Friday, November 13, 2009

सपने अभी मरे नहीं और कविता भी

कविता, वो भी हिंदी में, युवाओं के मुख से और जगह दक्षिणी दिल्ली। इस परिचय पर सहज ही यकीन करना आसान नहीं लेकिन दरअसल हुआ यही।

 

निराला, मैथिली शरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, हजारी प्रसाद द्विवेदी और न जाने कितने ऐसे नाम जो इस हफ्ते दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक प्रतियोगिता में जैसे बरसों बाद सुनाई दिए तो मन कवितामय हो गया। दिल्ली के बेहतरीन कालेजों के छात्र दिल्ली के लेडी श्रीराम कालेज में जगह जमा हुए और वार्षिक प्रतियोगिता का हिस्सा बने। प्रतियोगिता के तहत कविता पाठ तो हुआ ही, साथ ही हुई साहित्यिक अंताक्षरी और प्रश्नोत्तरी।

 

कहने को यह महज एक प्रतियोगिता थी लेकिन इसने असल में सोच की कई बंद खिड़कियों को खोल दिया। सूचना क्रांति में उगे-फूले इस युग में हिंदी कविता कहां है, किधर है, कितनी जिंदा है, यह प्रतियोगिता उसका आइना थी। यह भी महसूस हुआ कि टीवीवालों का यह दावा भी कितना खोखला है कि कविता कोई सुनना नहीं चाहता, इसलिए टीवी पर वो दिखती नहीं। जो दिखती है, वो राजू श्रीवास्तव की शैली में है।

 

दरअसल मीडिया ने कभी बाजार को ठीक से समझा ही नहीं। पोपलुर परसेप्शन के झूठे छलावे के नाम पर असल में जनता की थाल में वही उठा कर डाल दिया जाता है जिसका अंदाजा लगता है, जो आसान होता है। यह ठीक है कि राजू (और एक समय में सरोजिनी प्रीतम, शैल चतुर्वेदी, के पी सक्सेना, सुरेंद्र शर्मा )सरीखों के जरिए कविता के नए मुहावरे सामने आए लेकिन क्या उसे वाकई में विशुद्ध तौर पर कविता कहा जा सकता है। 90 के शुरूआती दौर तक भी कवि सम्मेलनों के बारे में सुनने को गाहे-बिगाहे मिल जाता था। उसके बाद विश्व हिंदी सम्मेलनों में भी हिंदी कवियों को विदेश भ्रमण का बेशकीमती मौका मिला लेकिन त्रासदीपूर्ण ये रहा कि यहां आम तौर पर कवि का चयन उसकी कविता के स्तर और लोकप्रियता के आधार पर नहीं बल्कि राग दरबारी होने के स्केल के आधार पर होता रहा है। लेकिन इसे छोड़िए।

 

अब सफल कवि होने के औजार और हथियार दोनों ही बदल गए हैं। झोलाछाप कवि अब नहीं चलता। मौजूदा कवि वेबसाइट बनाता है, ईमेल करता है,ट्विटिंग करता है, दुनिया से पल-पल जुड़ा रहता है, फेसबुक पर अपने सेमिनारों की तस्वीरें डाउनलोड करता है और उसी पर अफनी कविता की दो-चार पंक्तियां भी चिपका देता है। कवि अब श्रोता से अपनी कविता सुनाने का इसरार नहीं करता, वह सीधे उन तमाम लोगों को ईमेल कर देता है, भले ही उनकी कविता में रूचि हो या न हो। फीडबैक के लिए उसे कवि सम्मेलनों की वाह-वाह के लिए सूखे पीड़ित की तरह तरसना नहीं पड़ता। उसे मेल पर ही सबके ईमेल नसीब हो जाते हैं।

 

तो सब कुछ बदला है। कवि भी, कविता भी लेकिन नहीं बदला तो मीडिया का रवैया। इलेक्ट्रानिक मीडिया से आज भी गंभीर कवि नदारद हैं। नई पीढ़ी़ के अंग्रेजी वाले यही सोच कर बड़े हो रहे हैं कि हिंदीवालों की कविता का स्तर सिर्फ छिछोरेपन तक ही है। प्रिंट में कवियों की खबर तब छपती है जब कोई खास बड़ा या विवादास्पद नेता या कवि उस किताब का विमोचन करता है या फिर कवि की मौत हो जाए तो फिर एक कालम की जगह कोने में सरक जाती है। यहां एक वर्ग उन कवियों का भी है जो विवादों को बुनने में माहिर हैं। वे बात-बेबात बिदकते हैं या कुछ ऐसी बेतर्की और सरकी हुई बातें कहते हैं कि छापने वालों को सब्जी के लिए मसाला मिल जाता है। ऐसे कवि तकरीबन पूरे साल ही खबर में बने रहते हैं। वे दिल्ली इंडिया हैबिटाट या फिर इंडिया इंटरनेशनल सेंचर में घूमते हैं और जिसे खाने के लिए बुलाते हैं, उसी की जेब से बिल का पैसा भी निकलवा लेते हैं। कवियों की यह जमात कविता की कम और कवियों के निजी जीवन के  स्वेटर उधेड़ने में ज्यादा समय खर्च करती है।

