Sep 28, 2011

नमस्ते फेसबुक

क्या सचमुच फेसबुक ने लोगों को जोड़ा है

 

प्रिय फेसबुक,

 

बुरा न मानना। अब कुछ दिनों तक तुमसे एक दूरी बनाने की सोची है। एक हफ्ते में दो घटनाएं हुईं-तुम्हारी वजह से। पहले तो बंगलौर की 23 साल की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली। यह लड़की आईआईएम की विद्यार्थी थी और इस बात से आहत हो गई थी कि उसके पुरूष मित्र ने उससे संबंध तोड़ कर सारी कहानी को फेसबुक पर डाल दिया था। मालिनी मुरमू का इस घटना से ऐसा दिल टूटा कि उसने खुद को फंदा लगा लिया। इस तरह से एक चमकता सितारा महज एक सोशल नेटवर्किंग साइट की वजह से अस्त हो गया।   

 

दूसरी घटना पटना विधानसभा से आई। यहां दो लोगों को निलंबित कर दिया गया। उनका गुनाह यह था कि उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपने ही राज्य के मुख्यमंत्री पर कुछ तीखी टिप्पणियां कर दीं थीं और विभाग के भ्रष्टाचार पर अपने कमेंट जारी कर दिए थे। आखिरकार यह भारत है भाई। वे भूल गए कि यहां पर राजनेता कुछ भी कर सकते हैं लेकिन सरकारी कर्मचारी की कई हदें हैं, कई सरहदें।

 

इससे पहले भी एक के बाद एक बहुत कुछ ऐसा हुआ जब लगा कि फेसबुक भूले-बिछुड़े नातों को जोड़ तो रहा है लेकिन यहां की गर्माहट कई बार ठंडेपन और फिर आहत करने के स्तर पर उतर आती है। अमरीका में ही 2007 में स्टीफेनी पेंटर जब फेसबुक की वजह से अपने प्रिय दोस्त को खुद से दूर होते देखती हैं तो एक रात वो फेसबुक के अपने 121 दोस्तों को विदाई का मैसेज भेजती हैं और अपनी जिंदगी का अंत कर लेती हैं। उनके दोस्त को उनके 121 दोस्तों में से कई लोगों से एक असुरक्षा का भाव महसूस होता है और जब यह निजी संबंधों को टूटन और बेहद तनाव की तरफ खींचने लगता है तो वे त को गले लगा लेती हैं।


वैसे कहने को तो फेसबुक अकाउंट पर अनगिनत दोस्त बनाए जा सकते हैं लेकिन क्या वे वाकई में दोस्त और हमदर्द हैं, यह अपने आप में एक सवाल है। अमरीका में ही एक महिला जब अपने फेसबुक वॉल पर लिखती है कि वह अपनी जिंदगी से तंग आ गई है और कुछ ही देर में आत्महत्या करने वाली है तो लोग उस स्टेट्स को लाइक तो कर देते हैं पर एक भी शख्स, यहां तक कि पड़ोसी भी, उसे संबल देने नहीं जाता। वह महिला कुछ देर बाद वाकई आत्महत्या कर लेती है और फेसबुक से उसका जुड़ा पड़ोसी सोसायटी में पुलिस को आते देखता है तो उसे स्टेट्स में लिखे शब्दों का यथार्थ पता चलता है।

यह है फेसबुक। बेशक इस समय फेसबुक अपने उफान पर है। आधुनिक युवा सामाजिक संपर्कों के नाम पर इस पर सबसे ज्यादा समय खर्च करने लगा है। भले ही अमरीका भी जोर-शोर से तुम्हें पूरी तरह से सफल और क्रांतिकारी कह रहा हो और नई पीढ़ी के लिए तुम अलादीन का चिराग बन गए हो, लेकिन दोस्त, कहीं ठहर कर कुछ सोचने की जरूरत भी है।


नहीं, कहने का यह मतलब कतई नहीं कि तुम सिर्फ परेशानियों का पिटारा लेकर आए हो या फिर तमाम त्रासदियों के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। मैं जानती हूं तुमने सोशल नेटवर्किंग का एक बड़ा सुनहला दरवाजा खोला है। यहां पल भर में पूरी दुनिया से जुड़ा जा सकता है। यह संपर्कों की तिजोरी को खोलता है और कई मामलों में जादुई भी है। तुम्हारी वजह से कई पुरानी गलियां गलबहियां डाल रही हैं। लंगोटिया यार सालों बाद एक-दूसरे के दिलों के करीब आ रहे हैं। दुनिया पूरी तरह से जैसे एक मुट्ठी में समा गयी है। हां, माउस के एक क्लिक से इंसान दुनिया के किसी भी छोर तक जा पहुंचता है।तुमने आवाज और दृश्य की गति को कई कल्पना से भी आगे ले जाकर बढ़ा दिया है। इसके लिए निश्चित तौर पर तुम बधाई के पात्र हो।

