Dec 10, 2011

ठगिनी माया

सफर ठगे जाने के बाद शुरू होता है
अपने से
पराये से
किसी पराये अपने से

बीचों बीच रौशनी के बुझने
सुरंग के लंबे खिंच जाने
मायूसी की लंबी लकीर के बीच

ठगे जाने के मुहावरे हमेशा पुराने होते हैं
लेकिन ठगा गया इंसान नया
और उससे निकला सबक भी

Dec 6, 2011

औरत

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेले नहीं होती
उसका साया होती है मजबूरी
आंचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शुरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
सांस भी डर कर लेती है
फिर भी
जरूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

Nov 14, 2011

सफ़र में धूप तो होगी, चल सको तो चलो

एकला कोई नहीं चलता
साथ चलते हैं अपने हिस्से के पत्थर
किसी और के दिए पठार
नमक के टीले
जिम्मेदारी से लदे जिद्दी पहाड़
दुखों के गट्ठर

कभी कभी होता ऐसा भी है
साथ चल पड़ते हैं मीठे कुछ ख्याल
किसी के होंठों से फूटती महकती हंसी
सरकती युवा हवा
बारीक लकीर सी कोई खुशी

ये सब आते हैं, कभी भी चले जाते हैं
ठिकाना कभी तय नहीं
खानाबदोशी, बदहवासी, उखड़े कदम
लेकिन इन सबमें टिके रहती है
पैरों के नीचे की जमीन
सर का टुकड़ा आसमान
उखड़ी-संभली सांसें
और एक अदद दिल
एकला कहां, कौन, कैसे

सुर (जनसत्ता 13 नवंबर, 2011)

कोई सुर अंदर ही बजता है कई बार
दीवार से टकराता है
बेसुरा नहीं होता फिर भी

कितनी ही बार छलकता है जमीन पर
पर फैलता नहीं

नदी में फेंक डालने की साजिश भी तो हुई इस सुर के साथ बार-बार
सुर बदला नहीं

सुर में सुख है
सुख में आशा
आशा में सांस का एक अंश
इतना अंश काफी है

मेरे लिए, मेरे अपनों के लिए, तुम्हारे लिए, पूरे के पूरे जमाने के लिए

पर इस सुर को
कभी सहलाया भी है ?

सुर में भी जान है
क्यों भूलते हो बार-बार

Nov 9, 2011

तीन बहनें

कल जब तुम इस अंगने में लौट के आना, तुम हमें न पाना – आत्महत्या करने से पहले तीनों युवा बहनें अपने घर के आंगन में फुदक रही गौरेया से यही कहती हैं। 1988 की फरवरी में कानपुर की तीन बहनें अपने घर में आत्महत्या कर लेतीं हैं। पढ़ी-लिखी, समझदार, सुंदर तीन लड़कियां खुद को फांसी पर इसलिए लटका लेती हैं कि उनके पिता के पास उन्हें देने के लिए दहेज नहीं।

फिल्म 6 घंटे के घटनाक्रम पर चलती है कि कैसे तीनों बहनों कई उलझनों से जूझती हैं और एक मोड़ पर तो आत्महत्या करने का इरादा ही त्याग देती हैं। लेकिन सामाजिक दबाव, डर और खुद में आत्मविश्वास की गहरी कमी उन्हें जीने नहीं देती। वह यह तो जानती हैं कि बेटी का बाप होना कठिन होता है पर यह भी कहती हैं कि यह मुश्किल बेटी होने से बड़ी नहीं। दहेज की वजह से शादी न हो पाने का दंश आखिर में उनकी बलि चढ़ा ही देता है। पर मरते-मरते भी लड़कियां अपनी जिम्मेदारियां पूरी करके ही जाती हैं। वे बर्तन साफ करती हैं, कपड़े धोती हैं और फिर अपना आखिरी खत लिखती हैं।

और उसके बाद मर ही गईं तीनों बहनें। पीछे छूट गए उनके मां-बाप और दो भाई। भाई जो परिवार की शायद पहली प्राथमिकता थे और आखिरी भी।

88 से आज के भारत ने एक लंबा सफर तय कर लिया है। आप कह सकते हैं हदेज तो अब बीते समय की बात हो वाला है पर ऐसा नहीं है, न ही ऐसा हो सकता है। दहेज लेने के तरीके और लड़की को मारकर बचने के अंदाज अब बदल गए हैं पर मूल समस्या नहीं। समाज आज भी साथ नहीं देता। समाज सुनता है, देखता है पर जुटता मौत के अगले दिन ही है।

दिल्ली में कुंदन शाह की इस फिल्म की विशेष स्क्रीनिंक के समय फिल्म के प्रमुख सहयोगी शेखर हट्टंगड़ी मौजूद थे। फिल्म के एक दृश्य में जब तीनों में से एक बहन कहती है कि बरसों से इस घर का मौसम नहीं बदला है तो लगता है कि जैसे बरसों से हिंदुस्तान का मौसम भी नहीं बदला है।

इन तीन बहनों के दो भाई थे। घटना के समय मां-बाप उन दोनों के साथ कानपुर से बाहर एक शादी में शरीक होने गए थे। वे जब लौटे होंगे तो अपनी तीनों बेटियों को फंदे पर लटका हुआ पाकर बहुत रोये होंगे। वो परिवार आज भी कानपुर में रहता है। भाइयों की शादी हो गई होगी। मां-बाप जाने किस हाल में होंगे पर इतना जरूर है कि वे शायद आज भी इस बात से अज्ञान होंगे कि उस आत्महत्या ने देश की कमजोर पड़ती नींव पर कैसे प्रहार किया था। दहेज शादी के रास्ते में एक रूकावट हो सकती है जिसे छिटका जा सकता है पर जिंदगी को छिटकना क्या जरूरी है।।।।

हिंदुस्तानी लड़कियों के लिए मौसम आज भी पूरी तरह से नहीं बदला है पर एक बात जरूर बदली है। लड़कियों की हिम्मत बदली है, कोशिश करने का जज्बा बदला है, सोच बदली है। वे मरने से पहले भी संघर्ष की एक आखिरी कोशिश करने लगी हैं। शादी का एक कमसिन उम्र में होना कोई अनिवार्यता नहीं रहा बल्कि शादी का होना भी अब कोई अनिवार्य बात नहीं। एक संस्था के रूप में शादी को लेकर सोच का दायरा काफी वृहद हुआ है। शादी अब जिंदगी का हिस्सा है पर उसे आक्सीजन मानने वाले अब कम ही हैं। शादी को लेकर मान्यताओं और सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। कानून भी पहले के मुकाबले थोड़ा मजबूत ही हुआ है।

बहरहाल, इस वजह से फिल्म एक पुराने ढर्रे पर बनी जरूर लगी, खास तौर पर 2011 के इस दौर में। पर तब भी यह जरूर है कि सिनेमा के तौर पर फिल्म ने सच की परतों को उधेड़ा।

हां, ऐसी फिल्में आंखें को नम कर जाती हैं लेकिन कई बार आत्मा को भी। जिस देश का मौसम बरसों एक जैसा रहा हो, वहां फिल्म, साहित्य, कला मौसम के रूख को बदलने के लिए कुछ हद तक मजबूर भी कर सकता है। इन समस्याओं का हल सरकारी नहीं, सामाजिक ही हो सकता है। आपसी समझ और साथ के बिना कुछ संभव नहीं। इस सुरंग में रौशनी उसी छोर से आ सकती है।

Oct 26, 2011

इस बार की दीवाली

आंसू बहुत से थे
कुछ आंखों से बाहर
कुछ पलकों के छोर पर चिपके
और कुछ दिल में ही

सालों से अंदर मन को नम कर रहे थे
आज सभी को बाहर बुला ही लिया

आंसू सहमे
उनके अपने डर थे
अपनी सीमाएं
पर आज आदेश मेरा था
गुलामी उनकी

हां, आमंत्रण था मेरा ही
जानती हूं अटपटा सा
पर आंसुओं ने मन रखा
तोड़ा न मुझे तुम्हारी तरह
वे समझते थे मुझे
और मैं उन्हें एक साथी की तरह

आज इन्हें हथेली पर रखा
बहुत देर तक देखा
लगा
एक पूरी नदी उछल कर मुझे डुबो देगी

पर मुझे डर न था
मारे जाने की सदियों का धमकियों के बीच
मन ठहरा था आज

तो देखे आंसू बहुत देर तक मैनें
फिर पी लिया
मटमैला, कसैला, उदास, चुप, हैरान स्वाद था

मेरे अपने ही आंसुओं का
आज की तारीख
इनकी मौत है
पर इनकी बरसी नहीं मनेगी
कृपया न भेजें मुझे कोई शोक संदेश।

Sep 28, 2011

नमस्ते फेसबुक

क्या सचमुच फेसबुक ने लोगों को जोड़ा है

 

प्रिय फेसबुक,

 

बुरा न मानना। अब कुछ दिनों तक तुमसे एक दूरी बनाने की सोची है। एक हफ्ते में दो घटनाएं हुईं-तुम्हारी वजह से। पहले तो बंगलौर की 23 साल की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली। यह लड़की आईआईएम की विद्यार्थी थी और इस बात से आहत हो गई थी कि उसके पुरूष मित्र ने उससे संबंध तोड़ कर सारी कहानी को फेसबुक पर डाल दिया था। मालिनी मुरमू का इस घटना से ऐसा दिल टूटा कि उसने खुद को फंदा लगा लिया। इस तरह से एक चमकता सितारा महज एक सोशल नेटवर्किंग साइट की वजह से अस्त हो गया।   

 

दूसरी घटना पटना विधानसभा से आई। यहां दो लोगों को निलंबित कर दिया गया। उनका गुनाह यह था कि उन्होंने अपने फेसबुक अकाउंट पर अपने ही राज्य के मुख्यमंत्री पर कुछ तीखी टिप्पणियां कर दीं थीं और विभाग के भ्रष्टाचार पर अपने कमेंट जारी कर दिए थे। आखिरकार यह भारत है भाई। वे भूल गए कि यहां पर राजनेता कुछ भी कर सकते हैं लेकिन सरकारी कर्मचारी की कई हदें हैं, कई सरहदें।

 

इससे पहले भी एक के बाद एक बहुत कुछ ऐसा हुआ जब लगा कि फेसबुक भूले-बिछुड़े नातों को जोड़ तो रहा है लेकिन यहां की गर्माहट कई बार ठंडेपन और फिर आहत करने के स्तर पर उतर आती है। अमरीका में ही 2007 में स्टीफेनी पेंटर जब फेसबुक की वजह से अपने प्रिय दोस्त को खुद से दूर होते देखती हैं तो एक रात वो फेसबुक के अपने 121 दोस्तों को विदाई का मैसेज भेजती हैं और अपनी जिंदगी का अंत कर लेती हैं। उनके दोस्त को उनके 121 दोस्तों में से कई लोगों से एक असुरक्षा का भाव महसूस होता है और जब यह निजी संबंधों को टूटन और बेहद तनाव की तरफ खींचने लगता है तो वे त को गले लगा लेती हैं।


वैसे कहने को तो फेसबुक अकाउंट पर अनगिनत दोस्त बनाए जा सकते हैं लेकिन क्या वे वाकई में दोस्त और हमदर्द हैं, यह अपने आप में एक सवाल है। अमरीका में ही एक महिला जब अपने फेसबुक वॉल पर लिखती है कि वह अपनी जिंदगी से तंग आ गई है और कुछ ही देर में आत्महत्या करने वाली है तो लोग उस स्टेट्स को लाइक तो कर देते हैं पर एक भी शख्स, यहां तक कि पड़ोसी भी, उसे संबल देने नहीं जाता। वह महिला कुछ देर बाद वाकई आत्महत्या कर लेती है और फेसबुक से उसका जुड़ा पड़ोसी सोसायटी में पुलिस को आते देखता है तो उसे स्टेट्स में लिखे शब्दों का यथार्थ पता चलता है।

यह है फेसबुक। बेशक इस समय फेसबुक अपने उफान पर है। आधुनिक युवा सामाजिक संपर्कों के नाम पर इस पर सबसे ज्यादा समय खर्च करने लगा है। भले ही अमरीका भी जोर-शोर से तुम्हें पूरी तरह से सफल और क्रांतिकारी कह रहा हो और नई पीढ़ी के लिए तुम अलादीन का चिराग बन गए हो, लेकिन दोस्त, कहीं ठहर कर कुछ सोचने की जरूरत भी है।


नहीं, कहने का यह मतलब कतई नहीं कि तुम सिर्फ परेशानियों का पिटारा लेकर आए हो या फिर तमाम त्रासदियों के लिए तुम ही जिम्मेदार हो। मैं जानती हूं तुमने सोशल नेटवर्किंग का एक बड़ा सुनहला दरवाजा खोला है। यहां पल भर में पूरी दुनिया से जुड़ा जा सकता है। यह संपर्कों की तिजोरी को खोलता है और कई मामलों में जादुई भी है। तुम्हारी वजह से कई पुरानी गलियां गलबहियां डाल रही हैं। लंगोटिया यार सालों बाद एक-दूसरे के दिलों के करीब आ रहे हैं। दुनिया पूरी तरह से जैसे एक मुट्ठी में समा गयी है। हां, माउस के एक क्लिक से इंसान दुनिया के किसी भी छोर तक जा पहुंचता है।तुमने आवाज और दृश्य की गति को कई कल्पना से भी आगे ले जाकर बढ़ा दिया है। इसके लिए निश्चित तौर पर तुम बधाई के पात्र हो।

शायद तुम सीधे तौर पर इसके लिए जिम्मेदार न हो क्योंकि तुम शायद आए किसी सकारात्मक मकसद से ही थे लेकिन जैसा कि हर तकनीक के साथ होता है, यहां भी तकनीक कई काले साये साथ लेकर चली आई है।

 