 

रही बात राजनेताओं की तो नए राजनेताओं को तो वैसे ही हिंदी की कविता समझ में आती नहीं। कविता में उन्हें कोई वोट बैंक भी नहीं दिखता। कविता कलावती नहीं है, न ही वह मायावती है। वह तो बस लिखने वालों की आपसी सहमति है। राजनेता के लिए कविता कब भी भूली बात हो गई। जो बचे पुराने नेता तो वो भी अपने कविता संग्रह छपा कर अब चूक चुके हैं और जो नए नेता आएंगे, वो संसद में इस बात का बिल पास करवाएंगे कि मरती हुई कविता में धड़कनें डालने के लिए कितने लाख बजट की तुरंत जरूरत है।

 

तो कविता के नाम पर कूटनीति, राजनीति, वाकनीति सब होती रही है, आगे भी होगी। लेकिन यहां गौर करने की बात यह है कि तमाम उपेक्षाओं, विवादों और हेराफेरियों के बावजूद कविता जिंदा है। युवा इन्हें पढ़ रहे हैं, गुनगुना रहे हैं। बहुत से घरों में आज भी कविता किसी पुरानी डायरी में गुलाब के सूखे फूल के साथ आलिंगन किए बैठी है। इस कविता की खुशबू को कोई राजनीति छीन नहीं सकती।यहां पाश की कविता की एक पंक्ति याद आती है - सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना। तो यहां सपने अभी मरे नहीं हैं। सपने जिंदा है, कविता भी जिंदा है, मीडिया कविता को सहलाए या न सहलाए। नेता को कविता का ककहरा समझ आए न आए, कविता ने अपनी राह खुद चुनी है, आगे भी चुनेगी। जय हो।

 

(यह लेख 5 नवंबर, 2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)


Saturday, October 31, 2009

कौन-सा फॉलोअप, किसका फॉलोअप

11 साल पहले एक दिन खबर मिली कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास लगे एक टावर पर एक आदमी चढ़ गया है और उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। बनारस से दिल्ली आए उसका कहना था कि वह तभी उतरेगा जब उसकी पत्नी मायके से वापिस आकर उसके साथ दोबारा रहने का वादा करेगी, वो भी दुनिया के सामने। उस पुरूष ने अंतर्जातीय विवाह किया था और लड़की के मां-बाप जबरदस्ती लड़की को अपने साथ ले गए थए जिसे यह युवक बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। उसके आस-पास के लोगों ने भी उसकी कोई मदद नहीं की, इसलिए वो दिल्ली चला आया और गाड़ी के स्टेशन आते ही सदमे के चलते सीधे पहुंचा टावर के ऊपर।

 

हम लोगों के लिए यह मजेदार खबर थी। पहले दिन एक-दो लोग कवर करने पहुंचे। एनडीटीवी(स्टार न्यूज) पर इस खबर को दिखाने का असर यह रहा कि अगले दिन अखबारवालों का हुजूम भी लग गया। सर्दियों के दिन थे।हम टावर के नीचे। टावर वाला ऊपर। कभी पूरा लेटमलेट,कभी अधलेट, कभी उठ कर नमाज अदा करता। जब खास मूड में होता तो हाथ हिलाता,हम सबके नाम पूछता। उस दिन शाम होते-होते उसने सबके लिए पर्चियां फेंकनी शुरू कर दीं। एनडीटीवी के नाम, इंडियन एक्सप्रेस के नाम, पंजाब केसरी के नाम। लिखा यह कि वह राष्ट्रपति से मिलने के बाद ही नीचे उतरेगा क्योंकि उसे किसी पर भरोसा नहीं है। उसे विश्वास था कि सिर्फ राष्ट्रपति ही अब उसे इस वियोग से मुक्ति दिला सकते हैं। खैर स्टोरी लायक चटपटा सामान हम लोगों को रोज नसीब होता रहा।

 

लेकिन एक दिन सुबह पहुंचे तो देखा टावर वाला न्यूजमेकर गायब। मालूम हुआ कि एक रात रेलवे पुलिस के जवान उसे उतार ले गए। उसके पास से डाई फ्रूट्स के दो झोले भी मिले(वह रोज यही खाता था)। उस दिन स्टोरी ये बनी कि उस टावर के पास पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए हैं ताकि कोई उस पर चढ़ न सके। वाह!

