Mar 24, 2011

मिस्र में बीते मेरे वो खौफनाक पल

मैंने अपने 20 साल के करियर में कभी ये नहीं सोचा था कि इस प्रोफेशन में कैमरामैन को रिवॉल्वर दिखाकर हाथ पीछे करने के बाद हथकड़ी लगा दी जाती है और कैमरामैन से पूछा जाता है कि तुम्हारे पास कोई हथियार तो नहीं है, ये मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। मैंने अभी तक बस यही सुना और यही देखा था कि पत्रकार की कभी लोकेशन पर मौत हो जाती है या कभी हंगामे को कवर करते वक्त उसे चोट लग जाती है। लेकिन मैंने पहली बार देखा कि चार पुलिसवाले होटल के अंदर कमरे में ले जाकर किसी कैमरामैन को हथकड़ी लगा देते हैं। यह घटना खुद मेरे साथ मिस्र में बीती है। मिस्र में मीडिया वालों के साथ मारपीट की गई, कैमरे तोड़े गए।

30 जनवरी को जब मुझे पता लगा कि मुझे मिस्र जाना है तो मुजे बहुत खुशी हुई क्योंकि 2-3 दिनों से मैं मिस्र की ही घटना को देख रहा था। वहां काफी समय से विद्रोह की आग भड़की हुई थी। मुझे पता था कि वहां पर काम करना काफी चुनौतीपूर्ण रहेगा, लेकिन मुझे इसी तरह के काम करना अच्छा लगता है इसलिए मिस्र का नाम सुनकर मैं काफी खुश था। एक फरवरी को मैं और मेरे साथ जा रहे सीनियर जर्नलिस्ट सूर्या गंगाधर ने दूतावास जाकर मिस्र का वीजा लगवा दिया। दो फरवरी की सुबह हम लोग मिस्र के लिए रवाना हो गए। शाम को हम लोग काइरो पहुंचे। काइरो के हवाई अड्डे पहुंचने के बाद कस्टम से ही समस्याएं शुरू हो गईं। काइरो हवाई अड्डे पर कस्टम पर पहुंचते ही सबसे बड़ी समस्या भाषा की थी। कस्टम अधिकारियों ने दो घंटे हमें खड़ा रखा। इसके बाद हमने दूतावास से एक कर्मचारी को बुलवाया। अधिकारियों ने हमसे 650 डॉलर कैमरा की सिक्योरिटी जमा करवाने के बाद हवाई अड्डे से जाने दिया।

हवाई अड्डे से बाहर हम जैसे ही शहर में पहुंचे जगह-जगह जनरल पब्लिक चैकिंग चल रही थी। हम जैसे ही अपने होटल के पास पहुंचे वहां पहले से ही रास्ता ब्लॉक किया हुआ था। वहां 15 साल के बच्चों से लेकर 65 साल के बुजुर्ग अपनी कॉलोनी की सेफ्टी के लिए खड़े थे। वहां पर कॉलोनी के लोगों को अपना पासपोर्ट दिखाकर हम अंदर गए। हम कमरे में जाने के बाद कैमरा लेकर बाहर आ गए। वहां एक लड़के से हमने इंटरव्यू देने के लिए पूछा। पहले तो उसने मना कर दिया लेकिन काफी कहने के बाद वह तैयार हो गया, वह काफी डरा हुआ था। उसने बोला कि यहां का माहौल काफी खराब हो गया है इससे पढ़ाई पर भी फर्क पड़ रहा है। जितना जल्दी हो सके इसका समाधान निकलना जरूरी है क्योंकि इंसान के अंदर हमेशा डर बना रहता है, एक हफ्ते से कोई आदमी अपना काम नहीं कर पा रहा है। इसके बाद वह अपने घर की तरफ चला गया।

बाद में 2-3 लड़के आए और हमसे कैमरा बंद करने के लिए बोला, उन्होंने हमें वहां से जाने के लिए बोल दिया। हम होटल के अंदर चले गए। अगले दिन सुबह हम तहरीर चौक गए, वहां पर पूरा कर्फ्यू का माहौल था। वहां सेना के कई टैंक खड़े थे और जगह-जगह पत्थर पड़े हुए थे। जब हम तहरीर स्क्वायर के अंदर गए तो हमें वहां पर डर भी लग रहा था क्योंकि वह एंटी मुबारक लोगों का मुख्य अड्डा था, वहीं पर लोग प्रोटेस्ट कर रहे थे। वहां पर मेरा कैमरा जैसे ही सेना के जवानों की ओर मुड़ा उन्होंने उसे बंद करने के लिए कहा। हमने वहां पर दो घंटे शूटिंग की। इसके बाद होटल से फीड भेजकर हम दोबारा तहरीर चौक गए।

तहरीर चौक पर मीडियावालों को ज्यादा समस्या नहीं हो रही थी। वहां थोड़ा खतरा था लेकिन मीडिया वाले शूटिंग कर सकते थे। जब मैं तहरीर चौक पर शूट कर रहा था तो पास ही एक ग्रुप में झगड़ा हो गया। मैं उस तरफ कैमरा लेकर गया और शूट करने लगा। उसी समय सेना के एक अफसर ने मुझे देख लिया और मुझसे कैमरा बंद करने के लिए बोल दिया। इसके बाद मैने कैमरा बंद कर दिया। इसके बाद वह अफसर मेरे पास आया और मुझसे कैमरा छीन लिया। मैंने उनसे कैमरा मांगा तो उन्होंने कैमरा वापस करने से मना कर दिया और मुझे अपने साथ लेकर जाने लगे। मैंने उस अफसर से काफी निवेदन किया कि मैं अपने एक रिपोर्टर से बात कर लेता हूं या भारतीय दूतावास से संपर्क कर लेता हूं लेकिन उसने मना कर दिया और मुझे तहरीर चौक से निकालकर प्रो मुबारक ग्रुप की ओर ले जाने लगा।

