Jun 30, 2012

Kuch Metha Ho Jaye Episode Part 3 2

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इंटरनेट पर सेंसरशिप और ऑनलाइन मीडिया के भविष्य पर बड़ी बहस

(प्रवासी दुनिया)
मीडिया से जुड़े लोगों ने ऑनलाइन मीडिया को नियंत्रित करने के सरकार के प्रयास की आलोचना की और आगाह किया कि जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए. नोएडा में बुधवार 27 जून को आयोजित ‘एस पी सिंह स्मृति समारोह 2012’ में मौजूद मीडिया के तमाम लोगों ने सरकार के ऐसे किसी भी प्रयास का विरोध किया.

मीडिया खबर डॉट कॉम की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में ‘इंटरनेट सेंसरशिप और ऑनलाइन मीडिया का भविष्य’ विषय पर चर्चा हुई. कार्यक्रम में आनलाइन मीडिया पर नकेल कसने के सरकार के प्रयासों की निंदा की गई. केंद्र सरकार की ओर से सोशल साइटों को सोनिया गांधी के खिलाफ की गई एक टिप्पणी को हटाने के लिए कहना और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से उनके कार्टून प्रसारित करने वाले एक प्रोफेसर को गिरफ्तार किये जाने पर चिंता व्यक्त की गयी.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की पूर्व एडिटर सलमा जैदी ने कहा कि सेंसरशिप की बात तो ठीक है लेकिन एक इंटरनेट वॉच होना चाहिए.

‘इंटरनेट सेंसरशिप और आनलाइन मीडिया का भविष्य’ विषय पर वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक ने कहा कि ऑनलाइन मीडिया ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को प्लेटफॉर्म दिया है. इंटरनेट पर सेंसरशिप के सवाल पर कार्णिक का कहना था कि ‘बांध नदियों पर बनते हैं, समुद्र पर नही’. आज इंटरनेट एक समुद्र की तरह हो गया है जिस पर किसी प्रकार का सेंसरशिप लगाना अतार्किक और अव्यवहारिक है.

इंटरनेट सेंसरशिप के खिलाफ काम कर रही जर्मनी की कोवैक्स ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सोशल एक्सपेटेंस भारत में ज्यादा है ? भारत में बहुत सारे अंतर्राष्ट्रीय प्रावधान पहले से ही भारतीय संविधान में डाले गए गए हैं. जब हम सेंसेरशिप की बात करते हैं तो सिर्फ मीडिया सेंसरशिप की बात नहीं कर रहे हैं, इसके अलावे भी हमें बाकी चीजों पर बात करनी होगी. हमारी बात कहने की कोई जगह नहीं है. मेरा स्पेस नहीं है, लेस प्रोटेक्टेड. ऐसा नही है कि कोई रिस्ट्रिक्शन नहीं होनी चाहिए, लेकिन लेजिटिमेसी की बात है.

दिल्ली यूनिवर्सटी के लेडी श्रीराम कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ वर्तिका नंदा का इंटरनेट पर सेंसरशिप के बारे में कहना था कि अगर सेंसरशिप का मतलब गला घोटना है तो मैं इसका समर्थन नहीं करती, अगर इसका मतलब एक लक्ष्मण रेखा है जो बताता है कि हर चीज की एक सीमा होती है तो ये गलत नहीं है.

न्यूज़ एक्सप्रेस के प्रमुख मुकेश कुमार ने कहा कि मैं ऑनलाइन और सेंसरशिप की बात को आइसोलेशन में नहीं देखना चाहता. मुझे लगता है कि ये सेंशरशिप माहौल में लगायी जा रही है. सेंसरशिप के और जो फार्म है उस पर भी बात होनी चाहिए. मैं तो देख रहा हूं कि नितिश कुमार भी एक अघोषित सेंशरशिप लगा रहे हैं. एक कंट्रोल मार्केट सेंसरशिप लगायी जा रही है.बाजार सरकार को नियंत्रित और संचालित किया जा रहा है, बाजार का जो सेंसरशिप है, उस पर भी लगाम लगाया जाना चाहिए.

वहीं छत्तीसगढ़ न्यायालय के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन साहब ने ऑनलाइन मीडिया की तारीफ़ करते हुए कहा कि ऑनलाइन ने जो सबसे अच्छी बात की है वो ये कि आईना सामने रख दिया. सच बात मान लीजिए,चेहरे पर धूल, इल्जाम आईने पर लगाना भूल है. हमसे बाद की पीढ़ी ज्यादा जानती है क्योंकि सोशल मीडिया ने ऐसा किया है.

महुआ ग्रुप के ग्रुप एडिटर राणा यशवंत ने इंटरनेट के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज इंटरनेट बहुत जरूरी हो गया है और इसपर किसी भी तरह का सेंसर समाज के लिए ठीक नहीं. वैसे सरकार की मंशा ऐसी रही है. यह लोकतंत्र के बुनियादी अधिकार पर रोक लगाने जैसा है.

इस कार्यक्रम में बीबीसी हिंदी.कॉम की पूर्व एडिटर सलमा जैदी, वेबदुनिया के एडिटर जयदीप कार्णिक, मीडिया विश्लेषक डॉ.वर्तिका नंदा, न्यूज़ एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार, महुआ न्यूज़ के ग्रुप एडिटर यशवंत राणा, जर्मनी की कोवैक्स, वेबदुनिया के जयदीप कार्णिक, छत्तीसगढ़ के पूर्व चीफ जस्टिस फखरुद्दीन और इन.कॉम (हिंदी) के संपादक निमिष कुमार शामिल हुए जबकि मंच संचालन युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार ने किया.

बाहरी लिंक - http://www.pravasiduniya.com/internet-censorship-and-the-debate-on-the-future-of-online-media

Jun 29, 2012

‘20 मिनट का प्रोडक्ट लेकर आया खबरों में क्रांति’

द संडे इंडियन (पत्रिका)

आज तक के संस्थापक रहे सुरेंद्र प्रताप सिंह खबरों के क्षेत्र में क्रांति लेकर आए. दूरदर्शन पर आने वाला सिंह का कार्यक्रम 'आज तक' ने खबरों के संसार में कई मानक स्थापित किए. सिंह के साथ काम कर चुकी जी न्यूज की एंकर अल्का सक्सेना के मुताबिक आज बाजार बेशक हावी हो पर ये कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता कि हम वहीं दिखा रहे हैं जो कि पाठक देखना चाहते हैं. आज बाजार के इस दौर में जितनी गुंजाइश है उसमें बेहतर करने की कोशिश की जानी चाहिए. अल्का ये बातें मीडियाखबर डॉट कॉम एवं सेंटर फॉर सिविल इनिशिएटीव की पहल पर नोएडा के मारवाह स्टूडियों में आयोजित एस.पी. सिंह स्मृति समारोह 2012 के दौरान बोल रही थी.