 

आज 11 साल बाद भी कई बार लोग इस घटना का जिक्र करते हैं। वे जानना चाहते हैं कि वहां से निकल कर वह पागलखाने पहुंचा या अपनी पत्नी के पास। जवाब किसी के पास नहीं है।  

 

यहां से अब जरा एक गंभीर मुद्दे पर आइए। मुद्दा है फॉलो अप का। मीडिया, खास तौर से इलेक्टॉनिक मीडिया खबर तो दिखाता है लेकिन उसके निष्कर्ष या कुछ सालों में उसमें आए बदलाव को दिखाने में अक्सर चूक जाता है। याद कीजिए प्रियदर्शिनी मट्टू। वो सुंदर कश्मीरी लड़की जिसे एक आईपीएस अधिकारी के बिगड़ैल लड़के संतोष ने बलात्कार के बाद बेदर्दी से मार डाला था। इस घटना की परिणति जनता नहीं जानती। संतोष अपने पिता के प्रभाव की वजह से आखिर में छूट गया या अब भी वो कैद है। मट्टू परिवार अब कहां है। वगैरह।

 

याद कीजिए हाल की घटना। 30 अगस्त 2008 की दोपहर जब उमा खुराना एक सरकारी स्कूल में रोज की तरह गणित पढ़ा रही थीं और टीवी पर खबर चली थी कि वे लड़कियां मुहैया करवाती हैं। इस खबर की पूरी तफ्तीश हुई नहीं, वो टीवी पर चल गई और पलों में भीड़ ने स्कूल को और फिर उमा को घेर लिया, बदसलूकी की। खैर, बाद में खबर काफी हद तक फर्जी साबित हुई। खुराना की नौकरी बहाल हो गई लेकिन आज वो किस हाल में, कहां हैं, इस एक रिपोर्टिंग ने उनकी और परिवार की सोच को कैसे बदला, कोई नहीं जानता। अगर आपको याद हो, उमा खुराना और आरूषि हत्या की घटनाओं की वजह से ही ब्रांडकास्टिंग कोड को लागू करने की जोरदार बहस छिड़ी थी। इसी तरह नीतिश कटारा मामले की मुख्य गवाह और उसकी प्रेमिका भारती यादव कहां है, मनु शर्मा मामले का अंत कहां हुआ, सत्येंद्र दुबे का परिवार किस हाल में है, बंगारू लक्ष्मण अब क्या करते हैं, सीताराम केसरी का परिवार अब कहां है, जनता नहीं जानती। लेकिन लोग जानना चाहते हैं। आलम यह है कि जिस गुड़िया( वही जिसका पति पाकिस्तान जेल से बरसों बाद लौटा तो गुड़िया दूसरी शादी कर चुकी थी)के लिए मीडिया ने चर्चा की चटपटी दुकानें सजाई थीं, उसकी मौत पर महज एक चैनल उसके घर पहुंचा था और आज तो कोई नहीं जानता कि गुड़िया का बच्चा अब किसके पास है।

 

 

तो मीडिया ने खबर के आने पर तस्वीरें तो दिखाईं लेकिन तस्वीर के बाद की तस्वीर दिखाना वो शायद भूल गया। भागते चोर की लंगोटी पकड़ने के चक्कर में सब भागमभाग में छूटता जाता है। दिमाग को तस्वीरें मुहैया कराना इलेक्ट्रानिक मीडिया का काम है लेकिन क्या कोई भी घटना महज चंद तस्वीरें ही है। क्या मीडिया के लिए हर घटना महज एक स्टोरी है और वह सिर्फ एक स्टोरी टेलर। क्या उसका काम कहानी बांचना ही है, परिणति दिखाना नहीं। मीडिया की शायद इसी चंचल, अगंभीर और विश्लेषण से इतर आदत ने उसकी छवि को मसखरे-सा बना डाला है।


(यह लेख 18 अक्तूबर को दैनिक हिंदुस्तान के लखनऊ संस्करण में प्रकाशित हुआ)

Monday, October 12, 2009

आहा जिंदगी

पहला अध्याय

 

नई फ्राक मिली

कचनार के फूलों से लदी डाली पर

गिलहरी-सी

ठुमक-घुमक उठी

जन्नत मुट्ठी में

जमीन आसमान पर

 

दूसरा अध्याय

 

दुपट्टा ओढ़ा

नजरें जैसे सारी उसी पर

सपनों के सीप भरे-भरे से

किसी सुनहरे रथ के इंतजार में

इंतजार की सड़क छोटी थी

 

 

तीसरा अध्याय

 

बैलगाड़ी आई

पहियों के नीचे

सपनों ने पलकें मूंदीं

अदरक-प्याज के छौंक में

बैलवाले को चीखें न सुनीं

ये सड़क बड़ी लंबी लगी

 

चौथा अध्याय

 

पलों का रेला है

सड़कें सांस हैं

सभी जुड़ीं, गुत्तमगुत्था

जिंदगी सड़कों की लंबाई मापने से नहीं चलती

चलती है जीने से

आह जिंदगी, वाह जिंदगी।

 


 

Wednesday, October 7, 2009

कैसे पैदा हुआ दहशत का माहौल


 

