Nov 2, 2018

JUXTAPOSE 2018

The Journalism department of Lady Shri Ram College for Women hosted its Annual Academic Meet- Juxtapose on the 27th and 28th of September in the college premises.
Juxtapose, a department of journalism initiative, aims at deliberating and bringing on stage the issues concerning society and the media.

This year, Juxtapose revolved around the theme- "On Battlefield: Death or Rebirth of Media?" and the events spread over two days addressed areas of censorship, film journalism, fake news, changing patterns of films, ownership, and media trial.


Day one, 27th September 2018, of the meet started with an opening ceremony and was followed with an All India Media Meet event in which the participants deliberated on the given topic of censorship in news. A panel discussion with esteemed guests like Paranjoy Guha Thakurta, Naila Grewal, Stutee Ghosh, Murtaza Ali Khan, and Ravindra Gautam took place in which the audience was enlightened with great views and thoughts concerning the topic- "Film Journalism: Is it about the content or profits?". A speaker's session on section 377 and its decriminalization was also conducted by Ms. Rituparna Borah. The day ended with a fun, competitive event- AdMad in which a lot of teams participated and displayed their love for acting and advertisements.


Day two, 28th September 2018, of Juxtapose began with an interesting Open Mic session in which the participants spoke on the topic "#Trending". Participants from different walks of life recited poems, sang songs, created sounds, mimicked artists and also did comedy on the stage. The event was taken further with a Panel Discussion in which journalists and media enthusiasts like, Neha Dixit, Ritu Kapur, and Nikhil Pahwa engaged in a discussion on the theme- "Who is the journalist if we are all newsmakers?". The third event of the day- Vox Pop- the annual turncoat debate witnessed a massive participation and continued for almost four long hours. The debate was held on an important and serious topic of the role of media and reporters during an individual's court trial. Media Quiz, a quizzing competition was the final event of the annual meet and consisted of two question-answers round. 

Juxtapose had a total of seven offline events and two online events. Panorama, an online photography event with the theme "Freedom and/or Restriction", and Meme Making, an online meme making event with the theme "Cinema and stereotypes" were introduced for the students.
Juxtapose 2018 was a grand success and brought together not just journalism students but students from different fields. Journalism Department organises this event each year with the hope of addressing media-based issues. 


By: Sanjana Chawla

Oct 10, 2018

जोधपुर की जेल डायरी


यह जोधपुर की सेंट्रल जेल है. 1874 में बनी इस जेल के बाहर आज भी लकड़ी का एक पुराना गेट लगा हुआ है जिस पर एक मोटी सी सांकल है. यह सांकल जेल के ऐतिहासिक होने का सहज ही आभास दिलाती है. गेट और सांकल- दोनों में ही राजस्थान की परंपरा की छवि है.
जेल के साथ ही जेलर का दफ्तर है. जेल के बाहर एक रजिस्‍टर पड़ा है जिसमें नाम, पता, उम्र के अलावा जाति को लिखे जाने का भी प्रावधान है. अंग्रेजों के जमाने की वह परंपरा आज भी जारी है. जो अंदर आएगा, उसके लिए इन सभी खानों को भरना अनिवार्य है.  इस रजिस्टर को भरते समय मुझे यह याद करने में काफी समय लगा कि आखिरकार मेरी जाति है क्या?
इस जेल में इस समय करीब 1400 बंदी हैं जबकि संख्‍या 1475 की है. इस मायने में यह जेल भीड़ की समस्‍या से काफी हद तक बची हुई है. वैसे यह जेल बहुत लंबे समय से चर्चा में चल रही है. एक सलमान खान की वजह से और दूसरे आसाराम की वजह से लेकिन किसी एक बड़े नाम के आ जाने के बावजूद जेल की अपनी संस्‍कृति बदस्तूर बनी रहती है. पर हां, जेल के अंदर के भाव काफी हद तक या शायद पूरी तरह से ही इस बात पर निर्भर करते हैं कि जेल के संचालकों की रुचियां और स्वभाव कैसा है. यही वजह है कि हर जेल के दौरे ने मुझे उस समाज, राज्य और संचालन के अंदरूनी मन की साफ झलक दी है. शहरों से काट कर रखी जाने वाली जेलें दरअसल उस समाज की सबसे सच्ची तस्वीर होती हैं जिसे समाज खुद से काट कर रखना चाहता है.
इस जेल के जेलर जगदीश पूनिया हैं. उनसे मेरी पहली मुलाकात एक दिन पहले ही हुई थी. जेल पर आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में एक ही झलक में मैं उनकी अपने काम के प्रति तल्लीनता को समझ सकी थी. मुझसे मिलने से पहले इस अधिकारी ने तिनका तिनका के बारे में काफी कुछ पढ़ रखा था. उनके पास जेलों को लेकर कई सरोकार थे. मैं जेलर के साथ अंदर आई तो देखा कि जेल के बड़े हॉल में एक बड़े कार्यक्रम के आयोजन की तैयारी की गई है. इस बड़े ऑडीटोरियम में भीड़ है. बंदी कतार में बैठे हैं. मेरी मुलाकात यहां दो भाइयों से होती है. दोनों किसी मामले में पिछले सात साल से इस जेल के अंदर हैं. एक भाई ने बीकॉम किया है. यहां आने से पहले सिंगापुर में तीन कंपनियों का मालिक था. अब यहां आने के बाद बंदियों को पढ़ाने का काम कर रहा है. अब तक वो 35 बंदियों को साक्षर कर चुका है.
दूसरा भाई एक गायक है. वो गाने लिखता है और उन्‍हें कंपोज करता है. वो बार-बार कहता है कि जेल ने उसे पूरी तरह से बदल दिया है. जेल में आने से पहले उसके पास जीने का कभी कोई मकसद नहीं था. आज उसके पास कई मकसद हैं. आज इस जेल को वो अपनी तपोभूमि मानता है.
तीसरा बंदी मंच पर आता है तो अपना परिचय देते हुए पहली पंक्ति में कहता है- मेरा नाम पीड़ा है. बाकी बातों के अलावा एक पीड़ा जो मुझे है, वह यह है कि जो बाहर से आता है, वह बस हमारी बात सुनकर चला जाता है. हम सभी देश के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं. हम सबमें दिल है, इसलिए हममें संवेदना भी है और कुछ रचने का सामर्थ्य भी. लेकिन कोई हमें याद रखे तब तो. राखी में हर साल कई एनजीओ जेल में आते हैं. महिलाएं बंदियों को राखी बांधती हैं. वे एक मुस्कुराहट के साथ तस्वीर खिंचवा कर लौट जाती हैं और लगता है कि जैसे कहानी वहीं पर खत्म हो गई. उसकी बात में दर्द भी है और सब्र भी.
इसी जेल में मेरी मुलाकात एक भूतपूर्व मंत्री से होती है. उम्र करीब 75 साल होगी. उनके हाथ में एक कॉपी है. दो रंगों के पेन से बहुत ही सफाई से लिखा हुआ एक लंबा दस्‍तावेज है. उन्‍होंने तिनका तिनका के हर चप्पे के बारे में पढ़ा है और अपने सवालों को क्रमबद्ध तरीके से लिखा है. वो बहुत साफ अंग्रेजी में मुझसे कई सवाल पूछते हैं. उनका एक सवाल यह है कि मैंने तिनका तिनका तिहाड़ के हिंदी और अंग्रेजी के कवर तो एकदम एक जैसे रखे लेकिन मराठी में एक कबूतर को क्यों चुना. और जो आखिरी सवाल मेरी तरफ उछालते हैं, उसका जबाव देना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. वो मुझसे पूछते हैं कि मैं किसी जेल को गोद में क्‍यों नहीं लेती बल्कि मैं सीधे इसी जेल को एडॉप्‍ट क्‍यों नहीं करती. इस सवाल का मेरे पास क्‍या जबाव हो सकता है. वे मुझे बताते हैं कि पिछले कई दिनों से अज्ञेय की किताब- शेखऱ एक जीवनी- को पढ़ने की इच्छा है लेकिन वह उन्हें अब तक नहीं मिल पाई है.

