Sep 14, 2010

दिल्ली में नीरो के अतिथियों से रू-ब-रू होना


 

करीब 300 लोगों की क्षनता वाला स्टीन आडीटोरियम खचाखच भरा था। हाल में हर उम्र के लोग थे लेकिन ज्यादा तादाद युवाओं की थी। वे एक ऐसी फिल्म देख रहे थे जिसमें न तो बालीवुड का तड़का-मसाला था, न बड़े सितारे और न ही उनके करियर से जुड़े सवाल। मामला किसानों की आत्महत्या का था। फिल्म थी नीरोज गेस्ट्स, कहानी थी किसानों की आत्महत्या की और फिल्म के सूत्रधार का काम कर रहे थे देश के इकलौते रूरल एडिटर पी साईंनाथ। आयोजक था- पीएसबीटी और मौका था वार्षिक फिल्म समारोह। जगह वही नई दिल्ली जहां पर किसानों की गिड़गिड़ाहट की आवाज पहुंचती ही नहीं। लेकिन फिल्म को दिखाते समय ऐसा माहौल बना हुआ था कि अगर सुई भी सरकती तो उसकी आवाज दर्ज हो जाती।

 

पी साईनाथ जेनयू से पढ़े हैं, मैगेसेसे अवार्ड से नवाजे जा चुके हैं और पिछले दस साल से एक ही मिशन पर काम कर रहे हैं और वह है किसान। उनकी किताब एवरीबडी लव्ज ए गुड ड्राउट किसानों के हालात का कच्चा चिट्ठा है। फिल्म पूरे सच्चेपन से बढ़ती चलती है और विदर्भ के किसानों के उन घरों में भटकती है जहां किसानों ने आत्महत्या की है। फिल्म दिखाती है कि कैसे इन परिवारों तक कोई सरकारी मदद अब तक पहुंची नहीं है और कैसे इन परिवारों के बच्चे एक ही रात में बड़े हो गए हैं। उन्हीं परिवारों में कुछ चेहरे ऐसे भी देखते हैं जो किसी भी पल आत्महत्या कर सकते हैं। फिल्म में कई जगह पर साईंनाथ का गुस्सा और क्षोभ उभरता है। उन्हें तमाम आंकडे जुबानी याद हैं। बताते हैं कि दस साल में 2 लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। वे कहते हैं कि सेंसेक्स की हालत पतली होने पर मंत्री दो घंटे में मुंबई पहुंच जाते हैं लेकिन किसानों का हाल देखने जाने के लिए देश के प्रधानमंत्री को दस साल लग जाते हैं। वे जमकर फैशनवीक की धज्जियां उड़ाते हैं, बताते हैं कि कैसे 512 पत्रकार एक फैशनवीक को कवर करने पहुंच जाते हैं और उसे एक राष्ट्रीय उच्सव में तब्दील कर जाते हैं  और कैसे किसानों की आत्महत्या किसी पत्रकार के लिए खबर तक नहीं बनती।  

 

कई दिनों बाद एक गंभीर मसले पर एक फिल्म देखने को मिली बिना सीटियों के, बिना शोर के बीच, एकदम सभ्य तरीके से। इसमें खास मजा यह देखकर आता है कि जिस पेज थ्री की खिल्ली वे उड़ा रहे थे, उनमें से कई तो वहीं आडीटोरियम में बैठे थे और वे भी खिसिया कर ताली बजाने को मजबूर हो गए थे।

 

लेकिन इसमें एक कमी लगी। फिल्म सरकारी तंत्र का हद से ज्यादा विरोध करती चलती है, खिल्ली उड़ाती है। यहां संतुलन की कमी महसूस होती है, मामला कई जगह एकतरफा होता भी दिखता है। भारतीय युवा, जो कि मीडिया के अति खुलेवाद की वजह से वैसे ही विद्रोही और नकारात्मक होते जा रहे हैं, उन्हें अगर यह प्रस्तुति सकारात्मक जवाबों से भी रूबरू कराते चलती तो असर शायद और भी प्रभावी हो जाता। 

 

