Jan 20, 2012
बैगपाइपर पत्रकारिता के बीच
Jan 15, 2012
Jan 14, 2012
Jan 1, 2012
अधूरी कविता
देवदारों में चलते हुए
ये पांव
झाड़ियों के बीच में से राह बना लेते हैं
गर
भरोसा हो
सुबह के होने का
सांसों में हो कोई स्मृति चिन्ह
मन में संस्कार
और उम्मीदों की चिड़िया
जिंदा है अगर
तो जहाज के पंछी को
खूंटे में कौन टांग सकता है भला
Dec 10, 2011
ठगिनी माया
अपने से
पराये से
किसी पराये अपने से
बीचों बीच रौशनी के बुझने
सुरंग के लंबे खिंच जाने
मायूसी की लंबी लकीर के बीच
ठगे जाने के मुहावरे हमेशा पुराने होते हैं
लेकिन ठगा गया इंसान नया
और उससे निकला सबक भी
Dec 6, 2011
औरत
Nov 9, 2011
तीन बहनें
फिल्म 6 घंटे के घटनाक्रम पर चलती है कि कैसे तीनों बहनों कई उलझनों से जूझती हैं और एक मोड़ पर तो आत्महत्या करने का इरादा ही त्याग देती हैं। लेकिन सामाजिक दबाव, डर और खुद में आत्मविश्वास की गहरी कमी उन्हें जीने नहीं देती। वह यह तो जानती हैं कि बेटी का बाप होना कठिन होता है पर यह भी कहती हैं कि यह मुश्किल बेटी होने से बड़ी नहीं। दहेज की वजह से शादी न हो पाने का दंश आखिर में उनकी बलि चढ़ा ही देता है। पर मरते-मरते भी लड़कियां अपनी जिम्मेदारियां पूरी करके ही जाती हैं। वे बर्तन साफ करती हैं, कपड़े धोती हैं और फिर अपना आखिरी खत लिखती हैं।
और उसके बाद मर ही गईं तीनों बहनें। पीछे छूट गए उनके मां-बाप और दो भाई। भाई जो परिवार की शायद पहली प्राथमिकता थे और आखिरी भी।
88 से आज के भारत ने एक लंबा सफर तय कर लिया है। आप कह सकते हैं हदेज तो अब बीते समय की बात हो वाला है पर ऐसा नहीं है, न ही ऐसा हो सकता है। दहेज लेने के तरीके और लड़की को मारकर बचने के अंदाज अब बदल गए हैं पर मूल समस्या नहीं। समाज आज भी साथ नहीं देता। समाज सुनता है, देखता है पर जुटता मौत के अगले दिन ही है।
दिल्ली में कुंदन शाह की इस फिल्म की विशेष स्क्रीनिंक के समय फिल्म के प्रमुख सहयोगी शेखर हट्टंगड़ी मौजूद थे। फिल्म के एक दृश्य में जब तीनों में से एक बहन कहती है कि बरसों से इस घर का मौसम नहीं बदला है तो लगता है कि जैसे बरसों से हिंदुस्तान का मौसम भी नहीं बदला है।
इन तीन बहनों के दो भाई थे। घटना के समय मां-बाप उन दोनों के साथ कानपुर से बाहर एक शादी में शरीक होने गए थे। वे जब लौटे होंगे तो अपनी तीनों बेटियों को फंदे पर लटका हुआ पाकर बहुत रोये होंगे। वो परिवार आज भी कानपुर में रहता है। भाइयों की शादी हो गई होगी। मां-बाप जाने किस हाल में होंगे पर इतना जरूर है कि वे शायद आज भी इस बात से अज्ञान होंगे कि उस आत्महत्या ने देश की कमजोर पड़ती नींव पर कैसे प्रहार किया था। दहेज शादी के रास्ते में एक रूकावट हो सकती है जिसे छिटका जा सकता है पर जिंदगी को छिटकना क्या जरूरी है।।।।
हिंदुस्तानी लड़कियों के लिए मौसम आज भी पूरी तरह से नहीं बदला है पर एक बात जरूर बदली है। लड़कियों की हिम्मत बदली है, कोशिश करने का जज्बा बदला है, सोच बदली है। वे मरने से पहले भी संघर्ष की एक आखिरी कोशिश करने लगी हैं। शादी का एक कमसिन उम्र में होना कोई अनिवार्यता नहीं रहा बल्कि शादी का होना भी अब कोई अनिवार्य बात नहीं। एक संस्था के रूप में शादी को लेकर सोच का दायरा काफी वृहद हुआ है। शादी अब जिंदगी का हिस्सा है पर उसे आक्सीजन मानने वाले अब कम ही हैं। शादी को लेकर मान्यताओं और सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। कानून भी पहले के मुकाबले थोड़ा मजबूत ही हुआ है।
