Jun 15, 2018

'संजू' और वे लोग, जिनके रिश्ते जेल के अंदर हैं...

वर्तिका नंदा
June 15, 2018

जब फिल्‍में जेल जैसे विषय को असंवेदनशीलता के साथ दिखाती हैं तो वे उस मकसद को तोड़ देती हैं, जिसके लिए फिल्‍म का निर्माण किया गया था.


राजकुमार हिरानी की नई फिल्‍म संजू रिलीज होने से पहले ही चर्चा में है. वैसे भी किसी भी फिल्‍म का प्रोमो बनाए जाने का यही मकसद होता है कि लोग उसे देखने के लिए उत्‍सुक हो जाएं, लेकिन कई बार प्रोमो फिल्म के प्रमोशन के बजाय विवाद की वजह भी बन जाते हैं. संजू के साथ भी यही हुआ है.
राजकुमार हिरानी और विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'संजू' संजय दत्‍त की जिंदगी के विभिन्‍न पहलुओं को दर्शाती है. इसमें मुख्य किरदार में रणबीर कपूर हैं. तीन हिस्‍सों में बनी इस फिल्‍म को उनकी निजी जिंदगी के शुरूआती दिनों, ड्रग्‍स में लिप्त होते समय औऱ फिर टाडा के तहत जेल में भेजे जाने को केंद्र में रखा गया है.
यहां यह याद रखने वाली बात है कि संजय दत्‍त मुंबई की आर्थर रोड जेल और बाद में पुणे की यरवदा जेल में बंद रहे, लेकिन इस फिल्‍म की शूटिंग की भोपाल की उस पुरानी जेल में हुई है जो अब पूरी तरह से बंद है. इस जेल में एक जमाने में शंकरदयाल शर्मा एक स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में रुके थे और बाद में राष्‍ट्रपति बनने पर उन्‍होंने उस पत्‍थर को लोकार्पित किया था जो इनके नाम से आज भी लगा हुआ है. इस जेल में अब बंदी नहीं रखे जाते और यह पुरानी जेल प्रशिक्षण के लिए आने वाले अधिकारियों को ठहरने के काम में लाई जाती है. इसी जेल के बाहर यरवदा जेल के कटआउट लगाकर यरवदा जेल का रूप दिया गया था. (यहां यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि फिल्म की शूटिंग के लिए जेल प्रशासन को कोई फीस नहीं दी गई थी.)
फिल्‍म के प्रोमो को लेकर जो विवाद हुआ है वो काफी हद तक बहस के लायक दिखाई देता है. इस प्रोमो में संजय दत्‍त यानी रणबीर कपूर को जेल की एक अंधेरी कोठरी में बैठे हुए दिखाया गया है, जो गंदगी से भर रही है और संजय दत्त यानी रणबीर कपूर इस पर चीखकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं. अगर इसे मौजूदा संदर्भ में देखा जाए और मानवाधिकार और जेल अधिकारों की बात करने वाले देशों में आमतौर पर ऐसा होना बहुत सहज नहीं दिखता. हां, यह बात जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट पिछले लंबे समय से देश की करीब 1,400 जेलों में अमानवीय स्थिति पर चर्चा कर रहा है और जेलें चर्चा के केंद्र में हैं और उन पर चिंतन का माहौल बना है, लेकिन यह भी सच है कि जिस जमाने में संजय दत्‍त जेल के अंदर बंद थे, तब भी एक बड़े अभिनेता को जेल की कोठरी में ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा हो, ऐसा बहुत सहज नहीं लगता.
हालांकि पूरी फिल्‍म को देखे बिना यह कहना मुश्किल है कि इसमें दिखाए गए दृश्‍य हकीकत के कितने करीब हैं, लेकिन इस बीच एक जेल सुधारक ने सेंसर बोर्ड से इस दृश्‍य को हटाए जाने की मांग कर दी है. जाहिर है ऐसे में फिल्मों में जेलों को जिस तरह से दिखाया जाता है, उस पर फिर से बात की जाने लगी है.
असल में जेलें फिल्‍मों के लिए और पूरे समाज के लिए उत्‍सुकता का विषय रही हैं. इस प्रोमो पर जैसे ही विवाद शुरू हुआ, कुछ फिल्‍म नि‍र्माताओं ने कहा कि फिल्‍मों का काम सच या फिर किसी झूठ को एक बड़े स्‍तर पर दिखाना होता है ताकि जनता उससे आकर्षित हो. इसका मतलब यह कि एक छोटी सी घटना बड़े पर्दे पर और भी बड़ी कैसे दिखे, इस पर कई बार ज्यादा तवज्जो होती है. जो बिकेगा, वही दिखेगा- की तर्ज पर फिल्में बहुत बार सच के एक तिनके को पहाड़ भी बना देती हैं और भ्रम का एक संसार खड़ा कर देती हैं. फिल्में जब तक सामाजिक चेतना या विकास को लेकर सक्रियता दिखाती हैं, स्वीकार्य और सम्मानित रहती हैं, लेकिन जब वे सच की एक डोर पर कल्पनाओं के कई रंग पोत देती हैं तो कई खतरों को पैदा कर देती है. यह एक खतरनाक परिस्थिति है, क्योंकि उसे देखने वाला दर्शक कई बार सच के पहलू से अवगत नहीं होता. इसलिए वह जो देखता है, उसे तकरीबन पूरी उम्र अंतिम सच मानता रहता है.
फिल्‍मकार और लेखक अक्‍सर इस बात को भूल जाते हैं कि जेल एक बहुत संवेदनशील मुद्दा है. जेलों के अंदर न तो मीडिया पहुंचता और न ही कैमरा. जेलों से खबरें जो छनकर बाहर आती हैं, उसी के आधार पर सच के अलग-अलग रूप बनाए जाने की कोशिश होती है. आज भी दुनिया में सबसे ज्‍यादा फिल्‍में भारत में बनती हैं और फिल्‍मों को समाज की तस्‍वीर के तौर पर माना जाता है, लेकिन जब फिल्‍में जेल जैसे विषय को असंवेदनशीलता के साथ दिखाती हैं तो वे उस मकसद को तोड़ देती हैं, जिसके लिए फिल्‍म का निर्माण किया गया था. 
फिल्‍म के इस दृश्‍य को लेकर अगर संजय दत्‍त खुद इस बात की पुष्टि करते हैं कि ऐसा उनके साथ हुआ था तब बात दूसरी है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो इस तरह के दृश्‍य को दिखाकर हम उन लोगों के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ रहे हैं, जिनके परिवार या परिचित जेल के अंदर हैं. वे खुद जेल की बैरक में जाकर अपने रिश्तेदारों के ठहरने की जगह नहीं देख सकते. हां, इन दृश्यों को देखकर दहल जरूर सकते हैं. क्या हमें इन लोगों को नजरअंदाज करना चाहिए जो बिना किसी अपराध के जेल के बाहर वैसे भी एक अनचाही सजा झेल रहे हैं?