हां, तो मैनें महसूस किया कि तुम एक उस दौर में पनपे हो जब मीडिया का दखल तो खूब है लेकिन मीडिया की साक्षरता अब भी नदारद। इसलिए तुमने जिस खुले मंच को एकाएक महैया करा दिया है, वह चुंधियाती रौशनी के साथ आया है। यह मंच हैरान करता है। हाथ के संपर्क में की बोर्ड होता है और सामने होता है एक खुला आकाश एक गलतफहमी देता हुआ कि यहां कभी भी, कुछ भी कहा जा सकता है। एक अड्डा जहां कुछ भी कहा-लिखा-पोस्ट किया जा सके। अपनी भड़ास निकाली जा सकती है, संबंधों को उधेड़ा, निचोड़ा और फायदेमंद बनाया जा सके।एक दूसरे की फ्रेंड लिस्ट में झांकते लोग उस पड़ोसी से भी बदतर हो जाते हैं कई बार जिन्हें दीवारों से कान लगाकर बात सुनने की आदत होती है। यह एक ऐसा मंच बन गया है जहां कोई रोक नहीं। कोई बंदिश और कोई सजा नहीं। यहां बहुत कुछ किसी मतलब से शुरू होता है और उसी पर खत्म भी होता है।

 

मुझे लगने लगा है कि नेटवर्किंग के बहाने तुम्हारा मंच कई चालाकियों के लिए भी इस्तेमाल होने लगा है। यह रिश्तों की एक कच्ची जमीन है। माउस के एक क्लिक से लोग फ्रेंड बनते हैं, फिर अन-फ्रेंड भी होते हैं। फिर भी कोई किसी का नहीं। कंधों का सहारा ढूंढते कि जाने कौन काम आ जाए। हां, जब संवेदनाएं, खुशियां या सच बंटते हैं, सुकून मिलता है। पर ऐसा कम होता है। इस पिलपिली और स्वार्थी जमीन पर अब मैं रोज नहीं आउंगी। यह मैने तय किया है। ऐसी ही कई वजहें रही होंगी कि पिछले कुछ महीनों में कई लोगों ने अपने फेसअकाउंट बंद कर दिए। पर मैं ऐसा नहीं कर रही। मैं सिर्फ कुछ दूरी से अब तुम्हारी रफ्तार को देखना और समझना चाहती हूं।


वैसे यह भी लगता है कि मौजूदा पोस्ट-मॉर्डन सोसायटी यह मौका तो देती ही है कि आजाद हस्तक्षेप किया जा सके। इसलिए इस टिप्पणी को सकारात्मक रूप से लेना।


हां, फिलहाल मैं कुछ समय के लिए तुमसे दूर जा रही हूं।


एक फेसबुक यूजर

वर्तिका नन्दा

 

(एक छोटा अंश 28 सितंबर, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित)

 

Sep 24, 2011

मरजानी - भास्कर में

24 सितंबर, 2011 को दैनिक भास्कर में छपी मरजानी की समीक्षा 

Sep 23, 2011

दुआ सलाम

कुछ शहर कभी नहीं सोते
जैसे कुछ जिंदगियां कभी सोती नहीं
जैसे सड़कें जागती हैं तमाम ऊंघती हुई रातों में भी

कुछ सपने भी कभी सोते नहीं
वे चलते हैं
अपने बनाए पैरों से
बिना घुंघरूओं के छनकते हैं वो
भरते हैं कितने ही आंगन

कुछ सुबहें भी कभी अंत नहीं होतीं
आंतरिक सुख के खिले फूलदान में
मुरझाती नहीं वहां कोई किरण

इतनी जिंदा सच्चाइयों के बीच
खुद को पाना जिंदा, अंकुरित, सलामत
कोई मजाक है क्या

Sep 19, 2011

ब्रोकरिंग न्यूज़

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनशल सेंटर में पिछले हफ्ते एक फिल्म दिखाई गई ब्रोकरिंग न्यूज। उमेश अग्रवाल की इस फिल्म को देखने के लिए पूरी हाल खचाखच भरा हुआ था और मजे की बात यह कि मीडिया की चिंदी-चिंदी करती इस फिल्म को देखने के लिए मौजूद लोगों में शायद तकरीबन सभी मीडियाकर्मी थे और बाकी थे मीडिया के कुछेक जिज्ञासु छात्र।

फिल्म पेड न्यूज से जूझती हुई आगे बढ़ती है। रूपर्टे मर्डोक के न्यूज ऑफ दी वल्ड प्रकरण से लेकर अशोक चव्हाण और बाद में राडिया तक तमाम तरह की पेड न्यूज को लेकर फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती जाती है, वहां मौजूद दर्शकों की प्रतिक्रिया भी एक नए तरह से खींचती है। यह दिल्ली की मीडिया साक्षर प्रबुद्ध जनता है। यह मीडिया को उस लैंस से देखने की आदी है जिस लैंस से सिर्फ वही देख सकते हैं, आम आदमी अब भी उससे काफी हद तक अछूता या शायद अबोध है। इसलिए बरखा दत्त या राजदीप सरदेसाई या प्रभु चावला के शॉट्स या बाइट्स आने पर यह दर्शक जोर की सीटी नहीं बजाता बल्कि एक तीखी हंसी हंसता है और यह इस फिल्म की दर्शनीयता को और भी अलग पुट देती है।

फिल्म में कुरूक्षेत्र के राकेश नाम के एक पत्रकार का जिक्र भी है जो कि पिछले चुनाव के दौरान हिंदी के एक प्रमुख अखबार का पत्रकार था। उनके पास तमाम सुबूत हैं कि कैसे उन सभी से मजबूरन पेड न्यूज करवाई जाती थी- बिना यह जिक्र छापे कि वो पूरी तरह से पेड है। नकारात्मक स्टोरीज को चुना जाता था और उन्हें नए सिरे से गढ़ कर और धारदार बनाया जाता था ताकि आहत लोग और भी पैसा दें। आखिरकार राकेश इस प्रकाशन समूह से इस्तीफा दे देते हैं और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया से सारे मामले की पड़ताल की गुहार लगाते हैं।

फिल्म बिजनेस रिपोर्टिंग के दबे झूठों की परतें भी खोलती है। मलाईदार होती बिजनेस रिपोर्टिंग और जनता को पूरी तरह से गुमराह करती कहानियों की बात उस तबके के लिए नई नहीं जो रोज उससे रूबरू होता है।

खैर,मीडिया के मौजूदा बदरंग पड़ते चेहरे को उखाड़ कर जब फिल्म खत्म होती है तो उसका कथ्य बहुत देर तक हॉल में घूमता हुआ महसूस होता है। इस बात पर बहस करने का भी मन होता है कि क्या अब मीडिया में कंटेंट इज दी किंग की जगह विशुद्ध रूप से पैसे ने ले ली है। क्या 19 महीने की जिस इमरजेंसी की बात हम आज भी चिल्लाते हुए करते हैं, वह सिर्फ अतीत है या अब एक नए तरह के जाल की बुनाई हो चुकी है जो मीडिया के गले की घुटन बनने लगा है। क्या राजनीति, अपराध और बिजनेस की रिपोर्टिंग के आस-पास ही मीडिया का दायरा सिमट जाएगा। गांव, गली, कूचे, टूटी सड़कें, कच्ची चरमराती व्यवस्थाएं किसी और और कभी और के लिए रोक कर रख ली जाएंगीं। इन सबके बीच अब जो झूठ के लबादे के बीच छुप कर रिपोर्टिंग आ रही है, उसका भविष्य क्या है। इनमें इस बात पर भी एक आंदोलन सा छेड़ने का मन करता है कि अगर रिपोर्टिंग यही है तो फिर इसकी जरूरत है ही क्या और इसे पत्रकारिता क्यों और कैसे कहा जाए। देश की सरकारें हमेशा ही ऊंचा सुनती रही हैं लेकिन जब भी बात मीडिया की हुई है तो उसके कान दीवार के उस पार तक भी सुन पाए हैं। सरकारें जान गईं हैं कि मीडिया को कदमताल (और अब तो खैर उड़ान के लिए) रोज भरपूर पैसों की जरूरत होती ही है। तिजोरी की इस मजबूरी और सत्ता सुख से मिलने वाले अपार वैभव ने मीडिया मालिकों के पांव में सोने के पायल पहना दिए हैं। यह बात अलग है कि एक आम पत्रकार के हाथ में अब भी एक मामूली पेन और कांपती हुई कच्ची नौकरी ही है।

बहरहाल मजबूर होते पत्रकार और बेदम पड़ती पत्रकारिता पर बहुत दिनों बाद एक सार्थक बहस होती दिखी। यह जरूरत भी उभरती दिखी कि मीडिया की पिटी-पिटाई परिभाषा को अब नए सिरे से गढ़ा जाना ही चाहिए। यह कहना अब झूठ ही होगा कि किसी भी पत्रिका या समाचार की रीढ़ है उसमें परोसी जाने वाली सामग्री, फिर उसकी साज-सज्जा और आखिर में कुछ और। नए जमाने में नए सच पैदा हुए हैं। इस नए सच को उगलना भी मुश्किल है और निगलना भी।


Aug 27, 2011

सफ़र में धूप तो होगी, चल सको तो चलो

एकला कोई नहीं चलता
साथ चलते हैं अपने हिस्से के पत्थर
किसी और के दिए पठार
नमक के टीले
जिम्मेदारी से लदे जिद्दी पहाड़
दुखों के गट्ठर

कभी कभी होता ऐसा भी है
साथ चल पड़ते हैं मीठे कुछ ख्याल
किसी के होंठों से फूटती महकती हंसी
सरकती युवा हवा
बारीक लकीर सी कोई खुशी

ये सब आते हैं, कभी भी चले जाते हैं
ठिकाना कभी तय नहीं
खानाबदोशी, बदहवासी, उखड़े कदम
लेकिन इन सबमें टिके रहती है
पैरों के नीचे की जमीन
सर का टुकड़ा आसमान
उखड़ी-संभली सांसें
और एक अदद दिल
एकला कहां, कौन, कैसे

Aug 23, 2011

संडे इडियन-अगस्त, 2011


21वीं सदी की 111 हिंदी लेखिकाएं - संडे इंडियन का ताजा अंक - आभार सहित


http://thesundayindian.com/hi/story/women-writers-in-delhi/7337/

Aug 9, 2011

ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा या दूरदर्शन?

(9 अगस्त, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित)

क्या दूरदर्शन नहीं मिलेगा दोबारा

क्या दूरदर्शन कोई जोकर है, बेकार का चैनल है, हंसी और दुत्कार की चीज है, बेवजह का सामान है।

आप का जवाब जो भी हो, फिल्म जिंदगी न मिलेगी दोबारा में इसका जवाब हां ही है। ऋतिक रोशन जब अपने बाकी के दो दोस्तों को दूरदर्शन की सिग्नेचर ट्यून याद दिलाता है और उसके बाद तीनों उस पर फूहड़ तरीके से हंसते हैं तो अंदर से रोना आता है पर सामने देखती हूं, बहुत सी तालियां और सीटियां बजती हैं।

साल 1973 था जब उस्ताद अली अहमद हुसैन ने दूरदर्शन के इस सिग्नेचर ट्यून को सुरों में ढाला। बाद में जो परिष्कृत रूप हमें दिखा, उसमें पंडित रवि शंकर का अहम रोल था। 1959 में जन्मा दूरदर्शन हौले-होले इस देश की कहानी को लिखते-बनते देखता रहा और एक कुशल शिल्पी की तरह उसमें निखार लाता रहा। बरसों लोग इस सिग्नेचर ट्यून का इंतजार किया करते थे। यह प्रसारण के शुरू होने का संकेत था और अपनी घड़ी के सही होने का भी। दूरदर्शन इकलौता टीवी था उस वक्त, जनसेवा प्रसारक भी। लेकिन इस नन्हें शावक को किसी ने गंभीरता से लिया ही नहीं। काले-सफेद टीवी के परदे के सामने बैठ कर दर्शक सत्यम शिवम सुंदरम के उस लोगो को बहुत चाव से देखा-सुना करते थे। यह धुन उन्हें जैसे किसी दूसरी दुनिया में ले जाती थी।

उन दिनों दूरदर्शन पर दिखाए जानेवाले गिने-चुने कार्यक्रमों में प्रमुख होता था - कृषि दर्शन। 26 जनवरी, 1966 को शुरू हुआ कृषि दर्शन। इसका मकसद था-किसानों तक कृषि संबंधी सही और जरूरी सूचनाओं का प्रसारण। यह एक प्रयोग था जिसे सबसे पहले दिल्ली और आस-पास के चुने गए 80 गांवों में सामुदायिक दर्शन के लिए विकसित किया गया। यह प्रयोग सफल रहा और यह पाया गया कि हरित क्रांति के इस देश में कृषि दर्शन ने किसानों से बेहद जरूरी जानकारियां बांटने में जोरदार भूमिका निभाई।

इसी दौर में शुरू हुआ चित्रहार। चित्रहार लोगों के लिए खुशी का एक अवसर था जो उन्हें घर बैठे-बैठे मिलता था। लेकिन इस कार्यक्रम ने एक बेहद स्मार्ट प्रयोग को भी जन्म दिया। यहां गाने की ही भाषा में सब टाइटलिंग होने लगी। इस कोशिश ने एजुटेंमेंट की बुनियाद रख दी और नव साक्षरों के इस देश में साक्षरता को एक नई ऊंचाई दी। जो नए पढ़ेलिखे थे, वे अपनी पहचान के शब्द देख कर उन्हें पढ़ते-गाते हुए गौरवांवित होते और जो पढ़ना न जानते, वे भी अपने जाने-पहचाने गाने सुनते हुए शब्दों के साथ एक नई तरह की रिश्तेदारी कायम कर लेते। शब्दों के साथ इस नए संबंध को इसी सरकारी दूरदर्शन ने बनाया। समान भाषा में सब-टाइटलिंग( सेम लैंग्वेज सब टाइटलिंग यानी एसएलएस) ने लाखों लोगो को अक्षरों से जोड़ा।