जेल में एक लाइब्रेरी है. यहां कई किताबें हैं. तीन बड़े ढेर एक तरफ पड़े हैं. मुझे यह जानकर बेहद खुशी होती है कि इस लाइब्रेरी के लिए नागरी प्रचारिणी सभा ने इन किताबों को तोहफे के तौर पर भेजा है (यह भी एक सच है कि इस साल हिंदी दिवस के सरकारी तमाशे के दौरान मैंने कुछ लोगों से जेलों में सीधे कुछ किताबें भेजने का आग्रह किया था लेकिन किसी ने मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया क्योंकि जेलें समाज के एक बड़े तबके के लिए कोई अहमियत नहीं रखतीं.) इस जेल में 70 महिलाएं हैं और 7 बच्चे. एक बच्चा महिला सुरक्षा गार्ड से बार-बार चिपक रहा है. मैं समझ सकती हूं कि बच्चे ने आज बहुत दिनों बाद बाहर से आए किसी इंसान को देखा है.
एक युवती मेरे पास आती है. इसकी उम्र 24 साल है. वो अपने चेहरे को ढंककर मेरे पास आकर खड़ी हो जाती है. उसके हाथ में ड्राइंग की एक कॉपी है, बिल्‍कुल वैसी जैसे बच्‍चों के पास होती है. वो उत्‍साह के साथ बताती है कि वह जेल के अंदर कोशिश करती है कि अपने समय में किसी तरह से कुछ रंग भर सके. मैं उन तस्‍वीरों को देखती हूं, सराहती हूं. आखिर में उसकी आंखों की तरफ देखती हूं तो उसकी आंखों को भीगा हुआ पाती हूं. यही जेलों का सच है.
जेल में बहुत- से लोग अपने रिश्‍तेदारों के साथ हैं. कोई भाई के साथ. कोई पिता के साथ. कोई बेटे के साथ. किसी का कोई अपराध और शायद किसी का कोई अपराध नहीं. जेल के अंदर समय रुका हुआ है. लौटने के समय समझ नहीं पाती कि इन महिलाओं से क्‍या कहूं. मैं कहती हूं कि तुम सभी को एक दिन बाहर जाना है. बाहर जाने के समय आने तक यहां कुछ रचना शुरू कर दो ताकि जब लौटो, तुम्‍हारे साथ एक खुशी हो. मैं इस कमरे में बनी दीवार को देखती हूं. दीवार जेल के अंदर बनी है. इसे कुछ कलाकारों ने करीब 5 साल पहले बनाया था और वो आज भी वैसी ही है. मैं पूछती हूं कि क्‍या वे ऐसी दीवार को बना पाएंगीं? मुझे जबाव मिलता है- हां.
जेलों की सारी जिंदगी इसी हां और ना के बीच है. कुछ करने और कुछ रचने के बीच. रुकी हुई घड़ी को फिर से चलाने और समय पर फिर नई इबारत लिख लेने की जद्दोजहद के बीच. जोधपुर की जेल से बाहर निकलते और रजिस्टर पर वापिसी की सूचना लिखते हुए लगा कि जेल के ठिठके हुए समाज की ऊर्जा दरअसल जेल के अधिकारी और स्टाफ ही बनते हैं. यह एक परिवार है जो लगातार बदलता है. जेलें इसी बदलाव की कहानी हैं. पूरी तरह से कमर्शियल होते मीडिया और फिल्मों को शायद आज भी इस बात का भान नहीं है कि प्रवचनों से लदी, नफरत से देखी जाती जेलों में वादों, अपवादों और विवादों से परे संवेदनाएं भी बसती हैं.
जेलों की मौजूदगी इसी आध्यात्मिक दबाव को समाज पर उछालती हैं. फिलहाल जोधपुर की जेल की यह यात्रा एक कॉलम में समेट रही हूं. बहुत कुछ छूट गया है लेकिन हर बार जेलों में जो देखती हूं, उसके हर सिरे को लिख सकूं, वैसी क्षमता अभी भी मुझमें शायद है नहीं.

