक बड़ा सुबूत है। उन्हें फेसबुक की यह दीवानगी उपजी कहां से है और क्यों है। असल में फेसबुक युवाओं के अंदर फैले उस खालीपन को दूर करने का रास्ता है जिसे वे किसी अंधेरी सुरंग में छिपाए रहते हैं। लेकिन यहां एक बात और सोचने की है। हर नई चीज को सिर्फ युवाओं से ही क्यों जोड़ा जाए। क्या फेसबुक सिर्फ युवाओं की ही जरूरत है। नहीं। बड़ी तादाद में बुजुर्ग इस फेसबुक से जुड़ने लगे हैं ( और यहां बुजुर्गों से आशय 70 पार के लोगों से है) और उनका जुड़ना भावनात्मक स्तर पर ज्यादा निश्छल है। यहां किसी इम्प्रैस करने के लिए फेसबुकपना नहीं किया जाता। यहां अपनों की तलाश की जाती है, पोते-पोतियों को भूली-बिसरी लोरियां याद दिलायी जाती हैं और उनसे उनके हाल की खोज-खबर कर झुर्रियों से भरे चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश की जाती है। रिश्तेदार जो अक्सर रविवार की शामों को जमा हो कर गली-मोहल्लों-स्कूलों की पुरानी बातें यादें किया करते थे, वे भी अब इसी फेसबुक पर जमा होकर कागजी धमाचौकड़ी कर लेतें हैं और खुशियां बांट लेते हैं। यह एक बड़ी बात है। अकेलेपन को भोगते बुजुर्गों के लिए यह फेसबुक सपनों का उड़नखटोला बन कर आया है। उम्र के इस पड़ाव पर अपने पुराने दोस्तों को ढूंढने के लिए अब उन्हें बेवजह ही व्यस्त दिखते अपने बेटों के आगे चिरौरी नहीं करनी पड़ती। वे खुद जब चाहें अपनी पुरानी जड़ों को तलाश सकते हैं और अपने बुढ़ापे में कुछ रौशनियां भर सकते हैं।

एक बात और ख्याल आती है। अमरीका जोर-शोर से फेसबुक की बात करता रहा है। हम भारत में रहकर भी कभी भी अपने पारंपरिक संचार माध्यमों का वैसा प्रचार कर ही नहीं पाए। भारतीय रेल के एक बड़े अधिकारी अरविंद कुमार सिंह सालों साल डाकिए पर शोध करते रहे हैं और इस पर उनकी लिखी किताब देश की सबसे अनूठी किताब है पर उसका ऐसा प्रचार कभी नहीं हुआ। डाक के डिब्बे और डाकिए के हाथों से मिलती एक चिट्ठी जिंदगी में कैसे रंग भरा करती थी, इस पर भारत सरकार कभी फख्र से झंडे गाढ़ नहीं पाई। पातियों के वे भीगे-महकते दिन अब शायद कभी लौटें। कबूतर भी शायद कुछ सालों में गुप्त संदेश ले जाने के रास्ते भूल जाएं लेकिन अमरीका याद रखेगा कि फेसबुक और बाकी दूसरे संचार माध्यमों को अधिकाधिक पापुलर कैसे बनाना है। हम सोचते ही रह जाते हैं और बिग ब्रदर हमेशा एक लंबी छलांग भर कर आगे निकल जाता है।

(यह लेख 1 अगस्त, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Jun 18, 2011

राजकमल प्रकाशन से छपकर आ गई है मरजानी


पंजाब का एक छोटा-सा शहर – फिरोजपुर। 22 साल पहले यहीं से मेरा पहला कविता संग्रह आया था- मामूली सा। तब स्कूल में थी।

फिर यात्रा टीवी चैनलों से गुजरती हुई अब अध्यापन पर आ गई है। अभी लंबा सफर बाकी है। इस सफर की समूची गाथा अंदर जमतीं रहीं कविताओं ने देखी-सुनी। इन कविताओं ने असंख्य चेहरों को गौर से देखा, फिर खुद से संवाद करती रहीं, उनकी कहानी का अंदर वाचन करती रहीं।

