Jun 19, 2009

लिखा जो खत मैनें

कोशिश सिर्फ इतनी थी
लिफाफे में बंद कर खत भेजूं
चंद लफ्ज़ हों
चंद कतरे छिटकती जिंदगी के।

बहुत बंद किया लिफाफे को मैनें
लगा दिए तमाम औजार
अपनी शक्ति
पर लिफाफा भारी हो ही गया
उससे झरने लगे
मेरे मन के मलमली पत्ते - यहां-वहां
अब खुला खत कैसे भेजूं ?

Jun 6, 2009

खबर यहां भी है

खबरों के घेरे में अब चर्च भी आने लगे हैं। हाल ही में इनके खबर में आने की दो वजहें रही हैं। पहली वजह वह ताजा सर्वेक्षण है जिसमें बेबाकी के साथ यह बात सामने आई है कि केरल की एक चौथाई से ज्यादा नन अपनी मौजूदा स्थिति से नाखुश हैं और दूसरी वजह है- केरल की एक नन की लिखी हुई आत्मकथा। सबसे पहले सर्वेक्षण की बात। फादर जॉय कालियथ ने सर्वेक्षण करते हुए केरल के विभिन्न हिस्सों में रह रही ननों से बात की। वे इस कारण की तह में जाना चाहते थे कि क्या वजह है कि पिछले 9 साल में अकेले केरल में ही 14 ननों ने आत्महत्या कर ली और कई चर्च को छोड़ कर भाग रही हैं। अभी हाल ही में केरल में 16 साल पहले हुई एक हत्या की गुत्थी खुली तो उसमें भी सनसनीखेज सच सामने आए। इस हत्या के सिलसिले में एक नन की गिरफ्तारी भी हुई। पता चला कि यह हत्या इसलिए हुई थी कि चर्च में रहने वाली एक नन को दूसरी नन और एक पादरी के शारीरिक संबंधों की जानकारी हो गई थी। इसलिए प्रत्यक्षदर्शी नन की हत्या कर दी गई लेकिन चूंकि यह सोचा जाना आसान नहीं था कि एक नन भी हत्या कर सकती है, इस मामले को सुलझाने में इतना लंबा समय लग गया। इस तरह की कई घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में फादर जॉय कालियथ ने जब सर्वेक्षण किया तो यह पाया कि वास्तव में ही ऐसी ननों की कमी नहीं जो चर्चों में न तो खुशी महसूस करती हैं और न ही खुद को सुरक्षित। चर्चों के खबरों में आने की दूसरी वजह है- अमेन ओरू कन्यास्थ्रीयुदे आत्मकथा। यह केरल की ही एक नन सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा है। किताब के रिलीज होने के कुछ हफ्तों के भीतर ही इसके दो प्रिंट हाथोंहाथ बिक चुके हैं और तीसरे की 2000 से ज्यादा कापियों की मांग बाजार में बुक की जा चुकी है। यह किताब चर्चों के अंदर की अंधेरी दुनिया की कहानी कहती है। एक कैथोलिक चर्च से जुड़ी सिस्टर जेसिम ने कांवेंट की मानसिक और शारीरिक तौर से परेशान करने वाली गतिविधियों की वजह से कांवेंट को छोड़ दिया था। यह आत्मकथा शुरू से आखिर तक ऐसी कहानियों से ही भरी हुई है। इसमें सिस्टर जेसिम बड़ी बेबाकी से शारीरिक शोषण की उन तमाम घटनाओं का जिक्र करती हैं जिनका उन्हें अपने 33 साल के कांवेंट प्रवास के दौरान सामना करना पड़ा था। सिस्टर जेसिम ने अपनी किताब में बार-बार यह कहा है कि उनके साथ जब भी शोषण किया गया, वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकीं। हर प्रसंग पर पूरी तरह से विश्वास कर पाना भी आसान नहीं लगता लेकिन यह भी है कि कम से कम इस किताब के बहाने समाज के सम्मानित और पूजनीय माने जाने वाले पक्षों पर खुलेपन के साथ लिखने की जोरदार शुरूआत तो हो ही गई है। बेशक सदियों से चर्चों से लेकर मंदिरों-मस्जिदों तक तमाम धर्मों के साथ लोगों की अटूट आस्थाएं जुड़ी रही हैं। इसलिए इनसे जुड़े या इनमें पनपने वाले अपराधों और इनके आवरणों की तह में होने वाले शोषण की दास्तान खुलकर कहने की हिम्मत करने वाले कम ही हुए। जिन्होंने ऐसा करने की कोशिश की, उनकी आवाज को या तो दबा दिया गया या फिर कट्टरपंथियों ने उन्हें अधार्मिक और ईश्वर के सिद्धांतों के विपरीत साबित कर दिया। लेकिन इसके बावजूद आवाजें सुनाई देती रहीं। कभी दबे स्वर में तो कभी कुछ आक्रोश के साथ लेकिन अब नए दौर में इन आवाजों ने जोर पकड़ लिया है। दरअसल यह कहानी तकरीबन हर धर्म के साथ रही। पर्दे के पीछे छिपे इस संसार पर बहुत से आरोप लगे और सवाल उछले। मिसाल के तौर पर हाल में डेरा सच्चा सौदा में विवाद खडे़ हुए। संत गुरमीत राम रहीम सिंह पर एक साध्वी ने यौन शोषण का आरोप लगाया। 2005 में कांची कामकोटि पीठ के जगदगुरू शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती को पीठ के मैनेजर शंकररामन की हत्या का षड्यंत्र रचने का आरोपी बनाया गया। इस सिलसिले में उनको गिरफ्तार भी किया गया। ओशो रजनीश और उनका आश्रम 80 के दशक में सेक्स पर अल्ट्रा लिबरल विचारों और ड्रग्स के इस्तेमाल को लकेर आलोचनाओं के केंद्र में रहे। इसी तरह कुछ इस्लामिक केंद्रों में आतंक की ट्रेनिंग के खतरनाक आरोप लगे और यहां कट्टरवादिता की राष्ट्रविरोधी पाठशाला के मौजूद होने के सुबूत भी पाए गए। फिलहाल सिस्टर जेसिम के इस परेशान करने वाले खुलासे के बाद कैथोलिक चर्च में गुस्सा व्याप्त है और उन्हें मानसिक तौर से बीमार घोषित कर दिया गया है लेकिन दूसरी तरफ राज्य के महिला आयोग ने सिस्टर जेसिम को यह आश्वासन दिया है कि उनके लगाए आरोपों पर पूरी गंभीरता के साथ विचार किया जाएगा। इन आश्वासनों का नतीजा क्या निकलेगा या फिर कुछ निकलेगा भी या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन इतना साफ है कि बात निकली है तो दूर तक तो जाएगी ही और इस बार इस बात को दूर तक ले जाने में मीडिया को अपनी सक्रिय भूमिका निभानी ही होगी। 180 पेज की यह दास्तान एक आत्मकथा भर ही नहीं है। यह दास्तान समाज के उन हिस्सों की मार्मिक कहानी है जहां सूरज भी झांकने से पहले सोचता है। भारत में धर्म हमेशा ही परदे में छिपा रहा है और धार्मिक परिवेश भी। बेहद संवेदशील होने की वजह से इन इलाकों में झांकने और उनमें दबी कटु सच्चाइयों को उधेड़ सामने लाने की हिम्मत खुद मीडिया भी बटोर नहीं सका है। इस बार एक आम महिला ने इस हिम्मत को दिखाया है और इस दस्तावेज को अपने आप में काफी हद तक विश्वसनीय माना भी जा सकता है क्योंकि इसे कागज पर उतारने वाले ने वहां रह कर वहां की जिंदगी भोगी है। बेशक लिखे गए विवरणों को सच के कथित तराजू में विभिन्न कोणों से तौला जा सकता है लेकिन इस बात को भी भूला नहीं जाना चाहिए कि जहां आग होती है, धुआं भी वहीं उठता है। इस बार जो धुआं उठा है, उस के बहाने ही सही, दीमक लगती दीवारों की मरम्मत का काम जरूर कर लिया जाना चाहिए। (यह लेख 4 मई को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Apr 21, 2009

