Oct 31, 2010

रियासत

  

इससे बेहतर                   

बल्कि बेहतरीन और कैसा बचपन होता

बचपन को सलीकेदार, हवादार, खुशबूदार बनाने के लिए

मन की फौज को रखना चाक-चौबंद

याद रखना

दोहराना

अपनी जिंदगी की राजा या रानी मैं खुद हूं

बड़ी सी प्रजा भी खुद ही

यहां सपने मेरे अपने बड़े से खेत में उगेंगे

उनकी सिंचाई का बंदोबस्त भी मेरे हाथ में

मर्जी होगी मेरी

कि कित्ते तारे देखना चाहूं आसमान की स्लेट पर

किसे लिखूं खत

बताऊं

पिट्ठूगरम में कितनी बार जीती इस हफ्ते

अपनी गुड़िया के लिए मलमली गद्दे

अपने लिए गुलाबी फ्राक

बहन के लिए पिचकारी

सब मेरी फूलों की क्यारी से ही सरक कर आएंगे बाहर

बागडोर मेरे हाथ में

अपनी जिंदगी की, थिरकन की, मचलन की

रियासतें रियासतों से नहीं बनतीं

जहन में उकरते हैं उनके नक्शे

उसके तमाम चौबारे अंदर ही

फव्वारे भी

अंदर की रियासत बनाने वाले

सुख बोते हैं, सुख काटते हैं, सुख पाते हैं

Oct 29, 2010

पाकिस्तान, आतंकवाद और सूचना मंत्रालय


 

1980 के आस-पास के सालों में पंजाब के छोटे-से शहर फिरोजपुर में रहते हुए एक छवि जो मन में बसी, वो आज भी कायम है। वो छवि थी चुस्त-दुरूस्त पीटीवी यानी पाकिस्तान टीवी की। पीटीवी पंजाब में बहुत लोकप्रिय था। दूरदर्शन से भी ज्यादा। मनोरंजन के नाम पर पाकिस्तान टीवी पर भरपूर सामान रहता था लेकिन इसी के साथ जो चौंकाता था,वो था पीटीवी पर भारतविरोधी बयानबाजी। पीटीवी के समाचारों के बड़ा हिस्सा भारत के ही नाम रहता और वो एकतरफा भड़काऊ पक्ष बड़ी महारत से रखता। दूसरी तरफ भारतीय दूरदर्शन के शाम के क्षेत्रीय समाचार और रात के राष्ट्रीय समाचार संतुलित पक्ष तो देते लेकिन बेहद थके और ऊबाऊ लगते।

 

इस बात पर इतनी हैरानी नहीं होती जितनी इस पर होती है कि पिछले 30सालों से भारत का सूचना प्रसारण मंत्रालय आज भी इस भारत विरोधी मुहिम से बचने का कोई कारगर तरीका खोज नहीं पाया है।

 

 

ताजा खबर के मुताबिक मंत्रालय अब फिर सक्रिय हो उठा है। मंत्रालय को आभास है कि पड़ोसी देशों की सीमा से सटे इलाकों और नक्सल प्रभावित राज्यों में प्रसारण दे रहे दूरदर्शन और आकाशवाणी को आतंकवादी और माओवादी लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। इनसे निपटने के लिए अब केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय एक रणनीति तैयार कर रहा है। देश भर से मिली रिपोर्टों के आधार पर मंत्रालय अब इस सच को स्वीकार कर चुका है कि सीमापार से आतंकवाद झेल रहे जम्मू कश्मीर सहित पंजाब, अरूणाचल प्रदेश, मघालय, असम और नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के संवेदनशील जिलों में मंत्रालय को अब अतिरिक्त मुस्तैदी दिखानी होगी। इसके लिए दो स्तरों पर तैयारी की जा रही है। पहली एक विस्तृत रणनीति बनाते हुए दूरदर्शन और आकाशवाणी के एफएम रेडियो को नए सिरे से तैयारी करते हुए रौडमैप बनाने का काम सौंप दिया गया है। दूसरे, टीवी और रेडियो सिग्नल के माध्यम से प्रसारित हो रहे देश विरोधी अभियान को ब्लॉक करने की कारर्वाई पर गंभीर चिंतन किया जा रहा है। मंत्रालय अवगत है कि पीटीवी और पाक रेडियो के जरिए सीमावर्ती इलाकों में भारत विरोधी कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं। लेकिन चिंता सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। सरकार के गले का फांस बने हुए नक्सली भी अब सूचना तकनीक में माहिर होने लगे हैं। नतीजतन वे अपने रेडियो स्टेशनों के जरिए पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिलों में अपनी मर्जी के मुताबिक कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं। इससे निपटने के लिए मंत्रालय ने हाई पावर ट्रासमीटर लगाने की पहल कर दी है।