वहां पर दो ग्रुप थे- प्रो-मुबारक और एंटी मुबारक। सबसे ज्यादा समस्या प्रो मुबारक के साथ होती थी, मीडिया पर हमले यह ग्रुप करता था। प्रो मुबारक का कहना था कि हमारे देश में शांति है, मीडिया यहां क्यों आई है। सेना का अफसर मुझे लेकर काफी आगे आ गया लेकिन बार-बार निवेदन करने के बाद उसने मुझे छोड़ दिया। वहां से छूटने के बाद जैसे ही मैं थोड़ी दूर गया मुझे 10-15 लड़कों ने घेर लिया। वो लड़के पहले तो मेरा कैमरा छीनने लगे। जब मैंने उन्हें कैमरा नहीं दिया तो वे उसका टेप निकालने लगे। मैंने टेप निकालकर उन्हें दे दिया। मैं उनसे बात कर ही रहा था कि एक लड़के ने मेरी जेब में हाथ डालकर कुछ पैसे निकाल लिए। जब मैंने टेप उन्हें दी तो उन्होंने मेरे सामने दोनों टेप जला दिए। इसके बाद मैंने एक लड़के के हाथ में अपना आई कार्ड देखा, उसने उसे भी जला दिया। इतनी देर में सेना के जिस अफसर ने मुझे पकड़ा था वह भी वहां आ गया। जब मैं उन लड़कों से छोड़ने के लिए निवेदन कर रहा था तो वह अफसर भी स्थानीय भाषा में शायद यही कह रहा था कि इसे मैंने पकड़ा है छोड़ दो।

इसके बाद मैं वहां से होटल जाने लगा, टैक्सी से थोड़ा आगे निकले ही थे कि फिर से कुछ लड़कों ने मुझे घेर लिया। वहां लोगों में भाषा कि बड़ी समस्या थी। मैं टेप का इशारा करके बता रहा था कि मेरे पास कोई फिल्म नहीं है। वह उस समय मेरा आई कार्ड चेक कर रहे थे, लेकिन मेरे पास आई कार्ड भी नहीं था। वह मुझे वहां से पैदल लेकर जाने लगे इतने में वहां पर फायरिंग और पथराव चालू हो गया। उस वक्त एंटी मुबारक और प्रो मुबारक के बीच जबरदस्त फायरिंग हो रही थी। उन लोगों ने मुझे सेना के हवाले कर दिया।

सेना के अफसरों से जब मैंने कहा कि मेरे कैमरे में टेप नहीं है, मुझे होटल जाना है और मेरे पास आई कार्ड भी नहीं है। लेकिन सेना के अफसर एम शोधे ने मेरे हाथ से कैमरा, पासपोर्ट, मोबाइल, टेप और एक्स्ट्रा बैटरी छीनकर मोबाइल का स्विच ऑफ कर दिया। वे मुझे एक मकान के अंदर ले गए मकान के अंदर उन्होंने अपना अस्थाई ऑफिस बनाया हुआ था। मैंने उनसे भारतीय दूतावास और ऑफिस में फोन करने का बहुत निवेदन किया लेकिन उन्होंने मना कर दिया। इसके बाद सेना के दो जवान और दो लोकल लड़के मुझे उस मकान के पीछे पुराने खंडहर की तरह एक कमरा था वहां ले गए। वहां पहले से ही 4 लड़के जो कि 20 से 25 साल के थे उनको गिरफ्तार करके रखा हुआ था। मुझे भी उनके साथ ही बैठा दिया गया।

वहां 4 लड़के और 5 सेना के जवान थे, किसी को भी अंग्रेजी नहीं आती थी। सेना के एक जवान ने पूछा 'आर यू हिंद?', मैंने बोला यस 'आई एम हिंद'। फिर वह बोला हिंद वन, अमिताभ बच्चन स्टार? उसके आगे उसको कुछ बोलना नहीं आया। जब मैं वहां पर अंदर बैठा था तो बाहर गोलियां चल रही थीं। मैं उस वक्त अपने आपको हैंडिकैप्ड समझ रहा था क्योंकि मेरा कैमरा सेना की कस्टडी में था और बाहर गोलियां चल रही थीं। इस तरह के माहौल में अगर कैमरामैन के पास कैमरा न हो तो वह हैंडिकैप्ड ही हो जाता है। इस तरह के अवसर बार-बार नहीं मिलते।

मुझे वहां पर चार घंटे बिठाकर रखा गया। चार घंटे तक मैं सेना के एक जवान से विनतियां करता रहा कि मुझे एक फोन करने दिया जाए लेकिन वह मना करता रहा। उसके बाद एक मेजर और तीन सिपाही आए। वह अपनी भाषा में सबके पते लिखने लगे। उस समय मुझे डर लगा कि पता नहीं क्या लिख रहे हैं मैंने उनसे पूछने की कोशिश कि लेकिन उन्होंने मना कर दिया और बैठने के लिए बोल दिया। कुछ वक्त बाद तहरीर चौक पर सेना के जिस अफसर ने मुझे पकड़ा था वो भी वहीं पर आ गया।

मैंने उसे अपनी पूरी कहानी बताई लेकिन उसे मेरी बातों पर यकीन नहीं हुआ। सेना का अफसर सोचने लगा कि जब मैंने इसको छोड़ा होगा उसके बाद ये फिर से कहीं शूटिंग करने लगा होगा इसलिए इसे दोबारा पकडा़ होगा। उसने मुझे दोबारा बैठने के लिए कह दिया। मैंने काफी रिक्वेस्ट की कि मुझे ऑफिस या भारतीय दूतावास में फोन करने दिया जाए लेकिन उन्होंने मना कर दिया। मुझे उस वक्त डर लग रहा था। मैंने उस अफसर से बोला कि मेरी कल की फ्लाइट है और मुझे अपना सामान भी पैक करना है, मेरे पास कोई टेप भी नहीं है, मुझे वहां से जाने दिया जाए। कुछ देर बाद वहां एक मेजर आया और उसने मेरी तरफ इशारा करके मुझे कमरे से बाहर बुलवाया।