दूरदर्शन की इस कोशिश को हकीकी रूप देने में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद ने भरपूर सहयोग दिया। कहानी यूं बनी कि 2002 में आईएमए ने वल्ड बैंक की ग्लोबल इनोवेशन प्रतियोगिता में एक पुरस्कार जीता। यह महसूस किया गया कि एसएलएसटी के जरिए एक साल तक 50 करोड़ लोगों को महज 3 पैसे प्रति व्यक्ति के खर्च पर साक्षर करने की कोशिश की जा सकती है। इससे पहले 2000 में इस तकनीक को लंदन स्थित इंस्टीट्यूट आफ सोशल इनवैन्शंस ने उस साल की बेहतरीन खोज का इनाम दिया था। यह इनाम शिक्षा की श्रेणी के लिए ही दिया गया था।

बाद में इसी प्रयोग से उत्साहित होकर 1975 में साइट परियोजना की नींव रखी गई। भारत में तकनीक और सामाजिक स्तर पर यह सबसे बड़ी परियोजनाओं मे से एक बना। इसके तहत भारत के 6 राज्यों(राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, बिहार, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश) के 2330 गांवों को चुना गया। इसका मकसद था - जरिए गांवों की संचार प्रणाली की प्रक्रिया को समझना, टेलीविजन को शिक्षा के माध्यम के तौर इस्तेमाल करना और ग्रामीण विकास में तेजी लाना था। बेशक बनाए जा रहे कार्यक्रमों में कृषि और परिवार नियोजन को भरपूर तरजीह दी गई। 5 से 12 साल के स्कूली बच्चों के लिए हिंदी, कन्नड, उड़ीया और तेलुगु में 22 मिनट के कई ऐसे कार्यक्रम तैयार किए गए जिससे बच्चों में विज्ञान में दिलचस्पी बढ़ी। इस परियोजनाने यह साबित किया कि दूरदर्शन ग्रामीण शिक्षा और विकास की रफ्तार को बढ़ाने के लिए एक बड़ा हथियार हो सकता है।
लेकिन दूरदर्शन कभी भी वह रफ्तार नहीं पकड़ा पाया और न ही ला पाया वह गुणवत्ता जिसकी उससे अपेक्षा थी। बेशक भारत में टेलीविजन की शुरूआत जरा देर से ही हुई। नई दिल्ली में सितंबर, 1959 को पहला केंद्र स्थापित होने के बाद मुंबई में दूसरा केंद्र स्थापित करने में ही सरकार ने 13 साल का समय लगा दिए और रंगीन होने में तो 23 साल ही लग गए। वह भी तब जब भारत में एशियाड खेल आ धमके। दूसरी बार सफलता का मील का पत्थर साबित हुए खाड़ी युद्ध। फिर तो भारतीयों की आंखें ऐसी खुली कि जैसे चुंधिया ही गईं। 1962 में 41 टीवी सेटों से शुरू हुई कहानी फिर ठहरी नहीं। उसने रामायण और महाभारत जैसे धारावाहिकों से खूब तालियां और शोहरत तो बटोरी लेकिन यह दोनों ही उसने खुद नहीं बनाए थे।

90 के दशक में जब निजी चैनलों ने दस्तक दी, तब भी दूरदर्शन जाग न पाया। उसके लिए विकास प्राथमिकता तो रहा लेकिन गुणवत्ता की जरूरत उसे तब भी समझ में न आई। हां, पर सच यह भी तो था कि निजी चैनलों ने कभी भी विकास को पहली प्राथमिकता नहीं दी। निजी चैनल रसोईयों में पकवानों की रिसिपी तो सिखाते रहे और कहीं-कहीं किसान भाइयों सरीखे कार्यक्रम भी दिखे लेकिन उनमें पैसा कमाने की भूख ज्यादा हावी रही। मेरा गांव मेरा देश, किसान भाइयों और जय जवान जय किसान जैसे कार्यक्रमों की शुरूआत भी हुई लेकिन नेक नीयती के स्तर पर वे पिछड़ गए। निजी चैनल तिजोरी भरने की ऐसी जल्दी से लदे रहे कि भारत के सच्चे और सुच्चे मुद्दे हाशिए पर ही सिमटे रह गए।

लेकिन फिर भी यह सवाल पूछने का मन करता है कि दूरदर्शन पर इस तरह का भद्दा मजाक हुआ कैसे और क्यों। एक ऐसा देश जहां फालतू की बातों पर भी लोग नाराज हो जाया करते थे, जहां रत्ती भर की बात से कथित धार्मिक भावनाएं आहत हो जाती हैं, वहां दूरदर्शन के साथ ऐसी हंसी सरेआम होती है और पत्ता भी नहीं सरकता। क्या दूरदर्शन वाकई ऐसी बोरियत भरी चाज रहा, हमेशा। जिसने इस संवाद को लिखा या जिसने उसे सोचा, उसकी सोच पर तो खैर दुख होता ही है लेकिन साथ ही ऋतिक रौशन को लेकर भी कम चोट नहीं लगती। वे शायद नहीं जानते होंगे कि उस दौर में दूरदर्शन ने खूबसूरत जैसी फिल्म को इतनी बार न दिखाया होता तो उनके पिता राकेश रौशन भी शायद लोकप्रियता के उस चरम पर नहीं पहुंच पाए होते।

एक बात और। निजी चैनल के मालिकों और पत्रकारों को भी शायद उस सीन को देखकर जम कर हंसी आई होगी लेकिन वे भी तब अपने गिरेबान में झांक कर यह मानने से चूक गए होंगे कि आज वे जिस भी मुकाम पर हैं, उसमें बड़ा रोल इस दूरदर्शन का ही रहा। दूरदर्शन ने उस दौर में वो जगह और वो मोटा पैसा न दिया होता तो मियां अभी शायद कहीं दिखते भी न।

लेकिन यह दूरदर्शन की किस्मत है और बहुत कुछ खुद उसकी करनी भी। दूरदर्शन ने खुद को कभी भी शिकायतों के पिटारे से बाहर लाने की ईमानदार कोशिश नहीं की। नही। वहीं समय ठहर गया लगता है। सफेद हाथी ही हो गया है दूरदर्शन। जो युवा रखे भी गए हैं, वे अनिश्चिचतता के माहौल में टंगे रहते हैं। लाल फीताशाही चरम पर है। आज भी मंत्रियों के नाते-रिश्तेदारों को पीछे के सुनहरे दरवाजे से अंदर भर लिया जाता है। जायज फाइलों को सरकने में महीनों लग जाते हैं। दूरदर्शन की परोसी सरकारी उदघाटन की खबरों से ज्यादा लोग दूरदर्शन में फैले भ्रष्टाचार को याद रखते हैं।

लेकिन इसे बावजूद यहां यह पूछने का मन करता है कि क्या यही मजाक किसी निजी चैनल पर करने की हिम्मत भी होती। वहां हालात क्या बहुत आइडियल हैं। वैसे इस देश में बात-बे-बात धरने होते रहते हैं, धार्मिक भावनाओं को किसी इशारे से भी ठेस लग जाती है लेकिन जब बारी एक सरकारी माध्यम की आती है, तो उसकी बात करने वाला कोई दिखता नहीं, खुद सरकारी चैनल भी नहीं। यह मजाक अगर आज तक, एनडीटीवी या किसी भी और चैनल पर किया गया होता तो बात ही कुछ और होती।

फिल्में समाज की कहानी भी होती हैं। वे एक माहौल बनाती हैं और जिम्मेदारी के मंच पर खड़ी होती हैं। फिल्मों को देखने वाला हर दर्शक परिपक्व हो, यह कतई जरूरी नहीं। कई बार वह जो देखता है, उस पर अंधविश्वास कर लेता है। मजाक किसी दायरे में हों और हित में तो ही उचित है। वर्तमान इतिहास का मजाक उड़ाए और खुद को समझने लगे शहंशाह। भूल जाए कि उससे उसने पाया क्या था, इसे क्या सिर्फ एक भूल कहा जा सकता है। इतना कहना ही काफी समझें।

(यह लेख 9 अगस्त, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Aug 3, 2011

सुर

कोई सुर अंदर ही बजता है कई बार
दीवार से टकराता है
बेसुरा नहीं होता फिर भी

कितनी ही बार छलकता है जमीन पर
पर फैलता नहीं

नदी में फेंक डालने की साजिश भी तो हुई इस सुर के साथ बार-बार
सुर बदला नहीं

सुर में सुख है
सुख में आशा
आशा में सांस का एक अंश
इतना अंश काफी है

मेरे लिए, मेरे अपनों के लिए, तुम्हारे लिए, पूरे के पूरे जमाने के लिए
पर इस सुर को
कभी सहलाया भी है ?
सुर में भी जान है
क्यों भूलते हो बार-बार

Aug 1, 2011

अब फेसबुक ने बनाई ‘ तीसरी दुनिया ’


एक नई दुनिया बन कर तैयार हो रही है। यह दुनिया एक दूसरे से मिले बिना एक दूसरे से जुड़ी रहती है। एक दूसरे के सपने, गुस्से और दुख को बांटती है और पल भर में एक दूसरे के साथ जुड़ भी जाती है। यह बात अलग है कि जितनी तेजी से जुड़ती है, उतनी ही तेजी से उन संबंधों को किसी डस्टबिन में फेंक आगे निकल भी जाती है।

नए आकंड़े बड़ी मजेदार बातें बताते हैं। अगर दुनिया भर के फेसबुक यूजर्स की संख्या को आपस में जोड़ लिया जाए तो दुनिया की तीसरी सबसे अधिक आबादी वाला देश हमारे सामने खड़ा होगा। अब जबकि आबादी की 50 प्रतिशत हिस्सा 30 से कम उम्र का है, फेसबुक स्टेटस सिंबल बन चुका है। आधुनिक बाजार का 93 प्रतिशत हिस्सा सोशल नेटवर्किंग साइट्स का इस्तेमाल करता है। भारतीय युवा तो इस नए नटखट खिलौने के ऐसे दीवाने हो गए हैं कि भारत दुनिया का चौथा सबसे अधिक फेसबुक का इस्तेमाल करने वाला देश बन गया है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी से आए श्री श्रीनिवासन हाल ही में दिल्ली के अमरीकन सेंटर में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर खूब खुलकर बोले। देश के कुछ बड़े कालेजों के छात्रों के बीच उनकी कही बातें फेसबुक के बड़े होते कद को बार-बार साबित करती चली गईँ। एकबारगी तो ऐसा लगा कि जैसे फेसबुक का पीआर ही हो रहा हो। यहां पारंपरिक साधनों का कोई जिक्र नहीं था। यहां फेसबुक एक ऐसे राजा की तरह उभरा जो प्रजा भी खुद है और शहंशाह भी।

छात्रों से भरे इस हाल में एक टिप्पणी ऐसी थी जिसने चौंका दिया। एक युवक ने कहा कि फेसबुक को अब बड़ी उम्र के लोग यानी 35 पार वाले भी इस्तेमाल करते हैं। यानी छात्रों को यह मुगालता है कि फेसबुक शायद सिर्फ उन्हीं के लिए ईजाद किया गया और दूसरे 35 से पार वाले लोग बुजुर्ग हैं। यह संकेत एक ऐसे माहौल के तैयार होने का है जहां मुस्कुराहट भले ही हो पर यथार्थ और गरमाहट यहां से नदारद है।

फेसबुक जिस आपसी जुड़ाव की कथित जमीन को तैयार कर रहा है, यह उसके खोखलेपन का एक बड़ा सुबूत है। उन्हें फेसबुक की यह दीवानगी उपजी कहां से है और क्यों है। असल में फेसबुक युवाओं के अंदर फैले उस खालीपन को दूर करने का रास्ता है जिसे वे किसी अंधेरी सुरंग में छिपाए रहते हैं। लेकिन यहां एक बात और सोचने की है। हर नई चीज को सिर्फ युवाओं से ही क्यों जोड़ा जाए। क्या फेसबुक सिर्फ युवाओं की ही जरूरत है। नहीं। बड़ी तादाद में बुजुर्ग इस फेसबुक से जुड़ने लगे हैं ( और यहां बुजुर्गों से आशय 70 पार के लोगों से है) और उनका जुड़ना भावनात्मक स्तर पर ज्यादा निश्छल है। यहां किसी इम्प्रैस करने के लिए फेसबुकपना नहीं किया जाता। यहां अपनों की तलाश की जाती है, पोते-पोतियों को भूली-बिसरी लोरियां याद दिलायी जाती हैं और उनसे उनके हाल की खोज-खबर कर झुर्रियों से भरे चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश की जाती है। रिश्तेदार जो अक्सर रविवार की शामों को जमा हो कर गली-मोहल्लों-स्कूलों की पुरानी बातें यादें किया करते थे, वे भी अब इसी फेसबुक पर जमा होकर कागजी धमाचौकड़ी कर लेतें हैं और खुशियां बांट लेते हैं। यह एक बड़ी बात है। अकेलेपन को भोगते बुजुर्गों के लिए यह फेसबुक सपनों का उड़नखटोला बन कर आया है। उम्र के इस पड़ाव पर अपने पुराने दोस्तों को ढूंढने के लिए अब उन्हें बेवजह ही व्यस्त दिखते अपने बेटों के आगे चिरौरी नहीं करनी पड़ती। वे खुद जब चाहें अपनी पुरानी जड़ों को तलाश सकते हैं और अपने बुढ़ापे में कुछ रौशनियां भर सकते हैं।