खैर, पीपली लाइव से अलग लीक से हटकर बनी दीपा भाटिया की यह डाक्यूमेंट्री जब खत्म हुई तो तालियों की आवाज के बीच ऐसा भी लगा कि कुछ आंखें नम भी हो आई थीं। काश इस फिल्म को नीति निर्माता भी देख पाते।


(यह लेख 14 सितंबर, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Sep 13, 2010

सरकारी विज्ञापनों के बहाने

 

बात अरूण जेटली के सौजन्य से निकली है। हाल ही में अरूण जेटली ने इस बात का खुलासा किया कि लेह में बादल फटने से हुई तबाही के बाद सरकार ने 115 करोड़ रूपए की राहत दी जबकि इससे कहीं ज्यादा खर्च कांग्रेस पार्टी के अपने नेताओं के सरकारी विज्ञापनों पर खर्च होता है। इसके लिए उन्होंने मिसाल दी है 20 अगस्त को राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर दिए गए विज्ञापनों की। उनके मुताबिक इस मौके पर देश भर के अखबारों में जारी विज्ञापनों पर कम से कम 150 करोड़ रूपए खर्च किए गए जो कि लेह पर किए गए खर्च से ज्यादा तो है ही, देश के कई राज्यों में मूलभूत जरूरतों को बेहतर करने के लिए होने वाले खर्च से भी ज्यादा है।

 

यहां पर सबसे पहले यह जान लेना चाहिए कि सरकारी प्रचार और विज्ञापन को लेकर दिशा-निर्देश आखिर कहते क्या हैं। इसमें चार केंद्रीय बिंदु हैं यह सरकार की जिम्मेदारियों से जुड़े हुए हों, सीधे-सपाट तरीके से उद्देश्य की पूर्ति करते हों, वस्तुनिष्ठ हों और उन्हें प्रचारित किए जाने की वजह साफ हो, वे पक्षपातपूर्ण या विवादात्मक न हों, किसी पार्टी के राजनीतिक प्रचार का औजार न हों और ऐसी समझदारी से किए जाएं कि वे जनता के पैसों के इस खर्च की न्यायसंगत वजह पेश करते हों।

 

 

इस में कोई शक नहीं है कि चाहे राजीव गांधी हों, इंदिरा गांधी या फिर नेहरू इन सभी का देश के विकास और निर्माण में अविस्मरणीय योगदान रहा है लेकिन क्या सरदार पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, बाल गंगाधर तिलक, अरूणा आसफ अली, सुरेंद्र नाथ बनर्जी आदि को इस तराजू में कमतर आंका जा सकता है। तो फिर ऐसा क्या है कि एक साल में कांग्रेस परिवार के भरपूर विज्ञापन दिखाई दे जाते हैं जबकि कांग्रेस परिवार की परिधि से बाहर के नेताओं का नंबर उनके जन्म दिवस या पुण्यतिथि पर लगना भी मुश्किल हो जाता है।

 

असल में यहां खेल सत्ताओं के आस-पास ही घूमता है। जिसकी सत्ता होती है, उसके दायरे के तमाम नेता एकाएक एक बड़े कैनवास पर दिखाई देने लगते हैं। जैसे कि मीरा कुमार के लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद इस बार बाबू जगजीवन राम के जन्मदिवस पर एक विस्तृत डाक्यूमेंट्री ही बना दी गई। ऐसा नहीं है कि इससे पहले बाबू जी का योगदान कम समझा गया था लेकिन चूंकि इस बार मीरा कुमार का कद काफी ऊंचा हो आया था, तो ऐसा संभव हो सका।

 

दरअसल सरकारी स्तर पर चमचागिरी की परंपरा हमेशा से रही है लेकिन यह अखरता तब है जब इसके लिए पैसा जनता की जेब से उगाहा जाता है। तमाम नेताओं की यादों में जारी होने वाली सरकारी विज्ञापन उस स्रोत से निकलते हैं जिसका इस्तेमाल जनता की बेहतरी के लिए किया जा सकता है। यहां यादों को जिंदा रखने की जिम्मेदारी का खामियाजा आखिर जनता क्यों भुगते।