खबर और आत्मा की आवाज

ब्रिटेन में पत्रकारिता का स्तर गिरावट पर है। यहां अखबारों की विश्वसनीयता दिनोंदिन घट रही है। यह बात उस रिपोर्ट का मूल सार है जिसे ब्रिटेन की एक स्वायत्त संस्था, मीडिया स्टैंडरर्ड्स ट्रस्ट ने जारी किया है। फाइनेंशियल टाइम्स ग्रुप के चेयरमैन सर डेविड बैल इसके चेयरमैन हैं। इस रिपोर्ट ने खास तौर से उस घटना को आधार बनाया है जिसमें दो साल पहले एक ब्रिटिश लड़की खो गई थी। चार साल की मैजेलिन मैक्कन नामक एक लड़की अपने माता-पिता के साथ घूमने पुर्तगाल जाती है और वहीं से वह गुम जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक इस घटना की रिपोर्टिंग विवादास्पद होने के साथ ही बेहद आपत्तिजनक भी थी। यह खबर हफ्तों ब्रिटिश मीडिया में हेडलाइन बनी रही लेकिन ज्यादातर रिपोर्टिंग गॉसिप और तुक्कों पर आधारित ही दिखी। मिसाल के तौर पर बड़े पैमाने पर यह लिखा गया कि हो सकता है कि मैडेलिन के मां-बाप की गलती से ही मैडेलिन की ‘मौत’ हो गई हो और उसके बाद उन्होंने ही मौडलिन के अगवा होने की कहानी ‘पकाई’ हो। रिपोर्टिंग के इस अंदाज पर कुछ दिनों बाद खुद मैडेलिन के पिता ने कहा कि अपने अखबारों की बिक्री बढ़ाने के लिए प्रिंट मीडिया ने उनका इस्तेमाल एक ‘कोमोडिटी’ के रूप में किया। इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए मीडिया स्टैंडरर्ड्स ट्रस्ट ने यह बात भी कही है कि रिपोर्टरों ने इस तरह की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग इसलिए की क्योंकि वे खुद ‘संपादकों के दबाव में थे।’ वेस्टमिनस्टर यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर ऑफ कम्यूनिकेशंस प्रोफेसर स्टीवन बारनेट भी इस शोध का हिस्सा थे। उन्होंने समूचे प्रकरण के अध्ययन के बाद टिप्पणी की कि जो पत्रकार इस घटना की रिपोर्टिंग के लिए पुर्तगाल भेजे गए थे, उन्हें संपादकों की तरफ से साफ निर्देश दिए गए थे कि उन्हें हर रोज एक एक्सक्लूजिव स्टोरी फाइल करनी होगी ‘चाहे जो भी हो जाए।’ कहना न होगा कि ज्यादातर पत्रकारों ने कड़वे सच को दिखाती इस रिपोर्ट का स्वागत किया है। इसी आधार पर नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ने अपनी बरसों पुरानी मांग को दोहराया है कि पत्रकार को किसी स्टोरी को इंकार करने का अधिकार दिया जाना चाहिए। एनयूजे का कहना है कि हर पत्रकार के कांट्रेक्ट में ‘कान्शियस क्लाज’ जरूर शामिल किया जाना चाहिए जो कि उन्हें किसी भी ऐसी स्टोरी को करने से इंकार करने का अधिकार दे जिसे उनकी आत्मा स्वीकार नहीं करती। स्वाभाविक है कि मीडिया जगत, खास तौर से प्रिंट मीडिया, इस रिपोर्ट से न तो खुश है और न ही सहमत। खुद प्रेस कंप्लेट्स कमिशन के चेयरमैन सर क्रिस्टोफर मेयर ने इस रिपोर्ट को संदेहास्पद, लापरवाह और बिना सबूतों के बुनियाद पर बनाया बताया है। लेकिन यह एक विरला मौका है जब प्रेस की विश्वसनीयता को इतना खुल कर कटघरे में खड़ा किया गया है। शोध में इस बात का खुलासा है कि 75 प्रतिशत लोग यह मानते हैं कि ‘अखबारें आमतौर पर ऐसी खबरें छापते रहते हैं जिनके बारे में वे जानते हैं कि वे पूरी तरह से सच्ची नहीं हैं।’ अखबारों पर लोगों का विश्वास इतना गिरा है कि सिर्फ 7 प्रतिशत लोग यह उम्मीद करते हैं कि अखबारों को अपना काम जिम्मेदारी से निभाना चाहिए। विश्वास का यह स्तर बैंकों पर लोगों के मौजूदा विश्वास से भी काफी कम है। शोध के लिए जिन लोगों से संपर्क किया गया, उन में से 60 फीसदी लोगों ने माना कि निजता की रक्षा के लिए अब सरकार का दखल जरूरी हो गया है जबकि 73 फीसदी ने इस बात पर जोर दिया कि मीडिया की गलत रिपोर्टिंग को रोकने के लिए सराकर को अब कड़े कदम उठाने ही चाहिए। इसी तरह सामाजिक चिंतक ईयान हारगीव्स ने अपनी विख्यात किताब ‘जर्नलिज्म’ में साफ तौर पर यह लिखा कि सर्वेक्षण कहते हैं कि पत्रकारों का रूतबा और उन पर जनता का विश्वास पहले जैसा नहीं रहा। आलम यह है कि वे राजनेताओं की ही तरह विश्वसनीय नहीं माने जाते। उनका मानना है कि हाईपर जर्नलिज्म और जंक जर्नलिज्म ने पत्रकारों को बरसों पुराने अपने इज्जतदार रूतबे से ठीक विपरीत ध्रुव पर लाकर पटक दिया है। लब्बोलुबाब यह कि अकेले भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के और भी कई देशों में चल रही पत्रकारिता ने अब विश्लेषकों को खुलकर आलोचना करने के लिए विवश कर दिया है। यह उस समय हो रहा है जब मीडिया अपने चरम पर है लेकिन तकनीकी प्रगति का यह चरम अपने साथ मीडियाई उद्दंडता भी लेकर चला आया है। ब्रिटेन से भी रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब भारत में गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग पर चीख-चीख कर बहसें हो रही हैं। करगिल से लेकर मुंबई हमले तक भारत में रिपोर्टिंग का मनमानापन सबने देखा है। मैजेलिन मैक्कन की तरह हमारे यहां आरूषि की कहानी को तमाम मसालों के साथ भूना गया था। नैना साहनी की हत्या से लेकर जिगिषा कांड तक मीडिया ने अक्सर टिप्पणियां करते हुए मर्यादा को भूल जाने की गलती की है। इसीलिए कई बार मीडिया पर अंकुश लगाने की सही या गलत जो भी, लेकिन मांगें उठी जरूर। पर इस बार मीडिया स्टैंडरर्ड्स ट्रस्ट ने मीडिया के सरासर बदमाशी पर उतर आने पर जो तीखा वार किया है, वह इस ख्याल को जन्म जरूर देता है कि भारत में भी पत्रकारों की विश्वसनीयता के स्तर को आंकने के लिए जन-सर्वेक्षण करने का समय आ गया है ताकि नीति-निर्धारक बन बैठे मीडिया मालिकों को कुछ सबक मिले। बेशक इस मामले में सीधा और कड़ा मुकाबला राजनेताओं और पत्रकारों के बीच ही होगा और इसलिए इसे देखना बेहद दिलचस्प होगा।

(यह लेख 19 अप्रैल, 2009 को दैनिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुआ)

Apr 9, 2009

कहने में किसका क्या जाता है?

चुनाव से पहले गुहार लगी है
‘सही’ आदमी को ही वोट दो
वो अपराधी न हो, यह गौर करो ।

गुहार लगी है
कि यह है दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र
तंत्र न गड़बड़ाए
इसलिए बिलों से बाहर निकलो
भाई, इस बार जरूर वोट दो।

गाने लिखने-बजाने वाले बरसाती मेंढक भी उचक कर
आ गए हैं बाहर
वो गढ़ रहे हैं गीत
या फिर चोरी के काम के लिए
कर रहे हैं गानों की चोरी
पक्ष के लिए, विपक्ष के लिए, बीच वालों के लिए भी।

सज रही है विज्ञापनों की मंडी
पोस्टरों के बाजार में गोरपेन की क्रीम-सा निखार
लगता है कल रात ही पैदा हो गया
कमाई की फसल काटने लगे हैं
तिकड़मी पत्रकार भी।

लेकिन जनता बेचारी क्या करे
इतने जोकरों के बीच
कैसे तय करे
कौनसा जोकर उसके लिए ठीक रहेगा
कौन है ‘सही’।

कह देना आसान है
देना वोट ‘सही’ आदमी को
लेकिन असल सवाल तो
‘सही’ और ‘आदमी’ के बीच ही टंगा है
क्योंकि आदमखोरों की इस बस्ती में
न ‘सही’ दिखते हैं
न ‘आदमी’फिर किसे दिया जाए वोट?

Mar 31, 2009

जूतों के पीछे क्या है?

जूते के दिन वाकई फिर गए हैं। पहले बुश, फिर चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ और अब अरूंधति राय। ताजा मामला तो अरूंधति राय का ही है। हुआ यूं कि हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय की आर्ट्स फैकल्टी में एक संगोष्ठी ‘हमारे समय में प्रेम’ का आयोजन किया गया था। कहा जा रहा है कि संगोष्ठी के दौरान ही शायद यूथ यूनिटी फॉर बाइब्रेंट एक्शन नामक एक संगठन के कुछ छात्र वहां अरूंधति राय के खिलाफ नारे लगाने लगे। इन युवकों का मानना था कि अरूंधति राय देशद्रोही हैं क्योंकि वे देश में रहते हुए भी कश्मीर की आजादी की बात करती हैं, संसद पर हुए हमले के आरोपित गिलानी का समर्थन करती हैं और बाटला हाउस एनकाउंटर पर सवाल खड़े करती हैं। ऐसी सोच को डीयू में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए राय पर जूता फेंका गया, यह बात अलग है कि पहली दोनों घटनाओं की तरह ही यहां भी वह जूता अपना निशाना चूक गया।
वैसे सोचने की बात यह भी है कि पिछले तीन महीने में जूते फेंकना सबसे आसान उपाय क्यों लगने लगा है और यह भी कि फेंके जाने वाले जूते-चप्पल असल निशाने से इतनी दूर जाकर ही क्यों गिरते हैं और जिन लोगों ने इस कारनामे को अंजाम दिया, उन्हें अंतत क्या हासिल हुआ?
दरअसल यह तमाम घटनाएं आक्रोश के बढ़ने और सीमा से पार करने की तो हैं ही लेकिन साथ ही लोकप्रियता हासिल करने और एकाएक चर्चा में आने के एक हथकंडे की भी हैं। मिसाल के तौर पर बुश पर जूते का निशाना साधने वाले पत्रकार मुंतेजर अल जैदी ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि टीवी चैनल की रात-दिन की नौकरी नहीं, बल्कि उसके पांव का घिसा हुआ जूता उसकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति की वजह बनेगा। यह किस्मत की बात है और समय की भी। बुश पर यही जूता अगर 26 नवंबर को (जब मुंबई आतंकियों से त्रस्त था और तमाम भारतीय चैनल उसकी लाइव कवरेज में व्यस्त थे) निशाना साधता तो वह इतनी कवरेज हासिल कर ही नहीं पाता क्योंकि तब चैनलों के पास खबर के केंद्र में था - बंदूक और आतंक। दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के पूर्व राष्ट्रपति पर जूते की यह घटना न्यूज के लिहाज से एक ठंडे दिन में घटती है और घटते ही वह खबर से महाखबर के करीब पहुंच जाती है। घटना के कुछ ही घंटों के अंदर इंटरनेट पर ऐसी गेम्स का कब्जा हो जाता है जो बुश पर निशाना साधते हुए स्कोरिंग पांय्ट्स बनाते हैं। न्यूज चैनल इस मुद्दे को झट लपकते हैं। बार-बार दोहराई जाती हैं वहीं तस्वीरें और बनते हैं आधे घंटे के विशेष कार्यक्रम। इनमें भी गंभीरता कम, मसखरी का टोन ज्यादा दिखाई देता है। इसकी कवरेज को जिस अंदाज में किया गया था, उसी से इस बात की संभावनाएं(या आशंकाएं) पनपने लगी थीं कि अब जूता फेंको प्रतियोगिता के दिन करीब है और ऐसा ही हुआ भी।

