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My journey with Doordarshan since 80's

Mar 11, 2013

थी.हूं..रहूंगी...


ज़ुबां बंद है

पलकें भीगीं
सच मुट्ठी में
पढ़ा आसमान ने

मैं अपने पंख खुद बनूंगी

हांमैं थी. हूं..रहूंगी..







पानी-पानी
इन दिनों पानी को शर्म आने लगी है
इतना शर्मसार वो पहले कभी हुआ न था
अब समझा वो पानी-पानी होना होता क्या है
और घाट-घाट का पानी पीना भी 

वो तो समझ गया
समझ के सिमट गया
उसकी आंखों में पानी भी उतर गया
जो न समझे अब भी
तो उसमें क्या करे
बेचारा पानी 

निर्भया
औरत होना मुश्किल है या चुप रहना
जीना या किसी तरह बस, जी लेना
शब्दों के टीलों के नीचे
छिपा देना उस बस पर चिपकी चीखें, कराहें, बेबसी, क्ररता, छीलता अट्टाहास
उन पोस्टरों को भींच लेना मुट्ठी में
जिन पर लिखा था हम सब बराबर हैं

पानी के उफान में                    
छिपा लेना आंसू
फिर भरपूर मुस्कुरा लेना
और सूरज से कह देना
मेरे उजास से कम है वो

कैलास की यात्रा में
कुरान की आयतें पढ़ लेना
इतने सामान के साथ
साल दर साल कैलेंडर के पन्ने बदलते रहना

कागजों के पुलिंदे में
भावनाओं की रद्दी
थैले में भरी तमाम भद्दी गालियां
और सीने पर चिपकी वो लाल बिंदी
और सामने खड़ा - मीडिया 

इस सारी बेरंगी में
दीवार में चिनवाई पिघली मेहंदी
रिसता हुआ पुराना मानचित्र
बस के पहिए के नीचे दबे मन के मनके और उसके मंजीरे
ये सब दुबक कर खुद को लगते हैं देखने... 

इतना सब होता रहे
और तब भी कह ही देना कि
वो एक खुशी थी
किसी का काजल, गजरा और खुशबू
नाम था - निर्भया

Feb 19, 2013

मेरे समय की औरतें

लड़कियां फुटबाल की तरह उछल कर खेल लेतीं हैं इन दिनों

और अपने सीने में सीलन को दबाए

मुस्कुरा भी लेती हैं 

 

लड़कियों के पास अब अपना एक आसमान है

 

अपनी पगडंडी

अपनी कुटिया

अपनी हंसी

अपना दुपट्टा


समय के साथ बदल गई हैं लड़कियां

कालेज के बार भेलपूरी खाते हुए

यहां-वहां झांकतीं नहीं वे

 

खुश रहने लगी हैं लड़कियां

अपमान पी गईं हैं लड़कियां

हां, बदल गईं हैं लड़कियां



बादलों के बीच  


हर औरत लिखती है कविता

हर औरत के पास होती है एक कविता

हर औरत होती है कविता

कविता लिखते-लिखते एक दिन खो जाती है औरत

और फिर सालों बाद बादलों के बीच से

झांकती है औरत


सच उसकी मुट्ठी में होता है

तुड़े-मुड़े कागजसा

खुल जाए

तो कांप जाए सत्ता

पर औरत

ऐसा नहीं चाहती

औरत पढ़ नहीं पाती अपनी लिखी कविता

पढ़ पाती तो जी लेती उसे


इसलिए बादलों के बीच से झांकती है औरत

बादलों में बादलों सी हो जाती है औरत

Jan 9, 2013

हां, मैं थी..हूं..रहूंगी...

देखिए मैं यह बात साफ तौर पर कह देना चाहती हूं कि मैं भी अगर मर जाऊं या मारी जाऊं तो उसकी जांच पुलिस से न कराई जाए। जांच करवा कर कुछ होगा नहीं। बेवजह ऊपर बैठे भी तनाव रहेगा और यहां सत्ता वाले पूछ लेगें - ठीक है।

यह बात मैनें उस शाम अपने फेसबुक पर लिखी। मन चुप था। रोज बयानों की म्यूजिकल चेयर के बीच यह भी तय था कि देश की जनता पहली बार पूरे ब्यौरे के साथ यह जान रही है कि अपराध की कितनी परतें हो सकती हैं और कैसे एक अपराध किस कदर घुमावदार रास्तों से गुजरते-गुजरते खुद अपराध का शिकार होते चलता है ।