चुनावी माहौल की रस्साकशी के बीच हाल ही में मुंबई में कुछ ऐसा भी हुआ जिसने विचलित किया। ये तस्वीरें दहशत और सामाजिक विद्रूपता की थीं। ये तस्वीरें उस परिवार की पत्नी और तीन लड़कियों की हैं जिन्हें परिवार के मुखिया ने सात साल तक कमरे में बंधक बना कर रखा। इन  महिलाओं के लिए सूरज की रोशनी सपना था और भरपेट खाना भी। यह सब सात साल तक चला, वो भी एक ऐसे शहर में जिसे सपनों की माया नगरी कहा जाता है। एक ऐसा शह जहां हर साल गरीबी, दहशत, शोषण और प्यार के आस-पास घूमतीं 1000 से ज्यादा फिल्में बनाई जाती हैं जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा हैं।

 

बहरहाल इन महिलाओं को कमरे की चारदीवारी में रखने वाला गोम्स अब पुलिस की गिरफ्त में है। उस पर मुकद्दमा भी चलेगा लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती। यहां से कहानी शुरू होती है। यह कहानी डर, अपराध और सामाजिक अविश्वास के ताने-बाने को उधेड़ कर समझने के लिए जोर डालती है। गोम्स को डर था कि अगर उसकी पत्नी और बेटियां समाज की गलियों में निकलीं तो वे यकीनन बलात्कार की शिकार हो सकती हैं। हां, बहुत से लोग इसे महज मनोवैज्ञानिक समस्या कह कर इससे निजात पा सकते हैं और उनके लिए गोम्स की गिरफ्तारी कहानी के सुखद और त्रासद अंत की घोषणा हो सकती है लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता।

 

असल में समाज में सुरक्षा को लेकर विश्वास का टूटना, कानून के ढीलेपन, बलात्कार या छेड़खानी की शिकार युवतियों का तिरस्कार को भुगतना, समाज की नजरों का ढेढ़ापन ऐसा बहुत कुछ है जो किसी को भी गोम्स बना सकता है। इससे भी आगे हैं नपुसंक सामाजिक, प्रशासनिक और मीडियाई नीतियां और ढुलमुलापन। भारत में एक मिनट में करीब तीन युवतियां छेड़खानी या बलात्कार का सामना करती हैं। इनमें से ज्यादातर पुलिस और प्रशासन की कृपा से छूट जाते है। जो पकड़े जाते हैं, उनमें से 90 प्रतिशत गवाहों के न होने और केस में पीडित पक्ष के हिम्मत छोड़ देने से छूट जाते हैं। ऐसे में समाज पर विश्वास कौन,कैसे और क्यों करे।

 

जो पकड़े जाते हैं, जिन का जुर्म वाकई साबित हो जाता है, क्या मीडिया कभी भी यह दिखाता है कि बलात्कारी को अपने कुकर्म के लिए देखिए क्या पीड़ा उठानी पड़ी। क्या मीडिया कभीअपराधी को डराता है? नहीं, बल्कि मीडिया उसको डराता है जिस पर डर पहले से ही हावी है। मीडिया बलात्कार कवर करता है तो उसमें भी वो 'क्लास '  को ध्यान में रखता है। उच्च वर्ग के बलात्कारी की खबर मामूली गलती के आस-पास ही घूमती दिखती है जबकि निम्न वर्ग का बलात्कारी यौन पीड़ित के तौर पर देखा जाता है लेकिन कहीं भी अपराध को अपराध की तरह ट्रीट नहीं किया जाता।

 

क्या मीडिया यह नहीं जानता कि उसका काम समाज को यह संदेश भी देना है कि अपराध करेगें तो सजा भी भुगतेगें। दरअसल फिल्म और टीवी दोनों में ही खलनायक का अंत सिर्फ पल भर का होता है जबकि पूरी फिल्म उसके ऐशोआराम के आस-पास घूमती है। दर्शक को उसका यही मखमली पक्ष याद रह जाता है। वह पौने तीन घंटे तक फिल्म में देखता है कि खलनायक के पास नाम, पैसा, रूतबा-सब है। पिटाई चूंकि आखिरी 15 मिनट में सिमट जाती है और तमाम गोरखधंधे करने वाला बस एक गोली से मर कर चैन पा लेता है, इसलिए खलनायक की जिंदगी ज्यादा सुखमय और आसान दिखाई देती है। न्यूज में भी तकरीबन यही फार्मूला चलता है।

 