दरअसल सोचा तो तभी जाना चाहिए था कि यह जूता किसी आम इंसान पर नहीं बल्कि किसी देश के पूर्व राष्ट्रपति पर फेंका गया था। यहां यह बात परे हटा दी जानी चाहिए कि वे बुश थे। किसी भी देश के सर्वोच्च पद पर आसीन रह चुके राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री के साथ इस घटना के होने के कई संदेश जाते हैं। जूते का मारा जाना किसी देश को अपमानित करने जैसा ही है। यह व्यक्ति विशेष से ज्यादा देश का मामला है। यहां यह बहस हो सकती है कि बुश की नीतियों से तंग आकर यह काम किया गया लेकिन यह भी भूला नहीं जाना चाहिए कि आम अमरीकी नागरिकों ने बुश की नीतियों को पिछले राष्ट्रपति के चुनाव में ही नकारा और ओबामा को चुना। लेकिन जूता फेंकने जैसे कृत्य उन्हीं नागरिकों की राष्ट्रीय भावना को सुलगा भी सकती थी। ऐसा होने पर बुश के न होते हुए भी अमरीकी विदेश नीतियां पुन: बुशनुमा बन सकती हैं। यह मामला एक विशिष्ट मेहमान का भी था। मेहमान चाहे कोई भी हो और किसी भी देश मे जाए, मेजबान को उसका स्वागत जूते से नहीं करना चाहिए, ऐसा तो माना ही जाता है।
इसी तरह चीन के प्रधानमंत्री और अब अरूंधति राय पर निशाना साधने का मामला भी यही कहता है। अरूंधति राय से खैर एक लंबे समय से छात्र नाराज ही रहे हैं क्योंकि यह माना जाता रहा है कि वे लगातार चर्चा में बने रहने के लिए ऐसे बयान देनी की आदी बन गईं हैं जो किसी भी लिहाज से देशहित में नहीं हैं। चूंकि अंग्रेजी तबका यह समझता है कि वह अंग्रेजी में जो भी बुदबुदाएगा(और अगर कुछ छेड़ने वाली बात कहेगा) तो खबर बनेगी ही। इसलिए नाराज छात्रों ने इस बार उन्हें निशाना बनाया।
लेकिन दो बातें समझनी चाहिए। जूता फेंकना किसी मकसद का हल नहीं और जूते फेंकने की घटना को मीडिया में बार-बार दोहराना तो और भी कोई समाधान नहीं बल्कि यह तो प्रेरणा देने जैसा है। दूसरे देश प्रेम की भावना। तर्क देने वाले आजकल यह कह रहे हैं कि यह घटनाएं इस बात की ‘सुखद’ प्रतीक हैं कि यह युग उन लोगों के लिए अब असंवेदनशील होने लगा है जिन्हें देश हित की परवाह नहीं। लेकिन इसे जायज माना जाना कितना सही है?
गौर करने लायक विदेशी मीडिया का नजरिया भी है। मिसाल के तौर पर चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ पर कैंब्रिज विश्वविद्यालय में जूता फेंकने की घटना के बावजूद चीन ने उनके ब्रिटेन दौरे को पूरी तरह से सफल माना और चीनी मीडिया में इस घटना को काफी कम तवज्जो दी गई। यहां तक कि चीनी वेबसाइट्स में भी इस घटना का जिक्र तकरीबन नदारद ही है। लेकिन भारत में ऐसा नहीं होता। हमारे यहां यह घटनाएं खुशी की लहर लाती हैं। किसे यह सोचने की परवाह है कि ऐसी घटनाओं के बाद उस शॉट–सीक्वेंस को बार-बार टीवी पर दिखाया जाना क्या कहता है? बुश की घटना को तो मीडिया ने मसखरीपन के शिखर पर ही पहुंचा दिया। उनकी जो कवरेज इस घटना की वजह से हुई, उतनी शायद अमरीका के राष्ट्रपति रहते हुए किसी भी घटना की वजह से न हुई हो। अमरीका की 9/11 की घटना याद कीजिए। वो हमला अमरीका के समृद्धि के केंद्र पर था लेकिन तब भी उन तस्वीरों को क्या अमरीकी चैनलों पर हजारों बार दिखाया गया ? दूसरी तरफ जब हमारे यहां मुंबई की घटनाएं होती हैं तो हम आतंक के उस महाभारत का लाइव तमाशा पूरी दुनिया के लिए खोल देते हैं। दृश्यों की यह पुनरावृत्ति कभी भी किसी घटना को सुलझा तो नहीं पाती बल्कि उसे याद्दाश्त पर हमेशा की तरह चिपकाने का काम जरूर कर देती है। अब पूछा यह जाना चाहिए कि अगर जूते की यही घटना हमारे देश के किसी गणमान्य के साथ हुई होती और कोई दूसरा देश उसे बार-बार चटखारे लेकर दिखाता तो हमें कैसा लगता? सवाल कड़वा है।

दूसरे ऐसी घटनाओं की कवरेज सस्ते बाजारवाद की मिसाल बनती हैं। तीसरे यह कि इनसे लगता है कि क्या खबरों की दुनिया और यह ब्रह्मांड इतना बेमानी हो गया है कि ऐसी बचकानी खबरों के बहाने ही न्यूज चैनलों की नैया खेनी पढ़ रही है? तीसरी बात यह कि कहा जाता है कि टीवी का एयरटाइम कोकेन की तरह होता है। बहुत कीमती। तो अगर यह बेशकीमती है तो क्या इसका इस्तेमाल कुछ बेहतर चीजों के लिए नहीं किया जा सकता ?

वैसे इस जूतम किस्से के बीच समाचार प्रसारण मानक विवाद निस्तारण प्राधिकरण ने आत्मनियंत्रण के संभवत: पहले कदम के तौर पर टीवी समाचार प्रसारकों के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। इसमें आपात स्थितियों के सीधे प्रसारण पर पाबंदी लगाने और अफवाहों को खबर की तरह पेश करने से बचने की सलाह दी गई है। जाहिर है कि मसाले के आदी कई टीवी चैनलों के मालिक अब माथे पर पसीने की बूंदें लिए घूमने लगे हैं।

तो असल में मामला हाईपर रिएलिटी का है और साथ ही गुस्से को दैत्याकार में दिखाने का भी। वैसे गुस्सा दिखाने का अधिकार तो सबको है। अंदाज जरूर अलग हो सकता है। भूटान में गुस्सा दिखाने के लिए रंगीन टिशू पेपर को उस व्यक्ति पर फेंका जाता है जो कि नापसंद होता है। पेपर का नीचे गिरना इस बात का सूचक होता है कि वह व्यक्ति सम्मान के योग्य नहीं है। इसके बाद पेपर को फेंकने वाला खुद उसे उठाता है और फाड़ देता है। बहरहाल बुश पर फेंका जूता सुरक्षाकर्मियों ने नष्ट कर दिया है। बुश, जियाबाओ और अरूंधति राय –तीनों पर जूते का निशाना साधने वालों को पकड़ भी लिया गया है लेकिन इस बहाने कई सोये हुए सवाल जाग गए हैं। बुश की घटना ने इस संभावाना (या फिर आशंका) के दरवाजे खोल दिए थे कि अब भारत में भी वे दिन दूर नहीं जब यहां भी सरेआम जूते चलेगें। शुरूआत तो हो गई है लेकिन जिस देश में गंगा बहती है, वहां जूते चलेंगें तो बात बहुत दूर तक जाएगी।

Mar 7, 2009

कौन सा मीडिया, किसका मीडिया?