जेलों और सत्ता के बीच संवाद का डर


जून 2018 में भारत के महिला और बाल विकास मंत्रालय ने ‘जेलों में महिलाएं’ विषय पर एक रिपोर्ट जारी की जिसका मकसद महिला बंदियों में उनके अधिकारों के बारे में समझदारी कायम करना, उनकी समस्‍याओं पर विचार करना और उनका संभव समाधान करना है. इस रिपोर्ट में 134 सिफारिशें की गई हैं, ताकि जेल में बंद महिलाओं के जीवन में सुधार लाया जा सके. गर्भधारण तथा जेल में बच्‍चे का जन्‍म, मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य, कानूनी सहायता, समाज के साथ एकीकरण और उनकी सेवाभाव जिम्‍मेदारियों पर विचार के लिए ये सिफारिशें की गई हैं. रिपेार्ट में राष्‍ट्रीय आदर्श जेल मैन्‍युअल 2016 में विभिन्‍न परिवर्तन का सुझाव दिया गया है ताकि इसे अंतर्राष्‍टीय मानकों के अनुरूप बनाया जा सके.
इस रिपोर्ट को देखते-पढ़ते हुए मुझे एक बार फिर एक ऐसी महिला का ख्याल आया जिसने खुद जेल में बंद रहते हुए जेल में उसी परिवेश में रह रही महिलाओं की परिस्थिति का बेहद सटीक आकलन किया था. इस महिला का नाम था- मेरी टेलर.
बिहार की हजारीबाग जेल में अपने अनुभवों पर आधारित किताब ‘माई ईयर्स इन एन इंडियन प्रिजन’ के जरिए मेरी टेलर ने भारतीय जेलों के हर कोने को पूरी सच्चाई से अपने शब्दों में पिरो दिया है. बेशक इस किताब को भारतीय जेलों पर अब तक की सबसे खास किताबों में से एक माना जाता है. इस ब्रितानी महिला को 70 के दशक नक्सली होने के संदेह में भारत में गिरफ्तार किया गया था. 5 साल के जेल प्रवास पर लिखी उनकी यह किताब उस समय की भारतीय जेलों की जीवंत कहानी कहती है. इसमें उन्‍होंने जेलों में महिलाओं की स्थिति, मानसिक और शारीरिक आघात, अमानवीय रवैये और बेहद मुश्किल हालात को अपनी नजर से काफी महीनता से पिरोया है. न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि रिपोर्ट को बनाते समय मंत्रालय ने शायद जेलों पर लिखे गए और लिखे जा रहे साहित्य की पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई होगी क्योंकि हम यह मानते हैं कि सरकारी रिपोर्ट को लिखते समय अपने मौलिक शोध या अनुभव के आधार पर लिखे साहित्य की भला क्या अहमियत. लेकिन असल में ऐसा है नहीं.
बहरहाल, मेरी टेलर ने अपनी किताब ‘माई ईयर्स इन एन इंडियन प्रिजन’ के जरिए जेल की जिंदगी को जैसे पूरी तरह से उधेड़ दिया है. हालांकि वे न तो खुद को इतिहासकार मानती हैं और न ही कोई राजनीतिक टिप्पणीकार लेकिन इससे जेलों की जिंदगी के सच्चे दस्तावेज को अपने में समेटे इस किताब की अहमियत कम नहीं होती. यह किताब आज भी रंग भाषा, देश- इन सब से परे आज भी जेलों के बंद दरवाजे उन सब के लिए खोलती है जिन्हें मानवाधिकारों की परवाह है.
जेल के हर चप्पे को गौर से देखती हुई मेरी टेलर बड़ी सहजता और तल्लीनता से इस बात का आकलन करती हैं कि वो कौन सी महिलाएं हैं जो जेल में आती है, वे कौन-सा अपराध करती हैं और क्‍यों करती हैं. उऩ्होंने कई महिला कैदियों के अपराध की वजह और फिर मिली सजा पर एक करुण दस्‍तावेज बुना है. बुलकर्णी, गुलाबी, पन्‍नो- न जाने ऐसी कितनी महिलाएं हैं जिनको करीब से देख कर मेरी टेलर ने अपनी और उनकी स्थिति की मजबूरियों को बार-बार समझा. इन महिलाओं के नाम इतिहास में कहीं नहीं है क्योंकि वे शायद कहीं कोई मायने नहीं रखतीं. यही जेलों का सच भी है लेकिन इस बात को कौन नकार सकता है कि इन सभी महिलाओं के पास ऐसा कुछ था जो जेल सुधार और मानव सुधार से जुड़े लोगों के लिए जानना जरूरी था.
यह किताब अदालत से सजा पाने के बाद जेल में आई महिलाओं की जिंदगी का एक दूसरा ही चेहरा दिखाती है जिन्‍हें परिवार और समाज तुरंत अपनी नजरों से काट देता है. एक महिला ने किसी की हत्‍या इसलिए कर दी क्‍योंकि उसकी बेटी के अनचाहे गर्भ पर कोई बार-बार कटाक्ष दे रहा था. कुछ महिलाएं जेल में इसलिए थीं क्‍योंकि उन्होंने एक बेहद मामूली अपराध किया था और फिर जमानत उन्हें नसीब नहीं हो पा रही थी. कुछ महिलाएं इसलिए जेल में थीं क्‍योंकि जब उनके साथ बलात्‍कार होने वाला था, तब उन्‍होंने अपनी इज्‍जत और अपने अपराधी को मारने के बीच में किसी एक को चुना और न चाहते हुए भी जो हुआ, वह हत्या थी.
जेल कें अंदर ऐसी अंतहीन कहानियां और त्रासदियां भरी हुईं हैं. मेरी टेलर इऩ्हें हर रोज देख रही थीं. जेल के अंदर आधा पके चावल, खराब सब्जियां, जली हुई रोटियां- ऐसा बहुत कुछ था जो किसी के लिए पचा पाना बहुत मुश्किल था. वो ये भी बताती हैं कि जेलों के अंदर भ्रष्‍टाचार अपने चरम पर था. हर मामूली जरूरत और सुविधा की कीमत यहां पर ली जाती थी. दवाई से लेकर बच्‍चों के लिए दूध तक हर चीज पर जेल के अधिकारी अपना हुक्‍म चलाते थे और उसमें अपना हिस्‍सा लेते थे. जेल का सुप्रीटेंडेंट अपने आप को राजा मानता था और सभी बंदियों को अपना एक निजी सेवक. जेल के इन बंदियों की अपनी आवाज नहीं थी. उनके अपने कोई अधिकार नहीं थे. जेल के अंदर असल में एक और भी जेल हो सकती है इसको मेरी टेलर ने बखूबी समझा और समाज को समझाया.
जेल में जब किसी बड़े अधिकारी का दौरा होता था तो सुप्रीटेंडेंट और बाकी अधिकारी पूरी कोशिश करते थे कि वे बंदियों से कोई बात न कर पाए और अगर कोई बंदी अपनी आवाज को उठा लेता था तो उस बंदी को इसका खामियाजा उठाना पड़ता था.
उन्होंने जेलों में संवादहीनता पर भी खुलकर लिखा है. वे बताती हैं कि बंदियों को टीवी देखना तो बहुत दूर, अपने लिए अखबार तक नसीब नहीं होता था. उन्‍हें घर से आने वाले खत या तो नहीं मिलते थे या फिर देरी से दिए जाते थे. खतों को लिखने के लिए उन्हें कलम और कागज मुहैया नहीं करवाया जाता था. उन्‍हें यह भी पता नहीं होता था कि उनके अपने गांव या शहर की क्‍या स्थिति है. वे न तो राजनीतिक बदलाव से वाकिफ होती थीं, न ही अपने परिवार या समाज में आ रही हलचल से. संवाद की सभी खिड़कियां जैसे उनके लिए बंद कर दी जाती थीं. शायद जेलें यही चाहती थीं और आज भी काफी हद तक यही चाहती हैं.
आज भी हिंदुस्‍तान की कई जेलें ऐसी हैं जो संवादहीनता में ही जीती हैं. कई बार ऐसे बंदी भी मिलते हैं जिन्‍हें यह तक ठीक से मालूम नहीं होता कि उनके अपने राज्‍य में किसकी सरकार है. जेलों में सब कुछ सेंसर होकर पहुंचता है गोया जेल के बंदी अगर समर्थ, सक्षम, साक्षर, सबल या संवाद से लैस हो गए तो वे सत्‍ता को ही पलट देगें. कई बार यह समझना मुश्किल होता है जेलों से सत्‍ता डरती है या सत्‍ता से जेलें.