एक बात और। अपराध और आत्महत्या दोनों ही अचानक नहीं घटते। दोनों के साफ लक्षण होते हैं। कई बार यह लक्षण बचपन से दिखने लगते हैं। लेकिन चूंकि बेटा कपूत होकर भी सपूत की श्रेणी से चिपका कर रखना हमारी फितरत है, हम इन लक्षणों को महज शरारत का नाम देकर बचते फिरते हैं। सड़कों पर बेवजह हार्न बजाने वाले, रूआब झाड़ने वाले, घर पर पत्नियों को पीटने वाले, बिगड़े बेटों के लिए दिनोंदिन और आधुनिक साज उपलब्ध करवाने और परिवारों में महिला को निचले पायदान पर रखने वाले लक्षण अपराध की तरफ ही इशारा करते हैं। चूंकि यह कथित तौर पर छोटे अपराध हैं या यूं कहिए कि स्वीकार्य अपराध हैं, इस पर भौंहें नहीं तनतीं। दूसरे यह कि आज भी भारत में अपराध पर आडियंस की रीसर्च पर ज्यादा काम नहीं हुआ है। अमरीका में ऐसे प्रयास जरूर होते रहे हैं। अमरीका में 1950 में हुए एक शोध में यह कहा गया कि अमरीकी समाज में होने वाले अपराधों में से 70 प्रतिशत सिनेमा से उपजते हैं। इसी तरह ब्रिटेन में 1984 में पीयरसन ने दर्शक पर पड़ने वाले असर की विस्तृत विवेचना की।

 

दरअसल अपराध हर समाज में होते हैं और हर अपराध दूसरे अपराध से किसी न किसी रूप में अलहदा होता है। अपराध पर एक मिनट की स्टोरी कर उसे समेटना टीवी न्यूज मीडिया की मजबूरी है लेकिन आपराधिक होते समाज को परत-दर-परत छीलना क्या उसका काम नहीं है। समाज में गोम्स भी मौजूद हैं और गोम्स जैसों को गोम्स बनाने वाले भी। इसलिए खबर तो उन पर होनी चाहिए जो हर बार कानून से बच निकलते हैं और मोहल्ले दर मोहल्ले में किसी गोम्स को पैदा कर जाते हैं। 

 

अब बात निकली है तो दूर तक जानी ही चाहिए।

 

(यह लेख 6 अक्तूबर,2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ) 

 

 

Sunday, September 20, 2009

बढ़ रही है मीडिया की भूमिका

शशि थरूर की साइट में कांग्रेस के रंग भरे हैं। वे हाथ जोड़ कर कहते दिखते हैं कि वे पूरी शिद्दत के साथ तिरूवनंतपुरम की जनता के लिए काम करेंगे। जनता ने उन पर विश्वास भी किया कि ऐसा ही होगा और इसलिए उन्हें जीत मिली।

 

लेकिन दूसरी तस्वीर कुछ और कहती है। यह तस्वीर छेड़ती है,अट्टहास करती है औऱ छवि के दम को जोर से कम करती है। यहां झटका है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर पाठक को फिर से राजनीति के खोखलेपन और आम आदमी के पैसे की उड़ती धज्जियों पर कड़वा कर डालती है।

 

सोचने की बात है कि रोज ट्विट करने वाले,बड़ी बातें लिखने वाले, बुद्धिमान और युवा थरूर पुराने राजनेताओं की तरह पुरानी सोच को पुख्ता करते मिल कैसे गए। इस पूरे घटनाक्रम ने युवा को यह सोचने के लिए झकझोरा है कि क्या युवाओं के राजनीति में आने से वाकई भ्रष्टाचार कम होगा?

 

लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि जो मोटा बिल उनके और एस एम कृष्णा के नाम बना है, उसका भुगतान वाकई करेगा कौन। जनता को इसे जानने का पूरा हक है और मीडिया को हक है कि वह भी जनता के पैसों की हिफाजत करे।

 

लेकिन जरा सोचिए, पैसों की इस शाही खर्चों के कितने मामलों में जनता सच के आखिरी सिरे तक पहुंच पाई है। जनता को अमूमन खबर का सिर्फ एक सिरा मिलता है। वह कुछ दिनों तक उसे याद करती है, फिर बहुत जल्दी भूल भी जाती है क्योंकि मीडिया की तरह जनता भी जल्दी में है। दूसरे, जनता भ्रष्टाचार को अपनी जिंदगी की सांसों को तरह स्वीकार कर चुकी है। लेकिन इसका एक असर यह भी हुआ है कि जनता में कडवाहट बेतहाशा बढ़ गई है।

 

हाल ही में एक कालेज में छात्रों से जब अपनी पसंदीदा हस्तियों पर एक मोनोग्राम तैयार करने को कहा गया तो सिवाय एक छात्र के, किसी ने भी राजनेता को नहीं चुना और जिसने चुना भी, उसने लालू यादव का चुनाव किया। इसमें भी व्यंग्य है, हास्य है, करूणा है और खीज है।

 

 

राजनेता और उनके साथ ही उनका ऐशों में पलने वाला परिवार यह भूल जाता है कि बहुत सी नजरें उन पर टिकी रहती हैं। वे समझते हैं, वे नजरें उनसे दूर हैं। वे मीडिया के सच्चे हिस्से से मिलने में कचराते हैं क्योंकि रंगा सियार अपना चेहरा शीशे में देखने से डरता है लेकिन जनता सब जानती है और उस खीज को झेलती है। कभी मौका आता है तो वो अपनी खीज को उतारने में जरा मौका नहीं चूकती।

 

