Jun 15, 2010

कहीं मजाक न बन जाए मौसम पर चैनल


दिल्ली में बारिश की पहली बूंदें पड़ते ही ख्याल आया कि जल्द ही मौसम खुद एक बड़ी खबर बनने जा रहा है। सूचना है कि मौसम विभाग को साल 2010-11 के लिए 156 करोड़ रूपए की राशि दी गई है ताकि मौसम से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण प्रस्तावित परियोजनाओं का प्रारूप अमली जामा पहन सके। यह राशि तीन परियोजनाओं के लिए दी गई है भूकंप से जुड़े खतरों की जानकारी, कॉमन वैल्थ गेम्स के दौरान खिलाड़ियों को मौसम की सूचना देने और मौसम पर आधारित एक चौबीसिया चैनल की शुरूआत के लिए। प्रस्तावित मौसम चैनल का काम मौसम से जुड़ी तमाम जरूरी जानकारियों को आपस में बांधना और उनसे जुड़ी खबरों को जनता तक पहुंचाना होगा।

 

बेशक यह एक स्वागत योग्य कदम है। वैसे भी 400 चैनलों के इस देश में अभी भी नए चैनलों की काफी गुंजाइश दिखाई देती है। भले ही मनोरंजन, फिल्म और न्यूज से संबंधित चैनलों की बाढ़-सी आ गई है लेकिन जहां तक मौसम का सवाल है, यह अभी भी काफी हद तक अनछुआ क्षेत्र ही है। याद कीजिए, दूरदर्शन जब इकलौता चैनल हुआ करता था, तब कैसे समाचारों के अंत में इनसैट 1-बी की तस्वीरों के जरिए मौसम की रटी-रटाई जानकारी दी जाती थी। तब उन रूखी-सूखी तस्वीरों को देखना भी कम रोमांचक नहीं था। हालांकि मौसम की कहानी बताने वाली भाषा भी दर्शक को तब रट चुकी थी। फलां-फलां राज्यों में गरज के साथ छींटे पड़ने की संभावना है, फलां में मौसम शुष्क बना रहेगा और फलां में धूल भरी आंधी चलेगी। यह बात अलग है कि दी जा रही भविष्यवाणियों में से आधी अक्सर गलत ही निकला करती थीं। इसलिए कई दर्शक मौसम की सूचना को भी अपने मनोरंजन के लिए ही सुना करते थे और शर्त लगाया करते थे कि दी जा रही जानकारियों में से कितनी वाकई सही साबित होंगी। (यह बात अलग है कि इसके ले मौसम विभाग को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता)।

 

बाद में निजी चैनल आए तो उन्होंने खूब नए प्रयोग किए। एनडीटीवी तो अपने दफ्तर की छत से ही मौसम की खबर देने लगा और मजे की बात यह कि मौसम का एंकर इतनी लंबी सूचना को याद करके ही देता था। इसके लिए टेलीप्रांप्टर का इस्तेमाल नहीं होता था। इसलिए मौसम की एंकरिंग काफी मशक्कत का काम थी। उन दिनों मौसम की सूचना देने वाला एंकर सारा दिन इसी रेलमपेल में व्यस्त दिखाई दिया करता था। बाद में आज तक ने मौसम को लेकर कई प्रयोग किए। यहां तक कि मौसम के ग्राफिक पर ट्रैक्टर ही चला दिया। ट्रक्टर हर शहर को छूता जाता और उसके साथ ही अधिकतम और न्यूनतम तापमान जिन्न की तरह प्रकट हुए चले जाते। इस प्रक्रिया में एंकर को ही किनारे कर दिया गया।

 