मरजानी इसी गाथा का सार है। जो आस-पास देखा, अपनों-परायों को उधड़तो तारों में कसाव लाने के असफल प्रयासों में जो देखा, वो मरजानीहो गया। यही मरजानी आज छप कर आई है राजकमल प्रकाशन से।

इस संग्रह के लिए मरजानी से बेहतर कुछ सूझा नहीं क्योंकि मरजानियां मरने या मारे जाने का जबाव आने पर ज़्यादा जीवंत हो उठती हैं कई बार। सरकारी आंकड़े मरजानियों की कहानियां नहीं समझ सकते। मरजानी को समझने के लिए जरूरी है किसी के दिल में, किसी के आस-पास कोई मरजानी हो और उसका अहसास कहीं छूता हो।

इसलिए हो सके तो मरजानी के सफर में शरीक हो जाइए।

Jun 12, 2011

शायद यही हो वो

आकाश के फाहे निस्पंद

ऊनी स्वेटर बुनती चोटियों के बीच में से गुजरते हुए

कभी रोक पाए इनकी उड़ान क्या।

 

समय मौन था

सोचता

सृष्टि क्यो, कैसे, किस पार जाने के लिए रची ब्रह्मा ने

 

आत्माएं चोगा बदलतीं

आसमान की तरफ भगभगातीं प्रतिपल

शरीरों के दाह संस्कार

पानी में तैरते बचे आंसुओं के बीच

इतना बड़ा अंतर

 

निर्माण, विनाश, फिर निर्माण की तमाम प्रक्रियाओं में

समय की बांसुरी बजती रही सतत

वो सूक्ष्म-सा दो पैरों का जीव

इतनी क्षणभंगुर जमीन पर भी

गर्वित हो चलता कितना अज्ञानी

 

ज्ञान-अज्ञान, वैराग-अनुराग की सीमाओं से उठ पाना ही है

शायद

जीवन का सार

 

इस मरूस्थल में

 

उन दिनों बेवजह भी बहुत हंसी आती थी

आंसू पलकों के एक कोने में डेरा डालते पर

बाहर आना मुमकिन न था

 

मन का मौसम कभी भी रूनझुन हो उठता

उन दिनों बेखौफ चलने की आदत थी

आंधी में अंदर एक पत्ता हिलता तक न था

 

उन दिनों शब्दों की जरूरत पड़ती ही कहां थी

जो शरीर से संवाद  करते थे

 

उन दिनों

सपने, ख्वाहिशें, खुशियां, सुकून

सब अपने थे

उन दिनों जो था

वो इन दिनों किसी तिजोरी में रक्खा है

चाबी मिलती नहीं


ख़बर को मसालेदार बनाने की मजबूरी

एक समय की नामी अभिनेत्री दीप्ति नवल की आवाज टीवी पर बहुत दिनों बाद सुनाई दी, वो भी गुस्से और आक्रोश से भरी हुई। यह गुस्सा एकदम जायज भी था। बात हो रही थी गुजरे जमाने के अभिनेता राज किरण के बारे में जिन्हें हाल ही में अमरीका में खोज लिया गया। उनकी इस तलाश में अभिनेता ऋषि कपूर अरसे से लगे थे और अब जाकर उन्हें राज किरण को ढूंढने में सफलता मिली। वे इस समय अमरीका के एक मानसिक चिकित्सालय में हैं। सालों डिप्रेशन के शिकार होने के यह खबर बा आज हालात यहां तक आ पहुंचे हैं। यह खबर पूरी तरह से झकझोरने वाली थी। राज किरण की अभिनीत फिल्मों की फुटेज एक ऐसे सितारे दुखद कहानी कहती थी जिसे समय की आंधी ने हताशा में डुबो दिया। खबर ने शायद हर दर्शक को उद्वेलित किया होगा।