समर 2007। यह नाम उस फिल्म का है जो शहर और गांव के बीच की बढ़ती दूरी को पाटने की एक कोशिश है। निर्देशक सुहैल तातरी और निर्माता अतुल पांडे की यह फिल्म स्लमडाग मिलिनेयर जैसा कोई हंगामा तो खड़ा नहीं कर सकी है लेकिन इसने एक पत्रकार की खोज और पसीने की मेहनत को आधार बनाकर इस मिथ को तोड़ने की कोशिश जरूर की है कि इंडिया इज नॉट शाइनिंग(भारत चमक नहीं रहा है)। यह फिल्म पी साईंनाथ की गांवों की हकीकी खोज पर आधारित है। 2007 में मैगसेसे पुरस्कार से नवाजे जा चुके प्रख्यात पत्रकार पी साईंनाथ एक अरसे से किसानों की आत्महत्या के मामले पर खोज, लेखन और चिंतन करते रहे हैं। पिछले 14 साल से हर साल वह भारत के अलग-अलग गांवों में करीब 300 दिन बिताते रहे हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय से पढ़ाई और सूखे से पीड़ित भारत के 10 राज्यों के दौरे ने उनकी सोच में गांभीर्य भरा। उन्होंने भारत सरकार के घोषित कई पुरस्कारों को यह कहकर लेने से इंकार कर दिया कि उन्हें इन्हें लेने में शर्म महसूस होती है। लेकिन मजे की बात यह कि गांवों के इस देश में पी साईंनाथ की खींची गांव की तस्वीर को मीडिया ने कभी गंभीरता से नहीं लिया। हां, मैगसेसे पुरस्कार के मिलने के बाद थोड़ी सोच जरूर बदली लेकिन बहुत संतोषजनक नहीं। इसका सीधा सबूत यह है कि आज भी न्यूज मीडिया से गांव गायब हैं। इसलिए पी साईंनाथ के लेखों को आधार बनाकर ब्रेजश जयराजन ने इस फिल्म को लिखकर किसानों के दर्द को उभारा है। शोध कहते हैं कि 2003 में जब देश के कई राज्यों में किसान आत्महत्या कर रहे थे तो सिर्फ 6 पत्रकारों ने ऐसे गांवों में एक हफ्ते का समय बिताया जबकि लैक्मे फैशन वीक को कवर करने के लिए 412 पत्रकारों की फौज जमा हुई। इसी तरह भारत में सिर्फ 0.2 प्रतिशत लोग डिजानरों के डिजाइन किए हुए कपड़े पहनते हैं जबकि फैशन को कवर करने वाले पत्रकारों की तादाद करीब 300 है। और तो और शेयरों में भारत की महज 1.15 प्रतिशत आबादी ही पैसे लगाती है लेकिन तब भी भारतीय न्यूज मीडिया शेयरों के उतार- चढ़ाव की कहानी रात-दिन सुनाते हैं। भारत में आज भी किसानों को कवर करने वाला कोई पत्रकार नहीं है जबकि किसान ही हैं जिनकी 70 प्रतिशत आबादी आने वाली सरकार की किस्मत तय करती है। तो यह है फास्ट फूड संस्कृति का भारत। इस भारत में किसान कब के हाशिए में जाकर सिमट गए हैं और उनके मुद्दे फैशन के बाहर की चीज बन गए हैं। ऐसे में मॉलों को देख कर झूमने, फील गुड के राग गाने और क्रिकेट को सब कुछ मान कर चलने वाले परिवेश में किसान कहीं नहीं दिखते लेकिन न्यूज मीडिया की अनदेखी के बीच बॉलीवुड में एक पहल हो गई है। यहां गरीबी को बेचने की नहीं बल्कि किसान के पसीने की बूंदों को हथेली में लाकर दिखाने की एक छोटी कोशिश हुई है। यह कहानी विदर्भ के संकट को बड़ी खबर की तरह लेती है और इसलिए मेडिकल छात्रों को अनिवार्य तौर से गांवों में भेजने की बात चलती है। यहां पांच युवा पात्र चुने गए हैं जो कि चांदी के चम्मच मुंह में लिए पलने वाले अमीर परिवेश की सटीक तस्वीर हैं। फिल्म मेडिकल की पढ़ाई कर रहे इन्हीं पांचों छात्रों के आस-पास घूमती है। यह एक बेपरवाह टोली है लेकिन इस टोली को मजबूरन गांव जाना पड़ता है। यह गांव की तरफ निकलते भी हैं तो कुछ इस अंदाज में कि जैसे मूड बदलने के लिए सैर पर निकले हों। यहां ये एक गांव के प्राइमरी हेल्थ सेंटर में पहुंचते हैं। यहीं से बदलाव की कहानी शुरू होती है। इनका सामना पहली बार किसान की गरीबी और भूख से होता है और सामंती ताकतों के पैने दांत दिखते हैं। ‘इंडिया’ देखने वाले इन युवाओं को पहली बार ‘भारत’ दिखाई देता है। जिस साल यह फिल्म बन रही थी, उस साल 784 किसानों ने आत्महत्या की थी। लेकिन सोचने की बात यह है कि जो काम न्यूज मीडिया को बहुत पहले से करना शुरू कर देना चाहिए था, वह बालीवुड क्यों कर रहा है? क्या मीडिया के पास समय और संसाधनों की कमी है या फिर नीयत की? जाहिर है मामला नीयत का ही है। अब जबकि चुनाव करीब हैं, यह मौका 2004 के इंडिया शाइनिंग अभियान से सबक लेने का है। यह सबक सिर्फ राजनेताओं को ही नहीं लेना है बल्कि मीडिया को भी लेना है। फैशन, लाइफस्टाइल, राजनीति, क्रिकेट और अपराध – इन धुरियों के आस-पास घूमते मीडिया में गांव कहीं नहीं हैं जबकि मीडिया में आए ज्यादातर पुराने पत्रकार गांवों की पृष्ठभूमि से ही यहां आए हैं। न्यूज मीडिया में आते ही इन पत्रकारों के लिए भी गांव एक अनूठा ग्रह बन गए। मीडिया कोर्सों में भी ग्रामीण पत्रकारिता का कोई जिक्र नहीं होता। अब जबकि मेडिकल छात्रों को गांव में जाकर कुछ समय के लिए प्रेक्टिस करना अनिवार्य करने की बात हो रही है, क्या ऐसा नहीं लगता कि यह अनिवार्यता पत्रकारिता के गुर सीख रही नई पौध पर भी लागू होनी चाहिए? (यह कॉलम 7 मार्च, 2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Mar 2, 2009

संतरी

संतरी बाक्स से झांकते संतरी ने
पांच साल में देख लिया है पूरा जीवन
सत्ता में आने के बाद की ढोलक की थाप
दीवालियों, होलियों, ईदों पर तोहफों की बारात
नए साल पर दूर तक फैली गुलाबों की खुशबुएं
हवा में नहाई आती वो युवतियां
रेशम-रेशम हुए जाते अफसरान
और भी पता नहीं क्या कुछ।

इस बार चुनाव में हार गए मंत्रीजी
उस पसरे सन्नाटे में
संतरी के चौबीसों घंटे खड़े रहने वाले पांव
भीगी रूई से हो गए
न कारों का काफिला
न वो फलों के टोकरे
न बच्चों की गूंज
न मैडम की हंसी

उस शाम पहली बार संतरी और मंत्री की नजरें मिलीं
मंत्री ने देखा
खाली मैदान में
आज एक वही था
जो अब भी था खड़ा
वैसा ही
मंत्री ने पूछा उसका नाम
उसके गांव की ली सुध
आज मंत्री को संतरी का चेहरा बड़ा भला लगा
उसकी खिड़की में आज एक सहज शाम
खुद चली आई थी
संतरी के लिए इतना ही काफी था।

Feb 21, 2009

चांद, फिजा और मीडिया

फिजा या चांद से कोई रिश्तेदारी नहीं है और न ही किसी किस्म का कोई व्यापारिक या नौकरीनुमा गठबंधन लेकिन जाने क्यों जब से फिजा की कहानी देखी-सुनी-महसूस की है, कई सवालों ने मन में डेरा जमा लिया है।

कौन है यह फिजा? क्या है और क्यों हैं? फिजा मजाक है, विदूपता है, व्यंग्य है या त्रासदी है? वो अनुराधा बाली है, हिंदू है या फिर फिजा है, मुसलमान है, विवाहित है या फिर बलात्कार की पीडि़त महिला है। वो कौन है? सवाल इतने हैं और जो सवाल सबसे ज्यादा तंग कर रहा है और हर औरत को करना चाहिए कि जो फिजा के साथ हुआ, अगर वही हमारे साथ होता तो क्या होता। असल में मन तो यह करता है कि कोई जादुई छड़ी आ जाए और यह सवाल पुरूषों के दिल पर चिपक जाए। कोई एक रात उनकी जिंदगी में आए जब एकाएक वो कुछ घंटों के लिए फिजा बन जाएं और फिर अपने आस-पास की फिजा को उसकी आंखों और उसी के जैसे धड़कते हुए दिल से महसूस करें।

जैसा मैनें कहा, फिजा या चांद से मेरा कोई संबंध नहीं लेकिन भावनात्मक संबंध स्थापित हो जाना(चाहे वोएकतरफा ही क्यों ने हो) क्या कम होता है। एक अमरीकी फिल्म कंपनी ने अब पेशकश दी है कि अगर फिजा अपनी ‘असली’ कहानी बताने को तैयार हो जाती है तो कंपनी उसे 20 करोड़ रूपए देगी, साथ ही उस पर एक फिल्म बनाई जाएगी। कंपनी का दावा है कि ऐसी स्थिति में फिजा और चांद और चांद और फिजा नाम की इस फिल्म को आगामी लोकसभा चुनाव से पहले रिलीज भी कर दिया जाएगा।
दरअसल शादी के किस्से के बाद से ही फिजा की कई तस्वीरें सामने घुमड़ कर आईं हैं। शादी के बाद प्रेस कांफ्रेंस में अपने धुले-धुले बालों और नेलपालिश लगे हाथों के साथ मुस्कुराहट बिखरेती फिजा, चांद को बेहद प्यार से निहारती हुई, फिर चांद के कथित तौर पर गायब होने पर चिंता दिखाती फिजा, फिर आत्महत्या की कोशिश करने के बाद किसी के कंधे में पड़ी अस्पताल ले जाती हुई फिजा, उसके बाद चांद को 2 दिन में लौट आने की धमकी देती और अब चांद पर शादी के बहाने शारीरिक संबंध बनाने का आरोप लगाती फिजा। ताज्जुब ही है कि भारत जैसे सामाजिक बंधनों में जकड़े देश में शादी के कुछ दिनों में इतना कुछ ऐसे घटा कि जैसे तीन घंटे की फिल्म चल रही हो। पर यह फिल्म अभी खत्म नहीं हुई है। अलग-अलग सिरों पर यह बहस छिड़ गई है कि फिजा कितनी सही या गलत है। यह सवाल तकरीबन फीका पड़ गया है कि चांद के बहाने फिजा कहां से कहां पहुंच गई है।

ब्लाग पर एक पुरूष पत्रकार ने लिखा कि फिजा की नीयत ही ठीक नहीं थी। नीयत सीफ होती तो शादी के कुछ क्षणों बाद ही वह अपने और चांद के बीच के प्रेम भरे एसएमएस यूं ही सबसे साझा नहीं करती। उधर महिलावादियों का एक मोर्चा यह कहकर एकजुट हो रहा है कि पुरूष जब खुद महिला को प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल कर सकता है तो महिला अपनी बात खुलकर क्यों नहीं कह सकती। वह यह भी कह रहा है कि अब पुरूष औरत को बार्बी डॉल नहीं समझता क्योंकि वह तो नाजों से रखी जाती है। अब औरत फैक्ट्री की मशीन बन गई है, वह सेकेंड हेंड कार है जिसे धक्के से शुरू कर धूल के हवाले कर दिया जाता है। वह नाजुक नहीं। वह बनी है -ग्लोब की तमाम जिम्मेदरियों को निभाने और पुरूष की छोड़ी गंदगियों को हटाने। इसलिए इस बार जो हुआ है, उसे भूला नहीं जाना चाहिए।