वह मुझे ऑफिस में चलने के लिए बोलने लगा। मैं उनके ऑफिस में गया वहां पर सेना का वही अफसर एम शोधे एक और अफसर के साथ मौजूद था। उन्होंने मुझे पासपोर्ट और मोबाइल देकर जाने के लिए कहा। दूसरा अफसर तो कैमरा देने के लिए तैयार हो गया था लेकिन एम शोधे बार-बार मना कर रहा था। मैं जब उससे निवेदन कर रहा था तो वह मेरा हाथ पकड़कर दोबारा अंदर करने लगा। मैंने जब कैमरे के बारे में पूछा कि मुझे कैमरा क्यों नहीं दे रहे हो तो उसने कहा कि कल आकर के कैमरा ले जाना। मैंने बोला कल तो मेरी फ्लाइट है मुझे कल भारत वापस जाना है। उसने कहा कि मैं अब कैमरा नहीं दूंगा कल किसी भी टाइम आकर ले जाना। मैं वहां से बगैर कैमरे के निकला। मेरा होटल वहां से 15 किमी. दूर था और वहां कोई टैक्सी भी नहीं थी। सेना के ऑफिस के पास ही हिल्टन होटल था। मैंने सोचा इस होटल में एंट्री कर लेता हूं तो कम से कम सुरक्षित रह सकूंगा।

मुझे सेना के ऑफिस से निकलते ही फिर से दो लोगों ने पकड़ लिया। उन लोगों ने पूछा कि कहां जा रहे हो, मैंने कहा कि इस होटल में मैं रुका हुआ हूं। मैंने उनको अपना पासपोर्ट दिखाया तब जाकर उन्होंने मुझे छोड़ा। होटल के अंदर जाते ही मुझे लगा कि अब मैं सुरक्षित जगह आ गया हूं। मेरे पीछे मेरा परिवार, दोस्त और ऑफिस बड़ी परेशानी में थे क्योंकि कई घंटे से टीवी पर यही न्यूज चल रही थी। मोबाइल ऑन करते ही ऑफिस से फोन आने शुरू हो गए। ऑफिस में मैंने बताया कि अब सुरक्षित हूं। तब जाकर ऑफिस वालों को थोड़ी राहत मिली।

इस पूरी घटना में मुझे ऑफिस की ओर से बड़ा सहयोग मिला, मैं इस अहसान को कभी नहीं भूल पाऊंगा। इसके बाद मेरी सूर्या गंगाधर से बात हुई, उन्होंने मुझे बोला कि तुम्हारा अब वहां से टैक्सी से आना मुश्किल है तुम वहां पर कमरा लेकर रात को वहीं पर रुक जाना। लेकिन यहां पर कोई कमरा खाली नहीं था। इसके बाद भारतीय राजदूत का फोन आया उन्होंने कहा कि वहां पर कई भारतीय पत्रकार रुके हुए हैं उनके साथ कमरा शेयर कर लेना। मैं अभिसार शर्मा के साथ रात को कमरे में रुक गया। सुबह मेरी सूर्या गंगाधर के साथ बात हुई। उन्होंने कहा कि तुम टैक्सी लेकर आ जाओ, फिर दूतावास आ जाना।

मैं सुबह अपने होटल में गया, रिसेप्शन से अपने कमरे की चाबी ली और अपने कमरे में चला गया। मैं कमरे में चला गया तो सूर्या का फोन आया कि तुम कमरे से बाहर मत निकलना होटल के बाहर पुलिसवाले घूम रहे हैं। मैं सूर्या से बात कर ही रहा था कि कमरे के बाहर से किसी ने दरवाजा नॉक किया। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला एक पुलिसमैन ने मेरे सिर के पास रिवॉल्वर लगा दी। रिवॉल्वर लगाकर उसने मुझसे पूछा, 'यू हैव एनी वैपन्स' मैंने बोला 'नो आइ हैव नो वैपन्स, आइ एम नॉट ए टैररिस्ट, आइ एम जर्नलिस्ट'। उसके बाद उसने पूछा 'यू हैव एनी कैमरा एंड लैपटॉप' मैंने बोला 'नो आइ हैव नो कैमरा नो लैपटॉप'। उसके बाद उस पुलिसमैन ने दूसरे की तरफ इशारा करके मुझे हथकड़ी पहना दी और मुझे साथ चलने के लिए बोलने लगा।

मैं उनके साथ रिसेप्शन पर आ गया। उन्होंने मुझे वहीं बैठने के लिए कहा फिर होटल के कर्मचारी से बात करने लगे। 10-15 मिनट के बाद सूर्या होटल के अंदर आ गया। सूर्या को देखकर होटल की कर्मचारी ने इशारा किया कि ये भी इनके साथ ही हैं। उसके बाद सूर्या को भी रिसेप्शन पर बैठा लिया। कुछ देर बाद मेरे हाथों की हथकड़ी को खोलकर हम दोनों को पुलिस स्टेशन ले गए। वहां पर हमें दो घंटे तक बैठाए रखा, हम वहां इस इंतजार में बैठे रहे, हमें बताया गया कि हमारा कोई ऑफिसर आएगा वह आपसे बात करेगा। हमारे पासपोर्ट और मोबाइल उन्हीं के पास थे। दो घंटे के बाद एक अफिसर आया, उसने पासपोर्ट चेक किए और हमें वापस छोड़ दिया। उसके बाद वही पुलिसवाले हमें वापस होटल लेकर आए और दोबारा इनवेस्टिगेशन के लिए लेकर जाने लगे।