कार्यक्रम में एस. पी. सिंह के बाद टेलीविजनविषय पर आईबीएन सेवन के मैनेजिंग एडिटर आशुतोष का कहना था कि पिछले दो ढ़ाई सालों में देखे तो टेलीविजन ने अभूतपूर्व काम किया है और आज एस. पी. होते तो जरुर इसकी सराहना करते. सिंह के साथ काम कर चुके आज तक के पूर्व प्रमुख कमर वहीद नकवी ने कार्यक्रम के दौरान कहा कि पहले का दर्शक खबरों को सिर्फ रिसीव करता था, पर अब ऐसा नहीं है आज के दर्शक का पत्रकारिता में दखल बढ़ गया है.

इससे पहले सत्र में इंटरनेट सेंसरशिप और आनलाइन मीडिया का भविष्यविषय पर वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक ने कहा कि ऑनलाइन मीडिया ने व्यक्तिगत अभिव्यक्ति को प्लेटफॉर्म दिया है. इंटरनेट पर सेंसरशिप के सवाल पर कार्णिक का कहना था कि बांध नदियों पर बनते हैं, समुद्र पर नही’. आज इंटरनेट एक समुद्र की तरह हो गया है जिस पर किसी प्रकार का सेंसरशिप लगाना अतार्किक और अव्यवहारिक है.

दिल्ली यूनिवर्सटी के लेडी श्रीराम कॉलेज की विभागाध्यक्ष डॉ वर्तिका नंदा का इंटरनेट पर सेंसरशिप के बारे में कहना था कि अगर सेंसरशिप का मतलब गला घोटना है तो मैं इसका समर्थन नहीं करती, अगर इसका मतलब एक लक्ष्मण रेखा है जो बताता है कि हर चीज की एक सीमा होती है तो ये गलत नहीं है.

कार्यक्रम में, इसके अलावा दीपक चौरसिया, पुण्य प्रसून वाजपेयी, राहुल देव, मुकेश कुमार, राणा यशवंत जैसी मीडिया हस्तियों ने शिरकत की.

बाहरी लिंक- http://www.thesundayindian.com/hi/story/20-minutes-product-was-a-revolution-in-news/11/16890/

ऑनलाइन मीडिया पर नियंत्रण की निंदा

नोएडा, एजेंसी

मीडिया से जुड़े लोगों ने ऑनलाइन मीडिया को नियंत्रित करने के सरकार के प्रयास की आलोचना करते हुए आगाह किया कि जल्दबाजी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए।

नोएडा में बुधवार को आयोजित चौथे एसपी सिंह स्मृति व्याख्यान 2012 में मौजूद मीडिया के तमाम लोगों सरकार के ऐसे प्रयासों की मुखालिफत की। मीडिया खबर और सेंटर फॉर सिविल इनीशिएटिव की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में इंटरनेट सेंसरशिप एंड डेंजर्स ऑफ ऑनलाइन मीडिया विषय पर चर्चा हुई।

कार्यक्रम में आनलाइन मीडिया पर नकेल कसने के सरकार के कई प्रयासों की निंदा की गई। इन मामलों में केंद्र सरकार की ओर से सोशल साइटों को सोनिया गांधी के खिलाफ की गई एक टिप्पणी को हटाने के लिए कहना और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से उनके कार्टून प्रसारित करने वाले एक प्रोफेसर को गिरफ्तार किया जाना शामिल है।

इस कार्यक्रम में बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम की पूर्व संपादक सलमा जैदी, डॉ वर्तिका नंदा, न्यूज एक्सप्रेस के मुख्य संपादक मुकेश कुमार, महुआ न्यूज के समूह प्रमुख राणा यशवंत, वेब दुनिया के संपादक जयदीप कार्णिक समेत मीडिया से जुड़े कई वरिष्ठ लोगों ने अपने विचार रखे।

इस खबर को हिन्दुस्तान टाइम्स / सहारा समय के वेबसाइट पर पढ़ने के लिए क्लिक करें.


Jun 26, 2012

S.P. Singh Smriti Samaroh, 2012




मीडिया की सीमाएं और चुनौतियां

प्रियदर्शन

अण्णा हज़ारे के अनशन और आंदोलन के दौरान मीडिया की भूमिका पर कई तरह से सवाल उठे। एक बड़े तबके ने राय जताई कि मीडिया की वजह से यह आंदोलन इतना बड़ा दिखने लगा। दिल्लीया देश के दूसरे हिस्सों में कुछ हज़ार लोगों के प्रदर्शन को मीडिया ने इस तरह पेशकिया जैसे सारा देश इस आंदोलन के साथ हो। दूसरा इल्ज़ाम यह लगा कि मीडिया ने आंदोलन को सिर्फ दिखाया नहीं, बिल्कुल आंदोलन के साथ चलने लगा। वह भी टीम अण्णा का हिस्सा हो गया और अण्णा इज़ इंडिया के नारे लगाने लगा। केंद्र सरकार ने बाकायदा यह शिकायत की कि मीडिया ने इस पूरे आंदोलन के दौरान बस एक पक्ष- टीम अण्णा- की राय दिखाई, दूसरे यानी सरकारी पक्ष को बिल्कुल उपेक्षित किया। एक चौथी और अल्पमत जैसी राय यह भी थी कि आंदोलन जितना बड़ा था, वह तो मीडिया में समाया ही नहीं। मीडिया उसे कुछ शहरों और प्रदर्शनों तक सीमित करके रह गया, जबकि भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो आम और व्यापक गुस्सा है, उसकी तरह-तरह की अभिव्यक्तियां दरकिनार कर दी गईं।

एक बड़ी घटना को लेकर मीडिया के बारे में ये तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं क्या बताती हैं? यही कि सिर्फ मीडिया ही चीज़ों की ख़ुर्दबीनी शिनाख्त में जुटा नहीं रहता, उसकी भी ख़ुर्दबीनी शिनाख़्त लगातार चलती रहती है। जब आप दूसरों के बारे में 24 घंटे जानकारी देते हैं तो इसका एक मतलब यह भी होता है कि आप भी 24 घंटे दूसरों की नज़र में रहते हैं। शायद यह भी वजह है कि मीडिया जितने अतिरेकी छोरों तक जाकर ख़बरों से खिलवाड़ करता है उतने ही अतिरेकी छोरों से खुद मीडिया का विश्लेषण होता रहता है। अक्सर यह बात बड़े सपाट और निष्ठुर ढंग से कह दी जाती है कि 24 घंटे के समाचार चैनलों में समाचार सबसे कम होता है, तमाशा सबसे ज़्यादा। दूसरा आरोप यह लगाया जाता है कि वह संजीदा से संजीदा मसलों का ट्रिवियलाइज़ेशन, यानी क्षुद्रीकरण कर डालता है।