लेकिन सवाल तो चांद की नीयत पर भी खड़े हो रहे हैं कि शादी के बाद उन्हें एकाएक अपनी पहली पत्नी और बच्चे ऐसी शिद्दत से क्यों याद आने लगे और धर्म परिवर्तन करने से लेकर फिजा को प्यार से निहारने के बीच एकाएक यह गायब हो जाने की नौबत क्यों आ गई। कहा यहां तक जा रहा है कि फिजा जरूर ही चांद को किसी मुद्दे पर ब्लैकमेल कर रही है।

पर इस सबके बीच मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़े होते हैं। क्या यह ताज्जुब नहीं कि एक शादी के होने और फिर उसके तकरीबन नाकामयाब होने तक मीडिया ने एक बड़ा समय उसकी कवरेज पर कुछ इस अंदाज में लगाया कि जैसे कोई राष्ट्रीय महत्व की घटना घट गई हो? और यह भी कि क्या अब उस परंपरा की नींव नहीं डाल दी गई है जिसमें पति या पत्नी के बीच विवाद होने पर परिवार की सलाह लेने से ज्यादा आसान एक प्रेस कांफ्रेंस करना होगा? ऐसा भी नहीं है कि मीडिया की मंशा पति-पत्नी के विवाद को सुलझाने की है। बात तो मसाला पाने और उससे टीआरपी की झोली भरने भर की है।

तो निजता की कहानी अब सार्वजनिक होते-होते फिल्मी भी बन गई है। इंटरनेट पर एक ब्लॉगर ने लिखा है कि चांद और मीडिया ने उसके साथ किया है, इसके बावजूद वह उससे शादी करने के लिए तैयार है। तो मामला हाईपर रिएलिटी का है। ऐसे में सोचना होगा कि न्यूज चैनलों का काम फिल्म दिखाना और विवादों को और विवादास्पद बनाने के लिए आइडिया देना है या फिर न्यूज दिखाना है?


(यह लेख 21 फरवरी, 2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Feb 8, 2009

आओ स्कूल चलें हम

वाकई यह नए साल में आई एक शुभ सूचना है। गैर सरकारी संगठन प्रथम ने हाल ही में जो रिपोर्ट पेश की है, वब ग्रामीण भारत के बदलते चेहरे की पुष्टि करती है।

सर्वेक्षण के बाद जारी किए गए ताजा आंकड़े बताते हैं कि सात साल से दस साल के बीच देश के महज 2.7 फीसदी बच्चे पिछले साल स्कूल नहीं गए जबकि 11 से 14 साल के सिर्फ 6.3 फीसदी। रिपोर्ट साफ तौर पर दिखाती है कि प्राथमिक शिक्षा की यह अलख खास तौर पर उन राज्यों में दिख रही है जिनका नामकरण एक अरसे से पिछड़े और बीमारू क्षेत्रों के रूप में कर दिया गया था।

रिपोर्ट ने विस्तार से साबित किया है कि मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ और बिहार के गांवों में अब क्रांति आने लगी है।हालत यह है कि मध्य प्रदेश के बच्चे तो शिक्षा की गुणवत्ता में भी काफी आगे की चहलकदमी कर गए हैं। अंक गणित के परीक्षण में उनका प्रदर्शन गोवा और केरल के बच्चों से भी बेहतर रहा है।

यह रिपोर्ट इस बात का संकेत है कि भारत जाग रहा है और हरित और श्वेत क्रांति के बाद अब वाकई शिक्षा क्रांति की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है।

वैसे इस कामयाबी का एक बड़ा श्रेय सरकार ले सकती है। इसका उसे हक भी बनता है। सर्व शिक्षा अभियान ने देखते ही देखते भारत भर के गांवों में शिक्षा को एक आंदोलन की तरह जिंदा और सक्रिय रखा है। फिर तमाम खामियों और आलोचनाओं का शिकार होने के बावजूद मिड डे मील भी उस वर्ग के बच्चों के लिए एक लौ का काम करता रहा है जिन्हें न तो अपने परिवारों में पढ़ने का माहौल मिल पाता है और न ही दो वक्त का भरपेट खाना।

लेकिन यहां कुछ पहलू ऐसे भी हैं जिन पर गौर जरूर किया जाना चाहिए। दरअसल इस तरह की योजनाएं सरकारी फाइलों के इधर-उधर भागने से कहीं ज्यादा बाबुओं की व्यक्तिगत दिलचस्पी पर काफी हद तक निर्भर रहती है। मानव संसाधन मंत्रालय में ऐसे अफसरों की कमी नहीं जिन्होंने अपने स्तर पर इस अभियान की ताकत को बनाए रखा। लेकिन कामयाबी की इस कहानी को लिखने वालों का जिक्र करना न तो सरकार को याद रहता है औऱ न ही मीडिया को। मजे की बात तो यह है कि सरकारी महकमों में जो गिने-चुने अधिकारी ऐसी योजनाओं के साथ मानसिक एकरूपता महसूस करते भी हैं, उन्हें भी एक पद विशेष में बहुत दिनों तक टिके रहने नहीं दिया जाता।

दूसरे सरकारी स्कूलों की मिड डे योजना आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को तो खींच लेती है लेकिन जरा बेहतर स्तर के परिवार के अपने बच्चों यहां भेजना पसंद नहीं करते। यही वजह है कि पिछले तीन साल में गांवों के पब्लिक स्कूलों में करीब 37 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि गांवों के सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले बच्चों की तादाद लगातार घट रही है। अंग्रेजी रटाने के नाम पर इन पब्लिक स्कूलों में जिस अधकचरे ज्ञान का महिमामंडन होता है, उस पर जागने का माहौल अभी बनता नहीं दिख रहा।

तीसरे यह कि सफलता को लगातार बनाए रखने के लिए हमेशा नए फार्मूलों की जरूरत पड़ती है। मिड डे योजना के बाद अब अच्छा होगा कि बदलते समय के अनुरूप नए फार्मूले और प्रोत्साहन देती योजनाएं लागू की जाएं ताकि सर्व शिक्षा अभियान की ताजगी बरकरार रहे।

साथ ही इस तरह का माहौल बनाना होगा कि इन स्कूलों में पढने और बाहरी जिंदगी में कुछ सफल होने के बाद इन्हीं में से कुछ बच्चे इनमें आकर पढ़ाएं भी। गांव में रहकर पढ़ना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसी गांव में वापिस लौटक कर कुछ देने का भाव रखना भी है। बच्चों को अपने ही भीतर से रोल मॉडल मिलें, इसकी नींव अभी से रखनी होगी। इससे गांव तो सक्षम होंगे ही, तो शहरों पर बढ़ता जनसंख्या का दबाव भी घटेगा। वैसे भी आर्थिक मंदी ने अर्थव्यव्स्था को खेतों का रास्ता फिर से दिखाया है। इस बार भी सबक लेने में चीन बाजी मार गया है। अगर स्कूल सही दिशा में ज्ञान देने में सफल रहते हैं तो इस बात की गारंटी रहेगी कि भारत आकाश की ऊंचाइयों को छूने के बावजूद जमीन से कटेगा नहीं।

वैसे इस सारे अभियान में मीडिया की भूमिका कई बार सकारात्मक रही है। रिएलिटी शोज ने सपने जगाए हैं। मामूली चेहरों और निम्न घरों के बच्चों के हाथों में जीत का गुलदस्ता थमाया है और साथ ही बड़े शहरों के उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों के बच्चों के अपराध ऐसे जोर-शोर से दिखाए हैं कि कई बार गांववालों को महसूस हुआ है कि वे इनसे बेहतर हैं।

लेकिन शिक्षा के प्रसार को पुरजोर कोशिश के साथ स्थापित करने की आदत मीडिया को नहीं पड़ी है। वाजपेयी के प्रधानमंत्री काल में शिक्षा का एक बेहद आकर्षक सरकारी विज्ञापन बना, वह भाजपा सरकार जाने के बाद भी कई दिनों तक मामूली फेरबदल के बाद वैसे ही चलता रहा। निजी चैनल आज भी जनमानस से जुड़े मुद्दों को दिखाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता क्योंकि उसे लगता है कि यह काम दूरदर्शन के जिम्मे है। वही करे समाज का भला।


फिलहाल यह बच्चे स्कूल जा रहे हैं लेकिन इनके बस्ते किन सपनों की पनघट के पार जा रहे हैं,यह सोच शायद अभी सरकार के पास नहीं। अगले दस साल में जब ऐसे कई बच्चे अपनी बढ़ाई पूरी कर रहे होंगे या कर चुके होगें तो इनका कब्जा उन तमाम सपनों पर हो जाएगा जो अब तक चांदी की प्लेटों में खाना खा रहे बच्चों के पास ही कैद थे। ये बच्चे जब डिग्रियां पाएंगें तो इनके पास एक जादुई उड़नतश्तरी खुद-ब-खुद आ जाएगी और यही नए भारत को एक सुपर शक्ति बनाने का विचारशील फार्मूला तय करेगें। इसलिए समय आ गया है कि इन बच्चों को अब सिर्फ ककहरा ही न पढ़ाया जाए बल्कि सपनों की घुट्टी भी पिलाई जाए। तब वाकई लगेगा कि अपने देश में बुद्धा इज लाफिंग।

Feb 5, 2009

असली खबर तो बताइए हुजूर!