Sanju trailer: Toilet scene sparks off debate

यातना नहीं, सुधार की जगह बनें जेलें

डॉ. वर्तिका नन्दा
13 June 2018



Courtesy: Dainik Tribune
http://dainiktribuneonline.com

Jun 7, 2018

Bihar's jails are way too crowded, liquor arrests made it worse

Written By: Vartika Nanda
June 7, 2018

14 of Bihar's jails hold more than 150 percent of their capacity.


Who cares about prisons? Do people languishing inside actually matter to us? Why are our prisons overcrowded? Is it because of the rise in crime, quicker 'justice' delivered in courts, or the lack of system both inside and outside prisons? Questions are enormous. Thus, it is pertinent to analyse the situation at hand.
There have been a series of attempts on prison reforms in the Indian context in varied forms. Many debates have followed with the basic understanding that prisons do not diminish crime rate, they may be seen as a solution to tackle with crime but that cannot be the ultimate solution. Also, prisons need constant improvement because they are undoubtedly a part of the society.
With the ongoing hearing in the Supreme Court of India pertaining to inhuman conditions in 1382 prisons in India, debates related to prison reforms have started emerging. According to figures provided by the government in Rajya Sabha in 2018, India's 1,412 jails are crowded to 114% of their capacity, with a count of 4.33 lakh prisoners against a capacity of less than 3.81 lakh until December 31, 2016. The 1,401 jails of 2015 have a break-up of 741 sub-jails, 379 district jails and 134 central jails, the rest being open jails, women's jails, special jails and other jails. There are only 18 women jails in India comprising just over 1% of the total. Statistics clearly suggest that the ratio of men entering the prisons is much higher as compared to women. In 2016, 18,498 women were lodged in prisons against a capacity of 26,068, or 71%, while the 4,14,505 men overshot the capacity of 3,54,808 by 17%. There are also examples of states where women have outnumbered men. Chhattisgarh had a female occupancy of 186%, followed by Uttarakhand (141%), Delhi (138%), Goa (120%) and Uttar Pradesh (117%). Goa showed a striking contrast: while its women prisoners were 20% over capacity, men prisoners were less than 36% of capacity. Overall, the state had among the lowest occupancies at 38%.
In 2017, Supreme Court of India had directed Chief Secretaries of 18 States/UTs to review the progress of the various constructions of jails/ barracks and take decisions on all proposals for construction of additional jails/barracks and evaluate those prisons where over-crowding is more than 150%. These included Andhra Pradesh, Assam, Bihar, Chhattisgarh, Delhi, Gujarat, Jharkhand, Karnataka, Madhya Pradesh, Maharashtra, Odisha, Punjab, Rajasthan, Uttar Pradesh and West Bengal. The affidavits received by the amicus curiae, Gaurav Aggarwal, throw light on where we stand.  
It is shocking to note that prisons, both in UP and Bihar display an image of complete neglect. There are eight central, 32 district and 18 sub-jails in Bihar. According to a report published in the Business Line in 2017, all the 58 jails in Bihar are overflowing with inmates. The situation worsened when 35,000 people were arrested and sent to jail under the liquor law in the state since April 2016.  
14 jails in Bihar are overcrowded beyond 150%. The chart submitted to the Hon'ble Supreme Court in May, 2018 is self-explanatory:  
The information given by Bihar to address the above problem is as follows:
1) 3 District jails at Aurangabad, Bhabhua and Jamui with capacity of 2718 prisoners are near completion. 
2) Construction of prisoner ward at Gaya, Purnea, Sitamarhi, Bettiah, Arrah, Gopalganj, Chhapra, Bhagalpur [for women prisoners] and Jhanjharpur with capacity of 3076 are under process. 
3) Construction of new district jails at Madhepura, Arwal and Sub-Jails at Kahalgaon and Paliganj are also under process for the project estimate and acquisition of land.
But the main question still remains unanswered. Do we have our systems in place to deal with overcrowding? Also, do we have timelines for completing the projects and also can prisons get some attention please?
Like many other states, Bihar has also not provided any specified time line for completing these projects. Also, the issue of filling up the vacant posts remains unanswered.  