दरअसल लोगों में मौसम का हाल जानने की उत्सुकता हमेशा ही रही है। दूसरे, मौसम पर टिप्पणी संवाद शुरू करने का भी एक सदाबहार तरीका है। जब लोगों के पास संवाद के लायक ज्यादा कुछ नहीं होता, तब भी मौसम पर बात कर अक्सर संवाद को आगे बढ़ा दिया जाता है। हमारे यहां यह कहना बहुत ही आम है कि आज सर्दी बहुत है या गर्मी बहुत है या बारिश पता नहीं कब होगी। मौसम के नाम पर भारतीय आम तौर पर असंतुष्टि और बेहतर मौसम के इंतजार का भाव लिए हुए ही रहते हैं। मौसमों से जुड़े पर्व और पकवान भी मौसम की अहमियत को दिखाते हैं। हमारे यहां मौसम सिर्फ किसान के काम की बात नहीं है, मौसम जिंदगी का फलसफा है।  

 

खैर, तो अब मौसम चैनल आने वाला है। खुशी की बात है। लेकिन इस खुशी को बनाए रखना कोई आसान काम नहीं होगा क्योंकि हमारे यहां मौसम की भविष्यवाणी वैसे ही गाहे-बेगाहे मजाक का विषय बनती रही है। फिर कामन वेल्थ गेम्स की वजह से इसके साथ इस बार प्रतिष्ठा भी जुड़ी होगी।

 

दरअसल चैनल शुरू करने की योजना बनाना और सरकारी खजाने से लबालब पैसा पा लेना आसान हो सकता है लेकिन चौबीसों घंटे के सफेद हाथी को खिलाते-पिलाते-पालते रहना नहीं। चैनल के लिए प्रोग्रामिंग क्या और कैसी होगी, टीम कैसी होगी, कंटेट पर फैसला कौन लेगा, रीसर्च कहां से होगी, पुरानी फुटेज का जुगाड़ कहां से होगा, यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनसे चैनल शुरू करने से काफी पहले निपटना होगा।

 

अगर ऐसा न हुआ तो मौसम चैनल को महज कॉमेडी बनने में कोई ज्यादा देर नहीं लगेगी। उम्मीद है कि चैनल के विचारकों और नीति-निर्धारकों तक गरज के साथ छींटे पहुंच रहे होंगे।

Jun 13, 2010

शब्दहीन



पानी का उफान तेज था

अंदर भी, बाहर भी

फर्क एक ही था

बाहर का उफान सबको दिखता था

अंदर का पानी अंदर ही बहा

उसे कौन बांधता

न पत्थर, न बांध

अंदर का तूफान

खुद ही थमता है

खुद ही से थमता है

अंदर की आवाज भी

अंदर के कान ही सुनते हैं

वे ही जानते हैं

अंदर के मौसम का हाल

अंदर कभी चरमराहट होती है

कभी अकुलाहट

आहटें अंदर का सच हैं

अंदर अपने कदमों के निशान रोज पड़ते हैं

मिट भी जाते हैं

सिसकियां उठतीं हैं

सो जाती हैं

 

अंदर की तस्वीर भला कौन सा कैमरा खींचे

खुद का अंतस जानने में भी

गुजर जाते हैं बरसों बरस

अंदर की सुरंगें, गलियां, महल, चौबारे, हड़प्पा, मोहनजोदाड़ो,जनपथ,राजपथ

कितने टांगे हिनहिनाते हैं रोजमरोज

किसे पकड़ूं, किसे छोड़ूं

ये ख्याली तितलियां हैं

कभी उड़ेंगीं, कभी मीनार बन जाएंगी

क्यों न आज

हंस लिया जाए

इसी ख्याल पर।

Jun 10, 2010

हवा हुआ रोमांच


10वीं और 12वीं दोनों के ही नतीजे डाक से स्कूल पहुंचे थे। उस दिन मंदिर होते हुए स्कूल पहुंचे तो उत्साह चरम पर था। उंगली से एक-एक विषय पर हाथ रखते हुए मार्क्स नोट किए थे,तब भी डर बना था कि ऊपर या नीचे वाले के नंबर न लिख बैठें। साल दल साल स्कूलों में नतीजों के आने पर उत्साह, उत्सव, चुप्पी, निराशा का एक मजेदार माहौल बनता था। कुछ वहीं रोने लगते, कुछ भागड़ा डालने लगते। अनगिनत स्कूलों की दीवारों को यह सब कभी भी भूल नहीं सकता। यह साल का सबसे ज्यादा रोमांचक पल होता था।