 

अब आज अगर भाजपा सत्ता पर आसीन हो जाए तो वीर सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी सरीखे कई नेताओं की लाइन अखबारों में लग जाएगी। मीडिया हाउस उनसे जुड़ी अहम तारीखों को अपनी फारवर्ड प्लानिंग लिस्ट में डाल लेंगे ताकि उनकी यादों के साथ न्याय हो सके। सत्ता बदलते ही सत्तारूढ़ दिवंगत नेताओं की यादों के समारोहों का जैसे उत्सव चल निकलता है।

 

लेकिन इसमें एक फायदा जरूर होता है। छोटे और मझोले अखबार इन्हीं विज्ञापनों के भरोसे फलते-फूलते हैं। प्रेस काउंसिल आफ इंडिया का दिशा-निर्दश यह कहता है कि आरएनआई में जो छोटे और मझोले अखबार पंजीकृत हैं, उन्हें हर साल एक नियत संख्या में सरकारी विज्ञापन जरूर दिए जाने चाहिए ताकि वे अपनी गुजर कर सकें और बड़े अखबारों के दबाव तले यूं ही मर न जाएं। इन अखबारों के लिए जन्मतिथि और पुण्यतिथि वाले ये विज्ञापन किसी रामबाण से कम नहीं। एक सर्वे के मुताबिक भारत में इस समय 300 बड़े अखबार हैं, जबकि 1000 से ज्यादा मझोले और 1100 से ज्यादा छोटे अखबार हर रोज छपते हैं। इनके लिए ये विज्ञापन ताकत के कैप्सूल हैं लेकिन इन्हें ये कैप्सूल यूं ही नहीं मिल जाया करते। यहां गलियारों में कई दिनों तक जूते घिसने पड़ते हैं औऱ कई राज्य सरकारों में तो क्लर्कों से लेकर ऊपरी स्तर तक इन यादों वाले विज्ञापन पाने के लिए सेवा भी करनी पड़ती है। 

 

वैसे सवाल यह भी है कि जिस भाजपा ने कांग्रेस के सरकारी विज्ञापनों पर आपत्ति जताई है, क्या वह यह संकल्प ले सकती है कि अगर वह कभी सत्ता में आई तो वह इस तरह सरकारी फंड को पानी में नहीं बहाएगी। जवाब में चुप्पी के मिलने के आसार ज्यादा हैं।


Sep 7, 2010

क्या है आइडल कार्यक्रमों का आइडल


बात आई-गई हो गई। इंडियन आइडल में कथित तौर पर एक बेसुरा आता है। जैसे ही वो गाने की शुरूआत करता है, कुछ ही सेकेंडों में कार्यक्रम के जज अन्नू मलिक, सुनिधि चौहान और सलीम मर्चेंट चेहरा बनाने लगते हैं और फिर टेबल पर सिर रख कर सो जाने का नाटक करते हैं- यह दिखाते हुए कि बेसुरापन बर्दाश्त से बाहर है। प्रतिभागी इस पर गौर करता है और गाना रोक कर स्टेज पर कहकर जाता है कि जजों को उसका गाना भले ही पसंद न आया हो लेकिन तब भी कलाकार की तौहीन नहीं की जानी चाहिए।

 

लड़का बाहर आता है तो अभिजीत सावंत उस युवक की प्रतिक्रिया लेना चाहते है। इस बार वह लड़का खुलकर अपनी बात रखता है। वह अपना विरोध जताता है कि कार्यक्रम में उसके साथ कुत्ते की तरह बर्ताव किया गया। इस बार वह सीधे अन्नू मलिक की प्रतिभा पर पलटवार करता है, यह जाने बिना भी कि वे पीछे ही खड़े हैं। खास बात यहीं पर है। जब अन्नू मलिक इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हैं, तब भी वह लड़का विचलित नहीं होता और अपनी पूरी बात कहता है। अन्नू मलिक का आवेश में आना यहां एक अजीब सी खीझ भरता है।  

 