Jun 4, 2018

तिनका-तिनका: कब सुधरेंगी उत्तर प्रदेश की जेलें?

Coumnist: Vartika Nanda
May 23, 2018

कानून और व्यवस्था ही नहीं बल्कि जेलों के मामले में भी उत्तर प्रदेश बेदम है. उत्तर प्रदेश की आधी से ज्‍यादा जेलों में अपनी निर्धारित संख्या से 150 प्रतिशत से ज्‍यादा बंदी हैं और राज्य सरकार के पास इससे निपटने का कोई ठोस उपाय दिखाई नहीं देता.


कानून और व्यवस्था ही नहीं बल्कि जेलों के मामले में भी उत्तर प्रदेश बेदम है. उत्तर प्रदेश की आधी से ज्‍यादा जेलों में अपनी निर्धारित संख्या से 150 प्रतिशत से ज्‍यादा बंदी हैं और राज्य सरकार के पास इससे निपटने का कोई ठोस उपाय दिखाई नहीं देता. सुप्रीम कोर्ट में गौरव अग्रवाल की दायर की गई जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह बात सामने उभरकर सामने आई कि देश की ज्यादातर जेलें अतिरिक्‍त बोझ से दबी हुई हैं. यह याचिका देश की 1382 जेलों की अमानवीय परिस्थितियों को लेकर दायर की गई है. अब तक जारी रिपोर्टों के मुताबिक उत्तर प्रदेश और बिहार की जेलों की सबसे खस्ता हालत है. 
इस साल मई के महीने में सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए अपने हलफनामे में उत्‍तर प्रदेश सरकार ने इन बातों को खासतौर पर रखा है: 
* उत्‍तर प्रदेश के चार जिलों में नई जेलों का निर्माण किया जा रहा है. यह जिले हैं- अंबेडकर नगर, सरस्‍वती संघ, कबीर नगर और इलाहाबाद. इनमें कैदियों को रखने की निर्धारित क्षमता 4723 होगी. लेकिन इस हलफनामे में उत्‍तरप्रदेश सरकार ने कहीं भी यह नहीं लिखा है कि इन जेलों में निर्माण का काम किस स्‍तर तक पहुंच चुका है और यह निर्माण कब पूरा होगा.
* उत्‍तर प्रदेश सरकार अपनी मौजूदा जेलों में 59 नई बैरक बनाने का काम भी कर रही है जिससे 1780 बंदियों के लिए अतिरिक्‍त जगह बन सकेगी. लेकिन यहां पर भी उत्‍तरप्रदेश सरकार ने किसी भी समय-सीमा का उल्‍लेख नहीं किया है.
* राज्‍य सरकार ने कहा है कि ललितपुर जिले की जेलों में बंदियों को रखने की 4500 की क्षमता है लेकिन अब नए निर्माण के तहत इसकी क्षमता 16,500 बंदियों तक बढ़ाई जा सकेगी. इसके लिए नई जेलों के लिए जमीन की या तो पहचान कर ली गई है या फिर उन्हें खरीदा जा चुका है.
कोर्ट में यह बात कही गई कि उत्‍तरप्रदेश सरकार ने जो जवाब सौंपा है, उससे राज्‍य सरकार की अ-गंभीरता साफ तौर पर दिखाई देती है. अपने किसी भी जवाब में उत्‍तरप्रदेश सरकार ने समय- सीमा का कोई उल्‍लेख नहीं किया है. इससे पहले जेलों में कैदियों की हालत का खुलासा 2017 में आगरा के आरटीआई एक्टिविस्ट नरेश पारस की उस रिपोर्ट से हुआ था जिसमें उत्तर प्रदेश की प्रदेश से कैदियों की मौत की मांगी गई रिपोर्ट में हुआ था. इस रिपोर्ट के मुताबिक़ वर्ष 2012 से जुलाई 2017 तक पूरे प्रदेश में जेल में बंद कैदियों की मौत 2 हजार से अधिक है जिनमें एक महिला कैदी भी शामिल है. इन मृतकों में 50 फीसद विचाराधीन बंदी थे. इनकी उम्र 25 से 45 साल के बीच थी. सबसे ज्यादा मौतें क्षय रोग और सांस की बीमारी के चलते होना बताई गई थी. पूरे उत्तर प्रदेश में 62 जिला जेल, पांच सेंट्रल जेल और तीन विशेष कारागार हैं.
इसी तरह बिहार की कम से कम 14 जेलें भीड़ की समस्‍या का सामना कर रही हैं. इनमें पटना की मॉडल सेंट्रल जेल से लेकर पूर्णिया, बेतिया, सीतामणि, कटियार, भागलपुर, माटीपुरा, छपरा, किशनगढ़, औरंगाबाद, गोपालगंज, जमोई और झांझरपुर तक की उप-जेलें शामिल हैं.
सुप्रीम कोर्ट में दायर जबाव में बिहार की तरफ से यह जबाव आया कि कुछ नई जेलों का निर्माण किया जा रहा है. लेकिन यह बात साफ नहीं की गई कि यह काम कब तक पूरा होगा और इस काम के लिए अतिरिक्‍त स्‍टाफ का चयन कब तक होगा.
यह बात जाहिर है कि राज्य सरकारों के लिए जेलें कहीं प्राथमिकता की सूची में नहीं आतीं. देश की सर्वोच्च अदालत के दखल के बावजूद जिन राज्यों में जेल सुधार को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखती, उनमें उत्तर प्रदेश और बिहार की जेलें अव्वल हैं. लेकिन जेलों की परवाह करने की फुरसत भला किसके पास है?