 

अब ये बीती बातें हो गई हैं। बीते कुछ सालों से नतीजे कंप्यूटर देता है। निर्धारित दिन पर साइट क्लक कीजिए और नतीजा सामने। दो मिनट के लिए कंप्यूटर के सामने ही नाच-रो लीजिए। फिर खुद भी कंप्यूटर की तरह ही बन जाइए, भावशून्य।

 

एक और मजे की बात है। कंप्यूटर सुख-दुख के सामाजिक आदान-प्रदान से भी वंचित करता है। न दूसरे को ढांढस बंधाने का मौका देता है, न गले मिलने का। इस बार एक अखबार की चटपटी खबरों के कोने में पढ़ा कि कैसे इस बार सीबीएसई ने प्रेस कांफ्रेस कर पत्रकारों को खास न्यौता नहीं दिया। कंप्यूटर पर आने वाले इन नतीजों ने दरअसल मीडिया के हाथों से भी खबरों के विजुअल छीन लिए हैं। अब विजुअल दिखाएंगे भला क्या। पहले विजुअल के नाम पर सारे नाटकीय रंग घुले-मिले मिलते थे। रिजल्ट की रिपोर्टिंग के लिए चैनलों और अखबारों में कई दिन पहले ही टीमों का गठन होने लगता था। फिर कोशिश की जाती थी कि बोर्ड पर नतीजे देख रही सुंदर लड़कियों की तस्वीरें खास तवज्जो के साथ दिखाई जाएं। उसके बाद वहीं पर उनकी बाइट, प्रिंसिपल का इंटरव्यू, टीचरों की टिप्पणियां, मां-बाप की बधाइयां, मिठाई के डिब्बे और संगीत की धुनें। सब कुछ एक फिल्मी कहानी की तरह जैसे सामने घटता चला जाता। अखबारों की रिपोर्टें भी अगले दिन बड़ा सटीक आंखों देखा हाल देतीं। किस स्कूल में रिजल्ट के दौरान क्या-क्या खास रहा, कहां नतीजे देर से पहुंचे या देर से बोर्ड पर लगे,कहां पीने को पानी भी नहीं था,कहां कोई लड़का बेहोश हो गया और कैसे कुछ पब्लिक स्कूलों के बाहर बच्चों से ज्यादा कारों का हुजूम मौजूद था वगैरह। रिपोर्टिंग सिलसिलेवार ढंग से खूब रसीली बातें कहती दिखती और आकर्षित करती।   

 

अब वो मजा कंप्यूटर वाले कमरे में सिमट कर रह गया है। अपनी भावना उसी के सामने जाहिर कीजिए और फिर कुछ ही पलों में फेसबुक पर खो जाइए। साल भर की पढ़ाई के बाद नतीजे का दौर अब एकाकी हो चला है। यहां खुद ही को बधाई दीजिए और खुद ही अपने आंसू पोंछिए। फिर धीरे-धीरे बाकी दोस्तों के नंबर देखने में जुट जाइए। दूसरे के अंदर उस समय क्या भाव उमड़ रहे हैं, इसका सही अंदाजा भी यहां क्या मिले।

 

बेशक कंप्यूटर और इंटरनेट ने दिमागी खिड़कियां खोलने का अंचभेभरा काम किया है लेकिन इस अचंभे की दुनिया से भावनाएं भी बह कर निकल आएं, यह सोचना ही गलत है। बच्चों की दुनिया में नतीजे बड़ी चीज हैं। इंटरनेट ने रोचकता और ज्ञान के एक से बढ़ कर एक अजूबे किए हैं लेकिन इस अजूबे से जब नतीजे की पोटली निकलती है तो बेरंगी ही लगती है।