महिलाएं और ओपन जेल : तिहाड़ से उम्मीद की एक किरण : वर्तिका नन्दा

वर्तिका नन्दा
August 11, 2018


यह कम ताज्‍जुब की बात नहीं है कि देश की सबसे पुरानी जेलों में से एक और दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ को महिलाओं को ओपन जेल तक लाने में इतने सालों का समय लग गया. यह भी ताज्‍जुब की बात है कि तिहाड़ की खुली जेल में रह रहे मनु शर्मा और सुशील शर्मा जैसे बंदी लगातार चर्चा में रहे और उन्‍हें मिलने वाली सुविधाएं हर बार सवालों के घेरे में आती रहीं, लेकिन महिलाओं की स्थिति को लेकर किसी तरह की गंभीर पहल करने में खुद तिहाड़ भी चूक गया.
असल में जेलों का निर्माण पुरुषों के हिसाब से ही किया गया था. महिला और बच्‍चे बाद में जोड़े. जेलों के मामले में महिलाओं और बच्‍चों की जरूरतें आज भी उतनी प्राथमिकता नहीं पातीं. यही वजह है कि अपनी सजा पूरी होने की कगार पर खड़ी कई महिलाएं अपने अच्छे और सुधरे आचरण के बावजूद खुली जेल में पहुंचने में अयोग्य करार दी जाती हैं. जेल में बंद ये महिलाएं आर्थिक, सामाजिक, शारीरिक, सृजनात्‍मक और यहां तक कि अपने रिश्‍तों के लिहाज से भी अपने आपको कटा हुआ पाती हैं.
भारत की जेलों में इस समय करीब 17,000 महिलाएं कैद हैं. इनमें से करीब 6000 आजीवन कारावास पर हैं. देश में महिलाओं के लिए कुल 18 जेलें हैं और सिर्फ 4 जेलें खुली जेलें हैं. देश की जेलों में करीब 30 प्रतिशत जगह अभी भी खाली पड़ी है. इन्‍हीं जेलों में करीब 1800 बच्‍चे अपनी मां के साथ रहने को मजबूर हैं. य‍ह हिंदुस्‍तान की जेलों का एक बड़ा सच है. भारत के कई राज्‍यों में आज भी महिलाओं के लिए आज भी तेल या शैंपू ले जाना मना है. लेकिन इन जेलों में महिला कैदियों के साथ फैशन शो करने में कभी कोई मनाही नहीं दिखती. जेलों को लेकर हमारा रवैया इस कदर ढीला और नकारात्‍मक है कि देखकर हैरानी होती है.
15 अगस्त से पहले तिहाड़ से 6 महिलाओं का सेमी ओपन जेल तक पहुंचना तकरीबन तय लगता है. यह एक अच्छी खबर है. तिहाड़ के माहनिदेशक अजय कश्यप और उप महानिदेशक एसएस परिहार के निर्देशन में तिहाड़ एक बड़ी मिसाल कायम करने जा रहा है. देश की बाकी जेलों के लिए तिहाड़ को ऐसी नजीर पेश करनी होगी, जो अनुकरणीय हो और सम्माननीय भी.