जाते हुए साल ने पुलिस, न्यायिक तंत्र, महिला आयोग, जनता और मीडिया - इन सभी के बेहद नए पक्ष को उभार कर रख दिया। 199 की आबादी पर एक सिपाही रखने वाली दिल्ली पुलिस जिसके पास वीआईपी ड्यूटी, घर पर रखे जा रहे कर्मचारी इत्यादी के बाद 30 प्रतिशत कर्मचारी ही देश की राजधानी के नागरिकों के लिए बचते हैं, इस बार खुद बचाव की मुद्रा में आ गई। महज 26 प्रतिशत मामलों में ही बलात्कारियों को सजा दिला पाने वाला न्यायिक तंत्र जिससे आम आदमी के खौफ का कद हमेशा बढ़ा ही है, इस बार भी मन में डर पैदा कर गया। फिर महिला आयोगों को लेकर भी मन में तीखे सवाल उठे, बेहद दुख के साथ। जनता ने खुल कर जाना कि आयोग ऐसे सफेद हाथी बनते जा रहे हैं जिसके दांत अब सजा कर रखने के काबिल तक नहीं। फिर हुआ क्या। कमान जनता ने अपने हाथों ले ली और मीडिया उसके साथ-साथ चला। वह भूला नहीं। उसने इस एक वाकये को महज स्टोरी की तरह नहीं लिया। उसने इस बार महसूस किया कि अपराध अब स्टोरी नहीं, स्टोरी न करना अब अपराध होगा। उसने अपनी सीमाएं खुद तय कीं और जब निर्भया का बेजान शरीर दिल्ली आया तो वो अपने कैमरों सहित वहां से दूर रहा।

असल में सत्ताएं जब संकेत नहीं समझतीं तो जनसत्ता राजसत्ता की तरफ गूंज के साथ मुखातिब होती ही है। ऐसा कई बरसों में एक बार होता है जब संसद सड़क के पास नहीं बल्कि सड़क संसद के पास चली आती है। जनता बहुत लंबे समय से संकेत दे रही थी। फेसबुक पर आने वाले कमेंट और कार्टून, ट्विटर के जरिए चलती दिखती सरकार और तमाम हलचलों के बीच मौन रहने वाला बाबा पर अखबारों में छपने वाले लंबे खत। अमानत, निर्भया या फिर उस लड़की - जो भी नाम आप दें, के मामले में भी जब सब्र टूटा तो जनता ने पहले सत्ता पर चूड़ियां और सिक्के ही फेंके थे। उनके नारों में अपने दर्द के भाव थे। आंसुओं से लबरेज कई चेहरे थे। कंपकपाती सर्दी में राजसत्ता को जगाने आए लोगों में अमानत के परिवार का एक भी सदस्य नहीं था बल्कि उसकी वजह से गली-मोहल्लों से निकल आए अपरिचित चेहरे खुद परिवार की तरह बन कर सामने आ गए। क्या आंदोलन में तीखेपन और भीगेपन का भान लगाने के लिए यही संकेत काफी नहीं थे।

बाद में जन और सत्ता के बीच जो विवाद चल रहा है, उस पर दोबारा लिखना मैं जरूरी नहीं समझती। हां, मीडिया पर तो कहना ही होगा। मीडिया पूरे साल आलोचनाओं का शिकार रही थी। इस निजी मीडिया ने अपने जन्म के बाद से साढ़े साती का ही काल देखा है लेकिन इसके बावजूद वह सक्रिय रहा है। टीआरपी, तिजोरी भरने की खुजली, हड़बड़ी भरे स्वभाव और खबर को बेखबर, पेड न्यूज के भंवर में दिखने के तमाम आरोपों के बीच इस घटना के दौराम मीडिया ने अपना फोकस खोया नहीं। सचिन की रिटारमेंट की खबर तक उसके डिगा नहीं पाई और वह जनता का हिमायती बनता दिखा। जन की भाषा बोलता, जन की तरह चोट खाता और जन की तरह हैरान।

इस बीच सर्वे होते गए। एक चैनल ने सर्वे करवाया जिसमें यह पाया गया कि दिल्ली की 95 प्रतिशत महिलाएं खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं। आयोगों की कथित सक्रियता और बेदम पड़ी वेबसाइट तक पर सवाल बने। कठोर कार्रवाई के अर्थ असल में क्या हों, उस पर बहसें हुईं पर ताज्जुब की बात यह कि इस सबके बावजूद दो बातें नहीं थमीं। एक, नेताओं की आपसी बयानबाजी (चाहे वह राष्ट्रपति के बेटे की टिप्पणी हो या फिर ममता बनर्जी पर दिया गया बयान) और दूसरे, बलात्कार। देश जब खौफ और रोष में था, तब भी अपराधी पहले की ही तरह सक्रिय थे।

कुल मिलाकर साल अपने पीछे गंभीर सवालों की पोटली छोड़कर गया है। राजाओं और आकाओं ने यह सवाल बड़े दिनों से कालीन के नीचे छिपा कर रख दिए थे। सवाल यह कि इस देश की औरत कुछ कहने में डरती क्यों है। भ्रूणहत्या, दहेज, घरेलू हिंसा और बलात्कार - क्या समय के साथ यह अपराध कम हुए। हम जहां थे, वहां से आगे हैं, या कहीं ठिठक कर आज भी नर्म छांव के पेड़ की तलाश कर रहे हैं।