मदर्स डे: जेल में मां, बच्चे और सजा

Written By: Vartika Nanda
May 13, 2018

पूरे देश में करीब 4 प्रतिशत महिलाएं जेलों में बंद हैं और उनके साथ करीब 1800 बच्चे भी वहीं रहने को मजबूर हैं.



मातृ दिवस पर खूब तस्वीरें खिंचीं. प्रचार हुआ. मांओं की वंदना में गीत हुए. बचपन को भी सम्मान मिला. लेकिन कुछ मांएं और कुछ बच्चे किसी को याद न आए. ये वे मांएं हैं जो जेलों में बंद हैं. ये वे बच्चे हैं जो अपनी मां या पिता के साथ जेल में हैं. पूरे देश में करीब 4 प्रतिशत महिलाएं जेलों में बंद हैं और उनके साथ करीब 1800 बच्चे.
जो अपराध करे, उसे कानून जेल में भेजे. अपराध मुक्‍त समाज को बनाने के लिए सामाजिक और राजनीतिक परिभाषा जेल को अपराध की सजा, पश्‍चाताप, सुधार और बदलाव से जोड़ती है. जेल में जाने वालों में स्‍त्री भी हो सकती हैं, पुरुष भी और यहां तक कि किन्‍नर भी. लेकिन उनका क्‍या जो किसी और के हिस्‍से के अपराध की सजा पाते हुए जेल में डाल दिए गए. जिन्‍हें अपराध का मतलब तक नहीं मालूम जो अ-घोषित अपराधी हैं और जिन्‍हें जेल भेज देने का पश्‍चाताप न सरकार को होता है और न ही कानून को या फिर समाज को.
ये वो बच्‍चे हैं जो किसी परिस्थिति में अपनी मां या पिता के साथ जेल में आए हैं. इनमें से बहुत से बच्‍चों का जन्‍म जेल में हुआ. हां, सरकार ने नियम जरूर बना दिए कि जेल में पैदा होने वाले बच्‍चे के जन्‍म सर्टिफिकेट पर जेल शब्‍द नहीं लिखा जाएगा. भारतीय कानून के मुताबिक ये बच्‍चे अपने माता या पिता के साथ 6 साल की उम्र तक जेल में रह सकते हैं. इसके बाद इन्‍हें या तो किसी एनजीओ को सुपुर्द किया जाएगा या फिर इनका बचा-कुचा परिवार इनको अपने साथ ले जाएगा.
ताज्‍जुब की बात ये है कि मानवाधिकार की सारी कोशिशों के बावजूद जेल में रहे बच्‍चों की गिनती कहीं नहीं है. चूंकि जेल में पड़े बंदी वोट नहीं दे सकते, ये लोग राजनीति सरोकार की बहस का हिस्‍सा भी नहीं बन पाते. बिना किसी जन्‍मदिवस, त्‍यौहार या फिर एक संतुलित परिवार के ये बच्चे हवा में झूलते हैं. जेल के खुरदरे होते जाते स्टाफ, पसीने भरी बैरकों और बेहद सीमित साधनों के बीच घुट-घुट कर जीने वाली जेलों में रहते ये बच्‍चे पैदा होते ही बुजुर्ग हो जाते हैं. वैसे तो देश में महिलाओं के लिए अलग जेलें बनाने का प्रावधान भी है. लेकिन महज 17 फीसदी यानी तीन हजार महिलाओं को ही वहां रखने की जगह है. बाकियों को विभिन्न केंद्रीय जेलों और जिला जेलों में ही अलग बैरकों में रखा जाता है. ये जेलें भीड़ भरी होती हैं और बच्चों को किसी अलग कमरे में रखने का यहां कोई इंतजाम नहीं होता.
वैसे भारत सरकार ने 1987 में जस्टिस कृष्ण अय्यर समिति का गठन किया था जिसका मकसद जेल की महिला कैदियों की स्थिति का आकलन करना और उसमें सुधार को लेकर अपने सुझाव देना था. इस समिति ने जेलों में महिला पुलिस की संख्या में बढ़ोतरी पर खास जोर दिया था और जेल में महिला बंदियों की सुरक्षा पर कई जरूरी सुझाव भी दिए थे. इस समिति ने महिला बंदियों और उनके बच्चों को लेकर भी जरूरी दिशा-निर्देश दिए थे. लेकिन इसके बावजूद स्थितियां बहुत बदल नहीं सकीं. राज्य सरकारों की ढिलाई काफी हद तक कायम रही.
अब जबकि सुप्रीम कोर्ट देश की 1382 जेलों की अमानवीय परिस्‍थति पर तवज्‍जो दे रहा है, जेल की महिलाएं और बच्‍चे फोकस में आ गए हैं. इस बार महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और राष्‍ट्रीय महिला आयोग को गौरव अग्रवाल के जरिए जो सलाहें भेजी गई, उनमें मेरी दी बाकी सलाहों के अलावा यह सलाह भी शामिल की गई है कि जेल के बच्‍चों का जन्‍मदिन भी मनाया जाए ताकि उनका बचपन और बचपन से जुड़ी यादें सुरक्षित रह सके.
बाहर रहने वाले लोगों को ये अंदाजा भी नहीं है कि जेल में रहने वाले बच्‍चे इस अलग संसार में जीते हैं. ये खरगोश, गाय और यहां तक कि बकरी को नहीं पहचानते. ये रिश्‍तों को नहीं पहचानते. रिश्‍तों के नाम पर इन्‍होंने अपने आस-पास जेल के बंदी देखे हैं या फिर पुलिस की वर्दी में आने वाले जेल के अधिकारी. ये इस परिवेश से जुड़ी मजबूरियों को ही अपना रिश्‍ता और नाता समझ लेते हैं. 6 साल के अपने प्रवास में जिंदगी के जो पल ये जेल में गुजारते हैं, वो ताउम्र इनकी यादों से दूर नहीं होती. लेकिन इसकी परवाह किसे है?
http://zeenews.india.com/hindi/special/mothers-day-special-mothers-in-jail-blog-by-dr-vartika-nanda/400320