ऐसा कई बार होता है कि जो असल में खबर होती है, वह खबर नहीं बनती और नाकाबिल खबर बड़ी खबर की तरह उछल कर सामने खड़ी हो जाती है। ताजा मिसाल है- फ्रांस के राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी की घोषणाएं। सरकोजी ने हाल ही में कुछ अहम घोषणाएं की हैं। सबसे अहम घोषणा यह है कि फ्रांस के जो युवा इस साल अपना 18वां जन्म दिवस मनाएंगें, उन्हें अपनी पसंद का एक अखबार मुफ्त में दिया जाएगा और उस अखबार की कीमत सरकार चुकाएगी। इसके अलावा देश की अखबारों की बिगड़ती सेहत को चमकाने के लिए एक नौ-सूत्री कार्यक्रम की योजना बना दी गई है जिसके तहत अखबारों को मिलने वाले विज्ञापनों में दोगुना बढ़ोतरी शामिल है। सरकार अब अखबारों और पत्रिकाओं को फिलहाल मिलने वाली 80 लाख यूरो की राशि को बढ़ा कर 7 करोड़ यूरो करने जा रही है। इसके अलावा वह प्रिंट को दिए जाने वाले विज्ञापनों पर 2 करोड़ यूरो अतिरिक्त खर्च करने जा रही है। इन प्रयासों के अलावा प्रिंट पर लगने वाली फीस की कुछ दरों में भी कटौती की जाएगी। सरकोजी ने यह तमाम घोषणाएं एक ऐसे समय में की हैं जबकि पूरी दुनिया पर मंदी का साया है। इस साये में दूसरे व्यापारिक प्रतिष्ठानों की ही तरह मीडिया की तरफ से भी यह आवाजें गूंजने लगी हैं कि मंदी का उन पर गहरा असर पड़ रहा है। वैसे फ्रांस के संदर्भ में देखा जाए तो उनका यह फैसला उनके आलोचकों को एक बार फिर यह कहने का मौका दे सकता है कि वे मीडिया मालिकों से अपनी करीबियत बढ़ाने के लिए आमादा हैं और इसके जरिए वे उन पर अपना प्रभाव और दबाव-दोनों ही बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन आलोचना चाहे जो भी हो, सरकोजी की इन घोषणाओं ने कम से कम फ्रांस में मुरझाने से लगे प्रिंट उद्योग को एक नई गुलाबी तो दे ही दी है। लेकिन सरकोजी का एक कदम खास तौर पर काबिलेतारीफ है। अपने 18वें साल में प्रवेश कर रहे नवयुवकों को एक साल के लिए अपनी पसंद की किसी अखबार को मुफ्त में पाने की उनकी इस पहल के कई दूरगामी असर होंगे। इस समय जबकि पूरी दुनिया में इस पर चिंतन होने लगा है कि युवा प्रिंट से दूर होता जा रहा है, ऐसी कोशिश उस दूरी को कम करने की कुछ कोशिश यकीनी तौर पर करेगी। साथ ही इससे प्रिंट को भी एक ताकत तो मिलेगी ही। अगले कुछ सालों में जब यह पीढ़ी पूरी तरह से अपने पांवों पर खड़ी होगी, तब इस पीढ़ी का प्रिंट की तरफ सम्मान (या फिर रूझान ही सही) का रवैया अगली पीढ़ी में भी प्रिंट के बदस्तूर टिके रहने को सुनिश्चित कर देगा। पूरी दुनिया में, खासकर पश्चिमी देशों में अखबार पढ़ने वाले कम से कम 5 प्रतिशत की वार्षिक दर से घट रहे हैं। इस मामले में भारत की बात जरा दूसरी है। भारत का समाचार पत्र उद्योग चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा समाचार पत्र उद्योग है। यहां नव साक्षरों की तादाद अभी भी बढ़ रही है और साथ ही एक बड़े लोकतंत्र के होने की वजह से भी टीवी की तमाम धमाचौकड़ियों के बावजूद प्रिंट का वर्चस्व आज भी हिंदुस्तान में कायम है। यही वजह है कि तमाम मंदियों और धमाकों के बावजूद भारत में आज भी रोज नए अखबार या पत्रिकाओं के प्रसव का दौर चल रहा है। वर्ल्ड प्रेस ट्रेंड(2008) के आंकड़ों के मुताबिक 2004 में भारत में 3,800 पत्रिकाएं छप रही थीं और 2007 में इनकी संख्या उछलकर 6,300 पर जा पहुंची। जाहिर है कि भारत में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की संख्या बढ़ रही है लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं लगाया जाना चाहिए कि प्रिंट के लिए यह प्रेम सदाबहार रहेगा। पिछले कुछ सालों में पत्रिकाओं को पढ़ने वालों की संख्या में तेजी से कमी आई है। अकेले भारत में पत्रिकाओं को पढ़ने वालों की तादाद साढ़े सात करोड़ से घट कर छ करोड़ 80 लाख तक आ पहुंची है। कहने को कहा जा सकता है कि टीवी और इंटरनेट की चौबीसों घंटे की मौजूदगी ने पत्रिकाओं को पढ़ने के समय को कम कर दिया है लेकिन इसे इस बदलाव की इकलौती वजह कतई नहीं माना जा सकता और न ही इस सच को स्वीकारने से परहेज होना चाहिए कि नई पीढ़ी का पढ़ने के प्रति रूझान सूख रहा है। बहरहाल फ्रांस की बात हो रही थी। लगता है कि फ्रांस में जिस बदलाव की तरफ इशारा किया गया है, उससे भारत को भी सबक लेना ही चाहिए। भारत में इस समय हिंदी पत्रिकाओं का बाजार सिमट रहा है। न्यूज और सामयिक विषयों पर गिनी-चुनी पत्रिकाएं ही बाजार में बची हैं और इनमें भी एक प्रमुख पत्रिका हाल ही के दिनों में साप्ताहिक से मासिक कर दी गई और उसके संपादक और कई वरिष्ठ पत्रकार पत्रिका को छो़ड़ कर एक नई अखबार से जा जुड़े। खबर यह है कि यह पत्रिका भी बस अब बंद होने के मुहाने पर खड़ी है। साहित्यिक पत्रिकाओं को तो वैसे भी राम-रहीम भरोसे चलने की आदत रही है। साहित्यिक पत्रिकाएं अब भी 1000 से ज्यादा प्रतियां छपाने का साहस जुटा नहीं पातीं। समाचार पत्रों का बाजार इस बीच फला-फूला जरूर लेकिन यहां भी अब कंटेट इज दी किंग की बजाय पैसा इज दी किंग का नारा जपा जा रहा है। रिपोर्टर विज्ञापन लाने में जुटते हैं और संपादकीय लिखने के लिए रखे गए लोग इस फिराक में कि समाचार पत्र समूह को कहां से धनलक्ष्मी मिल सकती है और इन सबके बीच मंदी के बहाने कई समाचार पत्रों से लोगों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया तो संदेश यह भी गया कि अब टिके रहने की एक बड़ी शर्त यह होगी कि आप पूंजीपति की पूंजी में मुनाफा करने के काबिल हैं या नहीं। मंदी का जोर भारत में भी है। मंदी वाकई उतनी गहरी है जितना दिख रही है या फिर यह सब बहाना है, यह सोचने की बात है। लेकिन इतना जरूर है कि मंदी के मौसम में कई अखबारों में अच्छे से अच्छे धुरंधर पत्रकारों की छुट्टी कर दी गई है। इसमें गौर करने की बात यह कि पत्रकारों की इस स्थिति पर कहीं कोई सुगबुगाहट भी दिखाई तक नहीं दे रही। कहा यह जा रहा है कि मंदी के चलते प्रिंट उद्योग पेरशानी में है, इसलिए अखबारों के दफ्तरों में जमी अतिरिक्त चर्बी को बाहर किया जाना निहायत जरूरी है। तो मुद्दा यह है कि जिस पत्रकारिता का काम मिशन था और सामाजिक हितों की रक्षा करना था, वह पूंजीपतियों की कठपुतली बनने लगा है। अब मिशन की जगह कमीशन ने और सामाजिक हितों की जगह स्वांत: सुखाय ने ले ली है। ऐसे में असल पत्रकारिता है कहां? लेकिन अगर सरकारी स्तर पर भारत में भी प्रिंट मीडिया को पैसे का ग्लूकोज दिया जाए तो शायद स्थिति बदले। यहां यह देखना होगा कि ग्लूकोज की डोज अपनी सीमा न लांघे और न ही मीडिया उसका आदी बन चले। यह भी कि डोज ऐसी न हो कि लेने वाला देने वाले के महिमामंडन को ही पत्रकारिता समझने की भूल कर बैठे। (यह लेख 5 फरवरी को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Feb 1, 2009