हम पुलिस की गाड़ी में बैठे, सूर्या ऑफिस में फोन लाइन पर थे। मैं भारतीय राजदूत से फोन पर बात कर रहा था। राजदूत ने कहा कि मेरी पुलिसवालों से बात करवा दीजिए, पुलिसवाले ने बात करने से मना कर दिया। मैंने पुलिसवाले से पूछा कहां लेकर जा रहे हो राजदूत पूछ रहे हैं, पुलिसवाले ने जगह बताने से मना कर दिया। फिर वह हमें किसी कॉलोनी में लेकर गया। मेन रोड पर डेढ़ घंटे खड़ा करके बोला हमारे ऑफिसर आएगा वह आपसे बात करेगा। पुलिसवाले ने कहा कि महीने बाद अगर आप आते तो हमारे गेस्ट होते लेकिन इस वक्त बहुत बुरे इंसान हो। डेढ़ घंटे बाद एक अफसर आया और वह पासपोर्ट लेकर अंदर चला गया। आधे घंटे बाद वह ऑफिसर वापस आया और उसने हमारे पासपोर्ट लौटा दिए। उसके बाद हम होटल में आए तो हमें कहा गया कि आप लोग एक बार चेक आउट कर लीजिए। हमने रूम चेक आउट किया उसके बाद पुलिसवाले हमें भारतीय दूतावास छोड़कर आए। इसके बाद भारतीय दूतावास ने दूसरे होटल में कमरा दिलवा दिया।

बाद में हम दूतावास के पास से ही शूट करके दूतावास से ही फीड भेजते रहे। अगले दिन मैं दूतावास से वहीं के रहने वाले नवीन को लेकर सेना के उसी ऑफिस में पहुंचा जहां पर मेरा कैमरा जमा था। सेना के ऑफिस में एम शोधे मौजूद था। उसने हमें इंतजार करने के लिए कहा और बोला कि हमारा ऑफिसर आएगा उसके बाद कैमरा मिलेगा। कुछ देर में वहां फायरिंग शुरू हो गई तो शोधे ने हमें बोला कि आप लोग अभी यहां से निकल जाइए, शाम को आकर कैमरा ले जाना। शाम को भारतीय दूतावास में काम करने वाला अहमद मेरे साथ गया। एक दूसरे ऑफिसर ने अहमद से कहा कि कैमरा सेना के हैडक्वॉर्टर में जमा है कल आकर ले जाना। अगले दिन मैं और विनय सेना के मुख्यालय पहुंचे। वहां हमें मना कर दिया गया, बोला गया कि वहां कोई कैमरा जमा नहीं है। उसके बाद हम उसी जगह सेना के ऑफिस में गए तो वहां पर एम शोधे ने हमें बताया जो आदमी कल आपके साथ आया था कैमरा वही लेकर गया है।

मैंने नवीन को फोन किया तो उसने मना कर दिया। इसके बाद दूतावास जाकर नवीन और अहमद को लेकर उसी ऑफिस में आया तो शोधे ने मना कर दिया। फिर उसने बोला कि किसी लोकल आदमी ने अपना आई कार्ड दिखाया और कहा कि मैं दूतावास से आया हूं तो मैंने कैमरा उसी को दे दिया। मैंने पूछा आपने कोई रिसीविंग लिया था उसका नाम नोट किया तो उसने मना कर दिया। उसके साथ उसका एक और ऑफिसर बैठा हुआ था उसने कहा कि तुम दूतावास जाओ, वहां जितने कर्मचारी हैं सबसे चेक करो। एम शोधे हमारे साथ दूतावास में आया। उसके बाद उसने मना कर दिया कि इनमें से कोई भी नहीं है।

इसके बाद हमने एक कंपलेंट लिखी लेकिन मुझे पहले से लग रहा था कि इस अफसर की नीयत कैमरे को लेकर खराब हो गई थी। इसीलिए वह शुरू से ही कैमरा नहीं देना चाहता था और झूठ पर झूठ बोल रहा ता। इस तरह की परिस्थिति में हम कुछ ज्यादा नहीं कर सकते थे। इसलिए हमने अंग्रेजी और अरबी भाषा में रिटिन में कंपलेंट लिख ली। अगले दिन हमें भारत वापस आना था। हम हवाई अड्डे आए, वहा पर हम कस्टम अधिकारियों से मिले। उन्होंने हमसे कहा कि पहले कैमरा दिखाओ उसके बाद 650 डॉलर मिलेंगे। हमने कहा कि हमारा कैमरा सेना के अफसरों ने नहीं दिया इसलिए दूतावास के लैटरपैड पर यह कंपलेंट लिखी है। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने एक नहीं सुनी औऱ 650 डॉलर रख लिए।

इस घटना में अपने पूरे ऑफिस का, दोस्तों का, रिश्तेदारों का और खासतौर से अभिसार शर्मा, सांतिष नाइल, बरखा दत्त का साथ कभी नहीं भूल पाऊंगा जो कि प्रार्थना कर रहे थे कि मैं जल्दी से भारत वापस आ जाऊं। इन सभी की दुआओं से मैं वापस अपने देश सही-सलामत पहुंच सका।

राजेश भारद्वाज
(राजेश भारद्वाज सीएनएन-आईबीएन न्यूज चैनल में बीते 5 साल से सीनियर वीडियो जर्नलिस्ट के पद पर कार्यरत हैं। तकरीबन 20 सालों से मीडिया में सक्रिय राजेश इराक युद्ध, 2004 के अमेरिकी चुनाव, 2010 में अफगानिस्तान में भारतीयों पर आतंकी हमले को कवर कर चुके हैं।)


यह लेख आईबीएन खबर वेबसाइट से उठाया गया है. लेख को आईबीएन खबर की साइट पर पढ़ने के लिए http://khabar.ibnlive.in.com/blogs/102/587.html लिंक पर क्लिक करें.