जब जेल में अज्ञेय ने लिखी 'शेखर: एक जीवनी'

Written By: Vartika Nanda
May 5, 2018
सच्चिदानन्द हीराननद वात्सयायन 'अज्ञेय' का लिखा यह कालजयी उपन्यास जेल की कोल-कोठरी में ही पनपा. इस उपन्यास का पहला भाग 1941 और दूसरा भाग 1944 में सरस्वती प्रेस, बनारस से प्रकाशित हुआ था. तीसरा भाग कभी नहीं आ सका, क्योंकि उसकी प्रति जेलर ने जब्त कर ली थी और फिर कभी लौटाई ही नहीं. 



दुनिया भर की शायद हर जेल में किसी मौके पर किसी न किसी के हाथ में कलम मौजूद रही और फिर लेखन भी हुआ. इऩमें से कुछ पन्ने बाहर की रोशनी देख सके, कुछ गुमनाम हो गए या मिटा दिए गए. जेल में लिखे दस्तावेजों के सिलसिले में आज बात शेखर: एक जीवनी की.
सच्चिदानन्द हीराननद वात्सयायन 'अज्ञेय' का लिखा यह कालजयी उपन्यास जेल की कोल-कोठरी में ही पनपा. इस उपन्यास का पहला भाग 1941 और दूसरा भाग 1944 में सरस्वती प्रेस, बनारस से प्रकाशित हुआ था. तीसरा भाग कभी नहीं आ सका, क्योंकि उसकी प्रति जेलर ने जब्त कर ली थी और फिर कभी लौटाई ही नहीं. कहते हैं कि चंद्रशेखर आजाद ने अज्ञेय को यह जिम्मेदारी दी थी कि वे भगत सिंह को जेल से भगा लाएं, लेकिन लाहौर बम कांड के दौरान भगवती चरण वर्मा की मौत की वजह से यह योजना धरी की धऱी रह गई. इसके बाद यशपाल ने उऩ्हें हिमालय की पहाड़ियों में करीब एक महीने तक छिपाए रखा, लेकिन नवंबर 1930 में वे अमृतसर में पुलिस की गिरफ्त में आ ही गए. उसके बाद अज्ञेय ने लाहौर, दिल्ली और पंजाब की जेलों में अपनी सजा काटी. 
'शेखर: एक जीवनी' के प्रथम भाग के लेखन की शुरुआत मुलतान जेल में नवंबर 1933 में और समाप्ति कलकत्ता में अक्टूबर 1937 में हुई. यायवरी के लिए मशहूर अज्ञेय ने शेखर की भूमिका 28 अक्तूबर 1939 को मेरठ में पूरी की, जबकि 1938 के 'रूपाभ' में संपादक सुमित्रानंदन पंत ने 'शेखर: एक जीवनी' प्रथम भाग का अंश 'खोज' शीर्षक से प्रकाशित किया. अज्ञेय ने खुद उपन्यास की शुरुआत में ही इस बारे में लिखा है- 
''यही उस रात के बारे में कह सकता हूं. उसके बाद महीना भर तक कुछ नहीं हुआ. एक मास बाद जब मैं लाहौर किले से अमृतसर जेल ले जाया गया, तब लेखन-सामग्री पाकर मैंने चार-पांच दिन में उस रात में समझे हुए जीवन के अर्थ और उसकी तर्क-संगति को लिख डाला. पेंसिल से लिखे हुए वे तीन-एक सौ पन्ने 'शेखर : एक जीवनी' की नींव हैं. उसके बाद नौ वर्ष से अधिक मैंने उस प्राण-दीप्ति को एक शरीर दे देने में लगाए हैं.''
हिंदी साहित्य का इतिहास इस बात का गवाह है कि 'शेखर : एक जीवनी' अज्ञेय का सबसे अधिक पढ़ा गया उपन्यास रहा है. हालांकि इस पर लगातार बहस होती रही कि उपन्यास का नायक शेखर खुद अज्ञेय ही हैं या कोई और व्यक्ति, या कल्पना से रचा गया कोई पात्र. कुछ लोग इसे पूरी तरह उनकी आत्मकथात्मक कृति मानते हैं, लेकिन खुद अज्ञेय ने इस बात को जोर देकर कहा था कि यह 'आत्म-जीवनी’ नहीं है. 