इस खबर के आने के बाद टीवी चैनलों ने उन तमाम सितारों से संपर्क करना शुरू किया जिन्होंने कभी राज किरण के साथ काम किया था। इसी कड़ी में दीप्ति नवल की बारी भी आई। उन्होंने राज किरण के साथ कई फिल्मों में अभिनय किया था।

तो फोनो लाइव इंडिया पर हो रहा था। एंकर थे सुधीर। दीप्ति से जब सवाल पूछा गया तो जवाब देने से पहले उन्होंने अपना गुस्सा इस बात पर जताया कि आज तक इस खबर को बेहद लापरवाही के साथ दिखा रहा है। वहां कहा जा रहा है कि राज किरण पागलखाने में हैं। दीप्ति नवल जाहिर तौर पर खबर को दिखाए जाने के अंदाज पर काफी आहत थीं। वे बार-बार कह रही थीं कि ऐसे मामलों को संजीदगी से रिपोर्ट करना चाहिए न कि गैर-जिम्मेदाराना तरीके से।

अब बारी सुधीर के सकपकाने की थी क्योंकि आलोचना सबसे तेज चैनल और साथ ही प्रतिद्वंदी चैनल की हो रही थी। यह शाब्दिक धुनाई अंदर से मजा भले ही दे रही हो लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर तो उस पर खुशी दिखाई जा नहीं सकती थी। यहां सुधीर यही कह कर रह गए कि उनका चैनल इस खबर को पूरी गंभीरता के साथ दिखाएगा भी और राज किरण के लिए कुछ करने की कोशिश भी करेगा। इससे ज्यादा कहना शायद संभव भी नहीं था।

लेकिन इतना जरूर है कि अगर राज किरण को लेकर बरसों पुरानी जमी धूल को अगर मीडिया ने साफ कर सामने रखा तो साथ ही यह भी सच है कि उसकी खबर को मसालेदार बनाने की भी पूरी कोशिश की गई।

दरअसल हर खबर एक अलग तरह का ट्रीटमेंट मांगती है लेकिन जब खबर खास तौर पर संवेदना के धरातल से उपज कर बाहर आती हो तो उस पर ज्यादा चौकन्ना होना भी जरूरी हो जाता है। टीवी वैसे भी एक सामाजिक-सांस्कृतिक फैक्टरी है। यहां न तो विशुद्ध मनोरंजन मिल सकता है, न खालिस खबर। यह दोनों का झालमेल है। न्यूज मीडिया इस गड़बड़झाले की मजेदार मिसाल है। दूसरी तरफ सरकार की बनाई तमाम संस्थाएं इन मामलों में मुंह में उंगली दबाए और कान पर रूई लगाए बैठी दिखती हैं। जिस प्रैस काउंसिल को इन मामलों में सक्रिय होना चाहिए, वह भी बेचारगी की स्थिति में दिखती है। 2009-10 में 950 और 2008-2009 में 726 शिकायतें पाने वाली प्रेस काउंसिल की तरफ से शायद ही कभी कोई बयान मुस्तैदी से आता है। मतलब यह नहीं कि काउंसिल को प्रेस के साथ किसी दुश्मन की भूमिका का निर्वाह करना चाहिए। मतलब सिर्फ यह है कि यह संबंध आपसी समझ को बढ़ाने और बेहतरी की तरफ जाने का भी तो हो सकता है।

इसके अलावा लगता यह भी है कि चैनलों को खुद अपने अंदर एक गंभीरता लाने के लिए खुद लामबंद होना शुरू कर देना चाहिए। धूल-मिट्टी फांक कर खबर लाता पत्रकार, डैस्क पर मजदूर की तरह घंटों गुजारता इनपुट या आटपुट एडिटर या फिर वीडियो एडिटिंग या कैमरा करके भी चैनल के हाशिए पर खुद को महसूस करता पत्रकार दूसरे की टीआरपी से सहम कर अक्सर ऐसी उछलकूद कर ही बैठता है। मामला सामंजस्य को बिठाने और कुछ मूलभूत लक्ष्मण रेखाओं को खींच देने का है। बस!