Jul 29, 2018

…जब जेलों में होगी गांधीगिरी

Vartika Nanda
July 28, 2018


इस बार गांधी जयंती का खास तौर से इंतजार रहेगा. इसकी वजह है- महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के मौके पर देशभर की जेलों में बंद कैदियों को विशेष माफी देने के प्रस्ताव को मिली मंजूरी. यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट बैठक में लिया गया. इस फैसले के तहत भारतीय जेलों में बंद 60 साल से ऊपर की उम्र के सभी कैदियों को रिहा करने का फैसला किया है. लेकिन इनमें दहेज हत्या, बलात्‍कार, मानव तस्‍करी और पोटा, यूएपीए, टाडा, पॉक्सो एक्‍ट समेत कई मामलों के कैदियों को रिहा नहीं किया जाएगा. रविशंकर प्रसाद के मुताबिक कुछ खास श्रेणी के कैदियों को ही विशेष माफी दी जाएगी.
इन सभी कैदियों को तीन चरणों में रिहा करने की योजना बनाई गई है. पहले चरण में कैदियों को दो अक्टूबर 2018 को रिहा किया जाएगा. उसके बाद दूसरे चरण में कैदियों को 10 अप्रैल 2019 (चम्पारण सत्याग्रह की वर्षगांठ) को रिहा किया जाएगा और तीसरे चरण में कैदियों को दो अक्टूबर 2019 में फिर से गांधी जयंती के मौके पर ही रिहा किया जाएगा.
इस समय देश की ज्यादातर जेलों में अपनी निर्धारित क्षमता से कहीं ज्यादा कैदी हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्‍यूरो की 2015 की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय जेलों में क्षमता के मुकाबले 114.4 फीसदी ज्‍यादा कैदी बंद हैं और कुछ मामलों में तो यह तादाद छह सौ फीसदी तक है. यहां यह जोड़ा जा सकता है कि हाल ही में न्यायमूर्ति एम.बी.लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने तमाम राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (जेल) को चेतावनी दी थी कि जेलों में क्षमता से ज्यादा भीड़ के मुद्दे से निपटने के लिए अदालत के पहले के आदेश के मुताबिक एक कार्य योजना जमा करने में नाकाम रहने की वजह से उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला चलाया जा सकता है.
दरअसल जेलों के बारे में चिंता और चिंतन को तीन हिस्‍सों में बांटा जा सकता है. पहला हिस्‍सा वह जब किसी इंसान को जेल की सजा होती है. तब अदालत की गति क्‍या है, अपराध के मुताबिक मिलने वाली सजा, उसकी मियाद और मियाद पूरी होने पर उसकी रिहाई. दूसरा हिस्‍सा है- जेल के अंदर रहते हुए बंदी के साथ होने वाला व्यवहार और बाहर की दुनिया के साथ उसका संबंध, जेल में सुधार के कार्यक्रम, जेल का माहौल, उनके रहने और खाने का इंतजाम, उनके विकास और पुनर्वास की योजनाएं और जेल से लौटने पर समाज से स्‍वीकार्यता को लेकर किए जाने वाले प्रयास. तीसरा वह हिस्‍सा जब वह अंतत: समाज में लौट आ जाते हैं.
एक तरफ जेलें भीड़ से उलझ रही हैं और दूसरी तरफ इनमें जेल कर्मचारियों की भारी कमी भी बनी हुई है. नेशनल लीगल सर्विस अथारिटी (नालसा) की ओर से पेश रिपोर्ट के मुताबिक देश भर की जेलों में कर्मचारियों की अनुमोदित क्षमता 77,230 है, लेकिन इनमें से 31 दिसंबर, 2017 तक 24,588 यानी 30 फीसदी से भी ज्यादा पद खाली थे. इसी तरह भारत की अदालतों का भी हाल खस्ता है. कई निचली अदालतों में जजों के करीब 60 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं. हाई कोर्ट में भी इस साल फऱवरी तक करीब 400 पद खाली पड़े हैं. ऐसे में न तो कोर्ट के अंदर कुछ भी सुचारू और आसान तरीके से हो पाता है और न ही जेल में. इसका खामियाजा अंतत: बंदी और उसके परिवार को चुकाना पड़ता है. इनमें भी खूंखार और प्रभावशाली अपराधी अपने लिए राहें खोज लेते हैं. स्थिति उनका खराब होती है जो आम अपराधी होते हैं या फिर किसी परिस्थिति में जेल में आ जाते हैं.
ऐसे में सरकार का यह कदम स्वागत योग्य है लेकिन अगर इस फैसले को बिना किसी तैयारी और समझ के लागू किया जाता है तो इसके फायदे कम और नुकसान ज्यादा होंगे. साथ ही चूंकि जेलें राज्य का विषय हैं, इनमें राज्यों की उत्साहवर्धक और ईमानदारी भागीदारी के बिना मनमाफिक नतीजे नहीं मिल सकेंगे.
Courtesy – Zee News

Reimagining prison spaces

Vartika Nanda
July 12, 2018

48-year-old Manoj Jha today is a reformed and confident person. No one, including him, can really believe that he had been in jail for almost 14 years. At the last leg of his punishment as a life convict, he was sent to the Hoshangabad Open Jail in Madhya Pradesh. This ushered in major alterations in his life. With 22 inmates in the open jail, he began his own venture as a contractor. Joined in his venture by three more inmates from the jail, they together began going out on a daily basis and, very soon, started earning almost Rs one lakh a month. Today, Manoj Jha is seen as a symbol of the success of open jails in India. This matter is crucial in light of the ongoing debate on the need for open jails in our country.
The inhuman condition of prisons in India has forced the Supreme Court to intervene in the conduct of the same. Taking into account the study conducted by the Rajasthan Legal Services Authority on open prisons and later on brought into focus by amicus curiae Gaurav Agarwal, the need for having more open spaces in prisons is now gaining prominence.
The Supreme Court of India, in the matter of suo motu Writ Petition (Civil) No. 406/2013 titled Inhuman Conditions Prevailing in 1382 Prisons in India, has asked the Centre and all states to implement its directions on prison reforms. SC directed the Ministry of Home Affairs (MHA) to send a communication to all states/UTs asking for their response to the idea of open prisons – whether they are willing to set up open prisons and the manner in which the open prisons could be feasibly operated. A time period of four weeks was fixed by the Ministry of Home Affairs, in October 2017. In pursuance of these meetings, the Bureau of Police Research & Development (BPR&D) has convened several more meetings, the latest one in May 2018, to recommend uniform guidelines for the administration of open jails throughout the country.