एक बात और ख्याल आती है। अमरीका जोर-शोर से फेसबुक की बात करता आ रहा है। हम भारत में रहकर भी कभी भी अपने पारंपरिक संचार माध्यमों का वैसा प्रचार कर ही नहीं पाए। भारतीय रेल के एक बड़े अधिकारी अरविंद कुमार सिंह सालों साल डाकिए पर शोध करते रहे हैं और इस पर उनकी लिखी किताब देश की सबसे अनूठी किताब है पर उसका ऐसा प्रचार कभी नहीं हुआ। डाक के डिब्बे और डाकिए के हाथों से मिलती एक चिट्ठी जिंदगी में कैसे रंग भरा करती थी, इस पर भारत सरकार कभी फख्र से झंडे गाढ़ नहीं पाई। पातियों के वे भीगे-महकते दिन अब शायद कभी न लौटें। कबूतर भी शायद कुछ सालों में गुप्त संदेश ले जाने के रास्ते भूल जाएं लेकिन अमरीका याद रखेगा कि फेसबुक और बाकी दूसरे संचार माध्यमों को अधिकाधिक पापुलर कैसे बनाना है। हम सोचते ही रह जाते हैं और बिग ब्रदर हमेशा एक लंबी छलांग भर कर आगे निकल जाता है।

(यह लेख 1 अगस्त, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Jun 18, 2011

राजकमल प्रकाशन से छपकर आ गई है मरजानी


पंजाब का एक छोटा-सा शहर – फिरोजपुर। 22 साल पहले यहीं से मेरा पहला कविता संग्रह आया था- मामूली सा। तब स्कूल में थी।

फिर यात्रा टीवी चैनलों से गुजरती हुई अब अध्यापन पर आ गई है। अभी लंबा सफर बाकी है। इस सफर की समूची गाथा अंदर जमतीं रहीं कविताओं ने देखी-सुनी। इन कविताओं ने असंख्य चेहरों को गौर से देखा, फिर खुद से संवाद करती रहीं, उनकी कहानी का अंदर वाचन करती रहीं।

मरजानी इसी गाथा का सार है। जो आस-पास देखा, अपनों-परायों को उधड़तो तारों में कसाव लाने के असफल प्रयासों में जो देखा, वो मरजानीहो गया। यही मरजानी आज छप कर आई है राजकमल प्रकाशन से।

इस संग्रह के लिए मरजानी से बेहतर कुछ सूझा नहीं क्योंकि मरजानियां मरने या मारे जाने का जबाव आने पर ज़्यादा जीवंत हो उठती हैं कई बार। सरकारी आंकड़े मरजानियों की कहानियां नहीं समझ सकते। मरजानी को समझने के लिए जरूरी है किसी के दिल में, किसी के आस-पास कोई मरजानी हो और उसका अहसास कहीं छूता हो।

इसलिए हो सके तो मरजानी के सफर में शरीक हो जाइए।

Jun 12, 2011

शायद यही हो वो

आकाश के फाहे निस्पंद

ऊनी स्वेटर बुनती चोटियों के बीच में से गुजरते हुए

कभी रोक पाए इनकी उड़ान क्या।

 

समय मौन था

सोचता

सृष्टि क्यो, कैसे, किस पार जाने के लिए रची ब्रह्मा ने

 

आत्माएं चोगा बदलतीं

आसमान की तरफ भगभगातीं प्रतिपल

शरीरों के दाह संस्कार

पानी में तैरते बचे आंसुओं के बीच

इतना बड़ा अंतर

 

निर्माण, विनाश, फिर निर्माण की तमाम प्रक्रियाओं में

समय की बांसुरी बजती रही सतत

वो सूक्ष्म-सा दो पैरों का जीव

इतनी क्षणभंगुर जमीन पर भी

गर्वित हो चलता कितना अज्ञानी

 

ज्ञान-अज्ञान, वैराग-अनुराग की सीमाओं से उठ पाना ही है

शायद

जीवन का सार

 

शायद यही हो वो

आकाश के फाहे निस्पंद

ऊनी स्वेटर बुनती चोटियों के बीच में से गुजरते हुए

कभी रोक पाए इनकी उड़ान क्या।

 

समय मौन था

सोचता

सृष्टि क्यो, कैसे, किस पार जाने के लिए रची ब्रह्मा ने

 

आत्माएं चोगा बदलतीं

आसमान की तरफ भगभगातीं प्रतिपल

शरीरों के दाह संस्कार

पानी में तैरते बचे आंसुओं के बीच

इतना बड़ा अंतर

 

निर्माण, विनाश, फिर निर्माण की तमाम प्रक्रियाओं में

समय की बांसुरी बजती रही सतत

वो सूक्ष्म-सा दो पैरों का जीव

इतनी क्षणभंगुर जमीन पर भी

गर्वित हो चलता कितना अज्ञानी

 

ज्ञान-अज्ञान, वैराग-अनुराग की सीमाओं से उठ पाना ही है

शायद

जीवन का सार

इस मरूस्थल में

 

उन दिनों बेवजह भी बहुत हंसी आती थी

आंसू पलकों के एक कोने में डेरा डालते पर

बाहर आना मुमकिन न था

 

मन का मौसम कभी भी रूनझुन हो उठता

उन दिनों बेखौफ चलने की आदत थी

आंधी में अंदर एक पत्ता हिलता तक न था

 

उन दिनों शब्दों की जरूरत पड़ती ही कहां थी

जो शरीर से संवाद  करते थे

 

उन दिनों

सपने, ख्वाहिशें, खुशियां, सुकून

सब अपने थे

उन दिनों जो था

वो इन दिनों किसी तिजोरी में रक्खा है

चाबी मिलती नहीं


ख़बर को मसालेदार बनाने की मजबूरी


एक समय की नामी अभिनेत्री दीप्ति नवल की आवाज टीवी पर बहुत दिनों बाद सुनाई दी, वो भी गुस्से और आक्रोश से भरी हुई। यह गुस्सा एकदम जायज भी था। बात हो रही थी गुजरे जमाने के अभिनेता राज किरण के बारे में जिन्हें हाल ही में अमरीका में खोज लिया गया। उनकी इस तलाश में अभिनेता ऋषि कपूर अरसे से लगे थे और अब जाकर उन्हें राज किरण को ढूंढने में सफलता मिली। वे इस समय अमरीका के एक मानसिक चिकित्सालय में हैं। सालों डिप्रेशन के शिकार होने के यह खबर बा आज हालात यहां तक आ पहुंचे हैं। यह खबर पूरी तरह से झकझोरने वाली थी। राज किरण की अभिनीत फिल्मों की फुटेज एक ऐसे सितारे दुखद कहानी कहती थी जिसे समय की आंधी ने हताशा में डुबो दिया। खबर ने शायद हर दर्शक को उद्वेलित किया होगा।

 

इस खबर के आने के बाद टीवी चैनलों ने उन तमाम सितारों से संपर्क करना शुरू किया जिन्होंने कभी राज किरण के साथ काम किया था। इसी कड़ी में दीप्ति नवल की बारी भी आई। उन्होंने राज किरण के साथ कई फिल्मों में अभिनय किया था।

 

तो फोनो लाइव इंडिया पर हो रहा था। एंकर थे सुधीर। दीप्ति से जब सवाल पूछा गया तो जवाब देने से पहले उन्होंने अपना गुस्सा इस बात पर जताया कि आज तक इस खबर को बेहद लापरवाही के साथ दिखा रहा है। वहां कहा जा रहा है कि राज किरण पागलखाने में हैं। दीप्ति नवल जाहिर तौर पर खबर को दिखाए जाने के अंदाज पर काफी आहत थीं। वे बार-बार कह रही थीं कि ऐसे मामलों को संजीदगी से रिपोर्ट करना चाहिए न कि गैर-जिम्मेदाराना तरीके से।

 

अब बारी सुधीर के सकपकाने की थी क्योंकि आलोचना सबसे तेज चैनल और साथ ही प्रतिद्वंदी चैनल की हो रही थी। यह शाब्दिक धुनाई अंदर से मजा भले ही दे रही हो लेकिन प्रत्यक्ष तौर पर तो उस पर खुशी दिखाई जा नहीं सकती थी। यहां सुधीर यही कह कर रह गए कि उनका चैनल इस खबर को पूरी गंभीरता के साथ दिखाएगा भी और राज किरण के लिए कुछ करने की कोशिश भी करेगा। इससे ज्यादा कहना शायद संभव भी नहीं था।

 

लेकिन इतना जरूर है कि अगर राज किरण को लेकर बरसों पुरानी जमी धूल को अगर मीडिया ने साफ कर सामने रखा तो साथ ही यह भी सच है कि उसकी खबर को मसालेदार बनाने की भी पूरी कोशिश की गई।

 

दरअसल हर खबर एक अलग तरह का ट्रीटमेंट मांगती है लेकिन जब खबर खास तौर पर संवेदना के धरातल से उपज कर बाहर आती हो तो उस पर ज्यादा चौकन्ना होना भी जरूरी हो जाता है। टीवी वैसे भी एक सामाजिक-सांस्कृतिक फैक्टरी है। यहां न तो विशुद्ध मनोरंजन मिल सकता है, न खालिस खबर। यह दोनों का झालमेल है। न्यूज मीडिया इस गड़बड़झाले की मजेदार मिसाल है। दूसरी तरफ सरकार की बनाई तमाम संस्थाएं इन मामलों में मुंह में उंगली दबाए और कान पर रूई लगाए बैठी दिखती हैं। जिस प्रैस काउंसिल को इन मामलों में सक्रिय होना चाहिए, वह भी बेचारगी की स्थिति में दिखती है। 2009-10 में 950 और 2008-2009 में 726 शिकायतें पाने वाली प्रेस काउंसिल की तरफ से शायद ही कभी कोई बयान मुस्तैदी से आता है। मतलब यह नहीं कि काउंसिल को प्रेस के साथ किसी दुश्मन की भूमिका का निर्वाह करना चाहिए। मतलब सिर्फ यह है कि यह संबंध आपसी समझ को बढ़ाने और बेहतरी की तरफ जाने का भी तो हो सकता है।

 

इसके अलावा लगता यह भी है कि चैनलों को खुद अपने अंदर एक गंभीरता लाने के लिए खुद लामबंद होना शुरू कर देना चाहिए। धूल-मिट्टी फांक कर खबर लाता पत्रकार, डैस्क पर मजदूर की तरह घंटों गुजारता इनपुट या आटपुट एडिटर या फिर वीडियो एडिटिंग या कैमरा करके भी चैनल के हाशिए पर खुद को महसूस करता पत्रकार दूसरे की टीआरपी से सहम कर अक्सर ऐसी उछलकूद कर ही बैठता है। मामला सामंजस्य को बिठाने और कुछ मूलभूत लक्ष्मण रेखाओं को खींच देने का है। बस!

 

खैर, बाबा रामदेव की योग-राजनीति माया में व्यस्त मीडिया ने फिर भी किसी तरह से राज किरण के लिए समय निकाला। खबर के बहाने दर्शक का ध्यान मायानगरी के झूठे तिलस्मी समाज तक गया। बधाई। क्या इस कहानी को हम किसी अंजाम तक पहुंचते हुए देख पाएंगें या यह भी बाकी कई कहानियों की तरह बिना किसी फालो अप को कहीं दब जाएगी।

 

(यह लेख 9 जून, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

 

Jun 7, 2011

चौरासी हजार योनियों के बीच

सहम-सहम कर जीते-जीते
अब जाने का समय आ गया।

डर रहा हमेशा

समय पर कामों के बोझ को निपटा न पाने का
या किसी रिश्ते के उधड़
या बिखर जाने का।

उम्र की सुरंग हमेशा लंबी लगी – डरों के बीच।

थके शरीर पर
यौवन कभी आया ही नहीं
पैदाइश बुढ़ापे के पालने में ही हुई थी जैसे।

डर में निकली सांसें बर्फ थीं

मन निष्क्रिय
पर ताज्जुब
मौत ने जैसे सोख लिया सारा ही डर।

सुरंग के आखिरी हिस्से से
छन कर आती है रौशनी यह
शरीर छूटेगा यहां
आत्मा उगेगी फिर कभी

तब तक
कम-से-कम, तब तक
डर तो नहीं होगा न!

Jun 6, 2011

विमोचन के बहाने

 

एक परिचय तो यह है कि ज्ञानेश्वर मुले भारतीय विदेश सेवा के 1984 बैच के अधिकारी हैं और इस समय मालदीव में भारत के उच्चायुक्त हैं। लेकिन यह एक सरकारी परिचय हुआ। इस परिचय में जो ताजा अध्याय जुड़ा है, वह इस परिचय को मानवीय बनाने में मदद करता है। इसी महीने ज्ञानेशवर मुले की आत्मकथा माटी, पंख और आकाश राजकमल प्रकाशन से छप कर आई है। 350 रूपए की सुंदर कवर डिजाइन से आई यह किताब अपनी पहली झलक में ही अपना ध्यान खींचने में सफल होती है।

 

मुले की किताब का हाल में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की एनेक्सी में विमोचन हुआ तो कई तत्व  देखने को मिले। हमेशा धीर-गंभीर चेहरा बनाकर रखने वाली निरूपमा राव का भाषण खुद अपनी यादों से सराबोर दिखा। मुले की बेहद प्रतिभावान पत्नी, लेखिका और एक सफल आईएएस अधिकारी साधना शंकर और किताब पर अध्यक्षीय टिप्पणी देते नामवर सिंह ने किताब के गांभीर्य को और बढ़ा दिया। लेकिन इसमें खास रही किताब में की गई अनगिनत सच्ची टिप्पणियां। जैसे कि लेखक कई जगह यह बात खुलकर बताते हैं कि कैसे महाराष्ट्र के एक गरीब परिवार से बाहर आकर देश की सबसे सम्मानित सेवा में आना उनके लिए बेहद दुरूह था। 1984 में चयन के बाद जब उनके बैच को राष्ट्रपति भवन ले जाना तय होता है तो कस्तूरबा गांधी मार्ग से लेकर राष्ट्रपति भवन तक का वह रास्ता उन्हें उनके कठिन दिनों की स्मृतियों से रूबरू कराता हुआ चलता है। वहां तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह सबसे पूछते हैं कि किसके पिता क्या करते हैं। सबके पिता बड़े लोग हैं, सिवाय ज्ञानेश्वर मुले के। वे फख्र से बताते हैं कि उनके पिता किसान हैं और सिलाई का काम करते हैं। इस पर जैल सिंह सबसे बात करते हुए कहते हैं