खैर, बाबा रामदेव की योग-राजनीति माया में व्यस्त मीडिया ने फिर भी किसी तरह से राज किरण के लिए समय निकाला। खबर के बहाने दर्शक का ध्यान मायानगरी के झूठे तिलस्मी समाज तक गया। बधाई। क्या इस कहानी को हम किसी अंजाम तक पहुंचते हुए देख पाएंगें या यह भी बाकी कई कहानियों की तरह बिना किसी फालो अप को कहीं दब जाएगी।

(यह लेख 9 जून, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Jun 7, 2011

चौरासी हजार योनियों के बीच

सहम-सहम कर जीते-जीते
अब जाने का समय आ गया।

डर रहा हमेशा

समय पर कामों के बोझ को निपटा न पाने का
या किसी रिश्ते के उधड़
या बिखर जाने का।

उम्र की सुरंग हमेशा लंबी लगी – डरों के बीच।

थके शरीर पर
यौवन कभी आया ही नहीं
पैदाइश बुढ़ापे के पालने में ही हुई थी जैसे।

डर में निकली सांसें बर्फ थीं

मन निष्क्रिय
पर ताज्जुब
मौत ने जैसे सोख लिया सारा ही डर।

सुरंग के आखिरी हिस्से से
छन कर आती है रौशनी यह
शरीर छूटेगा यहां
आत्मा उगेगी फिर कभी

तब तक
कम-से-कम, तब तक
डर तो नहीं होगा न!

Jun 6, 2011

विमोचन के बहाने

एक परिचय तो यह है कि ज्ञानेश्वर मुले भारतीय विदेश सेवा के 1984 बैच के अधिकारी हैं और इस समय मालदीव में भारत के उच्चायुक्त हैं। लेकिन यह एक सरकारी परिचय हुआ। इस परिचय में जो ताजा अध्याय जुड़ा है, वह इस परिचय को मानवीय बनाने में मदद करता है। इसी महीने ज्ञानेशवर मुले की आत्मकथा माटी, पंख और आकाश राजकमल प्रकाशन से छप कर आई है। 350 रूपए की सुंदर कवर डिजाइन से आई यह किताब अपनी पहली झलक में ही अपना ध्यान खींचने में सफल होती है।

मुले की किताब का हाल में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी में विमोचन हुआ तो कई तत्व  देखने को मिले। हमेशा धीर-गंभीर चेहरा बनाकर रखने वाली निरूपमा राव का भाषण खुद अपनी यादों से सराबोर दिखा। मुले की बेहद प्रतिभावान पत्नी, लेखिका और एक सफल आईएएस अधिकारी साधना शंकर और किताब पर अध्यक्षीय टिप्पणी देते नामवर सिंह ने किताब के गांभीर्य को और बढ़ा दिया। लेकिन इसमें खास रही किताब में की गई अनगिनत सच्ची टिप्पणियां। जैसे कि लेखक कई जगह यह बात खुलकर बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र के एक गरीब परिवार से बाहर आकर देश की सबसे सम्मानित सेवा में आना उनके लिए बेहद दुरूह था। 1984 में चयन के बाद जब उनके बैच को राष्ट्रपति भवन ले जाना तय होता है तो कस्तूरबा गांधी मार्ग से लेकर राष्ट्रपति भवन तक का वह रास्ता उन्हें उनके कठिन दिनों की स्मृतियों से रूबरू कराता हुआ चलता है। वहां तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह सबसे पूछते हैं कि किसके पिता क्या करते हैं। सबके पिता बड़े लोग हैं, सिवाय ज्ञानेश्वर मुले के। वे फख्र से बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं और सिलाई का काम करते हैं। इस पर जैल सिंह सबसे बात करते हुए कहते हैं

इस लड़के की सफलता आप सबकी सफलता से अलग तो है ही, महत्वपूर्ण भी है। यह ग्रामीण इलाके से आया है, मराठी में इसकी पढ़ाई हुई, इसके पिताजी साधारण किसान हैं, फिर भी यह लड़का यहां तक पहुंचा।