निश्चय ही ये दोनों आरोप बहुत दूर तक सच हैं। 24 घंटे के समाचार चैनलों में ज्योतिष, भूत-प्रेत, सेक्स-अपराध और नकली किस्म की सनसनी इतनी ज़्यादा होती है कि इन सबको देखते हुए कोफ़्त सी होने लगती है। यह कोफ़्त इस तथ्य से कुछ और बढ़ जाती है कि ऐसे सतही और फूहड़ कार्यक्रमों को दर्शक मिल जाते हैं- कम से कम टीआरपी के मीटर यही बताते हैं। यह ठीक है कि ये टीआरपी मीटर पूरे देश की राय नहीं बताते या दर्शक संख्या के बारे में भी बिल्कुल सटीक जानकारी नहीं देते, क्योंकि ख़ुद उनकी तादाद बहुत कम है, लेकिन इसके बावजूद उनसे चलन का तो पता चलता ही है। और दूसरी बात यह कि जब तक हमारे पास दर्शक संख्या मापने के दूसरे पैमाने नहीं हैं, टीआरपी मीटर ही इकलौती कसौटी है जिस पर पहले विज्ञापनदाता और फिर साथ-साथ टीवी चैनल यकीन करने को मजबूर होते हैं। बहरहाल, मजबूरी जो भी हो, टीवी चैनल इन दिनों खबरों के अलावा काफी कुछ परोसते हैं और काफी बुरे ढंग से परोसते हैं, इस बात से किसी को इनकार नहीं हो सकता।

चैनलों पर दूसरा आरोप भी बिल्कुल वाजिब है। वे संजीदा खबर भी लेते हैं तो संजीदगी से नहीं। अक्सर खबरों में जितनी कम सूचनाएं होती हैं, उससे कम सरोकार होते हैं। यहां तक कि टीवी के प्राइम टाइम पर चलने वाली बहसों में भी पर्याप्त तैयारी का अभाव बहुत साफ दिखता है जिसका सीधा असर सूचना और विश्लेषण दोनों स्तरों पर पड़ता है। ऐंकर अक्सर किसी बहस को सपाट दो हिस्सों में बांटकर, उसके दोनों पक्षों को आमने-सामने लाकर टकराव की स्थिति पैदा कर संतुष्ट हो लेते हैं। दर्शकों को बहुत कम सूचनाएं मिलती हैं और कई बार गलतफ़हमी पैदा करने वाले नतीजे मिलते हैं।

लेकिन ये सारी आलोचनाएं जितनी वैध हैं, उतनी ही इकहरी भी। सच तो यह है कि अपने सारे सतहीपन और स्थूलता के बावजूद 24 घंटे के समाचार चैनलों ने ख़बर का पीछा करने में अपने पूर्ववर्ती माध्यमों और पत्रकारों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रफ़्तार दिखाई है और जीवट भी। कायदे से देखें तो मीडिया के सारे तमाशे वहीं तक चलते हैं जहां तक उसके पास कोई बड़ी ख़बर नहीं होती। जैसे ख़बर पहुंचती है, वह ख़बर के पीछे लग लेता है। पुलिस अगर रात को 2 बजे रामदेव के धरने पर कार्रवाई करती है तो इसकी गवाही दर्ज करने के लिए टीवी कैमरे मौजूद रहते हैं। अगर अण्णा हजारे की गिरफ्तारी का अंदेशा होता है तो कोई रिपोर्टर पूरी रात उस फ्लैट के बाहर जागता खड़ा रह सकता है, जहां अण्णा हज़ारे टिके हुए हैं। ऐसा नहीं कि यह सिर्फ आधी रात के सनसनीखेज घटनाक्रम कवर करने का मामला हो, राजनीति और समाज से जुड़ी बाकी ख़बरों का भी मीडिया इसी रफ़्तार और जीवट के साथ पीछा करता है।

मिसाल के तौर पर चुनावी राजनीति जितनी अख़बारों में दिखाई पड़ती है, उससे कहीं ज़्यादा टीवी चैनलों पर। चुनाव के वक़्त बिल्कुल स्पॉट पर की जाने वाली रिपोर्टिंग से लेकर स्टूडियो में की जाने वाली चर्चा तक चुनाव ही केंद्रीय हुआ करते हैं। इस सक्रियता का आलम यह है कि एक दौर में लगभग सभी टीवी चैनल चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से लेकर एग्ज़िट पोल तक किया करते थे और नौबत ये आई कि चुनाव आयोग को चुनाव ख़त्म होने तक ऐसे सर्वेक्षणों पर पाबंदी लगानी पड़ी क्योंकि इससे जनमत के प्रभावित होने का ख़तरा था। अगर संजीदा ख़बर को टीवी चैनल संजीदगी से नहीं ले रहे होते तो चुनाव आयोग को ऐसी पाबंदी क्यों लगानी पड़ती?

ऐसी मिसालें और भी हैं। अण्णा हजारे का अनशन शुरू हुआ तो बाकी सितारे पीछे छूट गए। कौन बनेगा करोड़पति का नया संस्करण लेकर आए अमिताभ बच्चन ने पाया कि उन्हें देखने वाले कम हो गए। उस दौर में फिल्मी खबरें भी कम चलीं। टीवी चैनलों पर अण्णा का अनशन सबसे बड़ी खबर बना रहा। इसके पहले बिहार की कोसी नदी में आई बाढ़ पर मीडिया की सक्रियता की वजह से कई ज़रूरतमंदों को वक़्त पर राहत पहुंच सकी।

कुल मिलाकर देखें तो इस दौर में सूचनाओं का जो लोकतांत्रिकीकरण हुआ है, उसमें 24 घंटे के समाचार चैनलों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अब राजनीति की एक-एक ख़बर पर मीडिया की नज़र रहती है, नेता की एक-एक हरक़त को कैमरा पकड़ता चलता है। केरल से लेकर जम्मू कश्मीर तक मुख्यमंत्रियों के बयान हलचल मचाते हैं, येदियुरप्पा से लेकर नीतीश कुमार तक से जुड़े सारे विवाद मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंच जाते हैं। सच तो यह है कि इस दौर में चले कई सामाजिक अभियानों को मीडिया के समर्थन ने एक मुकाम तक पहुंचाया है। जेसिका लाल औरप्रियदर्शनी मट्टू जैसी लड़कियों के इंसाफ़ की लड़ाई कायदे से मीडिया की मदद से जीती जा सकी। चंडीगढ़ की रुचिका के हिस्से का भी जो आधा-अधूरा इंसाफ मिल सका है, उसमें मीडिया की भूमिका नहीं भुलाई जा सकती।