 

इसी कड़ी में नौशेरा, श्रीनगर, सोपोर, जम्मू लेह, राजौरी में भी ट्रांसमीटर लगाने का काम शुरू हो गया है। अरूणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के कुछ जिलों में भी दस वॉट की क्षमता वाले ट्रांसमीटर लगाए जाएंगें। इनसे दूरदर्शन और आकाशवाणी के सिग्नल पहले से बेहतर होगें ही, साथ ही विरोधी तत्वों के लिए इन्हें क्षीण करना असंभव होगा।

 

लेकिन इन कदमों से ज्यादा अकलमंदी मंत्रालय के इस कदम में दिखाई देती है कि अब नक्सलग्रस्त इलाकों में कम्युनिटी रेडियो के पनपने का बेहतर माहौल बनाया जाएगा। इन राज्यों में इस साल के अंत तक 100 से ज्यादा ब्रॉडकास्टिंग टावर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय ब्रॉडकास्टिंग को ज्यादा लोकप्रिय बनाने के लिए ही जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों में डीडी की डीटीएच सेवा को घर-घर पहुंचाने के लिए मुफ्त में सेट टॉप बॉक्स भी बांटे जा रहे हैं।

 

लेकिन असल मुद्दा दूरदर्शन-आकाशवाणी को लोगों तक पहुंचाना और विरोधियों के प्रसारण को रोकने भर से हल होने वाला नहीं है। मंत्रालय को अब यह समझ लेना होगा कि लोग सरकारी चैनल को तब ही देखेंगें जब उनमें चुस्ती,फुर्ती और बदलते समय के साथ चलने का दम-खम होगा। इतने सालों से सरकारी चैनल सत्तारूढ़ सरकार की प्यारी गुल्लक की तरह ही देखे जाते रहे हैं और मामला यहीं आकर पस्त पड़ जाता है।   

  

(यह लेख 25 अक्तूबर, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Oct 15, 2010

आह ओढ़नी

ओढ़नी में रंग थे,रस थे, बहक थी

ओढ़नी सरकी

जिस्म को छूती

जिस्म को लगा कोई अपना छूकर पार गया है

 

ओढ़नी का राग, वाद्य, संस्कार, अनुराग

सब युवती का श्रृंगार

 

ओढ़नी की लचक सहलाती सी

भरती भ्रमों पर भ्रम

देती युवती को अपरिमित संसार।

 

दोनों का मौन

आने वाले मौसम

जाते झूलों के बीच का पुल है।

                        

ओढ़नी दुनिया से आगे की किताब है

कौन पढ़े इसकी इबारत

ओढ़नी की रौशनाई

उसकी चुप्पी में छुपी शहनाई

उसकी सच्चाई

युवती के बचे चंद दिनों की

हौले से की भरपाई

ओढ़नी की सरकन युवती ही समझती है

उसकी सरहदें, उसके इशारे

पर ओढ़नी का भ्रम टूटने में भला कहां लगती है कोई देरी

 

Oct 11, 2010

माटी के चोले में तनवीर की विरासत

एक लोकगायिका, एक अदाकारा और बड़ी गहरी विरासत।  लेकिन असल जिम्मेदारी इससे भी कहीं बड़ी। कंधों पर नया थियेटर का काम और हर शो के बाद दर्शकों की खड़े होकर तालियों की भरपूर गूंज के साथ और बेहतर होते जाने की चुनौती। बेहतर होते जाने की यही बेचैनी नगीन तनवीर को सबसे अलग करती है। दिल्ली में संगीत नाटक अकादमी के आयोजित देश पर्व में चरनदास चोर के मंचन के बाद नगीन से विस्तार से बात करने का मौका मिला।

 