इल बार गणतंत्र दिवस पर जन गण मन अधिनायक जय हे - कहते हुए जुबान में कंपन होगा। खुद के महिला होने पर कुछ और डर मन में आकर ठिठकेंगे और पुलिस पर विश्वास शायद सालों कायम न हो सकेगा।

ऐसे में प्रार्थना ही की जा सकती है। प्रार्थना यह कि अपराधों से घिरते समाज के बीच औरत अपने दम पर जी सके और मन से कह सके - थी.हूं..रहूंगी...

http://khabar.ibnlive.in.com/blogs/36/820.html

Nov 5, 2012

कुछ फिल्म, कुछ जिंदगी

तमाम फिल्मी गानों के बीच

रूमानियत प्रेम सद्भाव स्नेह ममता विछोह

हर गीत ने हर बार अपनी जिंदगी की फिल्म ही चला दी


आसान तो होता ही है किसी दूसरे की फिल्म को देखना

रात में खाना खाकर

पान के साथ उसे चबा जाना


किसी दूसरे के आंसू, बेचारगी, विद्रूपता, षड्यंत्र

सभी को

मजे से पचा लेना

और सिनेमा हाल की कुर्सी से हाथ पोंछ कर

बाहर निकल आना


पॉपकॉर्न के साथ हजम कर जाना

फिल्म में दिखता अपमान, चालाकी और धूर्तता

और अगली सुबह फिर अपने अंदर के अपराधी को जगाकर

सच को पूजा की थाली के नीचे छिपा

दफ्तर चले आना


फिर चाय के साथ पकौड़ों की तरह

बात कर लेना उस फिल्म पर

और अखबार में पढ़ी समीक्षा और उसमे टंके सितारों पर भी

जमा देना

अपनी एक छोटी सी टिप्पणी


पर दोस्त

जिंदगी फिल्म कहां होती है

और उसका अंत भी कहां होता है इतनी सहजता से


जिंदगी फिल्म की पहली रील भी नहीं

जिसमें सेंसर बोर्ड का ठप्पा लगा हो

और न ही वह विराम

जो पल भर के लिए बीच में चल आए कि

आप कर सकें फिर कुछ संवाद, मतलब- बेमतलब के

और हॉल में सिंदूर लगाए बैठी पत्नी के उस पार

गर्ल फ्रेंड से अगले मिलन की तारीख तय कर आएं


जिंदगी में कहां होती है 35 एमएम की रील

तीन घंटे की फिल्म के बाद

जब पुराने नेपकिन को फेंक आते हैं

उस डस्टबिन में

तो जिंदगी के बाकी बचे अंश

फिल्म के किसी दरकते हिस्से के साथ चिपके हुए

साथ आते तो जरूर हैं

पर कार की खुली खिड़की,

मन के बंद दरवाजों

और बुने जाते सतत फंदों के बीच

वो सारा धुंआ कहीं उड़ जाता है


मन के पंछी को रोक कर

और नकली संवादों को डस्टर से मिटा कर

कभी अपनी जिंदगी पर

एक सच्ची फिल्म बना कर देखा है क्या


बस, वही एक फिल्म होगी

जो ब्लॉकबस्टर होगी

इस ख्याल को

लॉक किया जाए क्या
श्रद्धांजलि
श्रद्धांजलियां सच नहीं होतीं हमेशा
जैसे जिंदगी नहीं होती पूरी सच
तस्वीर के साथ
समय तारीख उम्र पता
यह तो सरकारी सुबूत होते ही हैं
पर
यह कौन लिखे कि
मरने वाली
मरी
या
मारी गई
श्रद्धांजलि में फिर
श्रद्धा किसकी, कैसे, कहां
पूरा जीवन वृतांत
एक सजे-सजाए घेरे में?
यात्रा के फरेब
षड्यंत्र
पठार
श्रद्धांजलि नहीं कहती
वो अखबार की नियमित घोषणा होती है
एक इश्तिहार
जिंदगी का एक बिंदु
अफसोस
श्रद्धांजलि जिसकी होती है
वो उसका लेखक नहीं होता
इसलिए श्रद्धांजलि कभी भी पूर्ण होती नहीं
सच, न तो जिंदगी होती है पूरी
न श्रद्धांजलि
बेहतर है
जीना बिना किसी उम्मीद के
और फिर मरना भी
परिभाषित करना खुद को जब भी समय हो
और शीशे में अपने अक्स को
खुद ही पोंछ लेना
किसी ऐतिहासिक रूमाल से
प्रूफ की गलतियों, हड़बड़ियों, आंदोलनों, राजनेताओं की घमाघम के बीच
बेहतर है
खुद ही लिख जाना
अपनी एक अदद श्रद्धांजलि