दरअसल बहुत दिनों बाद ऐसी किसी किताब का जिक्र होता सुनाई दिया है जहां किसी वरिष्ठ अधिकारी ने अपने संघर्ष की गाथा को ईमानदारी से कहने की कोशिश की है। मुले जब यह लिखते हैं कि उनके पास न तो कायदे का कोई जूता था और न ही टाई पहनने का सरूर तो एक छोटे भारत का विशालकाय सच जैसे उछल कर सामने खड़ा हो जाता है। वे अपनी ग्रामीण पृष्टभूमि पर शर्मिंदा नहीं हैं बल्कि गर्वित हैं। हालांकि किताब सिर्फ एक-दो पक्षों के आगे-पीछे घमूने तक ही सिमटी दिखती है लेकिन ऐसी किताबें निसंदेह उन लोगों के सपनों में उजास भरने का काम तो कर ही देती हैं जिनके रास्तों में भी कुछ इसी तरह के पठार हैं। फाइलों में लिखने और नीतियों का निर्धारण करने वाले जब अपनी यात्रा की कथा कहते हैं तो उनके मील के पत्थर युवामन के अंतर्द्वदों को साफ करने में मददगार साबित होते हैं।

भारत में किताबों की दुनिया मजे की उड़ान भरती दिखने लगी है। इंडिया हैबिटाट सेंटर हो या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में कुछ ठिकाने जैसे रोजमर्रा की गतिविधि की तरह किताबों का विमोचन होते देखते हैं। अब विमोचनों से पहले कायदे की चाय का इंतजाम भी होने लगा है। विमोचन एसी कमरों में होते हैं, उनका बाकायदा आमंत्रण पत्र छपते हैं और प्रेस विज्ञप्ति भेजी जाती है। बैकड्राप बनाया जाता है और उसे कारपोरेट लुक देने के लिए आपसी जुगलबंदी भी की जाती है। लेकिन यहां एक बात बड़ी मजे की है। इन विमोचनों में कौन आएगा और कौन कतई नहीं आएगा, यह फेहरिस्त कोई भी याद कर सकता है, महज कुछ ही समारोहों को देखकर। लेखकों का एक बड़ा वर्ग अपनी किताब के विमोचन में भारी भीड़ को देखने के लिए तो आतुर रहता है लेकिन दूसरे के विमोचन में(अन्यथा कि भाषण देने की कोई संभावना हो) जाने में यथोचित परहेज करता है। किताबों के विमोचन कई बार राजनीति का मैदान बने हुए भी दिखते हैं। छोटे-छोटे विमोचन कई बार जाने-अनजाने बड़ी नाराजगियों की वजह भी बन जाते हैं। इसके अलावा यह भी सच है कि कई बार बड़े पदों पर आसीन लोगों की किताब के छपने में आम तौर पर आसानी हो जाती है क्योंकि वे एक ही धक्के में कई पुस्तकालयों में किताब के खरीदे जाने को सुनिश्चित कर देते हैं।