बहरहाल, इस वजह से फिल्म एक पुराने ढर्रे पर बनी जरूर लगी, खास तौर पर 2011 के इस दौर में। पर तब भी यह जरूर है कि सिनेमा के तौर पर फिल्म ने सच की परतों को उधेड़ा।
हां, ऐसी फिल्में आंखें को नम कर जाती हैं लेकिन कई बार आत्मा को भी। जिस देश का मौसम बरसों एक जैसा रहा हो, वहां फिल्म, साहित्य, कला मौसम के रूख को बदलने के लिए कुछ हद तक मजबूर भी कर सकता है। इन समस्याओं का हल सरकारी नहीं, सामाजिक ही हो सकता है। आपसी समझ और साथ के बिना कुछ संभव नहीं। इस सुरंग में रौशनी उसी छोर से आ सकती है।
Oct 26, 2011
इस बार की दीवाली
Oct 17, 2011
Sep 28, 2011
नमस्ते फेसबुक
क्या सचमुच फेसबुक ने लोगों को जोड़ा है
प्रिय फेसबुक,
बुरा न मानना। अब कुछ दिनों तक तुमसे एक दूरी बनाने की सोची है। एक हफ्ते में दो घटनाएं हुईं-तुम्हारी वजह से। पहले तो बंगलौर की 23 साल की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली। यह लड़की आईआईएम की विद्यार्थी थी और इस बात से आहत हो गई थी कि उसके पुरूष मित्र ने उससे संबंध तोड़ कर सारी कहानी को फेसबुक पर डाल दिया था। मालिनी मुरमू का इस घटना से ऐसा दिल टूटा कि उसने खुद को फंदा लगा लिया। इस तरह से एक चमकता सितारा महज एक सोशल नेटवर्किंग साइट की वजह से अस्त हो गया।
दूसरी घटना पटना विधानसभा से आई। यहां दो लोगों को निलंबित कर दिया गया। उनका गुनाह यह था कि उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपने ही राज्य के मुख्यमंत्री पर कुछ तीखी टिप्पणियां कर दीं थीं और विभाग के भ्रष्टाचार पर अपने कमेंट जारी कर दिए थे। आखिरकार यह भारत है भाई। वे भूल गए कि यहां पर राजनेता कुछ भी कर सकते हैं लेकिन सरकारी कर्मचारी की कई हदें हैं, कई सरहदें।
इससे पहले भी एक के बाद एक बहुत कुछ ऐसा हुआ जब लगा कि फेसबुक भूले-बिछुड़े नातों को जोड़ तो रहा है लेकिन यहां की गर्माहट कई बार ठंडेपन और फिर आहत करने के स्तर पर उतर आती है। अमरीका में ही 2007 में स्टीफेनी पेंटर जब फेसबुक की वजह से अपने प्रिय दोस्त को खुद से दूर होते देखती हैं तो एक रात वो फेसबुक के अपने 121 दोस्तों को विदाई का मैसेज भेजती हैं और अपनी जिंदगी का अंत कर लेती हैं। उनके दोस्त को उनके 121 दोस्तों में से कई लोगों से एक असुरक्षा का भाव महसूस होता है और जब यह निजी संबंधों को टूटन और बेहद तनाव की तरफ खींचने लगता है तो वे त को गले लगा लेती हैं।
वैसे कहने को तो फेसबुक अकाउंट पर अनगिनत दोस्त बनाए जा सकते हैं लेकिन क्या वे वाकई में दोस्त और हमदर्द हैं,
यह अपने आप में एक सवाल है। अमरीका में ही एक महिला जब अपने फेसबुक वॉल पर लिखती है कि वह अपनी जिंदगी से तंग आ गई है और कुछ ही देर में आत्महत्या करने वाली है तो लोग उस स्टेट्स को लाइक तो कर देते हैं पर एक भी शख्स, यहां तक कि पड़ोसी भी, उसे संबल देने नहीं जाता। वह महिला कुछ देर बाद वाकई आत्महत्या कर लेती है और फेसबुक से उसका जुड़ा पड़ोसी सोसायटी में पुलिस को आते देखता है तो उसे स्टेट्स में लिखे शब्दों का यथार्थ पता चलता है।