As far as the technicality is concerned, an open prison differs from ordinary prisons in four respects – in structure (dealing with organisation and administration), in role systems (related to work and interaction in everyday life), in normative systems (in the context of social restrictions and expectations guiding behaviour) and in value orientations (impacting conduct and training). In India, the first open prison was started in 1905 under the Bombay Presidency. The prisoners were selected from the special class prisoners of Thane Central Jail, Bombay. However, this open prison was closed in 1910. Later on, the state of Uttar Pradesh established the first open prison camp in 1953 for the construction of a dam over Chandraprabha River near Benaras (now Varanasi). After completing this dam, the prisoners of the open camp were shifted to a nearby place for constructing the dam over Karamnasa River. The third camp was organised at Shahbad for digging a canal. Encouraged by the success of these temporary camps, a permanent camp was started on March 15, 1956, at Mirzapur, with a view to employing prisoners on the work of quarrying stones for the Uttar Pradesh government cement factory, located at Churk, Mirzapur. The initial strength of prisoners in this camp was 150, which went up to 1,700 but is not operational now. Another permanent camp, called Sampurnanad Shivir, was established in 1960 at Sitarganj in Nainital district of Uttar Pradesh (now Uttarakhand). At the time of its establishment, Sampurnanand camp had 5,965 acres of land but, later on, another 2,000 acres of reclaimed land was handed over to the Uttar Pradesh government for the rehabilitation of displaced prisoners. At present, thus, the Sitarganj camp has 3,837 acres of land and is one of the largest open prisons in the world. Ironically, of the 63 open jails in the country, only four accept women inmates. Yerawada Open Jail and the Women’s Open Prison in Trivandrum are exclusively for women, while Durgapura and Sanganer Open Camps in Rajasthan accommodate just a few women inmates. The other 59 open prisons in India have no provision for housing women inmates. It is clearly evident that in some states, women are, in fact, explicitly barred in the admission criteria to open prisons, owing to the belief that the presence of women may lead to some complexities. However, this situation also indicates the lax attitude towards open jails and also the cold disposition towards introducing women to them. For instance, Uttar Pradesh, despite being the largest state in India, has no open jail and there is still no concrete proposal, till this date. States like West Bengal, Uttarakhand and Jharkhand did not provide any details in this regard till the last proceeding in the Supreme Court. There is one open jail in Tihar with about 40 males and no female at all. But there are better examples too. For instance, the state of Gujarat has three open-air jails and the construction of one jail at Baroda is under progress. Proposals are also underway to set up open-air campuses in the Ahmedabad city central prison, Vadodara district prison, Junagadh district prison and Amreli district prison. The state of Maharashtra has 13 open-air prisons, including two for women and there is a proposal to start open-air prisons at six more places. Himachal Pradesh tops the list with seven open jails whereas Madhya Pradesh has two open jails, one in Hoshangabad and the other in Satna with a capacity of 25 inmates each. There is also a proposal to establish 10 open-air camps in central prisons. One cannot hide the fact that prisons have never been on the list of priority both for the Centre and the respective states. Since the inmates are not allowed to vote, they do not receive any political attention. Second, those who are out of sight are also forgotten very quickly. Prisons surely fall under this category of wishful forgetfulness. While the world celebrates International Women’s Day every year on March 8, no one seems to be bothered by the fact that India has only 18 jails specifically for women and just two open jails. With 149 prisons in India encountering an overcrowding of more than 150 per cent, it may be added that open prisons need to be restructured, recognised and implemented. Open prisons must be established in all those states where they do not exist at present. But, who will bring this wisdom to the table and also undertake the onerous effort of getting these ideas executed?
Courtesy – Millennium Post

Jun 29, 2018

चंबल के डाकू और खुली जेल

वर्तिका नंदा 

June 28, 2018

देश में इस समय कुल 63 खुली जेलें हैं जो जरूरत के मुताबिक बेहद कम हैं. इस मई के महीने में मध्य प्रदेश के जिला सतना में एक खुली जेल का उद्घाटन किया गया.