अज्ञेय का यह उपन्यास मानो जेल की जिंदगी को सामने उधेड़ कर ही रख देता है. यहां उनके लिखे कुछ वाक्य देखिए- 
वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है. जो यातना में है, वह द्रष्टा हो सकता है.
फांसी का पात्र मैं अपने को नहीं समझता था, न अब समझता हूं, लेकिन उस समय की परिस्थिति और अपनी मनःस्थिति के कारण यह मुझे असंभव नहीं लगा, बल्कि मुझे दृढ़ विश्वास हो गया कि यही भवितव्य मेरे सामने है. ऊपर मैंने कहा कि घोर यातना व्यक्ति को द्रष्टा बना देती है. यहां यह भी कहूं कि घोर निराशा उसे अनासक्त बनाकर द्रष्टा होने के लिए तैयार करती है. जेल में बंद अज्ञेय अपने लेखन के जरिए खुद को बचाए रखते हैं. उनके मन में अनगिनत सवाल हैं जो महज लेखकीय नहीं हैं, बल्कि मानवाधिकार को लेकर भी जरूरी टिप्पणियां हैं. आज जब जेल सुधार को लेकर पूरी दुनिया में बहस होने लगी है, जेल के अंदर से लिखा गया अज्ञेय का यह उपन्यास जेल की जिंदगी, उसकी नकारात्मकता, खालीपन, सामाजिक कटाव और मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल को चीर कर सामने ला देता है- 
''कहते हैं कि मानव अपने बन्धन आप बनाता है; पर जो बन्धन उत्पत्ति के समय से ही उसके पैरों में पड़े होते हैं और जिनके काटने भर में अनेकों के जीवन बीत जाते हैं, उनका उत्तरदायी कौन है?''
अज्ञेय ने जेल के अकेलेपन को बार-बार उकेरा है. वहां मौजूद मानवीय संवेदनाओं को बड़ी महीनता से पकड़ा है. उदासी के गहरे माहौल में खुशी ढूंढने में लगे बंदी उसे प्रभावित करते हैं. एक जगह पर अज्ञेय जेल में ही बंद एक साथी से मुलाकात के बाद उस पहली मुलाकात के सार को कुछ इस तरह से लिखते हैं–
''मेरा नाम मदनसिंह है. सन 19 में पकड़ा गया था. तब से जेल में हूं.' 21 वर्ष जेल में रहकर यह आदमी ऐसे हंस सकता है. शेखर को लगा कि वह कुछ छोटा हो गया है या उसके सामने वाला व्‍यक्ति कुछ ऊंचा उठ गया है. बरसों पहले लिखा गया अज्ञेय का यह उपन्यास जेलों की मौजूदगी की ही तरह साहित्य के फलक पर हमेशा जिंदा रहेगा. तिनका-तिनका इसकी कड़ी को आगे ले जा रहा है और देश की जेलों में लिखे जा रहे साहित्य को आपस में जोड़ रहा है.

दो आंखें बारह हाथ और देश की खुली जेल...

Columnist: Vartika Nanda

May 3, 2018 

शांताराम की बनाई इस फिल्‍म में एक आदर्शवादी जेलर की भूमिका खुद वही शांताराम ने ही निभाई है. आदीनाथ के चरित्र के जरिए ये खूंखार अपराधियों को बदलते हुए और फिर सामाजिक जीवन में लौटने की कोशिश करते दिखते हैं. 