Mar 22, 2011

चैनल पर जनता की वाणी


25 साल पहले इस देश में एक प्रयोग की शुरूआत हुई थी। नाम था जनवाणी। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह सुविचार आया था कि थकते हुए दूरदर्शन में नई ताकत का संचार भरने के लिए एक ऐसे कार्यक्रम की शुरूआत की जाए जिसमें जनता जन प्रतिनिधियों से सीधे तौर पर खुलकर सवाल पूछ सकें। कुबेर दत्त को इस कार्यक्रम का प्रोड्यूसर बनाया गया। कार्यक्रम खूब चला लेकिन के सी पंत से जुड़े एक विवादास्पद कार्यक्रम के प्रसारण के बाद बाद इस कार्यक्रम का पतन आरंभ हो गया। इसके बावजूद यह कार्यक्रम अपने मकसद में कामयाब रहा। इसने जनता के स्टूडियो तक पहुंचने की नींव रखी। यह भारत में जनता के मुखर बनने का पहला बिगुल था। जनता और प्रतिनिधियों के बीच बना यही सेतु आज एक कद्दावर रूप में उभर कर सामने आ गया है।

 

जनता की इसी आक्रोश की आवाज के टीवी पर तय हुई 25 साल की यात्रा पर हाल ही में अरिंदम चौधरी के द संडे इंडियन ने दिल्ली में एक राष्ट्रीय मीडिया सेमिनार का आयोजन किया। यूं तो मीडिया के 16 प्रतिनिधियों को एक ही दिन सुनना बोझिल हो सकता था लेकिन मुद्दे की ताकत ऐसी थी कि चर्चा अपने नियत समय से काफी आगे निकल गई। यह बात तो साफ हुई कि मीडिया, खास तौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया, ने जनता की आवाज को सामन लाने का एक बड़ा सशक्त मंच तैयार किया है लेकिन यह सफल कितना रहा, यह अपनेआप में एक बड़ा सवाल है।

 

दूरदर्शन के दिनों को याद कीजिए। आप और हम- सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम। खतों पर आधारित। हर सप्ताह एंकर जब आप और हम का पता बोलने लगता तो लोगों को प्लैकार्ड देखने की जरूरत भी नहीं पड़ती। उन्हें पता याद था। आप और हम, दूरदर्शन केंद्र, संसद मार्ग, नई दिल्ली। 110001 हर रोज हजारों की तादाद में बोरियों में भरकर खत दूरदर्शन केंद्र आते। एक पूरी की पूरी टीम उन खतों को खंगालती, बेहतरीन खतों को फिर कार्यक्रम में शामिल किया जाता। यह अखबारों के संपादक के नाम पत्र का टीवीनुमा रूप था जो बेहद लोकप्रिय हुआ। यहीं से भारतीय जनता को अपनी राय को और गुस्से का खुलकर इजहार करने का मौका भी मिला।

 

उसके बाद 1992 के शुरूआती दिनों में जब जी टीवी अपनी पलकें खोल रहा था तो तीन कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की गई। ये तीनों ही कार्यक्रम अपनी जोरदार लोकप्रियता से देश के पहले निजी चैनल की मजबूत उपस्थिति और आने वाले सालों में नए टीवी चैनलों की पैदावार के स्तंभ बनकर खड़े हो जाते हैं। ये तीन कार्यक्रम थे- आपकी अदालत, हेल्पलाइन और इनसाइटआपकी अदालत के एंकर रजत शर्मा थे, यह कार्यक्रम उनके जी टीवी छोड़ कर जाने पर जैसे दहेज में उनके साथ चल कर जाता है और अब तक उन्हीं के चैनल इंडिया टीवी की आंखों का तारा है। इसका शुमार देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले इंटरव्यू आधारित शोज में है। इनसाइट उमेश उपाध्याय का कार्यक्रम था जो किसी एक मुद्दे की तह में जाकर गहरी पड़ताल करता था। तीसरा कार्यक्रम था - हेल्पलाइन। इसकी एंकर जामिया से पढ़ीं राधिका कौल थीं। यह कार्यक्रम जनता की शिकायतों, मांगों और सुझावों पर आधारित था। हर हफ्ते आने वाले सप्ताहों के लिए मंत्रालयों या किसी विषय विशेष की घोषणा कर दी जाती और फिर दर्शक उस पर अपनी चिट्ठियां भेजते। इस टीम में गौरी गुप्ता, असदउर्रहमान किदवाई, शैला दुबे और मैं थे।

 

हेल्पलाइन असल में एक तरह का जन आंदोलन ही था। एलआईसी, पेंशन, रेलवे, उपभोक्ता मामलों पर खास तौर पर चिट्टियों का ऐसा अंबार लगता कि बोरियां भर-भर कर आतीं। सबसे बड़ा काम तो इन चिट्टियों को खोल कर उनका वर्गीकरण करना ही होता था और फिर संबंधित मंत्रालय से संपर्क बनाना, कार्यक्रम करना और उसके बाद उसका फॉलोअप भी। इसमें खास बात यह थी कि जिन लोगों के खतों को शामिल किया जाता था, उनके घर एक टीम भेजी जाती थी और उन पर पूरी स्टोरी को काटा जाता था। पाकिस्तान में बंदी बने लोगों पर बना एपिसोड तो कइयों की आखें भर आईं थीं। इस तरह से हर एपिसोड जनता के सरोकारों पर बुना जाता था।

 