देश में खुली जेलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दखल और दबाव की वजह से पहली बार जेल की सलाखें कुछ पिघलने की तैयारी में दिख रही हैं. देश में इस समय कुल 63 खुली जेलें हैं जो जरूरत के मुताबिक बेहद कम हैं. इस मई के महीने में मध्य प्रदेश के जिला सतना में एक खुली जेल का उद्घाटन किया गया. वैसे तो यह उद्घाटन रस्मी था, क्योंकि मुख्यमंत्री ने खुद खुली जेल में जाने की जहमत उठाने की बजाय सतना के ही एक ठिकाने से उसका शिलान्यास कर दिया, लेकिन तब भी तसल्ली यह कि एक और खुली जेल देश के नाम हुई. इससे पहले 2010 में मध्य प्रदेश के शहर होशंगाबाद में भी एक खुली जेल बनाई गई थी और वह सफल रही है. इन दोनों खुली जेलों में प्रत्येक की क्षमता 25 बंदियों की है.
यह वर्तमान दृश्य है. लेकिन इससे परे खुली जेलों को लेकर मध्य प्रदेश का एक रोचक इतिहास है जिस पर आम तौर पर चर्चा तक नहीं की जाती. असल में मध्‍यप्रदेश में पहली खुली जेल मुंगावली में 1973 में बनी. तब मुंगावली गुना जिले में था और अब जिला अशोकनगर में हैं. इसे 1972 में जय प्रकाश नारायण के सामने आत्‍मसमर्पण करने वाले चंबल के डकैतों के लिए शुरू किया गया था. जेपी के अभियान के दौरान 500 डकैतों ने आत्‍मसमर्पण किया था. इन डकैतों की शर्त थी कि इन्‍हें किसी एक जेल में एक साथ रहने की अनुमति दी जाए. उस समय इस जेल में 72 डकैत थे.
इसी तरह 1976 में बुंदेलखंड में जिन डकैतों ने आत्‍मसमर्पण किया था, उनके लिए लक्ष्‍मीपुर जिला पन्‍ना में खुली जेल बनाई गई. इन जेलों में सर्वोदय अभियान के लोग सुधारक के तौर पर काम करते थे. गुना और पन्‍ना – दोनों ही खुली जेलों को नवजीवन शिविर का नाम दिया गया. बाद में होशंगाबाद में खुली जेल बनी, वो भी नवजीवन ही कहलायी. इन खुली जेलों से डकैतों को कुछ सालों बाद छोड़ दिया गया और 90 के दशक में डकैतों के लिए भी इन खुली जेलों के आखिरकार बंद कर दिया. इन दोनों खुली जेलों में सभी डकैत एक साथ रहते थे. इन डकैतों को खाने-पीने के लिए विशेष भत्‍ता दिया जाता था.
इस बात की जानकारी मुझे सप्रे संग्राहलय भोपाल की छापी हुई किताब- चंबल की बंदूकें, गांधी के चरणों में- से मिली. 
1972 में प्रकाशित पत्रिकानुमा इस किताब का संपादन प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण गर्ग ने किया था. यह किताब डकैतों अपराध और पश्‍चाताप पर कमाल की रोशनी डालती है. किताब के शुरुआत में जयप्रकाश नारायण, विनोबा भावे और इंदिरा गांधी के लिखे हुए शब्‍द दर्ज हैं. उन्‍होंने अपने संपादकीय लेख में लिखा है कि इस पुस्‍तक के लिए हमें 96 घंटे दिए गए थे. लकिन हमने इसे 84 घंटों में तैयार कर दिया.
इस किताब के शुरू में ही लेखक के तौर पर जयप्रकाश नारायण ने 26 अप्रैल 1972 को उन्‍होंने लिखा है कि डकैतों ने जो आत्‍मसमर्पण किया, यह ईश्‍वरीय चमत्‍कार था. विनोबा भावे ने 7 अप्रैल 1972 को लिखा कि ये बागी अपने जीवन में परिवर्तन करना चाहते हैं. इंदिरा गांधी ने इस किताब की शुरुआत में लिखा है कि इस बारे में सार्वजनिक संवाद होना चाहिए और कोई भी कदम उठाने से पहले जनमत बनाना ही चाहिए. उन्‍होंने यह भी लिखा मैं पूरी तरह से सहमत हूं कि डकैतों के आत्‍मसर्पण से जो कल्‍याणकारी प्रभाव बना है, उसको हमें मिटने नहीं देना चाहिए. यह काम चंबल घाटी के आगे के विकास में बहुत सहायक होगा.
असल में जो जेपी के नेतृत्व में हुआ, उसका बीज विनोबा भावे ने ही बोया था और उसी का नतीजा था कि चंबल में डकैतों की समस्या के निदान का रास्ता बन सका. 1960 की मई में जब विनोबा भावे पदयात्रा के दौरान आगरा जिले में पहुंचे तो किसी ने उनसे कहा कि यह डकैतों का क्षेत्र है. तब विनोबा भावे ने कहा कि मैंने डकैतों के नहीं, सज्‍जनों के क्षेत्र में प्रवेश किया है. विनोबा भावे ने बार-बार डकैतों से कहा कि तुम जेल में जाओगे तो तुम्‍हें जेल, जेल जैसी नहीं लगेगी और आत्‍मसमर्पण करने वालों ने इसी बात को अपनी गांठ से बांध लिया.
बाद में जेपी ने मध्‍यप्रदेश, उत्‍तरप्रदेश और राजस्‍थान की सरकारों और केन्‍द्र सरकार से संपर्क किया और तब 1972 में कुल 270 डकैतों ने महात्‍मा गांधी के चित्र के सामने जेपी के कहने पर समर्पण कर दिया. जेपी ने वादा किया कि किसी को फांसी नहीं होगी, लेकिन कानूनी कार्रवाई का सामना करना होगा. यह हिंदुस्‍तान के इतिहास में एक बड़ी घटना थी जिस पर बाद में यथोचित चर्चा नहीं हुई.
यहां एक जरूरी बात यह थी कि इस जेल के बाहर कई ऐसे परिवार भी थे जो जेल में न होते हुए भी जेल का- सा जीवन बिता रहे थे. इन परिवारों में इन बागियों के परिवार और बागियों से पीड़ित- दोनों तरह के परिवार थे. इसमें यह भी जरूरी समझा गया कि ऐसे परिवारों के पुनर्वास के लिए कोई कार्यक्रम बनाया जाए.  
यहां इस घटना को भी याद किया जा सकता है कि भिंड के सत्र न्‍यायालय में 11 लोगों और हत्‍या का अभियोग चल रहा था. यह सभी 11 लोग अपने समय में चंबल के कुख्‍यात डाकू थे. कहते हैं कि न्‍यायाधीश मंजल अली ने फैसला किया था लेकिन ऐन वक्‍त पर उन्‍होंने फैसले को बदल दिया. उन्‍होंने कहा अभियोग तो ऐसा है कि फांसी की सजा देनी चाहिए. लेकिन इन अभियुक्‍तों ने एक संत पुरुष का संदेश सुनकर हथियार डाले हैं और खुद कानून के सामने आए, इ‍सलिए मैं इन्‍हें आजन्‍म कारावास की सजा देता हूं. इस संत का नाम विनोबा भावे था.
 
चंबल की घाटी में एक जमाने में तीन अलग- अलग मौकों पर बड़े स्‍तर पर डकैतों ने आत्‍मसमर्पण किया था. इनमें से एक डाकू ने अपनी कहानी लिखते हुए कहा था कि विनोबा भावे के कहने की वजह से हमें जेल कभी जेल नहीं लगी. हमारे लिए जेल अपने पापों के प्रायश्चित की जगह थी. यानी कहानी यह कि जेलों को देखने का नजरिया अलग भी हो सकता है. जेलों के अंदर दीए जलाने की जरूरत है और एक दीया समाज में भी जलाने की जरूरत दिखाई देती है.
Courtesy: Zee News


Jun 15, 2018

'संजू' और वे लोग, जिनके रिश्ते जेल के अंदर हैं...

वर्तिका नंदा
June 15, 2018

जब फिल्‍में जेल जैसे विषय को असंवेदनशीलता के साथ दिखाती हैं तो वे उस मकसद को तोड़ देती हैं, जिसके लिए फिल्‍म का निर्माण किया गया था.