जेलें एक आम रास्‍ता नहीं है. यही वजह है कि जेलों के बारे में जानने के लिए साहित्‍य और फिल्‍में सबसे आसान साधन बनती हैं. यह माध्यम कभी कोरी कल्पना और कभी किसी बड़े यथार्थ के जरिए जेलों को जनता से जोड़ देते हैं. ऐसी ही एक मिसाल बनी थी- दो आंखें बारह हाथ नाम की फिल्‍म.
1957 में व्ही शांताराम निर्मित दो आंखें, बारह हाथ जेल सुधार को लेकर एक बड़े प्रयोग को सत्यापित करती है. इस फिल्म में आदीनाथ नाम का जेल का युवा वॉर्डन पैरोल पर छूटे 6 दुर्दांत कैदियों को सुधारने में एक बड़ा काम कर दिखाता है. एक बंजर जमीन को हरे खेत में तब्दील कर यह कैदी आखिर में खुद को भी बदला हुआ पाते हैं.
इस फिल्म की एक खास बात यह रही कि इसे खुद एक जेलर ने लिखा था. पहले यह फिल्म एक किताब के रूप में सामने आई और बाद में इसे एक फिल्‍म में तब्‍दील कर दिया. इसे लिखने वाला जेलर जेलों की जिंदगी में बदलाव का एक साधन बन जाएगा, यह खुद उस जेलर ने भी कभी सोचा नहीं होगा. इस फिल्‍म की रूपरेखा खुले जेल के प्रयोग पर आधारित थी.
वहीं शांताराम की बनाई इस फिल्‍म में एक आदर्शवादी जेलर की भूमिका खुद वही शांताराम ने ही निभाई है. आदीनाथ के चरित्र के जरिए ये खूंखार अपराधियों को बदलते हुए और फिर सामाजिक जीवन में लौटने की कोशिश करते दिखते हैं. यह अपने आप में एक ऐसा प्रयोग था जिसने जो जेल सुधार के क्षेत्र में इस बात की संभावना पैदा करते कि कोशिश करने पर खूंखार अपराधी भी बदल सकता है. इस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म के लिए राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया था. 1957 में फ़िल्म फेस्टिवल में सिल्वर बियर पुरस्कार और 1957 में राष्‍ट्रपति का स्‍वर्ण पदक मिला था. 1958 में चार्ली चैपलिन के नेतृत्‍व वाली जूरी ने इसे 'बेस्‍ट फ़िल्‍म ऑफ़ द ईयर' का खिताब भी दिया था.
यह इस फिल्म की ताकत और सफलता ही हे कि इसके बनने के 70 साल बाद आज भी देश खुली जेलों और खुली कॉलोनी पर चिंतन और बहस कर रहा है.
बरसों पहले महाराष्ट्र में सतारा के पास स्‍वतंत्रपुर नाम की एक चौकी में इस खुली जेल कॉलोनी को बसाया गया था. उस समय कुछ बंदियों के जरिए उनके जीवन में बदलाव लाने की मुहिम शुरू हुई और इस जेलर ने इन बंदियों को खेती करते-करते खुद बदलते हुए देखा. भरत व्यास के लिखे और लता मंगेशकर के गाए गाने- ऐ मालिक तेरे बंदे हम को आज भी देश की बहुत-सी जेलों में सुबह की प्रार्थना के तौर पर गाया जाता है.
दरअसल, इन खुली कालोनियों में बंदी अपनी सजा के अंतिम पड़ाव में पहुंचते हैं. उनका चुनाव एक टीम करती है. जिनका चुनाव हो जाता है, वे यहां आकर अपने परिवार के साथ रहने के लिए आजाद होते हैं. जिनका चुनाव नहीं होता, उन्हें अपनी बाकी सजा जेल में ही पूरी करनी पड़ती है. जो बंदी यहां आ जाते हैं, उऩ्हें इस बड़े इलाके में रहने और खुद अपनी आजीविका कमाने के योग्य बनाया जाता है. ये कैदी यहां खेती करते हैं और अपने परिवार के साथ यहां रहते हैं. लेकिन यहां एक दिलचस्‍प बात ये भी है कि अब ये कैदी अपने गांव वापस नहीं जाना चाहते. उन्‍हें लगता है कि ये कॉलोनी उनके लिए ज्‍यादा सुरक्षित है. इन जेलों में काम कराने वाले अधीक्षक को भी जेलर की बजाए लाईजेन ऑफीसर भी कहा जाता है.
फिलहाल इस ओपन कॉलोनी में सिर्फ चार ही बंदी हैं. इस समय 28 नए कमरे बनाए जा रहे हैं ताकि ज्यादा कैदियों को यहां रखा जा सके. महाराष्ट्र की जेलों के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. भूषण कुमार उपाध्याय के नेतृत्व में महाराष्ट्र वैसे भी जेल सुधार के कई नए आयाम स्थापित कर चुका है. जिस देश में आज भी महिलाओं के लिए बनी चार खुली जेलों में से एक महाराष्ट्र में ही हो, वहां मानवाधिकार के लिए एक ईमानदार नीयत को स्वाभाविक तौर पर महसूस किया जा सकता है.
चाहे खुली जेलें हो या बिना पहरे के चलने वाली कालोनियां- इन सभी ने जेल सुधार को लेकर कई आशाओं और आशवस्तियों को जन्म दिया है. 

Jun 2, 2018

Open jails are a great idea, but why do we not want more of them?