हालांकि इन सारी बातों की तरफ ध्यान खींचने का मकसद यह साबित करना नहीं है कि मीडिया जो कुछ कर रहा है, वह अच्छा है और उसकी आलोचना गलत है। सच तो यह है कि सूचना के एक पेशेवर माध्यम के तौर पर मीडिया की भूमिका जितनी महत्त्वपूर्ण है, उसमें किसी सतहीपन या चूक की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात यह कि इस मीडिया का सम्यक मूल्यांकन करेंगे तो कहीं ज़्यादा साफ ढंग से उस विद्रूप को समझ सकेंगे जो सूचना की इस क्रांति के दौर में सूचना के एक महत्त्वूर्ण कारोबार में घटित हो रहा है।

सच्चाई यह है कि मीडिया का असली ख़तरा वह नहीं है जो वह नासमझी में कर रहा है, असली ख़तरा वह है जो वह सयानेपन से कर रहा है। इसमें शक नहीं कि मीडिया का वर्ग चरित्र बदल गया है। अगर ऐतिहासिक संदर्भों में इस बात को समझने की कोशिश करें तो 1991 में उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू होने के बाद का मीडिया मूलतः बड़ी पूंजी के खेल में बदलता चला गया है। उदारीकरण के जरिए अचानक भारत में आई विशाल पूंजी ने अखबारों को उनका नया अर्थशास्त्र समझाया और अखबार रातों-रात पाठकों के लिए नहीं, विज्ञापनदाताओं के लिए निकलने लगे। देश में सबसे बड़ी हैसियत का दावा करने वाले एक अंग्रेज़ी अखबार ने बेहिचक ख़ुद को ब्रांड और प्रोडक्ट बताया। यह दरअसल धंधे की नई समझ थी, जिसमें संपादक की जगह पीछे छूटती चली गई और बाज़ार के मंत्र जपते, उसकी नई शर्तों से लैस मार्केटिंग और ऐड मैनेजर अखबार की नीतियां तय करने लगे।

ठीक यही प्रवृत्ति इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में बड़ी तेजी से विकसित हुए इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों में लक्ष्य की जा सकती है- इस फर्क के साथ कि अखबार में जो फूहड़ता सिर्फ लिखित शब्दों तक सीमित थी और एक पढ़े-लिखे वर्ग तक ही पहुंचती थी, टेलीविजन में वह बिल्कुल दृश्यगत हो गई और चालू मुंबइया फिल्मों की तर्ज और उनके तर्क पर ही दर्शकों को वह परोसने लगी, जो वे चाहते और मांगते हैं।

लेकिन फिर दुहराने की ज़रूरत है कि मीडिया का असली ख़तरा इस तमाशे से नहीं, उस संजीदगी से निकलता है जो वह ख़बरों के नाम पर बेचता है। तमाशा तो फिर भी समझ में आ जाता है, आप चाहें तो रिमोट कंट्रोल से चैनल बदल कर कोई दूसरा बड़ा तमाशा देखने लग सकते हैं, लेकिन जब वह संजीदगी से ख़बर दे रहा होता है तब किन हाथों में खेल रहा होता है, यह देखने की ज़रूरत है।

इस लिहाज से कुछ बातें साफ़ लक्ष्य की जा सकती हैं। समाचार चैनलों का यह संसार मूलतः दिल्ली, मुंबई और कुछ बड़े शहरों को समर्पित है। सिर्फ इसलिए नहीं कि इन शहरों में टीआरपी मीटर ज़्यादा लगे हैं और इसीलिए उसे लगता है कि यहां उसकी दर्शक संख्या ज़्यादा गिनी जाएगी। यह छोटी सी सच्चाई है, बड़ी सच्चाई यह है कि आज का टीवी पत्रकार भले छोटे शहरों से आए, लेकिन उसके भी सरोकार और संवेदना के केंद्र में यही महानगर बनते शहर हैं- उसका एक नया वर्ग चरित्र है जिसमें उसे मॉल और मल्टीप्लेक्स भाते हैं, नए बनते क्षेत्रों और इलाकों में घर और करिअर की संभावना का सवाल छूता है, ट्रैफिक और कानून-व्यवस्था की समस्या चिंतित करती है और वह दफ्तरी भ्रष्टाचार सालता है जिसकी वजह से उसके कुछ काम देरी से होते हैं। इन सबकी ख़बर टीवी सबसे तेज़ी से लेता है। वह धीरे-धीरे दूर की ख़बरें छांटता चलता है। भट्टा-परसौल दिल्ली और नोएडा के क़रीब है और इसका वास्ता नई बनती आवासीय कॉलोनियों से है, इसलिए वहां चल रहे आंदोलन की गूंज मीडिया में ख़ूब दिखाई पड़ती है, लेकिन काशीपुर में विस्थापन के ही सवाल पर चल रहे आंदोलन की उसे ख़बर नहीं होती। नक्सली हिंसा का सवाल तब उसे घेरता है जब उस पर प्रधानमंत्री या गृह मंत्री का बयान आता है या फिर सीआरपीएफ के जवानों की हत्या की ख़बर आती है- इसके समांतर नक्सली समूहों और उनके नाम पर उत्पीड़ित किए जा रहे आम लोगों की ख़बर वह शायद ही लेता है। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वह अण्णा हजारे के आंदोलन के साथ हो लेता है, लेकिन मणिपुर में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून हटाने की मांग पर 11 साल से अनशन पर बैठी शर्मिला इरोम की खबर वह बस रस्म अदायगी के नाम पर लेता है।