राजकुमार हिरानी की नई फिल्‍म संजू रिलीज होने से पहले ही चर्चा में है. वैसे भी किसी भी फिल्‍म का प्रोमो बनाए जाने का यही मकसद होता है कि लोग उसे देखने के लिए उत्‍सुक हो जाएं, लेकिन कई बार प्रोमो फिल्म के प्रमोशन के बजाय विवाद की वजह भी बन जाते हैं. संजू के साथ भी यही हुआ है.
राजकुमार हिरानी और विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'संजू' संजय दत्‍त की जिंदगी के विभिन्‍न पहलुओं को दर्शाती है. इसमें मुख्य किरदार में रणबीर कपूर हैं. तीन हिस्‍सों में बनी इस फिल्‍म को उनकी निजी जिंदगी के शुरूआती दिनों, ड्रग्‍स में लिप्त होते समय औऱ फिर टाडा के तहत जेल में भेजे जाने को केंद्र में रखा गया है.
यहां यह याद रखने वाली बात है कि संजय दत्‍त मुंबई की आर्थर रोड जेल और बाद में पुणे की यरवदा जेल में बंद रहे, लेकिन इस फिल्‍म की शूटिंग की भोपाल की उस पुरानी जेल में हुई है जो अब पूरी तरह से बंद है. इस जेल में एक जमाने में शंकरदयाल शर्मा एक स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में रुके थे और बाद में राष्‍ट्रपति बनने पर उन्‍होंने उस पत्‍थर को लोकार्पित किया था जो इनके नाम से आज भी लगा हुआ है. इस जेल में अब बंदी नहीं रखे जाते और यह पुरानी जेल प्रशिक्षण के लिए आने वाले अधिकारियों को ठहरने के काम में लाई जाती है. इसी जेल के बाहर यरवदा जेल के कटआउट लगाकर यरवदा जेल का रूप दिया गया था. (यहां यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि फिल्म की शूटिंग के लिए जेल प्रशासन को कोई फीस नहीं दी गई थी.)
फिल्‍म के प्रोमो को लेकर जो विवाद हुआ है वो काफी हद तक बहस के लायक दिखाई देता है. इस प्रोमो में संजय दत्‍त यानी रणबीर कपूर को जेल की एक अंधेरी कोठरी में बैठे हुए दिखाया गया है, जो गंदगी से भर रही है और संजय दत्त यानी रणबीर कपूर इस पर चीखकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. अगर इसे मौजूदा संदर्भ में देखा जाए और मानवाधिकार और जेल अधिकारों की बात करने वाले देशों में आमतौर पर ऐसा होना बहुत सहज नहीं दिखता. हां, यह बात जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट पिछले लंबे समय से देश की करीब 1,400 जेलों में अमानवीय स्थिति पर चर्चा कर रहा है और जेलें चर्चा के केंद्र में हैं और उन पर चिंतन का माहौल बना है, लेकिन यह भी सच है कि जिस जमाने में संजय दत्‍त जेल के अंदर बंद थे, तब भी एक बड़े अभिनेता को जेल की कोठरी में ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा हो, ऐसा बहुत सहज नहीं लगता.
हालांकि पूरी फिल्‍म को देखे बिना यह कहना मुश्किल है कि इसमें दिखाए गए दृश्‍य हकीकत के कितने करीब हैं, लेकिन इस बीच एक जेल सुधारक ने सेंसर बोर्ड से इस दृश्‍य को हटाए जाने की मांग कर दी है. जाहिर है ऐसे में फिल्मों में जेलों को जिस तरह से दिखाया जाता है, उस पर फिर से बात की जाने लगी है.
असल में जेलें फिल्‍मों के लिए और पूरे समाज के लिए उत्‍सुकता का विषय रही हैं. इस प्रोमो पर जैसे ही विवाद शुरू हुआ, कुछ फिल्‍म नि‍र्माताओं ने कहा कि फिल्‍मों का काम सच या फिर किसी झूठ को एक बड़े स्‍तर पर दिखाना होता है ताकि जनता उससे आकर्षित हो. इसका मतलब यह कि एक छोटी सी घटना बड़े पर्दे पर और भी बड़ी कैसे दिखे, इस पर कई बार ज्यादा तवज्जो होती है. जो बिकेगा, वही दिखेगा- की तर्ज पर फिल्में बहुत बार सच के एक तिनके को पहाड़ भी बना देती हैं और भ्रम का एक संसार खड़ा कर देती हैं. फिल्में जब तक सामाजिक चेतना या विकास को लेकर सक्रियता दिखाती हैं, स्वीकार्य और सम्मानित रहती हैं, लेकिन जब वे सच की एक डोर पर कल्पनाओं के कई रंग पोत देती हैं तो कई खतरों को पैदा कर देती है. यह एक खतरनाक परिस्थिति है, क्योंकि उसे देखने वाला दर्शक कई बार सच के पहलू से अवगत नहीं होता. इसलिए वह जो देखता है, उसे तकरीबन पूरी उम्र अंतिम सच मानता रहता है.
फिल्‍मकार और लेखक अक्‍सर इस बात को भूल जाते हैं कि जेल एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है. जेलों के अंदर न तो मीडिया पहुंचता और न ही कैमरा. जेलों से खबरें जो छनकर बाहर आती हैं, उसी के आधार पर सच के अलग-अलग रूप बनाए जाने की कोशिश होती है. आज भी दुनिया में सबसे ज्‍यादा फिल्‍में भारत में बनती हैं और फिल्‍मों को समाज की तस्‍वीर के तौर पर माना जाता है, लेकिन जब फिल्‍में जेल जैसे विषय को असंवेदनशीलता के साथ दिखाती हैं तो वे उस मकसद को तोड़ देती हैं, जिसके लिए फिल्‍म का निर्माण किया गया था. 
फिल्‍म के इस दृश्‍य को लेकर अगर संजय दत्‍त खुद इस बात की पुष्टि करते हैं कि ऐसा उनके साथ हुआ था तब बात दूसरी है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो इस तरह के दृश्‍य को दिखाकर हम उन लोगों के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ रहे हैं, जिनके परिवार या परिचित जेल के अंदर हैं. वे खुद जेल की बैरक में जाकर अपने रिश्तेदारों के ठहरने की जगह नहीं देख सकते. हां, इन दृश्यों को देखकर दहल जरूर सकते हैं. क्या हमें इन लोगों को नजरअंदाज करना चाहिए जो बिना किसी अपराध के जेल के बाहर वैसे भी एक अनचाही सजा झेल रहे हैं?

Sanju trailer: Toilet scene sparks off debate

यातना नहीं, सुधार की जगह बनें जेलें

डॉ. वर्तिका नन्दा
13 June 2018



Courtesy: Dainik Tribune
http://dainiktribuneonline.com