 

इस लड़के की सफलता आप सबकी सफलता से अलग तो है ही, महत्वपूर्ण भी है। यह ग्रामीण इलाके से आया है, मराठी में इसकी पढ़ाई हुई, इसके पिताजी साधारण किसान हैं, फिर भी यह लड़का यहां तक पहुंचा।

 

दरअसल बहुत दिनों बाद ऐसी किसी किताब का जिक्र होता सुनाई दिया है जहां किसी वरिष्ठ अधिकारी ने अपने संघर्ष की गाथा को ईमानदारी से कहने की कोशिश की है। मुले जब यह लिखते हैं कि उनके पास न तो कायदे का कोई जूता था और न ही टाई पहनने का सरूर तो एक छोटे भारत का विशालकाय सच जैसे उछल कर सामने खड़ा हो जाता है। वे अपनी ग्रामीण पृष्टभूमि पर शर्मिंदा नहीं हैं बल्कि गर्वित हैं। हालांकि किताब सिर्फ एक-दो पक्षों के आगे-पीछे घमूने तक ही सिमटी दिखती है लेकिन ऐसी किताबें निसंदेह उन लोगों के सपनों में उजास भरने का काम तो कर ही देती हैं जिनके रास्तों में भी कुछ इसी तरह के पठार हैं। फाइलों में लिखने और नीतियों का निर्धारण करने वाले जब अपनी यात्रा की कथा कहते हैं तो उनके मील के पत्थर युवामन के अंतर्द्वदों को साफ करने में मददगार साबित होते हैं।

 

भारत में किताबों की दुनिया मजे की उड़ान भरती दिखने लगी है। इंडिया हैबिटाट सेंटर हो या इंडिया इंटरनेशनल सेंटर , दिल्ली में कुछ ठिकाने जैसे रोजमर्रा की गतिविधि की तरह किताबों का विमोचन होते देखते हैं। अब विमोचनों से पहले कायदे की चाय का इंतजाम भी होने लगा है। विमोचन एसी कमरों में होते हैं, उनका बाकायदा आमंत्रण पत्र छपते हैं और प्रेस विज्ञप्ति भेजी जाती है। बैकड्राप बनाया जाता है और उसे कारपोरेट लुक देने के लिए आपसी जुगलबंदी भी की जाती है। लेकिन यहां एक बात बड़ी मजे की है। इन विमोचनों में कौन आएगा और कौन कतई नहीं आएगा, यह फेहरिस्त कोई भी याद कर सकता है, महज कुछ ही समारोहों को देखकर। लेखकों का एक बड़ा वर्ग अपनी किताब के विमोचन में भारी भीड़ को देखने के लिए तो आतुर रहता है लेकिन दूसरे के विमोचन में(अन्यथा कि भाषण देने की कोई संभावना हो) जाने में यथोचित परहेज करता है। किताबों के विमोचन कई बार राजनीति का मैदान बने हुए भी दिखते हैं। छोटे-छोटे विमोचन कई बार जाने-अनजाने बड़ी नाराजगियों की वजह भी बन जाते हैं। इसके अलावा यह भी सच है कि कई बार बड़े पदों पर आसीन लोगों की किताब के छपने में आम तौर पर आसानी हो जाती है क्योंकि वे एक ही धक्के में कई पुस्तकालयों में किताब के खरीदे जाने को सुनिश्चित कर देते हैं।

 

लेकिन तब भी किताबों को पंख लगाता यह नया मौसम एक मीठी आहट तो है ही।

 


May 5, 2011

रेडियो के लिए एक अच्छी खबर

प्राइवेट रेडियो के लिए बहुत दिनों बाद एक गुड न्यज सुनाई दी है। खबर है कि निजी स्टेशनों को जल्द ही खबरों के प्रसारण की अनुमति मिल जाएगी लेकिन उन्हें खबरों को आकाशवाणी से ही लेना होगा। यानि स्रोत तय होगा और उसी के बंधन में खबर का प्रसारण करना होगा। इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि खबर वही होगी, जो सरकार देना चाहेगी। खबर छन और पक कर आएगी और निजी चैनल उसी को किसी परिवर्तन किए बिना प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होंगे।

लेकिन तब भी गुड न्यूज आई तो सही। आकाशवाणी के आला अफसरों ने यह भरोसा दिलाया है कि इस काम को अंजाम देने के लिए दो तरह के पैकेज बनाए जाएंगें। एक तो 15 मिनट का पैकेज होगा और दूसरा 2 मिनट का। प्राइवेट रेडियो स्टेशन अपनी जरूरत और समय के मुताबिक इनका इस्तेमाल कर सकेंगे। इसके अलावा खेलों की लाइव कमेंट्री देने पर भी विचार किया जा रहा है। यह सारे भरोसे उस समय दिलाए जा रहे हैं जब कि भारत में एफएम रेडियो के विस्तार के तीसरे चरण की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इस समय भारत में 84 केंद्रों में एफएम के 245 स्टेशन हैं। तीसरे चरण के बाद उम्मीद है कि 283 शहरों में 800 एफएम स्टेशन खुल जाएंगें।

इसका मतलब यह कि भारत में प्राइवेट रेडियो को खबरों के प्रसारण के लंबे इंतजार से अब मुक्ति मिलेगी लेकिन यहां यह नहीं भूला जाना चाहिए कि यह सब बहुत ही हास्यास्पद ढंग से आगे बढ़ा है। भारत में रेडियो का बीज 1921 में पड़ गया था जबकि दूरदर्शन 1959 में पैदा हुआ। निजी चैनल 90 के दशक में आए और इतने स्मार्ट निकले कि देखते ही देखते 24 घंटे के न्यूज चैनलों में तब्दील होने में सफल हो गए। वहां समय, शॉट्स, भाषा, नियम-कायदों की सारी कहानियां कच्चे रंगों की तरह रहीं। वे भूत को गवा कर, नागिन को नचा कर, राखियों को सजा कर और बेकार की खबर को भी ब्रेकिंग न्यूज बता कर टिके रहे। उनकी जमीन हिली नहीं। दूसरी तरफ नजाकत, नफासत के साथ शुरू हुए रेडियो को कभी भी अपनेपन की जमीन नसीब नहीं हुई। वह गाने बजाता ही रह गया। आकाशवाणी के जिम्मे तो जैसे पूरे देश की परंपरा को संभालने का काम ही पड़ गया। वह शास्त्रीय संगीत, विकास, कला साहित्य, नाटक, कठपुतली, तराने, किसान भाई, सैनिक भाई, चीनी भाई, देशभक्ति बस इन्हीं सबके फंदों में उलझा पड़ा रहा। उसका सारा ध्यान शब्दों के सही उच्चारण, भाषा की गरिमा और सौहार्द की ऊंचाई और गांभीर्य भरे ठहराव से कभी हटा ही नहीं। वह इस देश की संस्कृति का रक्षक बना रहा और अब भी है।

प्राइवेट रेडियो स्टेशन आए तो उन्होंने रेडियो के खिचड़ीनुमा स्वाद में तड़का लगाने का काम किया। वे हिंग्लिश बोलने लगे। बात-बात में उछलने लगे। उनकी भाषा में हड़बड़ी दिखी, नई जमाने के मुताबिक सांचे में ढलने की काबिलियत भी लेकिन इस सबके बावजूद वह टीवी के करीब नहीं पहुंच सका। वजह कंटेट नहीं थी, वजह थी-खबर। प्राइवेट रेडियो को न्यूज से दूर रखा गया।

भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय को यह डर हमेशा रहा कि अगर रेडियो को खुली लगाम दे दी गई तो क्या होगा। रेडियो खबर को हैंडल नहीं कर सकता। दूसरा डर यह भी रहा कि चूंकि रेडियो का दायरा आज भी टीवी से कहीं ज्यादा है, अगर रेडियो अनर्गल प्रसारण करने लगा तो उस पर रोक लगेगी कैसे। देश के दूर-दराज में उसकी मॉनिटरिंग करेगा कौन। मंत्रालय के लिए रेडियो एक ऐसा कीमती खिलौना हो गया जो देखने में तो सुंदर था लेकिन उससे खेलने की छूट किसी को न थी।

खबर को लेकर रेडियो पर नियंत्रण की यह कहानी हमेशा ही अटपटी लगी। देश में 600 चैनल उग आए, प्राइवेट चैनलों को खबर दिखाने का लाइसेंस मिलने लगा और वे भी खबर के नाम पर अपनी मर्जी के मुताबिक सामान परोसने लगे। तब भी मंत्रालय के माथे पर त्यौरियां नहीं चढ़ीं। चैनलों पर कई बार गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग हुई पर मंत्रालय ने उसे भी आराम से हजम कर लिया। बाद में 2010 में मंत्रालय ने एक मीडिया सैल का गठन किया लेकिन वो भी खामोश ही रहा है। ऐसे में रेडियो पर ही तमाम बंदिशें क्यों।

रेडियो को अपने वजूद को बनाए रखने के लिए हमेशा सबूत क्यों देने पड़ते हैं। सदी के इस अध्याय में खबर चारों तरफ है। जब बाकी किसी माध्यम पर कोई लगाम नहीं है तो सबसे पुराने,विश्वसनीय और टिकाऊ माध्यम को बंधन में रखने का आखिर क्या औचित्य है। सोचिए ओसामा के मारे जाने की खबर को तस्वीरों के साथ जब पूरी दुनिया का टीवी दिखा रहा था, इंटरनेट उसके विश्लेषण में धड़ाधड़ जुड़ा था, तब भी निजी रेडियो गाने बजाने को मजबूर था।

खैर, मंत्रालय के वादे के बहाने अब आस की एक पतली किरण बंधी है। कम से कम एक दरवाजा, छोटा ही सही, खुला तो।


(यह लेख 5 मई, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Apr 11, 2011

सपना नहीं, हकीकत हो फिल्म सिटी


सुंदर झीलें, बड़े पार्क, महल, खंडहर, गलियां, मोहल्ले, हाट, इमारतें सब सच की तरह दिखा देने में माहिर टेलीविजन धारावाहिकों की जिंदगी का सेट भी अब बदलने लगा है। खबर है कि धारावाहिकों के कैमरे अब मुंबई से बाहर जाकर दूसरे ठिकानों को खोजने में जुटने लगे हैं। इन शहरों में धारावाहिक बनाने के आदी रहे निर्माताओं के लिए नए विकल्प खोजना अब एक मजबूरी हो गई है। इसकी एक वजह नएपन की तलाश कही जा सकती है लेकिन बड़ी वजह जगह का अभाव, बढ़ता हुआ खर्च और तीखी प्रतिस्पर्धा भी है।

 

दरअसल बरसों शूट के लिए पारंपरिक रूप से फिल्म सिटी का इस्तेमाल किया जाता रहा है लेकिन पिछले कुछ सालों में टेलीविजन का दायरा और धारावाहिकों का निर्माण इस कदर बढ़ा है कि मुंबई की फिल्म सिटी अब सिमटा हुआ दिखने लगी है।

 

नए चैनलों की भीड़ की वजह से फिल्म सिटी पर भी दबाव बढ़ा है और यहां किराये की कीमतें कई गुणा बढ़ गईं हैं। एक आम शूट के लिए यहां पर हर महीने का किराया करीब 18 से 20 लाख रूपए पड़ता है जबकि मुंबई से बाहर निकलते ही यह खर्च करीब 30 से 40 प्रतिशत कम हो जाता है। इसके अलावा जगह और समय के दबाव की वजह से एक्सक्लूजिविटी बनाए रखने के आसार भी काफी घट जाते हैं। वैसे भी जो धारावाहिक दर्शकों में लोकप्रिय हो जाते हैं, उनकी अवधि 2-3 साल तक की तो तय मान ही ली जाती है। ऐसे में नए धारावाहिकों के लिए उस बंधी हुई जगह में अपने लिए बुकिंग करवा पाना आसान नहीं होता। इसके अलावा क्षेत्रीय चैनलों का अपना दबाव भी लगातार बना रहता है। यही वजह है कि अब नयगाम, दहीसर, सीरा रोड, पोवाई के अलावादिल्ली,  शिमला, लखनई, आगरा और बड़ौदा को शूट के लिए चुना जाने लगा है।

 

लेकिन इनमें कई कंपनियां खुशनसीब भी हैं। जैसे कि बालाजी टेलीफिल्म्स लिमिटेड और बीएजी फिल्म्स एंड मीडिया लिमिटेड के अपने स्टूडियो हैं। माना जाता है कि एकता कपूर की बालाजी ने 10 अलग-अलग तरह के स्टूडियो बनवाने पर करीब 1200 करोड़ रूपए का खर्च किया है।

  

दरअसल फिल्म और टीवी मनोरंजन की दुनिया में जिस बड़े कलेवर के साथ उभरे हैं, उस में फिल्म सिटी की अहमियत और जरूरत और भी बढ़ जाती है। मुंबई स्थित फिल्म सिटी को महाराष्ट्र सरकार ने दादा साहब फाल्के को समर्पित करते हुए बनवाया था। दिल्ली से सटे नौएडा में 1987 में फिल्म सिटी के बनने से एक बड़ी राहत मिली। हैदराबाद का   रामोजी फिल्म सिटी यानी आरएफसी दुनिया का सबसे बङा फिल्म स्टूडियो परिसर माना जाता है लेकिन आज भी अभी भी देश भर में एक दर्जन से कम फिल्म सिटी हैं जो कि बढ़ती जरूरतों के सामने अब भी नाकाफी ही हैं।

शत्रुघ्न सिंह ने बहुत पहले बिहार की राजधानी पटना में 100 एकड़ की जमीन पर फिल्म सिटी बनाने का सपना प्रचारित कर खूब तालियां बटोरी थीं जिसे वे शायद आज खुद ही भूल गए हैं। इसी तरह 2005 में राजस्थान सरकार और जयपुर विकास प्राधिकरण ने जयपुर में फिल्म सिटी बनाने का ऐलान किया था लेकिन यह सिटी अभी फाइलों में ही दबी  है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने 20 करोड़ रुपये की लागत से तकरीबन 1,000 एकड़ जमीन पर फिल्म सिटी बनाने का ऐलान किया था। तब बीकानेर से लोकसभा पहुंचे अभिनेता धमेंद्र ने भी खासी सरगर्मी दिखाई थी, लेकिन बाद में सारा हवा हो गया।