हाल ही में बूटा सिंह, फिर वीरभद्र सिंह और अब एक छोटे टुकड़े के कथित भ्रष्टाचार में थरूर और कृष्णा के नाम के आने से एक बार फिर राजनीति के जर्रे-जर्रे पर कैमरे की नजर और कलम के पैनेपन के मौजूद होने की जरूरत बढ़ गई है। पत्रकार बिरादरी के लिए आने वाले समय में काफी काम है। एक ऐसा काम, जो जन हित में है। यह काम तभी पुख्ता तरीके से हो पाएगा जब पत्रकार ट्रक पर लिखे स्लोगन की तरह राजनेता से दो हाथ की दूरी रखते हुए अपने माइक्रोस्कोप को चौबीसों घंटे तैयार रखेगा। तो तैयार हो जाइए। बिगुल तो कब का बज चुका।

 

 

(यह लेख 11 सितंबर, 2009 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

 

Friday, September 18, 2009

अश्क में भी हंसी है

खुशामदीद

 

पीएम की बेटी ने
किताब लिखी है।
वो जो पिछली गली में रहती है
उसने खोल ली है अब सूट सिलने की दुकान
और वो जो रोज बस में मिलती है
उसने जेएनयू में एमफिल में पा लिया है एडमिशन।
पिता हलवाई हैं और
उनकी आंखों में अब खिल आई है चमक।

बेटियां गढ़ती ही हैं।
पथरीली पगडंडियां
उन्हे भटकने कहां देंगीं!
पांव में किसी ब्रांड का जूता होगा
तभी तो मचाएंगीं हंगामा बेवजह।
बिना जूतों के चलने वाली ये लड़कियां
अपने फटे दुपट्टे कब सी लेती हैं
और कब पी लेती हैं
दर्द का जहर
खबर नहीं होती।
ये लड़कियां बड़ी आगे चली जाती हैं।
ये लड़कियां चाहे पीएम की हों
या पूरनचंद हलवाई की
ये खिलती ही तब हैं
जब जमाना इन्हे कूड़ेदान के पास फेंक आता है
ये शगुन है
कि आने वाली है गुड न्यूज।

 

बहूरानी (2)

 

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा

और फिर देखीं अपनी

पांव की बिवाइयां

फटी जुराब से ढकी हुईं

एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में -

दोनों की आंखों के पोर गीले थे

 

पैदाइश (3)

 

फलसफा सिर्फ इतना ही है कि

असीम नफरत

असीम पीड़ा या

असीम प्रेम से

निकलती है

गोली, गाली या फिर

कविता

 

गजब है (4)

 

बात में दहशत

बे-बात में भी दहशत

कुछ हो शहर में, तो भी

कुछ न हो तो भी

चैन न दिन में

न रैन में।

मौसम गुनगुनाए तो भी

बरसाए तो भी

शहनाई हो तो भी

न हो तो भी

हंसी आए मस्त तो भी

बेहंसी में भी

गजब ही है भाई

न्यूजरूम !

 

(यह कविताएं तद्भव के जुलाई 2009 के अंक में प्रकाशित हुईं)

 

Friday, September 4, 2009

चूल्हा-चौकी संभालने वाले हाथों में मीडिया


 

बहुत दिनों बाद उत्तर प्रदेश एक सुखद वजह से सुर्खियों में आया है। खबर है कि बुंदेलखंड की ग्रामीण महिलाओं की मेहनत से  निकाली जा रही अखबार खबर लहरिया को यूनेस्को के किंग सेजोंग साक्षरता अवार्ड, 009 के लिए चुन लिया गया है। इस अखबार को बुंदेलखंड की पिछड़ी जाति की महिलाएं निकाल रही थीं। इस अखबार की खासियत है महिलाओं के हाथों में मीडिया की कमान और साथ ही खबरों की स्थानीयता। इस अखबार में आस-पास के परिवेश के पानी, बिजली, सड़क से लेकर सामाजिक मुद्दे इस अखबार में छलकते दिखते हैं और साथ ही दिखती है इन्हें लिखते हुए एक ईमानदारी और सरोकार।

 

 

दरअसल भारत भर में इस समय जनता के हाथों खुद अपने लिए अखबार चलाने की मुहिम सी ही चल पड़ी है। हाल ही में बुंदेलखंड के एक जिले ओरइया से छपने वाले अखबार मित्रा में इस बात पर सारगर्भित लेख प्रकाशित हुआ कि कैसे प्राथमिक स्कूलों मे दाखिला देते समय जातिगत भेदभाव पुख्ता तौर पर काम करते हैं। इसी तरह वाराणसी से पुरवाई, प्रतापगढ़ से भिंसार, सीतापुर से देहरिया और चित्रकूट से महिला डाकिया का नियमित तौर पर प्रकाशन हो रहा है।

 