लेकिन तब भी किताबों को पंख लगाता यह नया मौसम एक मीठी आहट तो है ही।

May 5, 2011

रेडियो के लिए एक अच्छी खबर

प्राइवेट रेडियो के लिए बहुत दिनों बाद एक गुड न्यज सुनाई दी है। खबर है कि निजी स्टेशनों को जल्द ही खबरों के प्रसारण की अनुमति मिल जाएगी लेकिन उन्हें खबरों को आकाशवाणी से ही लेना होगा। यानि स्रोत तय होगा और उसी के बंधन में खबर का प्रसारण करना होगा। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि खबर वही होगी, जो सरकार देना चाहेगी। खबर छन और पक कर आएगी और निजी चैनल उसी को किसी परिवर्तन किए बिना प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होंगे।
लेकिन तब भी गुड न्यूज आई तो सही। आकाशवाणी के आला अफसरों ने यह भरोसा दिलाया है कि इस काम को अंजाम देने के लिए दो तरह के पैकेज बनाए जाएंगें। एक तो 15 मिनट का पैकेज होगा और दूसरा 2 मिनट का। प्राइवेट रेडियो स्टेशन अपनी जरूरत और समय के मुताबिक इनका इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके अलावा खेलों की लाइव कमेंट्री देने पर भी विचार किया जा रहा है। यह सारे भरोसे उस समय दिलाए जा रहे हैं जब कि भारत में एफएम रेडियो के विस्तार के तीसरे चरण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस समय भारत में 84 केंद्रों में एफएम के 245 स्टेशन हैं। तीसरे चरण के बाद उम्मीद है कि 283 शहरों में 800 एफएम स्टेशन खुल जाएंगें।
इसका मतलब यह कि भारत में प्राइवेट रेडियो को खबरों के प्रसारण के लंबे इंतजार से अब मुक्ति मिलेगी लेकिन यहां यह नहीं भूला जाना चाहिए कि यह सब बहुत ही हास्यास्पद ढंग से आगे बढ़ा है। भारत में रेडियो का बीज 1921 में पड़ गया था जबकि दूरदर्शन 1959 में पैदा हुआ। निजी चैनल 90 के दशक में आए और इतने स्मार्ट निकले कि देखते ही देखते 24 घंटे के न्यूज चैनलों में तब्दील होने में सफल हो गए। वहां समय, शॉट्स, भाषा, नियम-कायदों की सारी कहानियां कच्चे रंगों की तरह रहीं। वे भूत को गवा कर, नागिन को नचा कर, राखियों को सजा कर और बेकार की खबर को भी ब्रेकिंग न्यूज बता कर टिके रहे। उनकी जमीन हिली नहीं। दूसरी तरफ नजाकत, नफासत के साथ शुरू हुए रेडियो को कभी भी अपनेपन की जमीन नसीब नहीं हुई। वह गाने बजाता ही रह गया। आकाशवाणी के जिम्मे तो जैसे पूरे देश की परंपरा को संभालने का काम ही पड़ गया। वह शास्त्रीय संगीत, विकास, कला साहित्य, नाटक, कठपुतली, तराने, किसान भाई, सैनिक भाई, चीनी भाई, देशभक्ति बस इन्हीं सबके फंदों में उलझा पड़ा रहा। उसका सारा ध्यान शब्दों के सही उच्चारण, भाषा की गरिमा और सौहार्द की ऊंचाई और गांभीर्य भरे ठहराव से कभी हटा ही नहीं। वह इस देश की संस्कृति का रक्षक बना रहा और अब भी है।
प्राइवेट रेडियो स्टेशन आए तो उन्होंने रेडियो के खिचड़ीनुमा स्वाद में तड़का लगाने का काम किया। वे हिंग्लिश बोलने लगे। बात-बात में उछलने लगे। उनकी भाषा में हड़बड़ी दिखी, नई जमाने के मुताबिक सांचे में ढलने की काबिलियत भी लेकिन इस सबके बावजूद वह टीवी के करीब नहीं पहुंच सका। वजह कंटेट नहीं थी, वजह थी-खबर। प्राइवेट रेडियो को न्यूज से दूर रखा गया।
भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय को यह डर हमेशा रहा कि अगर रेडियो को खुली लगाम दे दी गई तो क्या होगा। रेडियो खबर को हैंडल नहीं कर सकता। दूसरा डर यह भी रहा कि चूंकि रेडियो का दायरा आज भी टीवी से कहीं ज्यादा है, अगर रेडियो अनर्गल प्रसारण करने लगा तो उस पर रोक लगेगी कैसे। देश के दूर-दराज में उसकी मॉनिटरिंग करेगा कौन। मंत्रालय के लिए रेडियो एक ऐसा कीमती खिलौना हो गया जो देखने में तो सुंदर था लेकिन उससे खेलने की छूट किसी को न थी।
खबर को लेकर रेडियो पर नियंत्रण की यह कहानी हमेशा ही अटपटी लगी। देश में 600 चैनल उग आए, प्राइवेट चैनलों को खबर दिखाने का लाइसेंस मिलने लगा और वे भी खबर के नाम पर अपनी मर्जी के मुताबिक सामान परोसने लगे। तब भी मंत्रालय के माथे पर त्यौरियां नहीं चढ़ीं। चैनलों पर कई बार गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग हुई पर मंत्रालय ने उसे भी आराम से हजम कर लिया। बाद में 2010 में मंत्रालय ने एक मीडिया सैल का गठन किया लेकिन वो भी खामोश ही रहा है। ऐसे में रेडियो पर ही तमाम बंदिशें क्यों।
रेडियो को अपने वजूद को बनाए रखने के लिए हमेशा सबूत क्यों देने पड़ते हैं। सदी के इस अध्याय में खबर चारों तरफ है। जब बाकी किसी माध्यम पर कोई लगाम नहीं है तो सबसे पुराने,विश्वसनीय और टिकाऊ माध्यम को बंधन में रखने का आखिर क्या औचित्य है। सोचिए ओसामा के मारे जाने की खबर को तस्वीरों के साथ जब पूरी दुनिया का टीवी दिखा रहा था, इंटरनेट उसके विश्लेषण में धड़ाधड़ जुड़ा था, तब भी निजी रेडियो गाने बजाने को मजबूर था।
खैर, मंत्रालय के वादे के बहाने अब आस की एक पतली किरण बंधी है। कम से कम एक दरवाजा, छोटा ही सही, खुला तो।