 

फिलहाल इस साल फरवरी में हरियाणा के शहर मोहाली में फिल्म सिटी के निर्माण को मंजूरी मिल गई है और इससे पंजाबी फिल्मों के निर्माण को खासतौर से प्रोत्साहन के आसार बनेंगें। इसी तरह मध्यप्रदेश में भी फिल्म सिटी को बनाए जाने का सपना जगा है। इसके जरिए स्थानीय बोलियों और संस्कृति पर आधारित छोटी-छोटी फिल्में बनाने में सहयोग की बात कास तौर से कही गई है।

दरअसल टेलीविजन और फिल्मों की लोकप्रियता की बात तो खूब होती है लेकिन कार्यक्रमों या फिल्मों के निर्माण से जुड़ी जरूरतों पर चर्चाओं का माहौल हमारे यहां कम ही बनता है।
एक मामूली सी दिखने वाली जगह थोड़ी सी मेहनत, दिमागी संयोजन और तकनीकी सम्मिश्रण से कमाल कर सकती है। फिल्म सिटी इसी का नाम है। सालों से फिल्म और टीवी की सफलता का मापदंड तय करने में सेट बहुत आगे रहे हैं। इनके अपने फायदे भी हैं। सबसे बड़ा तो यही कि टीवी पर एक ताजगी  का भान मिलता है, स्थानीय कलाकारों को मौका मिलने की गुंजाइश बनती है, वहां नया व्यवसाय पनपता है, आम लोगों को मुफ्त में टीवी को समझने का अवसर मिलता है और धारावाहिकों में स्थानीय पुट की छौंक लगने की संभावना बनती है।

 

बेहतर हो कि दुनिया के सबसे बड़े मनोरंजन क्षेत्र को ऊर्जा और समर्थन देने में राज्य सरकारें अब पहल करें।

 

(यह लेख 11 अप्रैल, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

Apr 5, 2011

मीडिया के मॉल में धर्म की बंपर सेल

अंग्रेजी आउटलुक के 14 मार्च के अंक के केंद्र में बाबा रामदेव हैं। आत्मविश्वास से लबरेज केसरिया चोगे में बाबा के बैकड्राप में संसद भवन है। कहानी का सार कहने के लिए वैसे तो यह तस्वीर ही काफी है लेकिन इसके बावजूद अंक ने एक बहस को जन्म दिया है। बहस का मुद्दा है कि क्या बाबा को राजनीति में होना चाहिए। आउटलुक जैसी तमाम बड़ी पत्र-पत्रिकाएं पिछले कई दिनों से इस बहस से जूझ रही हैं कि योग गुरू को खुद को योग तक ही सीमित रखना चाहिए या राजनीति के मैदान में उतर कर एक नई तरह की राजनीतिक कपाल भाति को जन्म देना चाहिए।

 

सवालों की यह नई उगी फसल बाबाओं के उस बढ़ते वर्चस्व की कहानी कहने के लिए काफी है जो एक दशक में महाकाय हो गई है और इस काम में टेलीविजन ने बाबाओं की ताकत बढ़ाने के कैप्सूल का काम बखूबी निभाया है।

 

बिकता क्या है, कहां है और कैसे है - टेलीविजन का बाजार इन सवालों के आसपास घूमता है और अपने लिए जमीन बनाता है। बाजार की परिभाषा कुछ भी हो सकती है। बाजार उस दर्शक का है जिसके लिए यह सारा सच या फिर भ्रम या फिर यह खेल रचा जा रहा है। अगर उसकी तालियां नसीब तो मतलब खेल सराहा गया नहीं तो खेल के नियम-कानून या फिर हो सकता है कि पूरा खेल ही बदलना पड़े।

 

इस खेल का एक दूसरा मालिक भी है, बल्कि वही सच्चा अन्नदाता या अन्नपूर्णा है। वह है विज्ञापनदाता जिसकी तिजोरी से सिक्के झरते हैं तो चैनल चलता है। चैनल की सांस का उदगम वही है। यही स्रोत चैनल की गति-दशा, दिशा और भविष्य तय करता है, बाकी बातें उसके बाद आगे सरकती हैं और आकार लेती हैं। ताजा आंकड़े कहते हैं कि 2014 तक भारत में मीडिया और मनोरंजन क्षेत्र 13 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से फैलेगा। इसमें धर्म और आध्यात्म की भी एक जोरदार भागेदारी होगी। मीडिया में बढ़ती इस भागीदारी के पीछे एक लंबी कहानी है, एकदम फिल्मी।

 

साल 1975। एक नया अध्याय खुलने का साल। इस साल एक छोटे बजट की फिल्म आती है, भूले-बिसरे या फिर एकदम अनजाने कलाकारों के साथ लेकिन वह इतनी सफल होती है कि वह उस दौर की शोले और दीवार की टक्कर में लोकप्रियता हासिल करने में सफल हो जाती है। यह फिल्म थी जय संतोषी मां। फिल्म लोगों में ऐसी धार्मिकता का प्रवाह करती है कि सैंकड़ों दर्शक थियेटर में प्रवेश करने से पहले अपने जूते बाहर उतार कर जाते थे ताकि देवी मां का अपमान न हो। उनके लिए थियेटर किसी मंदिर से कम नहीं था। फिल्म में जब भी देवी के दर्शन होते, वे परदे पर सिक्कों और फूलों की बरसात करने लगते और बार-बार सिर नवाते। फिल्म इस विश्वास या अंधविश्वास पर टिकी रहती है कि संतोषी मां का व्रत करने से महिलाओं की सारी परेशानियां दूर हो सकती हैं। ऐसा करके वे उस आदर्श जीवन को पा सकती हैं जिसकी वे हमेशा कामना किया करती हैं। इस फिल्म की सफलता ने तब एक नए दरवाजे के खुलने की संभावना की राह दिखा दी।    

 

अब सीधे चलिए 80 के दशक में। यह जमाना दूरदर्शन का था। दूरदर्शन के जन्म के 28 साल बाद रामायण और बाद में महाभारत के प्रसारण ने इस बात की जैसे बुनियाद ही रख दी कि भारतीय दर्शक धर्म को टीवी पर देखने के लिए लालायित है। रविवार 25 जनवरी 1987 को सुबह 9:30 बजे जब रामायण की पहली कड़ी ऑन एयर होती है तब किसी को उम्मीद तक नहीं थी कि 31 जुलाई 1988 तक ठीक इसी समय हर रविवार को देश भर की गलियां, सड़कें, मंदिर और बाज़ार सूने हो जाया करेंगें, ट्रेनें, बसें, ट्रक अगले 35 मिनट तक जहां के तहां रुक जाएंगे और एक तरह से पूरा देश ही थम जाएगा। रामायण के प्रसारण से कुछ देर पहले लोग इसे देखने के लिए जुटने लगते। दुकानों और घरों में लगे टीवी के सामने भीड़ लग जाती। अनजाने लोग भी किसी की बैठक में रामायण के दर्शन करने के लिए जगह पा ही जाते। यह रामायण फीवर का अदभुत दौर था। [1]

सारे दिन चाहे बिजली कितनी ही आंखमिचौली करती लेकिन इस समय वह मुस्तैद रहती ही। बैटरी और जनरेटर जरूरत के समय के लिए तैयार रखे जाते और ऐसा हर प्रयास किया जाता कि बिना व्यवधान के इसे टकटकी लगा कर देखा जा सके। लोग पूजा की थाली के साथ सीरियल के कलाकारों की आरती उतारते। महाराष्ट्र की लोकेशन पर शूटिंग करने वाले इन कलाकारों को भगवान समझने वाले दर्शकों की भीड़ से बचाना एक मशक्कत भरा काम होता। ऊपर से कलाकारों को हर समय अपने किरदार का रंग बरकरार रखना होता था वरना भीड़ की श्रद्धा को आक्रोश में बदलते देर नहीं लगती थी। 78 एपिसोड वाले इस सीरियल के प्रोड्यूसर/डाइरेक्टर थे चंद्रमौलि चोपड़ा उर्फ रामानंद सागर। 

 

रामायण में राम और सीता का किरदार निभाने वाले किरदार तो पहले दिन से ही भगवान की नजर से देखे जाने लगते हैं। इन किरदारों को निभाने वाले आम कलाकार थे जो इससे पहले तक इंडस्ट्री में स्ट्रगल ही कर रहे थे लेकिन इन धारावाहिकों से जुड़ते ही वे पूजनीय, माननीय और श्रद्धेय की उपाधि पा जाते हैं। कैकेयी का किरदार निभाने वाली पद्मा खन्ना को लोग वाकई उसी टेढ़ी नजर से देखने लगते हैं। मंथरा का किरदार निभा रही ललिता पवार को देख कर लोगों के मुंह का स्वाद कसैला होता है। वनवास गमन को जब राम, लक्ष्मण और सीता जाते हैं तो बहुत से दर्शकों के घर खाना नहीं बनता। रेलगाड़ियां और बसें रोक कर लोग इन धारावाहिकों को टकटकी लगाकर देखते हैं और मानने लगते हैं कि यह धारावाहिक अनंत चलेगा।

 

तो एक दृश्य टीवी के अंदर चलता है, एक बाहर। रामानंद सागर रामायण को 78 धारावाहिकों में बांधते हैं। टीवी पर दिखने वाले शॉट्स रिकार्डिड हैं। इसमें दिखने वाले हर क्षण के लिए सोची-विचारी योजना बनाई गई है। प्री प्रोडक्शन पर दर्जनों दिमाग लगे हैं। बाकायदा संवाद लिखे गए हैं। कड़ी मशक्कत से किरदारों का चुनाव किया गया, लोकेशन ढूंढी गई, सेट बने, तमाम रसों के सम्मिश्रण का करतब किया गया, संगीत और संगीतकारों का चयन हुआ, उन पर पोस्ट प्रोडक्शन हुआ, तब जाकर एक महाकाव्य टीवी पर साकार रूप में उभर कर सामने आया। 

 

सागर खेमे की रामायण ने महाभारत, विश्वामित्र, बुद्ध, लवकुश, कृष्णा, चाणक्य और भारत एक खोज जैसे सीरियलों की प्रेरणा दी। लेकिन इस स्तर की लोकप्रियता को सिर्फ चोपड़ा कैंप का महाभारत ही छू सका। 1988 से 1990 तक प्रसारित हुए इस सीरियल के निर्माता बी. आर. चोपड़ा और निदेशक रवि चोपड़ा थे। 94 हफ्तों का यात्रा तय करते हुए महाभारत भारतीय समाज के मानस पर गहरे उतरता है। इसकी प्रसिद्धि का आलम यह रहता है कि बीबीसी भी इंग्लैंड में इसे दिखाने के लिए बाध्य हो जाता है। इस में समय के रूप में हरीश भिमानी के कथन और आवाज अतीत की सुनहरी गलियों में ले जाते हैं। रामायण के मुकाबले इसका एक एपिसोड 45 मिनट का होता था। चोपड़ा के महाभारत का देश के बाहर भी प्रसारण हुआ। ब्रिटेन में बीबीसी ने इसे इंग्लिश सब-टाइटल के साथ दिखाया और इसे तरीब 50 लाख दर्शकों ने चाव से देखा। इस धारावाहिक ने 96 फीसदी की व्यूअरशिप का रेकॉर्ड बनाया जो गिनीज बुक ऑफ रेकॉर्ड्स में दर्ज है। आज की तुलना में भले ही इन सीरियलों का तकनीकी पक्ष कमज़ोर हो, बहुत बेहतरीन साउंड और ग्राफिक्स के इफेक्ट्स का इस्तेमाल भी भले ही न किया गया हो फिर भी इसने दो दशक पहले भारतीय दर्शक और भारतीय चैनलों की एक दिशा को जैसे तय कर दिया। भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास से जोड़ने की इस कोशिश ने दूरदर्शन को लोकप्रियता तो दी ही, साथ ही उसकी तिजोरी भी लबालब भरी।

 

धारावाहिक लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है। उसका बेसब्री से इतंजार होता है। जिस कथा के मूल सार को सैंकड़ों भारतीय पहले से जानते थे, वे भी इस यात्रा से जुड़ जाते हैं। टीवी का छोटा सा परदा रामायण और महाभारत जैसी पौराणिक और अति सम्मानित कथा को ऐसा जीवंत रूप दे देता है कि लगता है कि नए युग के हिसाब से इनकी एक नई पैकेजिंग ही कर दी गई हो। कैलेंडर, किताबों के कवर, सीडी, कैसेट, पेन, कपड़े, मालाएं सब जैसे एकाएक धर्ममय हो उठते हैं। धारावाहिक में द्रौपदी का चीरहरण दिखाए जाने के कुछ दिनों बाद ही गुजरात का एक व्यापारी द्रौपदी नाम की साड़ी बाजार में उतार देता है। निसंदेह यह साड़ी द्रौपदी के चीर की तरह अंतहीन तो नहीं होती लेकिन यह बिकती खूब है।

 