इस चरित्र को हम ध्यान से देखें तो कुछ और नतीजे निकलते हैं। धीरे-धीरे हम पाते हैं कि एक छोटे से वर्ग के हितों और उसके नए बनते शौक को समर्पित यह मीडिया मूलतः स्मृति विरोधी और समाज विरोधी है और कई अर्थों में गरीब विरोधी भी। संस्कृति की जगह इंटरटेनमेंट, यानी मनोरंजन शब्द इस्तेमाल करता है और इस मनोरंजन में हिंदी की सबसे चालू और फूहड़ फिल्में सबसे ज़्यादा जगह घेरती हैं। वह खेलों की दुनिया में उतरता है तो क्रिकेट को किसी नशीले पदार्थ की तरह बेचने में जुट जाता है और नकली उम्मीदों का झाग पैदा करता एक नकली किस्म का रुग्ण देशप्रेम विकसित करता है। कुल मिलाकर वह एक ऐसी लंपट अपसंस्कृति का वाहक बन जाता है जिसमें सभ्यता और संस्कृति के संवेदनशील मूल्यों के लिए ज़रा भी जगह नहीं है। इस अपसंस्कृति का कुछ असावधान प्रदर्शन टीवी चैनलों पर 24 घंटे इस्तेमाल की जा रही भाषा है जो कुछ छिछली हिंदी और टूटी-फूटी अंग्रेजी के मेल से बनी है और जिससे यह भ्रम होता है कि हिंदी तो किसी सरोकार या विमर्श की भाषा ही नहीं बन सकती।

खतरनाक बात यह है कि जो लोग और तबके इस सारी फूहड़ता के लिए ज़िम्मेदार हैं, वही फैशनेबुल ढंग से इस मीडिया की सबसे तीखी आलोचना भी करते हैं। यह बौद्धिक पाखंड उस बडे सामाजिक और साम्राज्यवादी पाखंड का हिस्सा है जिसमें भारत की विशाल सामाजिकता लगातार एक उपनिवेश में बदली जा रही है।

क्या इस स्थिति के प्रतिरोध की कोई सूरत कहीं निकलती है। फिलहाल वह मुख्यधारा के मीडिया में तो दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ती। लेकिन समाचार चैनलों की इस भेड़चाल से बाहर देखें तो हिंदीभाषी समाज का एक बड़ा तबका है जिसके भीतर इन सबको लेकर बहुत गहरा उद्वेलन है। यह उद्वेलन मुख्यधारा के बाहर के मीडिया में- खासकर नए माध्यमों में बहुत साफ तौर पर दिखाई भी पड़ता है। बस उम्मीद की जा सकती है कि एक दौर में मीडिया का यह खेल अपनी व्यर्थता की वजह से ही अपना विक्रय मूल्य खो बैठेगा और तब टीवी चैनलों पर कहीं ज़्यादा बेहतर, पेशेवर और संवेदनशील पत्रकारिता दिखेगी।

(यह लेख 2011 में रचना क्रम के मीडिया विशेषांक में प्रकाशित हुआ था)

निमंत्रण: 'इंटरनेट पर सेंसरशिप के खतरे' पर परिचर्चा


मीडिया वेबसाइट मीडिया खबर.कॉम के चार साल पूरे हो चुके हैं. यह चार साल उतार - चढाव से भरे रहे. कुछ हमने आलोचना की और कुछ हमारी आलोचना हुई. कुल मिलाकर खूब प्रयोग हुए.

बहरहाल जून का महीना मीडिया खबर.कॉम के लिए आत्मसमीक्षा का होता है. यूँ तो मई में ही मीडिया खबर.कॉम के चार साल पूरे हो गए, लेकिन इस दिन को हम आधुनिक भारतीय पत्रकारिता के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह यानी एस.पी की पुण्यतिथि 27 जून को मनाते हैं.

पिछले साल भी इंडिया हैबिटेट सेंटर में एक संगोष्ठी के बहाने एस.पी को याद किया गया था. इस साल भी 27 जून को फिल्म सिटी, नोएडा में एक कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है.

इस बार का कार्यक्रम दो सत्रों में होगा. पहले सत्र में 'ऑनलाइन सम्मेलन' होगा जिसमें मेनस्ट्रीम मीडिया के वेबपोर्टलों के संपादक भाग लेंगे. इसमें 'इंटरनेट पर सेंसरशिप के खतरे' पर परिचर्चा भी होगी.

दूसरे सत्र में सुरेंद्र प्रताप सिंह स्मृति समारोह का आयोजन किया जाएगा जिसमें 'एस.पी के बाद टेलीविजन' पर परिचर्चा होगी. आप सादर आमंत्रित हैं.



संगोष्ठी / Seminar 1 : ऑनलाइन सम्मलेन और 'इंटरनेट पर सेंसरशिप के खतरे' पर परिचर्चा / Future of Online media and danger of Censorship

तारीख/Date-
27 June, 2012, समय / Time - 12.00 - 3.00 pm

वक्ता / Speakers :

सलमा जैदी, पूर्व संपादक, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम / Salma Zaidi: Ex Editor BBC Hindi.Com
मुकेश कुमार, एडिटर-इन-चीफ, न्यूज़ एक्सप्रेस / Mukesh Kumar: Editor-in-Chief, News Express
श्री फखरुद्दीन, पूर्व चीफ जस्टिस, छत्तीसगढ़ / Fakhruddin: Ex Chief Justice, Chhattisgarh HC
राणा यशवंत, ग्रुप एडिटर, महुआ न्यूज़ / Rana Yashwant: Group Editor, Mahua News
शाजिया इल्मी, अन्ना आंदोलन के कोर टीम की सदस्य / Shazia Ilmi: Core member of Team Anna
जयदीप कर्णिक, वेबदुनिया / Jaideep Karnik: Editor, Web Dunia
डॉ.वर्तिका नंदा, प्रमुख, पत्रकारिता विभाग, लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली वि.वि. / Dr. Vartika Nanda: HOD, Department of Journalism, Lady Shri Ram College, Delhi University
निमिष कुमार, संपादक, हिंदी इन.कॉम / Nimish Kumar: Editor, www.hindi.in.com, Network 18
कमाल अख्तर, राज्यमंत्री, उत्तरप्रदेश सरकार / Kamal Akhtar: Panchayati Raj Minister, Uttar Pradesh
दीपक मिश्र, स्पेशल पुलिस कमिश्नर, दिल्ली / Deepak Mishra: Special Commissioner, Delhi Police

संचालन / Moderator :
संदीप मारवाह, फाउंडर एंड एमडी, मारवाह स्टूडियो / Sandeep Marwah, Founder & MD, Marwah Studios.

विशेष / Special :
'सेंसरशिप औऱ संभावनाओं के बीच का सोशल मीडिया' विषय पर 'मंडी में मीडिया' किताब के लेखक विनीत कुमार संदर्भ सहित व्याख्या करेंगे./ On behalf of Media Khabar, Vineet Kumar lecture on Internet, censorship & social media

संगोष्ठी / Seminar 2 :
'एस.पी के बाद टेलीविजन' / Television After S. P.Singh (Founder Editor, Aajtak)

तारीख / Date -
27 June, 2012, समय / Time- 4.00 - 7.00 PM.