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि रसोई संभालने वालों ने अब कलम भी थाम ली है। यह भारत का महिला आधारित समाचारपत्र क्रांति की तरफ एक बड़ा कदम है। यहां यह सवाल स्वाभाविक तौर पर दिमाग में आ सकता है कि ग्रामीण महिलाओं ने सूचना और संचार के लिए सामुदायिक रेडियो या फिर ग्रामीण समाचार पत्र का माध्यम ही क्यों चुना। वजह साफ है। मुख्यधारा का मीडिया गांव को आज भी हास्य का विषय ही मानता है और फिर महिलाओं को जगह देना तो और भी दुरूह काम है।ऐसे में सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से इन महिलाओं ने अपनी आवाज खुद बनने के लिए ऐसे माध्यम को चुना जिस पर न तो मुख्यधारा मीडिया की कोई गहरी दिलचस्पी रही और न ही पुरूषों को। यह तो काफी बाद में समझ में आया कि इन माध्यमों के लोकप्रियता की डगर चल निकलते ही इनमें गहरी रूचि लेने वाले भी गुड़ को देख कर चींटियों की तरह उमड़ने लगे।

 

अकेले सामुदायिक रेडियो की ही मिसाल लें तो आंध्रप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड और यहां तक कि अंडमान और निकोबार तक में ऐसी महिलाओं की मजबूत जमात खड़ी हो गई है जो विशुद्ध तौर पर पत्रकारिता कर रही हैं। इन महिलाओं के पास भले ही किसी मान्यता प्राप्त नामी संस्थान का पत्रकारिता का डिप्लोमा या डिग्री ने हो, लेकिन दक्षता और मेहनत के मामले में ये किसी से कम नहीं हैं। झारखंड के चला हो गांव में, रांची की पेछुवाली मन के स्वर, उत्तराखंड की हेवल वाणी, मंदाकिनी की आवाज, प्रदीप सामुदायिक रेडियो, कर्नाटक की नम्मा धवनि, केरल का रेडियो अलाकल, राजस्थान के किशोर वाणी समेत ऐसी मिसालों की कमी नहीं जहां जनता ने सामाजिक सरोकारों की डोर खुद अपने हाथों में थाम ली है।

 

 

यहां एक मजेदार घटना का उल्लेख करना जरूरी लगता है। बुंदेखंड के एक गांव आजादपुरा में पानी की जोरदार किल्लत रहती है। यहां एक ही कुंआ था जिसकी कि मरम्मत की जानी काफी जरूरी थी। यहां की महिलाएं स्थानीय अधिकारियों से कुछेक बार इसे ठीक कराने के लिए कहती रहीं लेकिन बात नहीं बनी। लेकिन जैसे ही इन महिलाओं ने कुंए की बदहाली और उसकी मरम्मत की जरूरत की बात अपने रेडियो स्टेशन के जरिए की, स्थानीय प्रशासन ने तुरंत नींद से जगते हुए चार दिनों के भीतर ही उनका कुंआ ठीक करवा दिया।  इस एक घटना ने महिलाओं को रेडियो की ताकत का आभास तो करवाया ही, लेकिन साथ ही यह हिम्मत भी दी कि सही नीयत और तैयारी से अगर संचार का खुद इस्तेमाल किया जाए तो रोजमर्रा के बहुत-से मसले खुद ही हल किए जा सकते हैं। इस इलाके में सामुदायिक रेडियो के लिए 5 रिपोर्टर और दो संचालक हैं। इसके अलावा एक प्रबंध समिति भी है जिसका मुखिया सरपंच है। इसके अलावा इसमें किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भरपूर भागदारी है।

 

बहरहाल खबर लहरिया  की इस उपलब्धि को भारत में महिलाओं के जरिए सूचना क्रांति की एक बेहद बड़ी मुबारक खबर के रूप में देखा जाना चाहिए। एक ऐसे दौर में, जब कि भारत में पूंजी केंद्रित पेज तीनीय पत्रकारिता का जन्म हो चुका है और वह एक बिगड़े बच्चे में तब्दील होकर पत्रकारिता के अभिभावकीय रूप को अपनी डफली के मुताबिक नचा रहा है, ऐसे में स्थानीय मीडिया से उम्मीदें और भी बढ़ जाती हैं। वैसे भी स्थानीय मुद्दों के लिए मुख्यधारा के पास समय, संसाधनों, विज्ञापनों से लेकर प्रशिक्षण तक न जाने किन-किन सुविधाओं की कमी हमेशा ही रही है। जहां रवि नहीं होता, वहां कवि भले ही पहुंच जाता हो लेकिन आज भी जिन गांवों के कुएं सूख गए हैं और जहां पहुंचने के लिए हेमामालिनी के गालों सरीखी सड़कें नहीं हैं, वहां मुख्यधारा मीडिया को पहुंचने में वैसी ही तकलीफ होती है जैसी किसी आईपीएस के बेटे को डीटीसी की बस में बैठने में। इसलिए बेहतर यही होगा कि गांववाले अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए अपना माइक और अपनी कलम खुद ही थामें। मुख्यधारा के तलब लिए गांव का दर्शन नेताओं की ही तरह चुनावी मौसम में ही सही है। साल के बाकी पौने चार सालों का जिम्मा शायद स्थानीय ग्रामाण मीडिया खुद ही उठा सकता है।