Columnist: Vartika Nanda
April 18, 2018
Only 4 of the 63 open jails in the country accept women.
48-year-old Manoj Jha today is a reformed and a confident person. No one, including him, can believe that he had been in jail for almost 14 years. At the last leg of his punishment as a life convict, he was sent to the Hoshangabad Open Jail in Madhya Pradesh, bringing in major changes in his life. With 22 inmates in the open jail, he started his own venture as a contractor. Joined by three more inmates from the jail in his venture, they started going out of the jail on a daily basis and very soon, started earning almost Rs 1 lakh a month. Today, Manoj Jha is seen as a symbol of success of open jails in India. This is crucial in light of the ongoing debate on the need of open jails.
The inhumane conditions of 1382 prisons in India have forced the Supreme Court of India to intervene. Taking into account the study conducted by the Rajasthan Legal Services Authority on open prisons, and recommendations in the report prepared by activist Smita Chakraburtty, further brought into focus by amicus curiae Gaurav Agarwal, the need for having more open spaces in prisons is now gaining prominence. 
During the hearing of a writ petition in December 2017, the Supreme Court of India directed Ministry of Home Affairs to send a communication to all states/UTs asking for their response to the idea of open prisons - whether they are willing to set up open prisons, and the manner in which open prisons could be operated. A time period of four weeks was fixed by the Ministry of Home Affairs, in October 2017. In pursuance of these meetings, BPR&D has convened several meetings, the latest one in February-end, to recommend uniform guidelines for the administration of open jails throughout the country. 
Ironically, of the 63 open jails in the country, only 4 accept women inmates at all. Yerawada Open Jail and the Women's Open Prison in Trivandrum are exclusively for women, while Durgapura and Sanganer Open Camps in Rajasthan take in a few women inmates. The other 59 open prisons in India have no provision for accommodating women inmates. It seems that in some states, women are in fact explicitly barred in the admission criteria to open prisons, believing that the presence of women may lead to some complexities.
An open prison differs from the ordinary prisons in four respects - in structure (affecting organization and administration), in role systems (affecting work and interaction in everyday life), in normative systems (affecting social restrictions and expectations guiding behaviour), and in value orientations (affecting conduct and training).
In India, the first open prison was started in 1905 under the Bombay Presidency. The prisoners were selected from the special class prisoners of Thane Central Jail, Bombay. However, this open prison was closed in 1910. The state of Uttar Pradesh established the first open prison camp in 1953 for the construction of a dam over Chandraprabha River near Benaras (now Varanasi).
After completing this darn, the prisoners of the open camp were shifted to a nearby place for constructing the dam over Karamnasa River. The third camp was organised at Shahbad for digging a canal.
Encouraged by the success of these temporary camps, a permanent camp was started on March 15, 1956 at Mirzapur with a view to employing prisoners on the work of quarrying stones for Uttar Pradesh government cement factory at Churk, Mirzapur. The initial strength of prisoners in this camp was 150 which went up to 1,700 but has now come down to 800. Another permanent camp, called Sampurnanad Shivir, was established in 1960 at Sitarganj in Nainital district in Uttar Pradesh.
At the time of its establishment, Sampurnanand camp had 5,965 acres of land but later on, another 2,000 acres of reclaimed land were handed over to the Uttar Pradesh government for the rehabilitation of displaced persons. At present, thus, the Sitarganj camp has 3,837 acres of land and is one of the largest open prisons in the world.
Prisoners selected for the camp from different jails of the state are transferred to district jail, Bareilly, from where they are shifted to the camp.
With 149 prisons in India facing an overcrowding of more than 150%, it may be added that open prisons need to be restructured, recognized and implemented. Open prisons must be established in all those states where they do not exist at present.

Soul search: How poems of four Tihar jail inmates will soon inspire Yerwada women inmates

The poems were written by Tihar jail inmates Seema Raghuvanshi, Aarti, Rama Chauhan and Riya Sharma. The poems deal with family, soul searching, emotions and life in prison.


Providing an insight into their lives, four women inmates of Tihar jail wrote 150 poems that were compiled into a book called Tinka Tinka Tihar, released in Hindi and English. However, to help women inmates of Yerwada jail find a voice through the book, the poems have been translated in Marathi, to be released by the director general of police (DGP), prisons, Bhushan Kumar Upadhaya at 11 am inside the women’s prison at Yerwada on April 21.
Mehta Publications will release the Marathi version of Tinka Tinka Tihar that has found a place in the 2015 Limca Book of Records. The original book was edited by Vartika Nanda and Vimla Mehra, Indian Police Service (IPS), former director general (DG), Delhi Prisons. Marathi author Manjiri Dhamankar translated the book in Marathi.
The poems were written by Tihar jail inmates Seema Raghuvanshi, Aarti, Rama Chauhan and Riya Sharma. The poems deal with family, soul searching, emotions and life in prison.
“The book came to me three years ago and it was one of the most fascinating books of poems. Through these poems, the women are venting out their emotions. You get a glimpse of what is going on in their minds and their thoughts are similar to that of any common man,” Dhamankar said.
She said, “We have a notion about jail and its inmates and often tend to believe that all inmates are criminals. It was while translating these poems that I felt a bond that they are also women who have the same feelings and that the only difference is they are in prison.”
It is the first book of collection of poems written by select women inmates of Tihar jail and was published in English and Hindi by Rajkamal Prakashan. The book was released by Sushil Kumar Shinde, the then minister of home affairs, at the Vigyan Bhawan in New Delhi in September 2013.