वक्ता / Speakers :

कमर वहीद नकवी, पूर्व न्यूज़ डायरेक्टर, आजतक / Qamar Waheed Naqvi, Former News director of Aajtak
राहुल देव , वरिष्ठ पत्रकार / Rahul Dev , Veteran Journalist
पुण्य प्रसून बाजपेयी, कंसल्टिंग एडिटर, ज़ी न्यूज़ / Punya Prasun Bajpai, Consulting Editor, Zee News
शैलेश, सीईओ, अल्फ़ा मीडिया / Shailesh, CEO, Alfa Media
आशुतोष, मैनेजिंग एडिटर, IBN-7 / Ashutosh, Managing Editor, IBN-7
दीपक चौरसिया, एडिटर, नेशनल अफेयर्स, ABP न्यूज़ / Deepak Chaurasia, Editor, National Affairs, ABP News
फारुख शेख , अभिनेता और टीवी प्रेजेंटर / Farooque Sheikh, Actor & TV Presenter

विशेष / Special -
अथश्री बिजनेस कथा - समाचार चैनलों के अर्थ के तंत्र पर देश के जाने - माने आर्थिक विशेषज्ञ ‘कवि कुमार’ का व्याख्यान और साथ में पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन. / Financial Expert Kavi Kumar lecture on News Channels Economy & Future of Hindi News Channels.

संचालन / Moderator:
डॉ. वर्तिका नंदा / Dr. Vartika Nanda

एस.पी.की याद में/ Remembering S.P.Singh/ गेस्ट लिस्ट/ Guest List :

Ram Bahadur Rai (Veteran Journalist), Ajit Anjum (Managing Editor, News24), Supriya Prasad (Channel Head, Aajtak), Rana Yashwant (Group Editor, Mahua News), Ajay Nath Jha (Ex Consultant of Loksabha Speaker & Loksabha TV), Mukesh Kumar (Editor-In-Chief, News Express), Sanjay Shukla (CEO, Percept Ltd.), V P Sajeevan (Veteran Imaging Industry Professional), Rajesh Shukla (MD, Montage Capital)

स्थान/Location :
मारवाह स्टूडियो, फिल्म सिटी, सेक्टर 16A, नोयडा. / Marwah Studios, FC-14/15, Film City, Sector-16A, Noida.

आयोजक / Organizer :
मीडियाखबर.कॉम www.mediakhabar.com ( Supported By Global Capital / Centre For Civil Initiatives)

Partners :
Wilson IT Solutions, MediaMantra , HTML Artists.

संपर्क / Contact
mediakhabaronline@gmail.com , pushkar19@gmail.com , 9999177575.

Jun 19, 2012

ब्रेक और ब्रेक के बीच की पत्रकारिता

प्रमोद जोशी

दो जानकारियाँ तकरीबन साथ-साथ प्राप्त हुईं। दोनों में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं, सिवाय मूल्यों और मर्यादाओं के जो एक कर्म से जुड़ी हैं, जिसे पत्रकारिता कहते हैं। तहलका पत्रिका के पत्रकार तरुण सहरावत का देहांत हो गया। उनकी उम्र मात्र 22 साल थी। अबूझमाड़ के आदिवासियों के साथ सरकारी संघर्षों की रिपोर्टिंग करने तरुण सहरावत बस्तर गए थे। जंगल में मच्छरों के काटने और तालाब का संक्रमित पानी पीने के कारण उन्हें टाइफाइड और सेरिब्रल मलेरिया हुआ और वे बच नहीं पाए। दूसरी खबर यह कि मुम्बई प्रेस क्लब पब्लिक रिलेशनशिप और मीडिया मैनेजमेंटपर एक सर्टिफिकेट कोर्स शुरू करने जा रहा है। 23 जून से शुरू हो रहे तीन महीने के इस कोर्स के विज्ञापन में प्लेसमेंट का आश्वासन दिया गया है। साथ ही फीस में डिसकाउंट की व्यवस्था है। यह विज्ञापन प्राइम कॉर्प के लोगो के साथ लगाया गया है, जो मीडिया रिलेशंस और कंसलटेंसी की बड़ी कम्पनी है। पहली खबर की जानकारी और दूसरी को लेकर परेशानी शायद बहुत कम लोगों को है।

पत्रकारों के क्लब को पब्लिक रिलेशंस पर कोर्स करने की ज़रूरत क्यों आ पड़ी? सम्भव है क्लब को चलाए रखने के लिए पैसे की ज़रूरत पड़ती हो। ऐसा कोर्स चलाने से दो काम हो जाते हैं। पैसा भी मिलता है और कुछ नौजवानों को दिशा-निर्देश भी मिल जाता है। पर पत्रकारिता और पब्लिक रिलेशंस एक चीज़ नहीं है। पब्लिक रिलेशंस और मीडिया मैनेजमेंट का व्यावहारिक मतलब है मीडिया का इस्तेमाल किस तरह किया जाए। इस अर्थ में उसका पत्रकारिता से टकराव है। वह पत्रकारिता का हिस्सा नहीं है। पत्रकारों को ट्रेनिंग देते समय यह बताने की ज़रूरत है कि वे पब्लिक रिलेशंस के महारथियों से किस तरह बचें और अपने काम पर फोकस करें। पिछले साल हम लॉबीइंग के खेल में फँसे रहे। हमने सारी तोहमत नीरा राडिया पर लगाई, पर वह तो अपना काम कर रही थीं। पत्रकारों को यह समझने की ज़रूरत थी कि उनका उद्देश्य क्या है। लगता है बहुत से पत्रकारों की समझ भी अपने कर्म को लेकर साफ नहीं है। मीडिया माने कुछ भी प्रकाशित और प्रसारित करना नहीं है। बिजनेस की बात करें तो वही माल बेचना चाहिए जिसकी डिमांड हो। और चूंकि डिमांड क्रिएट करना भी अब हमारे हाथ में है, इसलिए सारी बातें गड्ड-मड्ड हो गईं हैं।