यह है फेसबुक। बेशक इस समय फेसबुक अपने उफान पर है। आधुनिक युवा सामाजिक संपर्कों के नाम पर इस पर सबसे ज्यादा समय खर्च करने लगा है। भले ही अमरीका भी जोर-शोर से तुम्हें पूरी तरह से सफल और क्रांतिकारी कह रहा हो और नई पीढ़ी के लिए तुम अलादीन का चिराग बन गए हो, लेकिन दोस्त, कहीं ठहर कर कुछ सोचने की जरूरत भी है।
नहीं,
कहने का यह मतलब कतई नहीं कि तुम सिर्फ परेशानियों का पिटारा लेकर आए हो या फिर तमाम त्रासदियों के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। मैं जानती हूं तुमने सोशल नेटवर्किंग का एक बड़ा सुनहला दरवाजा खोला है। यहां पल भर में पूरी दुनिया से जुड़ा जा सकता है। यह संपर्कों की तिजोरी को खोलता है और कई मामलों में जादुई भी है। तुम्हारी वजह से कई पुरानी गलियां गलबहियां डाल रही हैं। लंगोटिया यार सालों बाद एक-दूसरे के दिलों के करीब आ रहे हैं। दुनिया पूरी तरह से जैसे एक मुट्ठी में समा गयी है। हां, माउस के एक क्लिक से इंसान दुनिया के किसी भी छोर तक जा पहुंचता है।तुमने आवाज और दृश्य की गति को कई कल्पना से भी आगे ले जाकर बढ़ा दिया है। इसके लिए निश्चित तौर पर तुम बधाई के पात्र हो।
शायद तुम सीधे तौर पर इसके लिए जिम्मेदार न हो क्योंकि तुम शायद आए किसी सकारात्मक मकसद से ही थे लेकिन जैसा कि हर तकनीक के साथ होता है, यहां भी तकनीक कई काले साये साथ लेकर चली आई है।
हां, तो मैनें महसूस किया कि तुम एक उस दौर में पनपे हो जब मीडिया का दखल तो खूब है लेकिन मीडिया की साक्षरता अब भी नदारद। इसलिए तुमने जिस खुले मंच को एकाएक महैया करा दिया है, वह चुंधियाती रौशनी के साथ आया है। यह मंच हैरान करता है। हाथ के संपर्क में की बोर्ड होता है और सामने होता है –एक खुला आकाश – एक गलतफहमी देता हुआ कि यहां कभी भी, कुछ भी कहा जा सकता है। एक अड्डा जहां कुछ भी कहा-लिखा-पोस्ट किया जा सके। अपनी भड़ास निकाली जा सकती है, संबंधों को उधेड़ा, निचोड़ा और फायदेमंद बनाया जा सके।एक –दूसरे की फ्रेंड लिस्ट में झांकते लोग उस पड़ोसी से भी बदतर हो जाते हैं कई बार जिन्हें दीवारों से कान लगाकर बात सुनने की आदत होती है। यह एक ऐसा मंच बन गया है जहां कोई रोक नहीं। कोई बंदिश और कोई सजा नहीं। यहां बहुत कुछ किसी मतलब से शुरू होता है और उसी पर खत्म भी होता है।
मुझे लगने लगा है कि नेटवर्किंग के बहाने तुम्हारा मंच कई चालाकियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा है। यह रिश्तों की एक कच्ची जमीन है। माउस के एक क्लिक से लोग फ्रेंड बनते हैं, फिर अन-फ्रेंड भी होते हैं। फिर भी कोई किसी का नहीं। कंधों का सहारा ढूंढते कि जाने कौन काम आ जाए। हां, जब संवेदनाएं, खुशियां या सच बंटते हैं, सुकून मिलता है। पर ऐसा कम होता है। इस पिलपिली और स्वार्थी जमीन पर अब मैं रोज नहीं आउंगी। यह मैने तय किया है। ऐसी ही कई वजहें रही होंगी कि पिछले कुछ महीनों में कई लोगों ने अपने फेसअकाउंट बंद कर दिए। पर मैं ऐसा नहीं कर रही। मैं सिर्फ कुछ दूरी से अब तुम्हारी रफ्तार को देखना और समझना चाहती हूं।
वैसे यह भी लगता है कि मौजूदा पोस्ट-मॉर्डन सोसायटी यह मौका तो देती ही है कि आजाद हस्तक्षेप किया जा सके। इसलिए इस टिप्पणी को सकारात्मक रूप से लेना।
हां, फिलहाल मैं कुछ समय के लिए तुमसे दूर जा रही हूं।
एक फेसबुक यूजर
वर्तिका नन्दा
(एक छोटा अंश 28 सितंबर, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित)