जाहिर तौर पर यह कार्यक्रम बेहद सराहा गया। इस तरह से निजी चैनलों के शुरूआती दौर ने ही इस बात के पुख्ता सुबूत दे दिए कि जनता जन भागेदारी और जन के आस-पास घूमने वाले कार्यक्रमों में गहरी दिलचस्पी रखती है। फिर तो यह प्रयोग चल ही पड़ा, अलग-अलग तरीकों से अलग-अलग चैनलों ने इन्हें आत्मसात किया और अपनी जरूरत के मुताबिक इन्हें ढाला। 

 

इस कड़ी में विनोद दुआ का जनवाणी हमेशा मील का पत्थर तो रहा लेकिन बाद में जब खबरिया चैनलों का प्रसव तेजी से होने लगा तो खबर की खोज और उसमें मसाले की मौजूदगी टीवी पर हावी होने लगी। लोकतंत्र के चौथे खंभे के तौर पर निजी चैनलों ने शुरूआती सालों में अपनी ताकत खबरिया पक्ष पर ही लगाई लेकिन धीरे-धीरे यह भी साबित होने लगा कि जनता पसंद वही करेगी, जहां वो खुद भी होगी। यह जन आंदोलन के दौर की पहली दस्तक थी। दूरदर्शन पर चिट्ठी पढ़ते कार्यक्रमों की लोकप्रियता जनता से दो तरफा संवाद के कायम करने की जरूरत की तरफ संकेत देते थे और अब निजी चैनलों पर लगती एसएमएस की गुहार, ट्वीट, फेसबुक और आडियंस की मौजूदगी में होने वाले कार्यक्रम जनता को मंच प्रदान करने का काम कर रहे हैं। इसका एक नतीजा तो प्रणाली में पारदर्शिता की चहलकदमी का बढ़ना है लेकिन दूसरे नतीजे काफी दूरगामी हैं। भारतीय दर्शक अब क्रांतिकारी-सा हो चला है। वह अब मौन नहीं है, मुखर है। शून्यता में डूबी उसकी शख्सियत में अब उत्साह भर आया है जो हर मुद्दे पर खुल कर बोलने की ताकत रखता है। वो प्रणाली से नहीं डरता, वो उसे झकझोरता है। टीवी के मंच पर जब वो बोलता है तो उसकी बात तथ्यों से लैस होती है। वह अब सिटिजन जर्नलिज्म के मौकों का फायदा उठाने लगा है। वह खुद एक अदना ही सही, लेकिन पत्रकार बन चला है। वह टीवी पर अपने वॉक्सपॉप देता है तो भी आत्मविश्वास से लबरेज होता है। टीवी पर उसका फोनो किसी मंझे हुए पत्रकार से कम नहीं होता। उसकी बात अब पैनी, सटीक और साफ होती जा रही है। यह करामात उस करिश्माई और नटखट डिब्बे की है जिसे कुछ साल पहले बुद्धू बक्सा कहकर  नकारने की कोशिश की गई थी।

 

अब वह एक ऐसा आम आदमी बन चला है जिसका पास कहने के लिए बहुत कुछ खास है। मजे की बात यह कि अब राजनेता भी इस कथित आम आदमी से डरने लगा है क्योंकि यह आम आदमी सूचना के भंडार पर बैठा है और धीरे-धीरे ताकतवर होता जा रहा है। जो उसे अनसुना करेगा, वह औंधे मुंह गिरेगा क्योंकि यह पब्लिक ही है जो सब कुछ जानती है।

 

लेकिन इन सबके बीच खामियां भी कई हैं। टीवी में आडिंयस की तलाश व्यापार का चेहरा लेने लगी है। नोएडा में बसे चैनल के लिए वहीं की जनता जुटाई जाती है और ग्रेटर कैलाश के लिए आम तौर पर दक्षिण दिल्ली से ही। इस वजह से दर्शक एक खास तबके, सोच या केंद्र से निकला हुआ ही आता है। कई बार दर्शक को जुटाना इतना मुश्किल हो जाता है कि उनकी जोरों से गुहार लगानी पड़ती है। कालेज के बच्चे भी आसानी से मिलते नहीं। वे एकाध बार शौक से चले जाते हैं, फिर उनका उत्साह उड़नछू हो जाता है। जो बुजुर्ग जाना चाहते हैं, उनके लिए खास तौर पर अलग से गाड़ी भेजने की दिलदारी कई चैनल दिखाते नहीं। लिहाजा किसी एक स्कूल कालेज या कालोनी में गाड़ी भेज कर ही वहीं के दर्शक एक बस में भर जुगाड़ कर लिया जाता है।

 

लेकिन इस जनता के बिना काम चलता भी नहीं। उसका भावनाओं में डूबा चेहरा, उसका चिल्लाना हंगामा करना, बेधड़की से बोलना यह सब अगर लोकतंत्र का आईना है तो टीवी चैनलों की सांसे भी। ये अगर न हों तो कई चैनल यूं ही बेदम होकर जा गिरें। यानी जनता जनार्दन जिंदाबाद। जनता है तो जीवन है। यह बात अलग है कि यह सच्चाई जितना मीडिया जानती है, तकरीबन उतना ही जनता भी(खास तौर से बड़े शहरों की जनता)। जनता जरूरी है, इसीलिए हर न्यूज चैनल के पास अब आंडियस जुटाने की दुकान भी है जिसमें जरूरत के मुताबिक कार्यक्रमों में बुलाए जाने वाली आडियंस के नाम-नंबर-पते टंगे रहते हैं। यह चयनित आडियंस है। जांचीपरखी हुई, जो सुंदर स्मार्ट और टीवी को बतौर माध्यम समझने वाली है। जो कि बताई गई भाषा में फराटेदार ढंग से बोल सकती है।कार्यक्रम शुरू होने से कुछ घंटे पहले फोन कीजिए और जनता जुटा लीजिए। ठीक उसी अंदाज में जैसे कि शादी के लिए किराए के बाराती ढूंढ लिए जाएं जो आमंत्रण देने वाले के एसी ट्रक में सवार होकर आएं औऱ तब तक ठुमके लगाएं जब तक कि आमंत्रण देने वाला चाहे।