यह छोटे भारत और स्मार्ट भारत के बीच का लाइव चित्रण था। लेकिन यह कहानी ज्यादा चली नहीं। बस आई और गई।

 

सोनी एंटरटेंमेंट पर पांच साल से चल रहे इंडियन आइडल का शुरूआती मकसद तो संगीत की छिपी प्रतिभाओं को खोज निकालना और उन्हें प्रोत्साहित करना ही था( हां, इसके बहाने पैसा कमाना और चैनल को लोकप्रियता के ऊंचे पायदान पर खड़े करने की तमन्ना तो थी ही। ) शुरूआती दौर काफी सुनहरा ही रहा। लोकप्रियता ऐसी मिलती है कि पहले साल में अभिजीत सावंत की जीत और अमित साना, राहुल वैद्या और प्रजाक्ता शुकरे की हार में जैसे पूरा भारत ही शामिल हो जाता है। इनमें अभिजीत मुंबई के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार से आए हैं जबकि बाकी तीनों बचे हुए प्रतिभागी भिलाई, नागपुर और जबलपुर से आए थे।

 

यहां तक कहानी सुखद लगती है लेकिन इसके बाद के सालों में इंडियन आइडल एक फार्मूले की तलाश करने लगा जिसमें रोमांच, संगीत, हताशा, ख्वाब और बाद में अपमान का पूरा छौंक लगा दिया गया। कई चैनल सुरों की महफिल जमाने लगे। यहां जज प्रतियोगियों के गाने के स्तर के अलावा उनके कपड़ों और उनके कथित स्टाइल पर भी कमेंट करने लगे। यहां मेकओवर की बात होने लगी (मजे की बात यह कि यहां पर पढ़ाई की बात होती कभी सुनाई नहीं दी और न ही पढ़ने पर कोई तवज्जो भी देता सुनाई दिया)  

 

खैर यहां कुछ सवाल कुनबुनाते हैं। पहला यह कि मीडिया का काम तो सूचना देना, शिक्षित करना और मनोरंजन परोसना था। उसमें आम जनता का मजाक उड़ाना कब शामिल हो गया। दूसरा यह कि क्या  बेसुरा होना पाप है। क्या सुरवाला होना जिंदगी की अंतिम जरूरत है? वैसे जो सुरवाले दूसरों पर हंस रहे थे, उन्हें शायद ही यह ख्याल आया हो कि बहुत से मामलों में वे एक कथित बेसुरे से भी ज्यादा फिसड्डी हो सकते हैं और तीसरे ये कि अगर टीवी पर सुरों की ये जमातें न चलें तो कई दिग्गजों की दुकानों पर खतरे के बादल मंडराने लगें। वैसे तो एक दबा सच यह भी है कि कई डूबते सितारे ऐसे कार्यक्रमों में जज बनने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए रहते हैं ताकि किसी तरह सर्कुलेशन में बने रहें।

 

खैर, आम जन को टीवी के चमकीले परदे पर खींच लाने की जो कबड्डी कुछ साल पहले शुरू हुई थी, वो अब छिछोरेपन पर उतर आई है। इंडियन आइडल का वह कथित बेसुरा जब मलिक से कहता है कि वे भी कभी मामूली आदमी थे तो लगा जैसे बाबा नागार्जुन, अज्ञेय और प्रेमचंद होते तो गदगद हो उठते।

 

खैर, उनके गदगद होने का तो मालूम नहीं लेकिन यह जरूर लगता है कि जिस सूचना और प्रसारण मंत्रालय को चैनलों की गुणवत्ता और दशा और दिशा पर गौर फरमाना चाहिए, उसका ध्यान अब भी शायद कहीं और है। चैनलों पर आम जन के हास और फिर परिहास के तबले बजने शुरू हो गए हैं और स्थिति यह है कि मंत्रालय का मौन व्रत टूटने का नाम ही नहीं ले रहा।

 

 

(यह लेख 5 सितंबर, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)