साबित हो जाता है कि विकासशील होने के रास्ते पर तेजी से अग्रसर होने के बावजूद भारतीयों के  मन के किसी कोने में अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के भूलते जा रहे पन्नों से जुड़े रहने की तीव्र उत्कंठा है। वह चाहता है कि आने वाली नस्लें इन्हें पूरी तरह से याद रखें और सहेज कर रखें। इन धारावाहिकों के प्रसारण ने इस बात की भी पुष्टि कर दी कि यह विषय पुराने नहीं पड़े हैं और इन्होंने दूरदर्शन के फीके पड़ते-से चेहर को भी एकाएक चमक से भर दिया। हफ्ते-दर-हफ्ते फैली हुई यह मनमोहक यात्रा दूरदर्शन को सबका दुलारा बना देती है। यहां यह सच भले ही दब गया हो कि इनमें से किसी भी धारावाहिक को, तमाम संसाधनों और सुविधाओं के बावजूद, दूरदर्शन ने खुद तैयार नहीं किया था। लेकिन जनता का इससे कोई सरोकार नहीं था। जनता को इन धारावाहिकों की वजह से बुद्धू बक्सा एकाएक बहुत समझदार, धीर-गंभीर और संस्कृति और धर्म का संवाहक और बहुत परंपरावादी लगने लगा। इस तरह धर्म के लिए एक नए चलते-फिरते रूप की जमीन तैयार हो गई।

 

इसकी सफलता पूंजी के बाजार को कई आइडिया देती है। रामायण और महाभारत का जो प्रसारण पहले विज्ञापनों की उपस्थिति भर ही देखता है, वह कुछ ही हफ्तों में जैसे उनकी मौजूदगी तले जैसे दब जाता है। पैसे का बाजार एकाएक स्फूर्ति से भर उठता है। टीवी की लोकप्रियता उत्पाद के प्रमोशन की वजह और हथियार बनकर सामने आती है। देश में फैली इस लहर को महसूस कर द संडे टाइम्स, लंदन ने लिखा- पिछले 50 सालों में राष्ट्रीय एकता का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं देखा गया है जब पूरा देश टेलीविजन सेटों के आगे घुटने टेक कर बैठ गया हो। रामायण ने अपने प्रसारण से जून 2003 तक दुनिया के सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले सीरियल के रूप में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में जगह पाई। [2] 

बहरहाल, यह धारावाहिक महज धार्मिक सीरियल नहीं था। इसमें सच और झूठ की शाश्वत लड़ाई का आंखों देखा हाल था। दर्शक इसे देख कर खुद को इसका हिस्सा महसूस कर रहे थे। उनके लिए इसने एक बुजुर्ग और सच्चे पथ-प्रदर्शक की भूमिका भी निभाई। इसीलिए यह किसी धर्म, जाति, वर्ग या उम्र तक सीमित नहीं था। इसके असर का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस एपिसोड के अंतिम सीन में भगवान राम और लक्ष्मण को नागपाश में बंधा हुआ दिखाया गया, सैकड़ों लोगों ने अगले एपिसोड तक सात दिन का उपवास यह कह कर किया कि जब हमारे भगवान बंदी बनें हों तो हम कैसे सुख से रह सकते हैं। दर्शकों की जिज्ञासा को जगाए रखने के लिए सागर की इस तरकीब की काफी आलोचना भी हुई। 

यह धारावाहिक कलाकारों को सितारा बना डालते हैं, उनकी किस्मत का सितारा रातों-रात चमक उठता है और बढ़ जाती है उनकी फीस, रूआब और नखरा। सीता का अभिनय करने वाली दीपिका चिखालिया और कृष्ण की भूमिका करने वाले नीतिश भारद्वाज राजनीति में भी उतर आते हैं। यहीं से जैसे टीवी के स्टारडम की नींव भी पड़ जाती है।

 

टीवी पर धर्म के इन नगाड़ों के बजने का एक सीधा प्रभाव यह भी पड़ता है कि भारतीय टीवी के बाजार में धर्म की पकड़ पुख्ता होने का साथ ही धर्म की वैरायटी पर चिंता-चिंतन-विमर्श होने लगते हैं। अखबारों में राशिफल पढ़ने वालों के लिए उदारवाद का दौर और निजी चैनलों की पैदाइश धर्म के भरपूर दिखने के साथ ही भरपूर बिकने की संभावनाएं भी बना लेती है। एनडीटीवी गुड मार्निंग इंडिया में शमशेर लूथरा से कविताई अंदाज में रोज राशिफल सुनाता है। यहां जोर इस पर रहता है कि इसे रोचक, सरस और चुस्त कैसे बनाया जाए। ऐसे कई प्रयास भारत में धर्म पर आधारित चैनलों के गर्भधारण का माहौल बना देते हैं। साल 2000 में आस्था देश का पहला धार्मिक चैनल बन कर उभरता है।

 

2006 तक समूची टीवी की व्यूअरशिप में धार्मिक और आध्यात्मिक चैनलों की जो भागेदारी महज 1 प्रतिशत होती है, वह 2007 आते-आते यह 2.8 प्रतिशत को पार कर जाती है। इन चैनलों का सीधा मुकाबला संगीत चैनलों से होता है जिनकी व्यूअरशिप 2 से 2.5 प्रतिशत के बीच थी।[3] इन चैनलों ने पहले तो खुद को धार्मिक प्रवचनों, संवादों, सेहत, जीवन शैली और धार्मिक संगीत से जोड़ कर सीमित समय तक प्रसारण किया लेकिन फिर बहुत जल्द ये खुद को चौबिसिया घंटे के चैनल का आकार देने में कामयाब हो गए। ये अपने छोटे से अनुभव के दायरे में जान गए कि भारत के टीवी के बाजार में कई सालों तक खबरिया चैनलों का हिस्सा 15 प्रतिशत के आस-पास ही रहेगा, बाकी के कुछ हिस्से पर अपना दिमाग खपा कर ये अपनी पक्की जगह सुनिश्चित कर सकते हैं और ठीक वैसा ही हुआ भी। इन चैनलों को अपनी बाहशाहत कायम करने में कोई ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी।

 

तो भारत में भावनाएं और संवेदनाएं बिकती हैं, इसकी जमीन 80 के दशक में ही तैयार हो गई थी। धर्म पर आधारित धारावाहिकों ने बड़ी सहजता से सहमति को बनाने के वातावरण की नींव रख दी तो जनता की हामी का हरा सिगनल भी मिल ही गया। यह बात साबित हो गई कि मानसिक तरंगों को छूने वाले तारों को जनता मन से ही देखती और सराहती है। वहां तकनीकी जादूगरी से बड़ी ताकत होती है-संवेदना का जुड़ना। धर्म काफी हद तक दिल ही का मामला है। मिथ रिएलिटी जैसे अंदाज में चाश्नी में लिपट कर जब सामने आते हैं, तब भी उन्हें दिमागी तराजू पर तौला नहीं जाता। वे पहले दिल में पहुंचते हैं और फिर दिमाग भी दिल से निकले फरमान पर अपनी मुहर लगा देता है या फिर मुहर लगा देने की औपचारिकता भर निभा लेता है। मजे की बात यह भी है कि यह सब परोसने वाला इस बात से पूरी तरह  वाकिफ है कि जिस दर्शक से उसका पाला पड़ना है, वह मीडिया के अनगिनत उत्पादों का लगातार सेवन कर रहा है। इसलिए उसे लुभाने का फार्मला सीधा-साफ और सोचा-विचारा होना चाहिए ताकि वो चारों खाने चित्त न हो। साथ ही अगर कोई ऐसा फार्मूला मिल जाए जिससे सर्वमान्य,सर्वस्वीकृत मान्यता को हवा मिलती हो तो सोने पे सुहागा खुद ब खुद ही लग जाता है।

नए सामाजिक परिदृश्य को अतीत की कड़ी से जोड़े रखने में इन चैनलों का कोई सानी नहीं हो सकता।

 

भारत में आध्यात्मिक चैनल

 

निजी चैनलों ने बाजार में आते ही तुरंत तो धर्म का दामन नहीं थामा लेकिन धीरे-धीरे हालात करवटें लेते गए। पहले खबर का बाजार ज्यादा गर्म रहा। खबर दिखाने की अनुमति भर ने निजी चैनलों में ऐसा अति उत्साह से भरा कि शुरूआती कुछ साल उसी भाग दौड़ में गुजर गए।

 

90 से 2000 के बीच जब बाजार सास-बहुओं के नाटकों से सराबोर था और द्रौपदी के चीर की तरह इन धारावाहिकों का अंत होता नहीं दिख रहा था, तब टेलीविजन के बाजार में एक अनोखी उथल-पुथल होने लगी जिसका नतीजा था- 2000 में देश के पहले आध्यात्मिक चैनल आस्था का जन्म। शुरूआती दौर में आस्था जैसे कई चैनलों का पहला मकसद अप्रवासी भारतीयों में अपनी पैठ पहुंचाना था। चैनल जानते थे कि रामायण और महाभारत ने कैसे भारत से बाहर रह रहे भारतीयों को भावुकता से भर दिया था और कैसे वे भारतीय जड़ों में अब भी अपना वजूद खोजते हैं। ऐसे में धर्म में लिपटा कोई भी चैनल उनके दिल के तार छेड़ सकता था। भारतीय संस्कृति से खुद को जोड़े रखने की भूख और अपनी अगली पीढ़ियों को धर्म की संवेदनाओं से परिचित बनाए रखने के लिए ये अप्रवासी हमेशा ही लालायित रहे। उनकी इस भूख का जवाब ये चैनल थे। वैसे भी एक लंबे समय तक इस डायसपोरा के लिए भारतीय बुद्धू बक्से में परोसने के लिए कुछ भी विशेष था नहीं और एक सच यह भी था कि इस हिस्से के पास विदेशी पूंजी भी थी और ललक भी। बस, यही एक समझ बाजार में एक नए उत्पाद के पनपने की ऐतिहासिक वजह बन गई।

 

तो भारत में 2000 में आस्था पहले आध्यात्मिक चैनल के तौर पर उभर कर आता है। आस्था के बाद कई और धार्मिक चैनल बाजार में उतरे जिनमें संस्कार,जागरण,साधना, प्रज्ञा और धर्म हैं। इसी समय क़रीब एक दर्जन छुटभइए धार्मिक चैनल भी सक्रिए हुए जो धनाभाव और इच्छाशक्ति की कमी से कभी-कभार ऑफ़-एयर भी होते रहे। उसके बाद तो जीवन, गॉड, महर्षि वेद विजन, मिराकल नेट, एटरनल वर्ल्ड टेलीविजन नेटवर्क, अहिंसा, अमृता - न जाने कितने धार्मिक चैनलों की बाढ़ दिखाई देने लगती है।

 

 

अपनी संतरी रंग की साइट में आस्था चैनल देश का नंबर 1 सामाजिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक नेटवर्क होने का दावा करता है। साइट में कहा गया है कि चैनल की पहुंच 30 मिलियन घरों में है और इसे 200 मिलियन से ज्यादा दर्शक देखते हैं। हिंदी, अंग्रेजी और गुजराती इन तीनों भाषाओ में कार्यक्रम प्रसारित करने वाले इस चैनल के स्टार मुरारी बापू हैं जिनके प्रवचन आम तौर पर गुजरात के शहर नादियाड से लाइव दिखाए जाते हैं।[4]

 

 

संस्कार चैनल भी इसी से मिलते-जुलते रंग की साइट में पहले पन्ने पर धार्मिक वीडियो दिखाता है। चैनल दावा करता है कि यह भारतीय सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी प्रोग्रामिंग के साफ्टवेयर का सबसे बड़ा प्रोड्यूसर है। चैनल के लक्ष्यों में यह साफ लिखा है कि यह चैनल हिंदू भजन, कीर्तन, आरती, कीर्तन, आराधना और बड़े संतों के आध्यात्मिक वचन सुनाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके अलावा इसमें मंदिरों में पूजा, धार्मिक अवसरों पर विशेष कार्यक्रम, एनिमेट की हुई धार्मिक फिल्में, आयुर्वेद, योग और स्वस्थ जीवन पर कार्यक्रम दिखाए जाएंगें।[5]

 

साधना चैनल में इन सबके अलावा धार्मिक सीडियों के विज्ञापन भी देखे जा सकते हैं। अंग्रेजी से हिंदी में अनुवादित सीडी 900 रूपए में भी मिल सकती है। .

 

अमृता टीवी का उदघाटन तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय रवि शंकर प्रसाद ने माता अमृतानंदमयी की 50वीं वर्षगांठ ने किया था। चैनल ने दावा किया कि इसका मकसद भरीपूरी प्रोग्रामिंग को परोसना है जो मूल्यों और संस्कृति पर आधारित होगी। मलयालयम भाषा में शुरू हुए स चैनल का इरादा दूसरी भाषाओं से भी जुड़ने का है। सामाजित-धार्मिक ज्ञान के अलावा यह चैनल लोगों के आत्मविश्वास में बढ़ावा की बात भी करता है। यहां अहं से आगे जाकर बड़े परिप्रेक्ष्य की बात की जाती है।

 

धर्म चैनल तो भजन संग्राम के नाम से देश का पहला धार्मिक संगीत आधारित टेलेंट हंट कार्यक्रम ही शुरू कर डालता है।

 

बाजार का आकलन करने वाले यह जानने लगते हैं कि जो लोग आध्यात्मिक चैनल देखते हैं, वे बहुत ज्यादा चैनल सर्फिंग नहीं करते। उनमें सिर्फ न्यूज या मनोरंजन आधारित चैनल देखने वाले दूसरे दर्शकों की तुलना में ठहराव और गांभीर्य ज्यादा होता है। यही वजह है कि धार्मिक चैनलों पर दर्शकों की प्रतिक्रिया देने की गति और तरीका भी जरा अलग हटकर ही होता है। रामायण या महाभारत से लेकर उत्सव और त्यौहारों का टीवीकरण अपनी जगह बना लेने में हमेशा ही सफल रहा है और कभी भी कट्टर आलोचना का शिकार नहीं बना है। यहां सुविचारित तरीके से बनाया गया योग, सत्संग, पर्वों, जागरणों और गुरूओं का संयोग इस पूरे पैकेज को बिकाऊ, टिकाऊ, रसाऊ और दुहाऊ बनाता है।

 