 

तो इसका मतलब यह हुआ कि चूल्हा-चौकी संभालने वाली अब सही मायने में सशक्त हो चली हैं। लगता है, कहीं दूर से तालियों की आवाज सुनाई दे रही है।

 

 

(यह लेख दैनिक भास्कर में 18 अगस्त, 2009 को प्रकाशित हुआ)


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Vartika Nanda
Media Traveller

Sunday, August 30, 2009

MCRC Mass Communication Details

M.A. Mass Communication (50 Seats)
The graduates of M.A. Mass Communication are expected to be media professionals with strong conceptual and technical skills who are ready to choose a diversity of career options in radio, photography, film, video & TV Production. The two-year intensive course imparts learning in technical and conceptual skills through both hands-on production work and theoretical academic work. The graduates of MCRC have over the years distinguished themselves in a diversity of media related careers. They are contributing energetically to various media institutions and industries as producers, directors, reporters, editors, camerapersons, writers, independent film-makers, teachers, scholars, designers, media practitioners and installation artists. The course requires students to clear final examination in two parts held at the end of each academic year. The examination consist of written papers, media production, internal assessment (including professional performance) and viva voce.
Duration : Two YearsNumber of Seats: 50
Course Inputs
Communication Theory, Research & Evaluation
Visual Communication
Sound for the Media
Traditional Entertainment
Audio-Visual Production and Still Photography
Radio Production
Video and Television Production
Film Production
Media Appreciation
Eligibility
Candidates who have taken their first degree in Arts, Humanities, Social Sciences, Natural Sciences, Engineering or Medicine, Commerce etc. are eligible to apply, provided they have secured 50 percent or more marks in aggregate in their first degree examination of a Course which is of three or more years duration after the 10+2 Examination. Age limit for admission is a maximum of 30 years on August 1, 2006. The students have to submit along with the application form a Statement of Purpose which should also briefly encapsulates all the extra curricular activities they have been involved with. The students are not to submit a Portfolio at this stage, but are expected to carry a Portfolio in case of selection to the interview stage.

Suggested Readings for Students (A)

1. Introduction to Communication Studies 000John Fiske
2. Mass Media Laws & Regulations 000000000C S Rayudu, S B Nageshwar Rao
3. Press in the Indian Constitution --------------R K Ravindran
4. Principles & Ethics of Journalism ------------Dr. Jan R Hakemuldar, Dr. Fay AC
5. Media & Development -------------------------M R Dua & V S Gupta
6. Mass Communication & Development -------Dr. Baldev Raj Gupta
7. Mass Communication In India ---------------Keval J Kumar
8. What Do We Mean By Development ---------by Nora Quebral
Article in IDR, 1973, Pg-25
9. Modern Media in Social Development 000---Harish Khanna
10. The Changing conceptions of Development 0by S L Sharma,
Article in National Development, Vol. 1, 1980
11. Lectures on Mass Communication ------------S Ganesh
12. Indian Broad Casting -------------------------H R Luthra
13. Television Techniques -------------------------Hoyland Beltinger
14. Advertising Made Simple ---------------------Frank Jefkins
15. Ogilvy on Advertising -------------------------David Ogilvy
16. Advertising Management ---------------------Aaker, Myers & Batra
17. Management, Prentice Hall of India ---------Stephen P. Robbins & Mary Coulter,
18. The Indian Press – Profession to Industry --Anna Bhattacharyajee
19. Beyond Those Headlines:000000000000---M. V. Desai & Sewanti
00Insiders on the Indian Press ------
20. Economic Aspect of Indian Press ------------Ashok V. Desai

Suggested Readings for Students (B)

21. Perspective Human Communication -----------------Aubrey B Fisher
23. Communication-concepts & Process -----------------Joseph A Devito
24. Lectures on Mass Communication -------------------S Ganesh
25. The Process of Communication -----------------------David K Berlo
26. Communication Facts & Ideas in Business ----------L. Brown
27. Mass Communication & Development ---------------Dr. Baldev Raj Gupta
28. Communication Technology & Development -------I P Tiwari
29. Mass Communication in India ------------------------Keval J Kumar
30. Here’s the News ------------------------------------------Paul de Maesener
31. Cinema & Television -------------------------------------Hermabon & Shahani
32. Mass Communication Journalism in India ---------D S Mehta
33. Mass Media Today ---------------------------------------Subir Ghosh
34. The Communication Revolution ----------------------Narayana Menon
35. The Story of Mass Communication -------------------Gurmeet Singh
36. Mass Communication Theory -------------------------Denis McQuail
37. Mass Culture, Language & arts in India 000000---Mahadev L Apte
38. You & Media: Mass Communication & Society 0---David Clark
39. Towards a Sociology of Mass Communication 00--Denis McQuail
40. The Myth of Mass Culture 0000 00000000000---Alan Swingewood