 

इस विभाग में काम करने वाली टीम का वर्गीकरण भी बहुत ही व्यावहारिक ढंग से किया जाता है ताकि जरूरत पड़ने पर मनमाफिक भीड़ जुटाई जा सके। चिल्लाने वाली जनता, तालियां पीटने वाली जनता, बिना दिमाग की जनता, शूट के लिए दो-चार घंटे तक इंतजार करने का माद्दा रखने वाली जनता वगैरह। कार्यक्रम और एंकर के स्वभाव के मुताबिक इन्हे जगह मिलती है और फिर चैनल के खाली, उबाऊ स्क्रीन और कभी-कभार मुश्किल से कटने वाले समय को भरने के लिए इस जनता का सदुपयोग किया जाता है।

मिसाल के तौर पर ऐसे कार्यक्रम जहां जनता के चेहरे पर न तो कोई विशेष फोकस करना है और न ही उनकी आवाज सुनाई जानी है, वहां ऐसी जनता का जुटाऊ अभियान चलाया जाता है है जो टीवी स्टूडियो देखने की बेताबी से भरी हो। इसमें वैसी जनती बड़ी काम की होती है जो किसी एंकर विशेष या पिर स्टूडियो को देखने में अपना परम सौभाग्य समझती है लेकिन एक सच यह भी है कि एकाध बार के चक्कर के बार फिर से उसी दर्शक को साधना आसान भी नहीं होता।

यही हाल कुछ समय बाद दूसरे वर्गों के दर्शकों का भी हो जाता है। देर से ही सही लेकिन वह भी चैनल की मजबूरियां और वजहें  समझ जाती है। नेताओं के हाथों हर पांच साल में ठगे जाने का गहरा अनुभव जो ठहरा। वह भी थोड़े दिनों में फूंक- फूंक कर कदम उठाने लगती है। वह अब कार्यक्रमों को लेकर चूजी होने लगी है। वह चैनल की तरफ से फोन कर आमंत्रित करने वाली कन्या से ही पूछती है कि आखिर उसे मिलेगा क्या। उसका क्लोज शॉट लगेगा या नहीं, आने-जाने के लिए गाड़ी मिलेगी या नहीं, पैसा मिलेगा या नहीं, वगैरह वगैरह। संतुष्टि हो जाए तो ठीक वर्ना क्या पड़ी है।

मजे की बात यह है कि दर्शकों के आशीर्वाद पर फलने-फूलने वाली दुकानों की भी कोई कमी नहीं। 10-15 दिनों के एंकरिंग कोर्स करवाकर महान एंकर बनाने का दावा करने वाली दुकानें इन कॉलों का इंतजार किया करती हैं। यहां वादा तो होता ही है कि कई चैनलों की सैर करवाई जाएगी। यहां के भावी एंकर चैनलों में सवाल पूछ कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। फिर दर्शक को बुलाए जाने का मौसम भी अहम है। अगर कार्यक्रम गर्मी में है और बिजली की कटौती चल रही है तो घर में इंवर्टर की बिजली के भरोसे बैठने से अच्छा तो स्टूडियो में एसी में बैठना ही है।

पर हो जो भी, टीवी के छोटे पर नटखट परदे ने जनता के लिए जगह बनाई है और उसके आत्मविश्वास को खाद डाली है। इस जनता के मनोवैज्ञानिक पक्ष को समझने के लिए अगर कुछ शोध भी कर लिए जाएं तो इससे टेलीविजन और दर्शक - दोनों का ही भला होगा।

Mar 8, 2011

सबके उम्दा होने की चाह

सब कुछ सटीक, सार्थक, करीनेदार और दोषमुक्त हो, आदर्शवाद की परिभाषा काफी हद तक इसके आस-पास ही घूमती है। आदर्श जिंदगी के उस मानचित्र की तरह रेखांकित किया जाता है जहां कमी, ग़लत या गफ़लत की कोई गुंजाइश ही नहीं। यह एक अंदरूनी शक्ति के जागृत होने का संकेत है जो इंसान को बेहतरीन करने के लिए ऊर्जावान बना सकता है। यह एक ऐसे रास्ते पर चलने और उस पर टिके रहने की उत्कंठा भी हो सकती है जो दूसरों को भी वैसा ही होने के लिए प्रेरित भी कर दे और वातावरण को खुशनुमा बयार से भर दे।

 

इस लिहाज़ से आदर्श होने या आदर्श जैसा होने की कोशिश करने में मुझे कोई बुराई नहीं दिखती। किसी भी समाज के लिए इससे आदर्श स्थिति क्या होगी कि उसके समाज में लोग बेहतरीन होने की कोशिश करें और रामराज्य को साकार कर दें लेकिन मजे की बात यह है कि आदर्श की ऐसी तमाम उम्मीदें आम तौर पर महिलाओं से ही की जाती हैं और वे उस पर काफी हद तक खरी भी उतरती हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि एक लड़की शुरू से ही भाव के साथ बड़ी होती है कि उसके पास समय कम है, फिर चाहे वो समय उसके बचपन का हो या फिर यौवन का। यही वजह है कि वह धीरे-धीरे आदर्श की पाठशाला-सी बनती चली जाती है। दरअसल औरत की रगों में जो खून बहता है, उसके पैदा होने से ही, वो उसमें आदर्श होने के तत्व को भरे रखता है। औरत की रूल बुक से नियम कटते नहीं बल्कि नए जुड़ते चले जाते हैं। उसके काम कभी खत्म नहीं होते और जिम्मेदारियों की फेहरिस्त कभी छोटी होती नहीं। वह एक काम निपटाती है तो दूसरा किसी नए कोने से उग कर चला आता है। कामों की यह लंबी लिस्ट उसे समय का प्रबंधन, तनाव पर नियंत्रण और बेहतरीन काम करते जाने की सीख देती चलती है। वह मल्टी टास्किंग करने लगती है। एक साथ कई काम पूरे करीने से करने में वह महारत हासिल करती जाती है। यह एक बड़ी कला है। वह उस चींटी की तरह है जो अपने वज़न से कई गुणा ज्यादा बोझ उठाने में सक्षम है।