कृषि दर्शन : उपयोगी पर दर्शनीय नहीं

किसान भाइयों को राम राम। 26 जनवरी, 1966 को इस संबोधन के साथ जिस प्रयोग की शुरूआत हुई, उसका नाम था- कृषि दर्शन। मकसद था-किसानों तक कृषि संबंधी सही और जरूरी सूचनाओं का प्रसारण। कहने को तो आप इसे महज एक कार्यक्रम भर मान सकते हैं लेकिन दरअसल कृषि दर्शन अपने आप में एक मुहावरा है। याद कीजिए वे दिन जब काले-सफेद टीवी के परदे के सामने बैठ कर दर्शक सत्यम् शिवम् सुंदरम् के लोगो को बहुत चाव से देखा-सुना करते थे। उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले गिने-चुने कार्यक्रमों में से एक था - कृषि दर्शन। चूंकि तब विकल्प नहीं थे और मनोरंजन के साज बुद्धू बक्से पर एक ही चैनल का कब्जा था तो यह कृषि दर्शन कई बार बड़े काम का लगता था। इस कार्यक्रम को असल में एक दृष्टि के साथ शुरू किया गया था। कृषि दर्शन एक प्रयोग था जिसे सबसे पहले दिल्ली और आस-पास के चुने गए 80 गांवों में सामुदायिक दर्शन के लिए विकसित किया गया। यह प्रयोग सफल रहा और यह पाया गया कि हरित क्रांति के इस देश में कृषि दर्शन ने किसानों से बेहद जरूरी जानकारियां बांटने में जोरदार भूमिका निभाई। कृषि प्रधान देश के किसानों के लिए इस कार्यक्रम ने घर बैठे ताजा सूचनाओं और तकनीक के नए द्वार खोल दिए। किसान इस कार्यक्रम का बेसब्री से इंतजार करते और बाद में दो तरफा संवाद कायम होने के बाद बीजों से लेकर कीटनाशकों तक से जुड़े सवालों के जवाब सीधे वैज्ञानिकों से पाने लगे। आज भी यह कार्यक्रम हफ्ते में पांच दिन प्रसारित किया जाता है। बाद में इसी प्रयोग से उत्साहित होकर 1975 में साइट परियोजना की नींव रखी गई। भारत में तकनीक और सामाजिक स्तर पर यह सबसे बड़ी परियोजनाओं मे से एक बना। इसके तहत भारत के 6 राज्यों(राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश) के 2330 गांवों को चुना गया। इसका मकसद था - गांवों की संचार प्रणाली की प्रक्रिया को समझना, टेलीविजन को शिक्षा के माध्यम के तौर इस्तेमाल करना और ग्रामीण विकास में तेजी लाना। इन कार्यक्रमों में कृषि और परिवार नियोजन को तरजीह दी गई। 5 से 12 साल के स्कूली बच्चों के लिए हिंदी, कन्नड, उड़ीया और तेलुगु में 22 मिनट के कई ऐसे कार्यक्रम तैयार किए गए जिससे बच्चों में विज्ञान में दिलचस्पी बढ़ी। इस परियोजना ने यह साबित किया कि दूरदर्शन ग्रामीण शिक्षा और विकास के लिए एक बड़ा हथियार बन सकता है। इसके बाद प्रयोग चलते ही रहे। 1982 में इंसैट और 1983 में इंसैट 1-बी परियोजनाओं ने गांवों में अलख जगाने की मुहिम बरकरार रखी। लेकिन दूरदर्शन न तो कभी पूरी रफ्तार पकड़ पाया और न ही वह गुणवत्ता जिसकी उससे अपेक्षा थी। नई दिल्ली में सितंबर, 1959 को पहला केंद्र स्थापित होने के बाद मुंबई में दूसरा केंद्र स्थापित करने में ही सरकार ने 13 साल का समय लगा दिया और रंगीन होने में तो 23 साल ही लग गए। वह भी तब जब भारत में एशियाड खेल आ धमके। बाद में खाड़ी युद्ध के बहाने निजी चैनलों की घुसपैठ होते ही दूरदर्शन का जैसे बाजा ही बज गया। 1962 में 41 टीवी सेटों से शुरू हुई कहानी फिर कभी ठहरी नहीं और न ही दूरदर्शन और निजी चैनलों के बीच तुलना का दौर। इस सबके बीच दूरदर्शन के लिए विकास तो प्राथमिक ही रहा लेकिन गुणवत्ता तब भी नहीं। यह त्रासदी ही है कि दूरदर्शन पर दिखाए जा रहे कृषि संबंधी कार्यक्रमों में कृषि दर्शन सबसे पुराना होने के बावजूद गुणवत्ता के स्तर पर सर्वश्रेष्ठ आज भी नहीं है। आज भी न तो सेट आकर्षक नहीं बन सके हैं और न ही एंकरों में कसाव आया है। इस कार्यक्रम में आज भी विषयों में विविधता नहीं दिखती। रीसर्च के नाम पर भी ढीलेपन का कब्जा है। यहां किसान की परिभाषा भी रटी-रटाई है। किसान यानी अपने खेत में खेती करने वाला आम किसान या फिर बहुत बड़ा किसान। भूमिहीन किसानों के अधिकारो की बात अक्सर यहां नहीं होती। दूसरे यहां नकदी फसलों जैसे नए और ज्यादा आधुनिक विकल्पों को भी नएपन से समझाया नहीं जाता। यही वजह है कि आज भी एक आम मजाक है कि कृषि दर्शन की हालत ऐसी है कि यह भेद करना मुश्किल है कि जो एपिसोड दर्शक देख रहा है वह 2009 में बना था या 1966 में। 2005 से कृषि मंत्रालय के सहयोग से राष्ट्रीय प्रसारण के लिए नैरोकास्टिंग कृषि दर्शन नामक कार्यक्रम की भी शुरूआत कर दी गई है लेकिन यहां भी दूरदर्शिता का अभाव साफ दिखता है। यह ठीक है कि निजी चैनलों ने कभी भी विकास को पहली प्राथमिकता नहीं दी। वे रसोईयों में पकवानों की रिसिपी तो सिखाते रहे लेकिन सब्जी-अन्न मुहैया कराने वाले बहुत याद नहीं आए। मेरा गांव मेरा देश, किसान भाइयों और जय जवान जय किसान जैसे कार्यक्रमों की शुरूआत भी हुई लेकिन नेक नीयती के स्तर पर वे भी पिछड़ गए। अब जबकि कृषि दर्शन अपने प्रसारण के 23 साल पूरे कर रहा है, खुशी होती है कि दूरदर्शन ने आज भी किसान को हाशिए पर सरकाया नहीं है। लेकिन सोचने की बात यह भी है कि क्या किसान अकेले दूरदर्शन की ही जिम्मेदारी हैं? क्या आचार संहिताएं बनाने वाले बुद्धिजीवी ऐसी कोई अनिवार्यता रख पाने में अक्षम हैं कि निजी चैनलों को एक तयशुदा प्रतिशत किसानों के लिए रखना ही होगा? दूसरे यह कि क्या तकनीक के स्तर पर इतनी क्रांतियां आने के बाद अब भी दूरदर्शन को महसूस नहीं होता कि अथाह संसाधनों के बावजूद वह आज भी इस कार्यक्रम को स्तरीय बनाने में चूक रहा है? ( यह लेख 1 फरवरी, 2009 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)

Jan 28, 2009

चलते-चलते यूं ही ..

(1)

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा
और फिर देखीं अपनी
पांव की बिवाइयां
फटी जुराब से ढकी हुईं
एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में -
दोनों की आंखों के पोर गीले थे

(2)

फलसफा सिर्फ इतना ही है कि
असीम नफरत
असीम पीड़ा या
असीम प्रेम से निकलती है
गोली, गाली या फिर
कविता

Jan 22, 2009

कैमरे और कलम की संवेदनहीनता

आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो और यूपी पुलिस के आंकड़ों ने इस बार जो तस्वीर पेश की है, वह चौंकाने वाली भी है और चेताने वाली भी। आंकड़ों के मुताबिक बलात्कार और घरेलू हिंसा के मामलों में उत्तर प्रदेश अव्वल है। खास तौर पर गौर करने की बात यह है कि रिपोर्ट में पाया गया है कि हालांकि देश भर में 2006 की तुलना में 2007 में महिला अपराध में 12.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है लेकिन अपराधों के उफान के मामले में भाषी राज्य पहले नंबर पर हैं।

लेकिन अपराध के आंकड़ों के ग्राफ की सेहत के मद्देनजर यह टटोलना बेहद जरूरी लगता है कि समाज में अपराध ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है या फिर अपराध को लेकर संवेदनहीनता।इस तरह की संवेदनहीनता दहेज हत्याओं के मामले में तो दिखती ही रही है लेकिन पिछले एक दशक में बलात्कार भी इस श्रेणी में शामिल होता जा रहा है। वैसे भी बलात्कार की कवरेज स्वाद और टीआरपी के मुनाफे के चलते कई परतों से होकर तो गुजरती ही है।

मिसाल के तौर पर अभी हाल ही में दिल्ली से सटे नौएडा में जब दिनदहाड़े बलात्कार की घटना हुई तो एक बार फिर यह सवाल उचल कर सामने आ गया। हालांकि इस बार उत्तर प्रदेश पुलिस ने अतिरिक्त सतर्कता दिखाते हुए 24 घंटे के भीतर ही आरोपियों को पकड़ कर मामले को तत्काल ‘ सुलझा ’ लिया लेकिन फिर भी अपराध को लेकर सामाजिक प्रशासनिक नजरिया बहुत आश्वस्त करता दिखाई नहीं दिया।

इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें साफ तौर पर उभर कर आईं हैं। पहली बात तो यह कि मीडिया ने खुलकर यह बताया कि बलात्कार पीड़ित लड़की कहां की रहने वाली थी, वह कहां पढ़ती थी, जिस युवक के साथ वह शॉपिंग कांपलेक्स में गई थी, उसका नाम क्या था और उसके पिता दिल्ली पुलिस में क्या करते हैं वगैरह। कहने का मतलब यह कि इस घटना की रिपोर्टिंग करते समय टीवी चैनलों ने तो अपने जाने-माने स्वभाव के मुताबिक कोई एतिहात नहीं बरती लेकिन साथ ही प्रिंट मीडिया भी पत्रकारिता के मूलभूत उसूलों से भटकता हुआ झटपट रिपोर्टिंग करता हुआ दिखा।

वैसे पत्रकारिता की बुनियादी पढ़ाई में ही इन दिनों भी कम से कम एकाध बार तो यह सबक बताया ही जाता है कि बलात्कार और बाल-अपराध के मामलों की रिपोर्ताज करते समय किन तत्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिए लेकिन यह भी सच है कि निजी चैनलों की आपसी आगे निकलो प्रतियोगिता के चलते ऐसे संवेदनशील मु्द्दे भी बाजारू रिपोर्टिंग के खतरे के शिकार होते चले गए हैं।

दूसरा मुद्दा है - मीडिया का अपराध और अपराधी के प्रति रवैया। घटना के अगले ही दिन दिल्ली से प्रकाशित होने वाला एक प्रमुख अंग्रेजी दैनिक उस गांव के सरपंच का इंटरव्यू छापता है जहां यह आरोपी रहते थे। इंटरव्यू का मर्म यह है कि ये लड़के निर्दोष हैं क्योंकि उन्होंने सिर्फ बलात्कार ही किया है। यह भी कहा जाता है कि असल में बलात्कार तो लड़की के दोस्त ने किया था लेकिन चूंकि तब ये लड़के क्रिकेट खेल कर पास से ही गुजर रहे थे, इसलिए इन्हें ही फंसा दिया गया। इंटरव्यू में बताया गया है कि यह युवक अमीर परिवारों के हैं और गांव में इनके बड़े-बड़े घर हैं। इस पूरी कहानी को अखबार के पहले पन्ने पर प्रमुखता के साथ छापा गया है।