Sep 1, 2010

‘दो मिनट’ का मीडिया शिक्षण


इंटरनेट पर भारत के मीडिया संस्थानों की लिस्ट तलाश करने पर 18 लाख से ज्यादा नतीजे दिखाई देते हैं। इनमें सरकारी संस्थान कम और निजी ज्यादा दिखाई देते हैं। यह भीड़ कुछ ऐसी है कि लगता है जैसे पत्रकार बनाने वाली फैक्ट्रियों की भीड़ ही जमा हो गई हो। वहीं एमबीए इंस्टीट्यूट की तलाश करने पर 6 लाख के करीब नतीजे दिखते हैं।

कुल जमा मतलब ये कि मीडिया संस्थानों की पहुंच, पूछ और पहचान बढ़ रही है। इसी साल देश के सर्वोच्चतम माने जाने वाले मीडिया इंस्टीट्यूट भारतीय जन संचार संस्थान को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया। 1965 में इंदिरा गांधी के स्थापित इस संस्थान ने साउथ एक्सटेंशन की एक छोटी सी इमारत से निकल कर अरूणा आसिफ अली मार्ग तक आने में एक लंबा सफर तय किया है और पत्रकार बनने के ख्वाहिश लिए हुए हजारों युवाओं को बड़ा पत्रकार बनाया है। 

इसी तरह दिल्ली के 5 कालेजों लेडी श्री राम, कमला नेहरू, अग्रसेन, दिल्ली कालेज फार आर्ट्स एंड कामर्स, कालिंदी कालेज में अंग्रेजी में पत्रकारिता को स्नातक स्तर पर पढ़ाया जा रहा है और हिंदी में 4 कालेजों अदिति महाविद्यालय, भीम राव अंबेडकर कालेज, राम लाल आनंद , गुरू नानक देव खालसा कालेज में पत्रकारिता के स्नातक स्तर की पढ़ाई हो रही है।

यानी दिल्ली में मीडिया के अध्ययन का भरपूर माहौल तैयार हो चुका है और सरकारी कोशिशें भी काफी हद तक संतोषजनक ही रही हैं। लेकिन इसके बावजूद दिल्ली में निजी संस्थानों भी एक के बाद एक खुलते गए हैं। दिल्ली से सटे एनसीआर रीजन में पत्रकारिता की कई दुकानें खुली हैं और मजे की बात यह है कि उनमें से ज्यादातर ने कहीं न कहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के पाठ्यक्रम से ही बड़े सबक उठाए हैं। सरकारी कालेजों की तुलना में इनमें से कुछ भले ही दर्शनीय और आकर्षक ज्यादा हों लेकिन गुणवत्ता के मामले में ये अभी भी खुद को साबित नहीं कर पाए हैं।

दरअसल भारत में मीडिया शिक्षा मोटे तौर पर छ स्तरों पर होती है – सरकारी विश्वविद्यालयों या कालेजों में (जैसे दिल्ली यूनिवर्सिटी, पंजाब यूनिवर्सिटी), दूसरे, विश्वविद्यालयों से संबंद्ध संस्थानों (जगन्नाथ इंस्टीट्यूट वैगरह), तीसरे, भारत सरकार के स्वायत्तता प्राप्त संस्थानों (जैसे भारतीय जन संचार संस्थान) चौथे, पूरी तरह से प्राइवेट संस्थान, पांचवे डीम्ड विश्वविद्यालय(जैसे एमिटी) और छठे, किसी निजी चैनल या समाचार पत्र के खोले गए अपने मीडिया संस्थान। इनमें सबसे कम दावे सरकारी संस्थान करते हैं और दावों की रेस में जीतते हैं – निजी संस्थान। लेकिन विश्वसनीयता के मामले में बात एकदम उल्टी है। यहां यह बात भी गौरतलब है कि अब भारत में 125 डीम्ड विश्वविद्यालय खुल गए हैं। इनमें से 102 निजी स्वामित्व वाले संस्थान हैं। यहां भी शिक्षण संबंधी मूलभूत नियमों की अनदेखी की शिकायतें आती रही हैं। यही वजह है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कार्यभार संभालते ही कपिल सिब्बल ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा हासिल कर चुके सभी शिक्षण संस्थानों के कामकाज की समीक्षा के आदेश दे दिए। इसी तरह विश्वविद्यालयों का लेखा-जोखा लें तो पता चलता है कि इस समय अकेले दिल्ली में ही ज्यादातर कालेजों में पत्रकारिता पढाने वालों की सीटें खाली पड़ी हैं। शेक्सपीयर या सूरदास पढ़ानेवाले ही पत्रकारिता पढ़ाने को मजबूर हैं।