 

अभी फेसबुक पर एक मैसेज आया है बिहार के सीमावर्ती ज़िले किशनगंज में एक व्यक्ति ने अपनी बेटी का पूरा शरीर सिगरेट से सिर्फ इसलिए दाग़ दिया क्योंकि वह अपने दोस्तों के साथ पिकनिक मनाने जाना चाहती थी। ऐसी घटनाएं हमारी रोज़मर्रा की कहानियों का हिस्सा हैं लेकिन अब एक बदलाव की लहर उठी है। ऐसी घटनाओं को सोशल नेटवर्किंग साइट्स पुरजोर तरीके से उठाने लगी हैं। जन आंदोलन का माहौल बनने लगा है और आजादी और आदर्श की परिभाषा पर नई और तीखी बहसों की ज़मीन तैयार होने लगी है। यह एक उपलब्धि है। 21वीं सदी के इन 11 सालों ने महिला को एक गज़ब के आत्मविश्वास से भर दिया है। सदियों से तमाम षड्यंत्रों के बावजूद महिलाएं लगातार अपने मुक़ाम तय करती चली गईं हैं और अब वे ऐसे मंच भी बनाने लगी हैं जहां उनकी बात कहीसुनी जा सके। महिलाएं अब रूदन की शैली से बाहर आकर ताकत का पर्याय बनती दिखने लगी हैं। इतने बदलावों के बीच अब अगर आदर्शवाद को लादा भी जाता है तो वह स्त्री-पुरूष दोनों ही के लिए कुछ नियम-कायदे लेकर आएगा, कम-से-कम इसका माहौल तैयार होता तो दिख ही रहा है।

 

यही वजह है कि इस साल महिला दिवस की 100वीं वर्षगांठ पर महिला के अस्तित्व को अपराध बोध से कम और उत्सव के भाव से ज़्यादा मनाया जा रहा है। गली-मोहल्लों तक में इस बार उत्साह है। इस बिगुल का बज जाना क्या कोई छोटी बात है? 

 

(8 मार्च के दैनिक भास्कर के अंक मधुरिमा में प्रकाशित)

 

स्त्री


कविता का यह दरवाज़ा

नितांत निजी तरफ़ जाता है

मत आओ यहां

बाहर इनकी हवा आएगी नहीं

अंदर सुखी हैं यह अपनी गलबहियों में

 

यह कविताएं बुहार रहीं हैं

अंदर आंगन

बतिया रही हैं आपस में

कुछ कर रहीं हैं गेहूं की छटाई

कुछ चरखे पर कात रही हैं सूत और

कोई लगाती लिपस्टिक सूरज को बनाए आईना

 

 

अंदर बहुत चेहरे हैं

शायद मायावी लगें यह तुम्हें

अंदर जंगल हैं कई

झीलें, नदियां, उपवन, शहर, गंवीली गलियां

कमल, फूल, सब्ज़ियां और

चरती-फकफकती बकरियां भी

 

इस संसार का नक़्शा

किसी देश के मंत्रालय ने पास नहीं किया

यहां की लय, थिरकन, स्पंदन दूसरा ही है

कहीं तुम अंदर आए

तो साथ चली आएगी

बाहर की बिनबुलाई हवा

बंध जाएंगे यहां के सुखी झूले

 

स्त्री के अंदर की दुनिया

अंदर ही बुनी जाती है

रोज दर रोज

दस्तावेज़ नहीं मिलेंगें इनके कहीं

मिलेगी सिर्फ़ पायल की गूंज

ठकठकाते दिलों की धड़कन

खिलखिलाते चेहरे

सपनों की गठरियां और

उनके कहीं भीतर जाकर चिपके

बहुत सारे आंसू

Mar 1, 2011

गुल्लक

 

हवा रोज़ जैसी ही थी

लेकिन उस रोज़ हुआ कुछ यूं

कि हथेली फैला दी और कर दी झटके से बंद

हवा के चंद अंश आएं होंगे शायद हथेली में

गुदगुदाए

फिर हो गए उड़नछू वहीं, जहां से आए थे

 

फूल भी क्यारी में रोज़ की तरह ही थे

लेकिन उस रोज़ जाने क्यों

एक पत्ते को उंगलियों में लिया

किताब की गोद में सुला दिया

लिख दिया उस पर तारीख, महीना, साल

पत्ता इतिहास हुआ पर दे गया कोई सुकून

कि जैसे

इतिहास को बांध लिया हो किताब की क़ब्र में

 

पल भी कई बार ऐसे ही समेटे कई बार

याद है शादी का वो एलबम

पहली किलकारी की तस्वीरें

होश में आते दिनों के ठुमकते दिन

 

मौसमों को भी कई बार बाहुपाश में समेटा

सर्द दोपहर की घाघरे सी फैली धूप में

बाहर बैठे

कैसे बातें लिपटती गई थीं

इतिहास की तह में जाकर भी

वो दोपहरें आबाद थीं

 

जाने क्यों इस जीवन को छोड़ने का मन ही नहीं करता