जब हम अपने कंटेंट पर नज़र डालते हैं तो बात साफ होती है। पत्रकारिता पब्लिक रिलेशंस है, मनोरंजन है प्रचार भी। तीनों में पैसा है। सबसे ज्यादा पैसा तो विज्ञापन की कॉपी लिखने में है। वास्तव में यह पाठक को तय करना है कि उसे बेहतरीन कॉपी लिखने वाले विज्ञापन लेखक चाहिए या जीवन और समाज की विसंगतियों को उजागर करने वाले पत्रकार। पर पत्रकारिता का काम जन सम्पर्क नहीं है। ज़रूरत पड़े तो उसे जन भावनाओं के खिलाफ भी लिखना चाहिए। सच यह है कि समाज को प्रभावित करने वाले पत्रकार इस समय नज़र नहीं आते। राजनेताओं या कॉरपोरेट वर्ल्ड को पसंद आने वाले कुछ लोग हमारे बीच ज़रूर हैं, पर उनके प्रसिद्ध होने के कारण कुछ और हैं। पर जिसे नोबल प्रफेशन या श्रेष्ठ कर्म कहते थे वह पत्रकारिता अपने आप को जन सम्पर्क कहलाना पसंद करती है। दूसरी ओर हमें गर्व है कि तरुण सहरावत जैसे साहसी तरुण हमारे पास हैं जो इस कर्म को श्रेष्ठ कर्म साबित करने के लिए जान की बाजी लगा सकते हैं।

एक-डेढ़ साल पहले आईबीएन सीएनएन ने राडिया लीक्स और विकी लीक्स के बाद अपने दर्शकों से सवाल किया कि क्या पुराने स्टाइल के जर्नलिज्म को नए स्टाइल के मीडिया ने हरा दिया हैं? यह सवाल अपने पैनल से था और दर्शकों दर्शकों से भी। पर सोचने की बात तो पत्रकारों के लिए थी और उनके लिए भी जो इसका कारोबार करते हैं। क्या होता है पुराने स्टाइल का जर्नलिज्म? और क्या होती है नए स्टाइल की पत्रकारिता? सागरिका घोष का आशय नए मीडिया से था। सोशल मीडिया फेसबुक, ब्लॉग, ट्विटर वगैरह। पर ये तो मीडियम हैं, पत्रकारिता तो कंटेंट की होती है।

लगता है कि पुरानी पत्रकारिता को सबसे नए मीडिया यानी नेट ने सहारा दिया और परम्परागत प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने बिसरा दिया। क्या वजह है इसकी? एक बड़ी वजह कारोबार है। नेट पर जो कुछ लिखा जा रहा है उसके पीछे ध्येय कमाई करने का नहीं है। बेशक छोटा-मोटा प्रभाव और मामूली बिजनेस भी इसमें है, पर बड़े क़रपोरेट हित इससे नहीं जुड़े हैं। इसका मतलब यह कि सूचना की आज़ादी को बनाए रखने के लिए उसे कारोबारी हितों से बचाने की ज़रूरत होगी। और वह कारोबार है भी तो वह प्रत्यक्ष रूप से पत्रकारीय साख का कारोबार है, साख गिराने का कारोबार नहीं। यह भी सच है कि नए मीडिया की पत्रकारिता में जिम्मेदारी का भाव कम है, व्यक्तिगत आक्षेप लगाने की कामनाएं हैं, क्योंकि कानूनी पकड़ कम है।

नया मीडिया और उसकी तकनीक समझ में आती है, पर नई स्टाइल क्या? नई स्टाइल में दो बातें एकसाथ हो रहीं हैं। एक ओर पता लग रहा है कि पत्रकार और स्वार्थी तत्वों की दोस्ती हैदूसरी ओर ह्विसिल ब्लोवर हैं, नेट पर गम्भीर सवाल उठाने वाले हैं। दोनों में ओल्ड स्टाइल और न्यू स्टाइल क्या है? दोनों बातें अतीत में हो चुकी हैं। हमने बोफोर्स का मामला देखा। हर्षद मेहता और केतन मेहता के मामले देखे। कमला का मामला देखा, भागलपुर आँखफोड़ मामला देखा। यह भारत में हिकीज़ जर्नल से लेकर अब तक पत्रकारिता की भूमिका यही थी। नयापन यह आया कि मुख्यधारा का मीडिया यह सब भूल गया। कम से कम नए मीडिया ने यह बात उठाई। ओल्ड स्टाइल जर्नलिज्म को न्यू मीडिया ने सहारा दिया है।

यह सवाल अब बार-बार पूछा जाने लगा है कि पत्रकारिता क्या खत्म हो जाएगी? इसके मूल्य, सिद्धांत और विचार कूड़ेदान में चले जाएंगे? मनी और मसल पावर की ही जीत होगी? काफी लोगों को लगता है कि पत्रकारिता के सामने संकट है और इससे निकलने का रास्ता कोई खोज नहीं पा रहा है। इस कर्म से जुड़े ज्यादातर लोग यों किसी भी दौर में व्यवस्था को लेकर संतुष्ट नहीं रहे, पर इस वक्त वे सबसे ज्यादा व्यथित लगते हैं। खबरों को बेचना सारी बात का एक संदर्भ बिन्दु है, पर घूम-फिरकर हम इस बिजनेस के व्यापक परिप्रेक्ष्य को छूने लगते हैं। फिर बातें पूँजी, कॉरपोरेट कंट्रोल और राजनैतिक-व्यवसायिक हितों के इर्द-गिर्द घूमने लगती हैं। ऐसा भी लगता है कि हम बहुत सी बातें जानते हैं, पर उन्हें खुलकर व्यक्त कर नहीं पाते या करना नहीं चाहते। भारतीय भाषाओं का मीडिया पिछले तीन दशक में काफी ताकतवर हुआ है। यह ताकत राजनीति-समाज और बिजनेस तीनों क्षेत्रों में उसके बढ़ते असर के कारण है। पर तीनों क्षेत्रों में हालात तीन दशक पहले बाले नहीं हैं।

राजनीति-बिजनेस और पत्रकारिता तीनों में नए लोगों, नए विचारों और नई प्रवृत्तियों का प्रवेश हुआ है। राजनीति में अपराध और बिजनेस के प्रतिनिधि बढ़े हैं। अपराध का एक रूप यूपी और बिहार में नज़र आता है। इसमें अपहरण, हत्या, फिरौती वगैरह हैं। दूसरा रूप आर्थिक है। यह नज़र नहीं आता, पर यह हत्याकारी अपराध से ज्यादा खतरनाक है। यह गुलाबजल और चांदी के वर्क से पगा है। राजनीति में अपराधी का प्रवेश सहज है। वह सत्ता का सिंहासन लेकर चलती है। ऐसा ही मीडिया के साथ है। वह भी व्यक्ति के सामाजिक रुतबे और रसूख को बनाता है। पुराने पत्रकार को पाँच-सौ या हज़ार के नोट दिखाने के बजाय आज बेहतर तरीके मौज़ूद हैं। चैनल शुरू किया जा सकता है। अखबार निकाला जा सकता है।