पहली बार चरणदास चोर में उन्होंने जब अपना कौशल दिखाया, तब साल था 1975 और उनकी उम्र थी 10 साल। आज तक वे इस शो के 1000 से ज्यादा रिहर्सल कर चुकी हैं। इसके बावजूद हर मंचन के दौरान वे एक नई ऊर्जा के साथ मंच पर कदम रखती हैं। लेकिन इसके साथ ही महसूस करती हैं कि कुछ ही सालों में थियेटर परिपक्व हुआ है। हर बार नाटक एक नया मजा देते हैं, हर बार नए मुहावरे गढ़े जाते हैं। जैसे कि इस बार चरनदास चोर में कामन वैल्थ गेम्स पर एक जगह टिप्पणी शामिल की गई और एक जगह पेप्सी कोक संस्कृति पर और इस पर लोग खूब गुदगुदाए।

 

वे कहती हैं कि दर्शक को सामने बैठ कर नाटक को देखना जितना लुभाता है, उन्हें उतना ही लुभाता है कलाकारों का अनुशासन और संयम। मंच पर आने से पहले सभी कलाकार पूरी तरह अपने में चरित्र में खोए रहते हैं, जरा भी बात तक नहीं होती। तन्मयता का यह माहौल सबमें ताकत भरता है।  

 

समय के साथ नगीन ने नाटक के तमाम पहलुओं में बदलाव होते देखे। यहां तक की कपड़े और जेवर भी बदलते गए। चरणदास चोर में रानी बनने वाली फिदा बाई पहले जो साड़ी पहनती थीं, वो सूती साड़ी छत्तीसगढ़ की हैंडलूम की होती थी। अब वो साड़ी बनती ही नहीं है। अब रानी गोल्डन साड़ी पहनती है और गोल्ड के ही गहने पहनती हैं।

 

 

नगीन बार-बार वो समय याद करती हैं जब उनके पिता हबीब तनवीर 1950 में मुंबई से दिल्ली आए और अपने साथ 6 कलाकार लाए। अपनी पत्नी की मदद से कनाट प्लेस के गैराज में नाट्य यात्रा की नीव डाली लेकिन नगीन को अखरता है कि लग बार-बार पिता का नाम लेते हुए यह भूल जाते हैं कि उनकी मां मोनिका मिश्रा नया थियेटर की जान थीं। हबीब पहले शख्स थे जो कि गांव वालों के साथ थिएटर में उतरे और उन्हें अपने हर कलाकार पर पक्का विश्वास था।

 

 

पीपली लाइव में चोला माटी के राम की जोरदार कामयाबी के बाद अब वे नाटकों से दूर रहने वाले आम दर्शकों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुकी हैं। वे फिल्म के निर्देशकों अनूशा और महमूद रिज़वी को आभार देते हुए यह भी मानती हैं कि मुंबई से से बुलावा काफी देर से आया। अब अगर अनूशा-महमूद की तरह और भी निर्देशकों को थियेटर की गूंज लुभाती है तो वे उनसे जुड़ने में एतराज नहीं करेंगी।

 

नगीन अब अपने सपनों पर काम करने में जुटी हैं। इस समय एक तरफ जगदीश चंद्र माथुर के नाटक कोणार्क और मन्ना भावे साठे के नाटक खामोश जुलूस पर काम चल रहा है तो दूसरी तरफ वे अपने पिता की शायरी, उनकी लिखी स्क्रिप्ट और नाटक सजो कर एक किताब का रूप देने में भी लगी हैं। परिवारवाद में न तो कभी उनके पिता का विश्वास था, न उनका है। वे पिता की विरासत को एक साथ सजोने के बाद पूरी तरह से गायकी में उतर जाना चाहती हैं।

 

(9 अक्तूबर, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित) 

Oct 10, 2010

अदालत का न्याय और मीडिया की सीमाएं



यह त्रासदी ही है कि एक लड़की के बलात्कार और हत्या के आरोपी की सजा इस बिना पर कम कर दी जाए कि वह शादीशुदा है और एक लड़की का बाप भी। अभी कुछ साल पहले की दलील कुछ ऐसी थी कि युवक एक आईपीएस अफसर का बेटा है और साथ ही भावी वकील भी।

 