शायद तुम सीधे तौर पर इसके लिए जिम्मेदार न हो क्योंकि तुम शायद आए किसी सकारात्मक मकसद से ही थे लेकिन जैसा कि हर तकनीक के साथ होता है, यहां भी तकनीक कई काले साये साथ लेकर चली आई है।

 

हां, तो मैनें महसूस किया कि तुम एक उस दौर में पनपे हो जब मीडिया का दखल तो खूब है लेकिन मीडिया की साक्षरता अब भी नदारद। इसलिए तुमने जिस खुले मंच को एकाएक महैया करा दिया है, वह चुंधियाती रौशनी के साथ आया है। यह मंच हैरान करता है। हाथ के संपर्क में की बोर्ड होता है और सामने होता है एक खुला आकाश एक गलतफहमी देता हुआ कि यहां कभी भी, कुछ भी कहा जा सकता है। एक अड्डा जहां कुछ भी कहा-लिखा-पोस्ट किया जा सके। अपनी भड़ास निकाली जा सकती है, संबंधों को उधेड़ा, निचोड़ा और फायदेमंद बनाया जा सके।एक दूसरे की फ्रेंड लिस्ट में झांकते लोग उस पड़ोसी से भी बदतर हो जाते हैं कई बार जिन्हें दीवारों से कान लगाकर बात सुनने की आदत होती है। यह एक ऐसा मंच बन गया है जहां कोई रोक नहीं। कोई बंदिश और कोई सजा नहीं। यहां बहुत कुछ किसी मतलब से शुरू होता है और उसी पर खत्म भी होता है।

 

मुझे लगने लगा है कि नेटवर्किंग के बहाने तुम्हारा मंच कई चालाकियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा है। यह रिश्तों की एक कच्ची जमीन है। माउस के एक क्लिक से लोग फ्रेंड बनते हैं, फिर अन-फ्रेंड भी होते हैं। फिर भी कोई किसी का नहीं। कंधों का सहारा ढूंढते कि जाने कौन काम आ जाए। हां, जब संवेदनाएं, खुशियां या सच बंटते हैं, सुकून मिलता है। पर ऐसा कम होता है। इस पिलपिली और स्वार्थी जमीन पर अब मैं रोज नहीं आउंगी। यह मैने तय किया है। ऐसी ही कई वजहें रही होंगी कि पिछले कुछ महीनों में कई लोगों ने अपने फेसअकाउंट बंद कर दिए। पर मैं ऐसा नहीं कर रही। मैं सिर्फ कुछ दूरी से अब तुम्हारी रफ्तार को देखना और समझना चाहती हूं।


वैसे यह भी लगता है कि मौजूदा पोस्ट-मॉर्डन सोसायटी यह मौका तो देती ही है कि आजाद हस्तक्षेप किया जा सके। इसलिए इस टिप्पणी को सकारात्मक रूप से लेना।


हां, फिलहाल मैं कुछ समय के लिए तुमसे दूर जा रही हूं।


एक फेसबुक यूजर

वर्तिका नन्दा

 

(एक छोटा अंश 28 सितंबर, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित)

 

Sep 24, 2011

मरजानी - भास्कर में

24 सितंबर, 2011 को दैनिक भास्कर में छपी मरजानी की समीक्षा 

Sep 23, 2011

दुआ सलाम

कुछ शहर कभी नहीं सोते
जैसे कुछ जिंदगियां कभी सोती नहीं
जैसे सड़कें जागती हैं तमाम ऊंघती हुई रातों में भी

कुछ सपने भी कभी सोते नहीं
वे चलते हैं
अपने बनाए पैरों से
बिना घुंघरूओं के छनकते हैं वो
भरते हैं कितने ही आंगन

कुछ सुबहें भी कभी अंत नहीं होतीं
आंतरिक सुख के खिले फूलदान में
मुरझाती नहीं वहां कोई किरण

इतनी जिंदा सच्चाइयों के बीच
खुद को पाना जिंदा, अंकुरित, सलामत
कोई मजाक है क्या

Sep 19, 2011

ब्रोकरिंग न्यूज़

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनशल सेंटर में पिछले हफ्ते एक फिल्म दिखाई गई ब्रोकरिंग न्यूज। उमेश अग्रवाल की इस फिल्म को देखने के लिए पूरी हाल खचाखच भरा हुआ था और मजे की बात यह कि मीडिया की चिंदी-चिंदी करती इस फिल्म को देखने के लिए मौजूद लोगों में शायद तकरीबन सभी मीडियाकर्मी थे और बाकी थे मीडिया के कुछेक जिज्ञासु छात्र।