पत्रकारिता नोबल प्रफेशन है। नब्बे फीसदी या उससे भी ज्यादा पत्रकार इसे अपने ऊपर लागू करते हैं। इसीलिए वे व्यथित हैं। और उनकी व्यथा ही इसे भटकाव से रोकेगी। पेड न्यूज़ पर पूरी तरह रोक लग पाएगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता, पर वह उस तरीके से ताल ठोककर जारी भी नहीं रह पाएगी। जिस पेड न्यूज़ पर हम चर्चा कर रहे हैं वह पत्रकारों की ईज़ाद नहीं है। यह पैसा उन्हें नहीं मिला। मिला भी तो कुछ कमीशन। एक या दो संवाददाता अपने स्तर पर ऐसा काफी पहले से करते रहे होंगे। पर इस बार मामला इंस्टीट्यूशनलाइज़ होने का था। इसका इलाज़ इंस्टीट्यूशनल लेवल पर ही होना चाहिए। यानी सरकार, इंडियन न्यूज़पेपर सोसायटी और पत्रकारों की संस्थाओं को मिलकर इस पर विचार करना चाहिए। सार्वजनिक चर्चा या पब्लिक स्क्रूटनी से इस मंतव्य पर प्रहार हुआ ज़रूर है, पर कोई हल नहीं निकला है। एक विडंबना ज़रूर है कि मीडिया जो पब्लिक स्क्रूटनी का सबसे महत्वपूर्ण मंच होता था, इस सवाल पर चर्चा करना नहीं चाहता। एक-दो अखबारों को छोड़ दें तो, ज्यादातर चर्चा मीडिया के बाहर हुई है। इस मामले के असली प्लेयर अभी तक सामने नहीं आए हैं। शायद आएंगे भी नहीं।

सम्पादक वह छोर है, जहाँ से प्रबंधन और पत्रकारिता की रेखा विभाजित होती है। सम्पादक कुछ व्यक्तिगत साहसी होते हैं, कुछ व्यवस्था उन्हें बनाती है। बहुत से तथ्य शायद अभी सामने आएंगे या शायद न भी आएं। पर इतना साफ है कि मीडिया की साख बनाने की जिम्मेदारी समूचे प्रबंधतंत्र की है। इनमें मालिक भी शामिल हैं। यह बात कारोबार की रक्षा के लिए ज़रूरी है। सामान्य पत्रकार कभी नहीं चाहेगा कि उसकी साख पर बट्टा लगे। इसमें व्यक्तिगत राग-द्वेष, महत्वाकांक्षाएं और दूसरे को पीछे धकेलने की प्रवृत्तियाँ भी काम करती हैं। पैराडाइम बदलता है, तब ऐसे व्यक्ति आगे आते हैं, जो खुद को संस्थान और बिजनेस के बेहतर हितैषी के रूप में पेश करते हैं। ऐसे अनेक अंतर्विरोध और विसंगतियां हैं।

इस मामले के दो प्रमुख सूत्रधारों की ओर हम ध्यान नहीं देते। एक मीडिया ओनरिशप और दूसरा पाठक या ग्राहक। देश के पहले प्रेस कमीशन ने मीडिया ओनरशिप का सवाल उठाया था। हम प्रायः दुनिया के दूसरे देशों का इंतज़ार करते हैं। या नकल करते हैं। कहा जाता है कि यही एक मॉडल है, हम क्या करें। पर हमें कुछ करना होगा। जो हालात हैं वे ऐसे ही नहीं रहेंगे। या तो वे सुधरेंगे या बिगड़ेंगे। तत्व की बात यह है कि यह सब किसी कारोबार का मसला नहीं है। यह काम हम पाठक-जनता या लोकतंत्र के लिए करते हैं।

चूंकि सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों पर पहल स्टेट और सिविल सोसायटी को लेनी होती है, इसलिए यह राजनेताओं और जन-प्रतिनिधियों के लिए भी महत्वपूर्ण विषय है। इसके कानूनी और सांस्कृतिक पहलू भी हैं। कानूनी व्यवस्था से भी सारी बातें ठीक नहीं हो जातीं। सार्वजनिक व्यवस्था में बीबीसी और जापान के एनएचके काम कर सकते हैं, पर हमारे यहां तमाम कानूनी बदलाव के बावजूद प्रसार भारती कॉरपोरेशन नहीं कर पाता। हमारा लोकतंत्र और व्यवस्थाएं इवॉल्व कर रहीं हैं। उसके भीतर से नई बातें निकलेंगी। नई प्रोसेस, नए चैक्स एंड बैलेंसेज़ और मॉनीटरिंग आएगी। शायद पाठक भी हस्तक्षेप करेगा, जो अभी तक मूक दर्शक है।

फिलहाल कंटेंट माने खबर या पत्रकारीय सामग्री नहीं है। उसकी जगह विज्ञापन ने ले ली है। खबरें फिलर बन गई हैं। यानी महत्वपूर्ण हैं ब्रेक। ब्रेक और ब्रेक के बीच क्या दिखाया जाय ताकि दर्शक अगले ब्रेक तक रुका रहे। स्वाभाविक है कि इसकी जिम्मेदारी जिन लोगों पर है उनके जेहन में बाजीगरी आती है। अखबारों में महत्वपूर्ण चीज़ होती है डमी। डमी यानी वह नक्शा जो बताता है कि विज्ञापन लगने के बाद एडिटोरियल कंटेट कहाँ लगेगा। यहाँ भी खबरें फिलर बन गईं। दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो मीडिया पर विश्वास नहीं करते।

हमने बात की शुरूआत तरुण सहरावत से की थी। व्यक्तिगत रूप से तरुण के साहस की तारीफ की जा सकती है, पर यह काम जोखिम का है। दुनिया के तमाम पत्रकार जोखिम उठाकर काम करते हैं, पर उनके पीछे संस्थाएं होती हैं। जोखिम के असाइनमेंट पूरे करने की ट्रेनिंग और जंगलों में ताम करने के किट होते हैं। सारी बातें केवल भावनाओं और आवेशों से पूरी नहीं होतीं। पत्रकारिता से जुड़ी व्यावसायिक संस्थाओं को इसके लिए साधन मुहैया कराने होते हैं। हमारी पत्रकारिता के प्रफेशनल लेवल को ऊपर लाने की ज़रूरत है। चैनल की एंकर का जबर्दस्त मेकप, वॉर्डरोब या शानदार सैट और वर्च्युअल बैकड्रॉप प्रफेशनलिज्म नहीं होता। अखबारों का रूपांकन, रंगीन छपाई और चमकदार कागज भी नहीं। ये बातें पब्लिक रिलेशंस में काम आती होंगी। अच्छी पत्रकारिता में तमाम काम सादगी से हो सकते हैं। उनमें व्यावसायिक सफलता भी सम्भव है।