यह युवक संतोष कुमार सिंह है जिस पर 14 साल पहले कानून की विद्यार्थी प्रियदर्शिनी मट्टू के बलात्कार और हत्या का आरोप है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले को सुनते हुए 3 दिसंबर, 1999 की दोपहर याद आ गई जब एडिशनल सेशन जज जी पी थरेजा ने 499 पेज के अपने फैसले में कहा था- हालांकि मैं जानता हूं कि संतोष ने ही इस अपराध को अंजाम दिया है लेकिन मैं उसे संदेह का लाभ देते हुए बरी करता हूं। ऐसा लगता है कि कानून उन लोगों के बच्चों पर लागू नहीं होते जिन पर खुद कानून को लागू करने की जिम्मेदारी होती है। अपने फैसले में थरेजा ने माना था कि दिल्ली पुलिस ने जांच के दौरान संतोष को मदद दी। मामले में इंस्पेक्टर ललित मोहन ने झूठे सबूत गढ़ने और अभियुक्त के बचाव का माहौल तैयार करने में भूमिका निभाई। बाद में सीबीआई के हाथों जांच की कमान आने पर भी डीएनए के साथ छेड़छाड़ दिखाई दी। इसलिए यह जांच भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 45 मददगार साबित नहीं हो सकी। यहां तक कि प्रियदर्शिनी के नौकर और महत्वपूर्ण गवाह को ढूंढा नहीं जा सका। (यह बात अलग है कि प्रिंट का एक जुझारू पत्रकार इस नौकर को बिहार के एक गांव में ढूंढ निकालता है और उसका पक्ष छाप भी देता है) कुल मिलाकर यह मामला पुलिस और जांच एजेंसियों की सांठगांठ और लापरवाही का नमूना साबित हुआ। उंगलियों के निशान, हेलमेट के रखाव और अंदरूनी कपड़ों तक के मामले में जो उदासीनता बरती गई, उसने इस मामले को कमजोर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायण ने इस मामले की दुर्भाग्यपूर्ण हालत देखते हुए कहा था कि न्याय के रक्षा मंदिर अब केसिनो में तब्दील हो गए हैं।  

 

थरेजा की टिप्पणियों ने दिल्ली पुलिस के बेहद पक्षपातपूर्ण रवैये की धज्जियां उड़ा दी थीं। शरीर पर 19 जख्मों के निशान लिए प्रियदर्शिनी की जांच करने में पुलिस ने न सिर्फ कोताही बरती थी बल्कि पूरी लीपापोती भी थी की क्योंकि उस समय संतोष के पिता पुलिस महानिरीक्षक थे।

 

खैर, 1999 की उस दोपहर संतोष तकरीबन हंसते हुए पटियाला हाउस कोर्ट से बाहर निकला था। उसकी खुशी और फुर्ती देखने लायक थी। उस दिन मीडिया के लिए उसकी एक तस्वीर को कैद करना बड़ा मुश्किल साबित हुआ था और उसकी हंसी देख कर किसी भी कैमरामैन के लिए विश्वास करना आसान नहीं था कि यही वह अभियुक्त है जिस पर धारा 302 और 376 कोई असर नहीं छोड़ सकी। वैसी ही हंसी जिसने रूचिका ममाले में आला पुलिस अधिकारी राठौर को जेल भिजवा दिया था।

 

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। केस आगे बढ़ता गया। प्रियदर्शिनी का परिवार हमेशा के लिए दिल्ली छोड़ कर जम्मू जा बसा था लेकिन वे न्याय पाने के लिए सक्रिय रहे। प्रियदर्शिनी के दोस्तों ने जस्टिस फार प्रियदर्शिनी की मुहिम चलाई और इंडिया गेट पर जाने कितनी मोमबत्तियां जलाकर सोते हुए समाज और न्यायिक व्यवस्था को झकझोरने की कोशिश की। जेसिका लाल और नीतिश कटारा मामले की तरह प्रियदर्शिनी की हत्या को भी जनता और मीडिया ने बराबर जिंदा रखा। इन दोनों ने ही न्यायालिका को कुछ भी भूलने नहीं दिया।

 

लेकिन जनता और मीडिया की एक आदत थोड़े से न्याय के बाद थक जाने की भी होती है। ताजा फैसले के तहत संतोष के बीवी-बेटी की दुहाई दी गई है। लगता है अब एक बार फिर जनता और मीडिया का काम शुरू होता है। क्या परिवार नामक संस्था से जुड़ जाने से अपराध कम हो जाता है और अपराधी अतिरिक्त संवेदना का पात्र बन जाता है, वह भी ऐसी स्थिति में जब कि अपराधी अब भी अपने अपराध को कबूल करने को राजी नहीं।

 

(यह लेख 10 अक्तूबर, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में कुछ बदलावों के साथ प्रकाशित हुआ)