फिल्म पेड न्यूज से जूझती हुई आगे बढ़ती है। रूपर्टे मर्डोक के न्यूज ऑफ दी वल्ड प्रकरण से लेकर अशोक चव्हाण और बाद में राडिया तक तमाम तरह की पेड न्यूज को लेकर फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाती है, वहां मौजूद दर्शकों की प्रतिक्रिया भी एक नए तरह से खींचती है। यह दिल्ली की मीडिया साक्षर प्रबुद्ध जनता है। यह मीडिया को उस लैंस से देखने की आदी है जिस लैंस से सिर्फ वही देख सकते हैं, आम आदमी अब भी उससे काफी हद तक अछूता या शायद अबोध है। इसलिए बरखा दत्त या राजदीप सरदेसाई या प्रभु चावला के शॉट्स या बाइट्स आने पर यह दर्शक जोर की सीटी नहीं बजाता बल्कि एक तीखी हंसी हंसता है और यह इस फिल्म की दर्शनीयता को और भी अलग पुट देती है।

फिल्म में कुरूक्षेत्र के राकेश नाम के एक पत्रकार का जिक्र भी है जो कि पिछले चुनाव के दौरान हिंदी के एक प्रमुख अखबार का पत्रकार था। उनके पास तमाम सुबूत हैं कि कैसे उन सभी से मजबूरन पेड न्यूज करवाई जाती थी- बिना यह जिक्र छापे कि वो पूरी तरह से पेड है। नकारात्मक स्टोरीज को चुना जाता था और उन्हें नए सिरे से गढ़ कर और धारदार बनाया जाता था ताकि आहत लोग और भी पैसा दें। आखिरकार राकेश इस प्रकाशन समूह से इस्तीफा दे देते हैं और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से सारे मामले की पड़ताल की गुहार लगाते हैं।

फिल्म बिजनेस रिपोर्टिंग के दबे झूठों की परतें भी खोलती है। मलाईदार होती बिजनेस रिपोर्टिंग और जनता को पूरी तरह से गुमराह करती कहानियों की बात उस तबके के लिए नई नहीं जो रोज उससे रूबरू होता है।

खैर,मीडिया के मौजूदा बदरंग पड़ते चेहरे को उखाड़ कर जब फिल्म खत्म होती है तो उसका कथ्य बहुत देर तक हॉल में घूमता हुआ महसूस होता है। इस बात पर बहस करने का भी मन होता है कि क्या अब मीडिया में कंटेंट इज दी किंग की जगह विशुद्ध रूप से पैसे ने ले ली है। क्या 19 महीने की जिस इमरजेंसी की बात हम आज भी चिल्लाते हुए करते हैं, वह सिर्फ अतीत है या अब एक नए तरह के जाल की बुनाई हो चुकी है जो मीडिया के गले की घुटन बनने लगा है। क्या राजनीति, अपराध और बिजनेस की रिपोर्टिंग के आस-पास ही मीडिया का दायरा सिमट जाएगा। गांव, गली, कूचे, टूटी सड़कें, कच्ची चरमराती व्यवस्थाएं किसी और और कभी और के लिए रोक कर रख ली जाएंगीं। इन सबके बीच अब जो झूठ के लबादे के बीच छुप कर रिपोर्टिंग आ रही है, उसका भविष्य क्या है। इनमें इस बात पर भी एक आंदोलन सा छेड़ने का मन करता है कि अगर रिपोर्टिंग यही है तो फिर इसकी जरूरत है ही क्या और इसे पत्रकारिता क्यों और कैसे कहा जाए। देश की सरकारें हमेशा ही ऊंचा सुनती रही हैं लेकिन जब भी बात मीडिया की हुई है तो उसके कान दीवार के उस पार तक भी सुन पाए हैं। सरकारें जान गईं हैं कि मीडिया को कदमताल (और अब तो खैर उड़ान के लिए) रोज भरपूर पैसों की जरूरत होती ही है। तिजोरी की इस मजबूरी और सत्ता सुख से मिलने वाले अपार वैभव ने मीडिया मालिकों के पांव में सोने के पायल पहना दिए हैं। यह बात अलग है कि एक आम पत्रकार के हाथ में अब भी एक मामूली पेन और कांपती हुई कच्ची नौकरी ही है।

बहरहाल मजबूर होते पत्रकार और बेदम पड़ती पत्रकारिता पर बहुत दिनों बाद एक सार्थक बहस होती दिखी। यह जरूरत भी उभरती दिखी कि मीडिया की पिटी-पिटाई परिभाषा को अब नए सिरे से गढ़ा जाना ही चाहिए। यह कहना अब झूठ ही होगा कि किसी भी पत्रिका या समाचार की रीढ़ है उसमें परोसी जाने वाली सामग्री, फिर उसकी साज-सज्जा और आखिर में कुछ और। नए जमाने में नए सच पैदा हुए हैं। इस नए सच को उगलना भी मुश्किल है और निगलना भी।