दरअसल अपराध होने असामान्य न माना जाना एक फितरत है लेकिन इस फितरत के आगे जाकर अपराध को जायकेदार और एक-पक्षीय बनाए जाने की कोशिश खतरनाक जरूर है। यही हो रहा है। एक तो मीडिया पढ़ाने वाले ज्यादातर दुकान सरीखे संस्थान नई फौज को पत्रकारिता के नाजुक मामलों और उससे जुड़े कानून को बताने में समय खर्च करना नहीं चाहते और दूसरे चैनलों में नौकरी पाने के बाद मुनाफे की होड़ में सब कुछ जल्द करवाने का ऐसा दबाव बना रहता है कि सही-गलत की लक्ष्मण रेखा पर विचार ही नहीं किया जाता।

एक बात और। भारत में आज भी महिला पत्रकारों की तादाद 15 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी नहीं है। इनमें भी प्रमुख बीट पाने वाली महिलाएं बहुत ही कम हैं। इस में कोई शक हो ही नहीं सकता कि अगर महिलाओं को ऐसे नाजुक मामलों की रिपोर्टिंग दी जाती है तो वे खबर से काफी हद तक न्याय कर पाती हैं लेकिन उन्हें इस मौके को देने की कमान फिर एक पुरूष के हाथ ही होती है और मर्जी न होने पर उन्हें संवेदनशील घटना की रिपोर्टिंग का मौका मिल ही नहीं पाता। पर यह भी सच है कि जो पुरूष खुद बलात्कार करता है, उसकी कलम ऐसी घटना को रिपोर्ट करते समय संवेदनशीलता जगेगी, इसकी उम्मीद करना बहुत मायने नहीं रखता।

इसलिए मामला सिर्फ यह नहीं कि अपराधों को लेकर नेशनल क्राइम रिकार्ट ब्यूरो क्या आंकड़े देता है। ब्यूरो तो 70 के दशक से ही आंकड़े तश्तरी में सजाने का औपचारिक काम कर ही रहा है। मामला तो यह है कि जिस देश में 1970 से लेकर अब तक अपराध दर में 7000 प्रतिशत का इजाफा हो गया हो, वहां आज भी अपराध को लेकर एक सख्त सोच पनप ही नहीं पाई है। लगता यही है कि भारतीय समाज अपराध होने की इंतजार ज्यादा करता है और उसे न घटने देने की कोशिश कम।

यह त्रासदी ही है कि एक ऐसा देश जहां भारत में हर साल बलात्कार के 19000 से ज्यादा मामले दर्ज होते हैं और हर तीन मिनट में एक महिला पर किसी न किसी तरह का अपराध किया जाता है, वहां आज भी वलात्कार की रिपोर्टिंग को लेकर कोई खाका तैयार ही नहीं किया गया है। यह वही देश है जहां महिला आयोग समय-समय पर चीखता दिखाई देता है लेकिन यह चीख इस मामले में कोई ठोस काम नहीं कर सकी है। यह वही देश है जहां भारतीय प्रेस परिषद का गठन इस वादे के साथ किया गया था कि यह प्रेस की अनियमितताओं पर नजर रखेगा लेकिन नजर रखने के अलावा इस पर हुआ क्या? बेशक पेज थ्री की रिपोर्टिंग में हमने झंडे गाढ़ दिए हैं और टीवी और अखबारों में कॉरपोरेट और विज्ञापन-प्रेरित खबरों के पेट का आकार भी बढ़ा है लेकिन बलात्कार की रिपोर्टिंग के लिए अभी भी मानवीय भावनाएं जग नहीं सकी हैं। बलात्कार की रिपोर्टिंग का किस्मत भी शायद वही है जो भारत की एक औसत महिला की है। लेकिन सोचना चाहिए कि सड़क पर हुए एक बलात्कार के बाद जब मीडिया अपने कैमरों और कलम से दोबारा बलात्कार करता है तो उस पर कोई धारा क्यों नहीं लगती?

(यह लेख 20 जनवरी, 2009 को अमर उजाला में प्रकाशित हुआ)

Jan 19, 2009

प्रेम

मुमकिन है बहुत कुछ
आसमान से चिपके तारे अपने गिरेबां में सजा लेना
शब्दों की तिजोरी को लबालब भर लेना

देखो तो इंद्रधनुष में ही इतने रंग आज भर आए
और तुम लगे सोचने
ये इंद्रधनुष को आज क्या हो गया!

सुर मिले इतने कि पूछा खुद से
ये नए सुरों की बारात यकायक कहां से फुदक आई?

भीनी धूप से भर आई रजाई
मन की रूई में खिल गए झम-झम फूल

प्रियतम,
यह सब संभव है, विज्ञान से नहीं,
प्रेम में आंखें खुली हों या मुंदी
जो प्रेम करता है
उसके लिए कुछ सपना नहीं
बस, जो सोच लिया, वही अपना है।

Jan 16, 2009

क्योंकि कविता भी बदलती है

बचपन में कविता लिखी
तो ऐसा उल्लास छलका
कि कागजों के बाहर आ गया।

यौवन की कविता
बिना शब्दों के भी
सब बुदबुदाती गई ।

उम्र के आखिरी पड़ाव में
मौन शून्यता के दरम्यान
मन की चपलता
कालीन के नीचे सिमट आई।

अब उस पर कविता लिखती औरत के पांव हैं
बुवाइयों भरे।

Jan 15, 2009

गजब है

बात में दहशत
बे-बात में भी दहशत
कुछ हो शहर में
तो भी
कुछ न हो तो भी

चैन न दिन में
न रैन में

मौसम गुनगुनाए तो भी
बरसाए तो भी
शहनाई हो तो भी
न हो तो भी
हंसी आए मस्त तो भी
बेहंसी में भी

गजब ही है भाई
न्यूजरूम !

Jan 8, 2009

बहूरानी

नौकरानी और मालकिन
दोनों छिपाती हैं एक-दूसरे से
अपनी चोटों के निशान
और दोनों ही लेती हैं
एक-दूसरे की सुध भी

मर्द रिक्शा चलाता हो
या हो बड़ा अफसर
इंसानियत उसके बूते की बात नहीं।

बलात्कार

लड़की का बलात्कार हुआ था
मीडिया पूछ रही थी
कैसा लग रहा है उसे
जिस युवक ने किया था
शादी का वादा
वो उसके घर का रास्ता
अब खोज नहीं पाता
अब है फिर पास वही मां

सहारा देने की ताकत पुरूष में कहां
इस ताकत के कैप्सूल अभी बने नहीं

Jan 4, 2009

नेलपालिश

जब भी सपने बुनने की धुन में होती हूं
गाती हूं अपने लिखे गीत
अपने कानों के लिए
तो लगाने लगती हूं जाने-अनजाने अपने नाखूनों पर नेलपालिश।

एक-एक नाखून पर लाल रंग की पालिश
जब झर-झर थिरकने लगती है
मैं और मेरा मन-दोनों
रंगों से लहलहा उठते हैं।

इसलिए मुझसे
मेरे होठों की अठखेलियों का हक
भले ही लूटने की कोशिश कर लो
लेकिन नेलपालिश चिपकाने का
निजी हक
मुझसे मत छीनना।
नाखूनों पर चिपके ये रंग
मेरे अश्कों को
जरा इंद्रधनुषी बना देते हैं और
मुझे भी लगने लगती है
जिंदगी जीने लायक।

तुम नहीं समझोगे
ये नाखून मुझे चट्टानी होना सिखाते हैं।
इनके अंदर की गुलाबी त्वचा
मन की रूई को जैसे समेटे रखती है।

ये लाल-गुलाबी नेलपालिश की शीशियां
मेरे बचपन की सखी थीं
अब छूटते यौवन का प्रमाण।

ड्रैसिंग टेबल पर करीने से लगी ये शीशियां
मुझे सपनों के ब्रश को
अपने सीने के कैनवास पर फिराने में मदद करती हैं।
ये मेरा उड़नखटोला हैं।
मुझे इनसे खेलने दो।

पत्रकार होने से क्या होता है?
मन को भाती तो
नेलपालिश की महक ही है,
माइक की खुरदराहट नहीं।

(यह कविता जनवरी 2009 के नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई)

एक अदद इंतजार

सपने बेचने का मौसम आ गया है।
रंग-बिरंगे पैकेज में
हाट में सजाए जाएंगे- बेहतर रोटी,कपड़ा,मकान,पढ़ाई के सपने।

सपनों की हांक होगी मनभावन
नाचेंगें ट्रकों पर मदमस्त हुए
कुछ फिल्मी सितारे भी
रटेंगे डायलाग और कभी भूल भी जाएंगे
किस पार्टी का करना है महिमा गान।

जनता भी डोलेगी
कभी इस पंडाल कभी उस
माइक पकड़े दिखेगें उनमें कई जोकर से
जो झूठ बोलेगें सच की तरह

और जब होगा चुनाव
अंग्रेजदां भारतीय उस दिन
देख रहे होंगे फिल्म
या कर रहे होंगे लंदन में शापिंग
युवा खेलेंगे क्रिकेट
और हाशिए वाले लगेंगे लाइनों में
हाथी, लालटेन, पंजे या कमल
लंबी भीड़ में से किसी एक को चुनने।

वो दिन होगा मन्नत का
जन्नत जाने के सपनों का
दल वालों को मिलेंगे पाप-पुण्य के फल।

उस दिन मंदिर-मस्जिद की तमाम दीवारें ढह जाएंगी
चश्मे की धूल हो जाएगी खुद साफ
झुकेगा सिर इबादत में
दिल में उठेगी आस
कि एक बार - बस एक बार और
कुर्सी किसी तरह आ जाए पास।

सच तो है।
अगली पीढ़ियों के लिए आरामतलबी का सर्टिफिकेट
इतनी आसानी से तो नहीं मिल सकता।

(यह कविता जनवरी 2009 के नया ज्ञानोदय में प्रकाशित हुई)