(यह लेख 5 मई, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Apr 11, 2011

सपना नहीं, हकीकत हो फिल्म सिटी

सुंदर झीलें, बड़े पार्क, महल, खंडहर, गलियां, मोहल्ले, हाट, इमारतें सब सच की तरह दिखा देने में माहिर टेलीविजन धारावाहिकों की जिंदगी का सेट भी अब बदलने लगा है। खबर है कि धारावाहिकों के कैमरे अब मुंबई से बाहर जाकर दूसरे ठिकानों को खोजने में जुटने लगे हैं। इन शहरों में धारावाहिक बनाने के आदी रहे निर्माताओं के लिए नए विकल्प खोजना अब एक मजबूरी हो गई है। इसकी एक वजह नएपन की तलाश कही जा सकती है लेकिन बड़ी वजह जगह का अभाव, बढ़ता हुआ खर्च और तीखी प्रतिस्पर्धा भी है।

दरअसल बरसों शूट के लिए पारंपरिक रूप से फिल्म सिटी का इस्तेमाल किया जाता रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में टेलीविजन का दायरा और धारावाहिकों का निर्माण इस कदर बढ़ा है कि मुंबई की फिल्म सिटी अब सिमटा हुआ दिखने लगी है।

नए चैनलों की भीड़ की वजह से फिल्म सिटी पर भी दबाव बढ़ा है और यहां किराये की कीमतें कई गुणा बढ़ गईं हैं। एक आम शूट के लिए यहां पर हर महीने का किराया करीब 18 से 20 लाख रूपए पड़ता है जबकि मुंबई से बाहर निकलते ही यह खर्च करीब 30 से 40 प्रतिशत कम हो जाता है। इसके अलावा जगह और समय के दबाव की वजह से एक्सक्लूजिविटी बनाए रखने के आसार भी काफी घट जाते हैं। वैसे भी जो धारावाहिक दर्शकों में लोकप्रिय हो जाते हैं, उनकी अवधि 2-3 साल तक की तो तय मान ही ली जाती है। ऐसे में नए धारावाहिकों के लिए उस बंधी हुई जगह में अपने लिए बुकिंग करवा पाना आसान नहीं होता। इसके अलावा क्षेत्रीय चैनलों का अपना दबाव भी लगातार बना रहता है। यही वजह है कि अब नयगाम, दहीसर, सीरा रोड, पोवाई के अलावादिल्ली,  शिमला, लखनई, आगरा और बड़ौदा को शूट के लिए चुना जाने लगा है।