उधर निजी चैनलों के कुछ संस्थान पहले तो चयन ही ऐसे छात्रों का करते हैं जो उनके चैनल के लिए पूरी तरह से उपयुक्त दिखते हैं। इनमें ऊंची पहुंच वालों के योग्य बच्चों को तरजीह मिलती है। कुछ छात्र गधेनुमा वर्ग (यानी जो चौबीसों घंटे काम करने को बेशर्त तैयार रहते हैं) के भी होते हैं। इऩमें से कई संस्थान जो सर्टिफिकेट देते हैं, वह चैनल में तो चलता है लेकिन कहीं और नहीं। यहां किसी विश्वविद्यालय से संबंद्ध डिग्री देने का प्रावधान नहीं बन पाया है।

अब मसला यह भी है कि इन संस्थानों में पढ़ाता कौन है (क्या पढ़ाया जाता है, यह एक लंबा मसला है)। सरकारी संस्थानों में इस साल से यूजीसी के निर्देशों का पालन अनिवार्य कर दिया गया है यानी इन संस्थानों में अब वही शिक्षक नौकरी पा सकेंगें जो गुणवत्ता के स्तर पर कहीं भी कम नहीं होंगें क्योंकि नेट की परीक्षा को पार करना आसान नहीं। ऐसे में अक्सर गैस्ट फैकल्टी को बुलाने की कोशिश होती है। आप इस बात पर भी मुस्कुरा सकते हैं कि ज्यादातर सरकारी कालेजों में आज भी गैस्ट को 1 घंटे के लैक्चर के लिए 500 से 750 रूपए ही दिए जाते हैं। ऐसे में या तो लोग आते नहीं और अगर आ भी जाते हैं तो शिक्षण की अनुभवहीनता और अरूचि के चलते अपनी सफलता के किस्से सुनाकर चलते बनते हैं।

लेकिन निजी संस्थानों में अब भी नेट अनिवार्य नहीं दिखती। नतीजा यह होता है कि या तो उनके पास वही टीचर रह जाते हैं जिनका ज्ञान 1980 में अटका पड़ा है या फिर उन्हें वे मिलते हैं जो मीडिया में हैं तो लेकिन पढ़ाने की कला और ताजा ज्ञान से कोसों दूर हैं। ऐसे लोग क्लासों में आत्म-प्रशंसात्मक किस्सागोई तो कर लेते हैं लेकिन छात्र के ज्ञान को विस्तार नहीं दे पाते। नतीजा यह होता है कि अल्पविधि में चलने वाले कोर्स गुणवत्ता के मामले में सरक कर और भी नीचे पहुंच जाते हैं।

ऐसे में मीडिया शिक्षा सिर खुजलाती दिखती है। युवा पत्रकार बनना चाहते हैं, वह भी जल्दी में। यहां पत्रकारिता मैगी नूडल्स बनने के कगार पर पहंचने लगी है। यह बाद में पता चलता है कि जल्दी में जिस फसल को रातोंरात बड़ा किया गया था, वह सही कीटनाशकों के अभाव में कैसी पिलपिली निकली। अब सवाल यह उठता है कि क्या कुछ समय के लिए फोकस मीडिया के बढ़ते बाजार की बजाय योग्य शिक्षकों की खोज, उनकी ट्रेनिंग और सही पैकेज पर किया जा सकता है? वैसे मजे की बात यह भी है कि गूगल पर मीडिया टीचर्स की तलाश करने पर 9 करोड़ से ज्यादा एंट्री मिलती है।


(यह लेख 1 सितंबर, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