लेकिन इनमें कई कंपनियां खुशनसीब भी हैं। जैसे कि बालाजी टेलीफिल्म्स लिमिटेड और बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड के अपने स्टूडियो हैं। माना जाता है कि एकता कपूर की बालाजी ने 10 अलग-अलग तरह के स्टूडियो बनवाने पर करीब 1200 करोड़ रूपए का खर्च किया है।

दरअसल फिल्म और टीवी मनोरंजन की दुनिया में जिस बड़े कलेवर के साथ उभरे हैं, उस में फिल्म सिटी की अहमियत और जरूरत और भी बढ़ जाती है। मुंबई स्थित फिल्म सिटी को महाराष्ट्र सरकार ने दादा साहब फाल्के को समर्पित करते हुए बनवाया था। दिल्ली से सटे नौएडा में 1987 में फिल्म सिटी के बनने से एक बड़ी राहत मिली। हैदराबाद का   रामोजी फिल्म सिटी यानी आरएफसी दुनिया का सबसे बङा फिल्म स्टूडियो परिसर माना जाता है लेकिन आज भी अभी भी देश भर में एक दर्जन से कम फिल्म सिटी हैं जो कि बढ़ती जरूरतों के सामने अब भी नाकाफी ही हैं।

शत्रुघ्न सिंह ने बहुत पहले बिहार की राजधानी पटना में 100 एकड़ की जमीन पर फिल्म सिटी बनाने का सपना प्रचारित कर खूब तालियां बटोरी थीं जिसे वे शायद आज खुद ही भूल गए हैं। इसी तरह 2005 में राजस्थान सरकार और जयपुर विकास प्राधिकरण ने जयपुर में फिल्म सिटी बनाने का ऐलान किया था लेकिन यह सिटी अभी फाइलों में ही दबी  है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 20 करोड़ रुपये की लागत से तकरीबन 1,000 एकड़ जमीन पर फिल्म सिटी बनाने का ऐलान किया था। तब बीकानेर से लोकसभा पहुंचे अभिनेता धमेंद्र ने भी खासी सरगर्मी दिखाई थी, लेकिन बाद में सारा हवा हो गया।

फिलहाल इस साल फरवरी में हरियाणा के शहर मोहाली में फिल्म सिटी के निर्माण को मंजूरी मिल गई है और इससे पंजाबी फिल्मों के निर्माण को खासतौर से प्रोत्साहन के आसार बनेंगें। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी फिल्म सिटी को बनाए जाने का सपना जगा है। इसके जरिए स्थानीय बोलियों और संस्कृति पर आधारित छोटी-छोटी फिल्में बनाने में सहयोग की बात कास तौर से कही गई है।

दरअसल टेलीविजन और फिल्मों की लोकप्रियता की बात तो खूब होती है लेकिन कार्यक्रमों या फिल्मों के निर्माण से जुड़ी जरूरतों पर चर्चाओं का माहौल हमारे यहां कम ही बनता है।
एक मामूली सी दिखने वाली जगह थोड़ी सी मेहनत, दिमागी संयोजन और तकनीकी सम्मिश्रण से कमाल कर सकती है। फिल्म सिटी इसी का नाम है। सालों से फिल्म और टीवी की सफलता का मापदंड तय करने में सेट बहुत आगे रहे हैं। इनके अपने फायदे भी हैं। सबसे बड़ा तो यही कि टीवी पर एक ताजगी  का भान मिलता है, स्थानीय कलाकारों को मौका मिलने की गुंजाइश बनती है, वहां नया व्यवसाय पनपता है, आम लोगों को मुफ्त में टीवी को समझने का अवसर मिलता है और धारावाहिकों में स्थानीय पुट की छौंक लगने की संभावना बनती है।

बेहतर हो कि दुनिया के सबसे बड़े मनोरंजन क्षेत्र को ऊर्जा और समर्थन देने में राज्य सरकारें अब पहल करें।

(यह लेख 11 अप्रैल, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)