विज्ञापन का बाजार


अध्यात्म, समाज सुधार, विकास, नैतिकता, शांति आम तौर पर इन चैनलों की शुरूआत के कारण यही बताए जाते हैं लेकिन इसके बावजूद यह बाजार अशांत की वजह बनते कारकों से अछूता नहीं। जाहिर है इनमें पैसा प्रमुख है। विज्ञापनदाता यह समझ गए हैं कि यह एक ऐसा बाजार है जिसमें अनंत, संभावनाएं हैं और अभी इनके रोशनदान भी ठीक से खुले नहीं हैं। टैम की साथी एजेंसी एडैक्स ने भी यह स्वीकार किया है कि इन चैनलों पर विज्ञापनों का प्रवाह तेज हुआ है। वही कंपनियां जो 2005 तक इनके वर्चस्व को लेकर विश्वस्त नहीं थीं, एकाएक अपने रास्ते को बदलने लगीं। यही वजह है कि अगरबत्ती, पत्थरों, मालाओं के विज्ञापन दिखाते इन चैनलों में एयरलाइंस, बैंक, टायर, लोशन, योगा मैट और खान-पान उतर आया। एकाएक विज्ञापनदाता इन चैनलों पर 5.71 लाख रूपए खर्च करने लगे। बाकी चैनलों की तुलना में भले ही यह मामूली हो लेकिन तब भी सच यह भी है कि इन चैनलों में विज्ञापन के लिए जगह जुटाना आसान भी है और सस्ता भी। प्रति दस सेकेंड यहां महज कुछ लाख रूपयों में एक पूरे अभियान को खड़ा किया जा सकता है और किसी को भी धर्म गुरू, पथ-प्रदर्शक या परमज्ञानी बनाया जा सकता है। इसी का नतीजा है कि गुरूओं की एक भरी-पूरी फौज यहां दिखने के लिए आतुर दिखाई दे रही है। ब्रांड की एक नई हाट लग गई है रंगीन, स्मार्ट और फास्ट।

 

विज्ञापन के बाजार को सामाजिक बदलाव के बारीक तारों से जोड़ा जा सकता है। चैनलों के खेत पर उत्पादों की बारीक मंडी प्रतिस्पर्द्धा का उवर्र माहौल पैदा करती है। एड स्पेस खरीदने और बेचने वाले कई खिलाड़ी मानते हैं कि इन चैनलों पर विज्ञापनों की विविधता की एक बड़ी वजह इनके प्रति दस सेकेंड के रेट कार्ड की कीमत का काफी कम होना है। यही वजह है कि कम बजट पर बनने वाले प्राकृतिक उत्पाद भी यहां अपनी जगह बना पाते हैं। फिर यहां प्राइम टाइम की परिभाषा भी दूसरे चैनलों से अलग है। यहां प्राइम टाइम सुबह 4 से 7 है। शाम में 4 से 7।

 

विज्ञापन ने बाजार ने तुरंत इस महीन सच को पकड़ लिया कि इन चैनलों का पहला मकसद भारत के रास्ते विदेशों में अपनी पैठ जमाना भी है। इसलिए उन्होंने दरवाजे बहुत समझदारी से खोले।

 

आस्था का दावा है कि वह 160 देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुका है। विदेशी बाजार में ग्राहकी शुल्क ने चैनल को शुरू से ही आश्वस्त बनाए रखा। नतीजतन अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, जापान, कोरिया, ताइवान, चीन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, फिजी जैसे अनगिनत देशों में इस चैनल की पकड़ अब पक्की हो चली है। कहीं यह फ्री टू एयर हैं तो कहीं ये पेड चैनल के तौर पर देखा जाता है। इनमें से ज्यादातर चैनल एक ही साथ एक बड़ी कमाई का लक्ष्य बनाकर नहीं चलते। एक साल में 65 लाख की कमाई को भी यहां संतुष्टि से देखा जाता है, बावजूद इसके सच यही है कि आमतौर पर कमाई इससे कहीं ज्यादा होती है और वह भी आसानी से। टेलीशॉपिंग के लिए 24 घंटे खुली हुई लाइनें लाखों का व्यापार खींच कर लाती हैं। कुंभ मेला, गणेश चतुर्थी, महाशिवरात्री, जन्माष्टमी, नवरात्रे वगैहर के लाइव टेलिकास्ट की सफलता इन चैनलों का उत्साहवर्धन करती चली गई है। ऐसे तमाम छोटे-बड़े धार्मिक उत्सवों ने चैनलों में नई जान का संचार किया है और उन्हें बोरियत से घिरने से भी बचा लिया है। उत्सवों के पैकेज भी गहन विचार से बनाए जाते हैं। वैरायटी का ध्यान रखा जाता है।

 

समय के साथ यह भी सामने आया कि इन चैनलों की viewership किसी विशेष सामाजिक-आर्थिक या फिर आयु वर्ग तक ही सीमित नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ बुजुर्ग ही इनके प्रतिबद्ध दर्शक हैं जो उम्र की सांझ में इन्हें देख कर शांति पाने को लालायित हैं। टैम की मीडिया रीसर्च ने पाया कि जहां गॉड और साधना के सभी दर्शक 35 से ज्यादा आयु के हैं, वहीं आस्था को देखने वाले 46 प्रतिशत, संस्कार 41 प्रतिशत, जी जागरण के 60 प्रतिशत और कुरान टीवी के 53 प्रतिशत दर्शकों की आयु 35 से कम है। औसतन पाया गया कि धार्मिक चैनलों के देखने वाले 54 प्रतिशत की उम्र 35 से ज्यादा है, बाकी को इस उम्र से कम के लोग भी देखते हैं।[6] यही वजह है कि इन चैनलों के लिए विज्ञापनों के बाजार ने भी एक नई करवट लेने में समझदारी समझी। एयरलाइंस, सोना बाथ, वजन घटाने की स्टाइलिश मशीनें, जिम, जेवर और प्रसाधनों के विज्ञापन भी इन चैनलों में चले आए।


आस्था, साधना और संस्कार की कुल दर्शक संख्या का 33 से 39 प्रतिशत क्लास ए की सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि का है। ऐसे में मुनाफे की गुंजाइश हमेशी बनी ही रहती है।

 

यहां बहुत कुछ बिकता है। हर्बल चाय, एक्यूपंचर, डायबिटीज या मोटापा घटाने की आयुर्वेदिक दवाएं, रत्न, मालाएं, फेंगशुई, वास्तु का सामान, अगरबत्ती, धूप, पूजा सामग्री, भजनों के सीडी, टेलीशापिंग के विज्ञापन, सकारात्मक सोच की किताबें, योग का मैट वगैरह। फिर बीते जमाने में चर्चित रहे बहुत से जाने-माने कलाकार भी कम कीमत पर विज्ञापन के लिए तैयार दिखते हैं।


न्यूज चैनलों में धर्म

 

इस साल 4 जनवरी को तकरीबन सारा दिन कई न्यूज चैनल यही बताते-समझाते रहे कि आंशिक सूर्य ग्रहण पर क्या करें, क्या न करें। कब कौन सा मंत्र पढ़ें, क्या खाएं, क्या न खाएं, आज क्या पहनें, ग्रहण के दौरान और बाद में क्या-क्या उपाय करें। दिशाओं का बोध दिया गया और धर्मकर्म के हिसाब से लंबी विवेचनाएं की गईं।

 

ये कहानियां ऐसी रोचक-सरस और क्रमवार कर दी गईं, ग्रहण के दौरान स्नान के इतनी बार विजुअल दिखाए गए और कथित आस्थाओं के ऐसे कलश सजा दिए गए कि सचिन का अपने करियर का 51वां टेस्ट शतक पूरा करना भी टीवी चैनलों की इस बाबानुमा आपाधापी को रोक नहीं पाया। सचिन पर ब्रेकिंग न्यूज आई, फोनो, वीओ हुए और फिर ग्रहण की डुबकी लगने लगी। सचिन चैनलों पर ग्रहण के खत्म होने और बाबाओं की अपनी दुकान के समेटने के बाद ही चैनलों पर पूरी तरह से हावी हो सके।

 

क्रिसमस या नए साल की शुरूआत में भी जब देश-दुनिया में गाजे-बाजे बज रहे होते हैं और तमाम चैनल खुमारी में ठुमक रहे होते हैं, तब भी वे यह ज्ञान देने से खुद को रोक नहीं पाते कि इस साल के पहले दिन क्या करना शुभ या अशुभ होगा। किस राशि के लिए यह साल खुशियां बरसाएगा, किसके लिए मातम आने की आशंका है। फिर उपायों की झड़ी लगाई जाती है कि क्या करने या न करने से दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। कौन से रत्न कैसा कायापलट कर सकते हैं और किन रंगों से जिंदगी की कहानी ही बदल सकती है।

 

यह एक अजीब कहानी है। जिन चैनलों को खबर देने के लिए 24 घंटे का बने रहने की अनुमति दी गई थी, वे कई बार विशुद्ध खबर कम और कर्मकांड ज्यादा बताते हैं। इस काम में वे जितनी ताकत लगाते हैं, उसे देख कर कई बार आह निकलती है कि काश इतनी ताकत चैनल अपने कंटेट को परिष्कृत करने में लगा देते या फिर इतना पैसा उन पत्रकारों के कल्याण में लगा देते जो चैनल के स्वभाव के अनुरूप खबर की तलाश में दिनभर खाक छानते फिरते हैं। खबरिया चैनलों पर अध्यात्म की दुकान जब सजती है तो वह खबर की दुनिया की ही तरह त्वरित और गतिशील होती है। यहां फार्मूले जल्द बताए जाते हैं। नुस्खे आसानी से आजमाए जाने लायक और सभी को आसानी से समझ आने लायक होते हैं।

 

इसमें एक बात और मजे की है। इन्हें देखने वाले लोग खुलकर कहते नहीं कि वे इन्हें देखते हैं या बाबाओं के फार्मूलों का अनुसरण करते हैं। वे इस बात को छिपा कर रखते हैं। यहां जैसे स्टेटस आड़े आ जाता है। जैसे लगता है कि यह आधुनिक बनती छवि को खा न ले। यही वे लोग हैं जो न्यूज चैनलों की टीआरपी को उस वक्त बढ़ा देते हैं जब बाबाओं के प्रवचन चरम पर होते हैं।[7]

 

चूंकि न्यूज चैनलों पर समय का भारी दबाव रहता है और न्यूज का स्वभाव भी है तेजी, ऐसे में इन चैनलों पर धर्म भी तेजी के साथ ही चलता है। न्यूज चैनलों पर धर्म अब चामात्कारिक रूप में है। यहां धर्म मिराकल करते चलता है। धर्म की गति यहां देखने लायक है। धर्म पहले कष्टों की बात करता है और फिर तुरंत उनके निवारण के सस्ते, आसान और जल्द किए जा सकने वाले उपाय बताता है। इसलिए किसी कहानी को यहां शुरू से लेकर उसके अंत तक समेट दिया जाता है। यहां हर बात पर नुस्खे-सलाहें दी जाती हैं और मैगी नूडल्स की गति से क्विकफिक्स फार्मूले।

 

यहां सेलिब्रिटी स्टेटस भी खूब करता है। सचिन तेंदुलकर या अमिताभ बच्चन अगर सर्वदोष निवारण के लिए किसी मंदिर विशेष में कोई पूजा करवाते हैं या अनिल अंबानी अपने जन्मदिन पर उज्जैन में महाका की पूजा करवाते हैं तो यह न्यूज की स्टोरी बनने के साथ ही धर्म पर आधारित एक भरपूर कार्यकम के लायक भी बनता है। इसका सीधा असर यह भी पड़ता है कि वह मंदिर एकाएक प्रसिद्धि की ऊंचाई पर पहुंच जाता है। सेलिब्रिटी की उस मंदिर में मौजूदगी की तस्वीरें मंदिर की वास्तविक शक्ति पर जैसे मुहर लगाने का काम करती है।  

 

खबरों के गर्मागर्म मोहल्ले में धर्म अब रविवार तक ही केंद्रित नहीं है। वह चाय की चुस्की है जिसका मजा किसी भी समय लिया जा सकता है।

 

यही वजह है कि न्यूज चैनलों पर पहले दिखाए जाने वले साप्ताहिक कार्यक्रमों को अब बहुत से खबरिया चैनलों ने दैनिक कार्यक्रमों में तब्दील कर दिया है। स्टार न्यूज तो हर रोज दिन में तीन बजे समर्पण ही दिखाने लगा। इसकी लोकप्रियता को देखते हुए बाकी न्यूज चैनलों ने भी अपने कार्यक्रमों के तेवर और कलेवर बदले। इसका एक असर यह हुआ कि अब कंटेट कसा हुआ तो रहा लेकिन उसकी क्वालिटी पूरी तरह से चकाचक नहीं रही। सब जगह बस धर्म को तुरत-फुरत दिकाने की जैसे मुहिम ही चल पड़ी। कहीं जय संतोषी मां, साईं बाबा पर धारावाहिक बन गए तो कहीं दिल का द्वार, अमृत वर्षा जैसे कार्यक्रम शुरू कर दिए गए। शक्तिपीठों पर धारावाहिक चल पड़े। वैष्णो देवी को एकाएक बिजनस माडल बना दिया गया। आज तक अनजान मंदिरों को खोजबीन कर उन पर कार्यक्रम बनाने लगा। विशेष अवसरों पर मंदिरों के बाहर ओबी वैनों के हुजूम लगने लगे। ईटीवी अष्टविनायक के दर्शन कराते हुए लोगों के नाम से निजी पूजा को टीवी पर दिखाने लगा। स्टार यात्रा और गुरूकुल दिखाने लगा और सीएनईबी तो अपने चैनल पर गुरबाणी का लाइव प्रसारण ही करने लगा।

 

दर्शक की राय में

 

टीवी प्रोग्राम नहीं, दर्शक बनाता है। टीवी सामाजिक तौर पर रचा गया नाटक है। यह अभिनीत भी हो सकता है और लाइव भी। टीवी का परदा आदतों और स्वभाव को परिचालित तक कर सकता है, पूरी तरह से बदल भी सकता है। नए समीकरण मीडिया का सेवन उसकी रोज की डाइट है। वैसे भी चैनलों के लिए उत्पाद तैयार करते समय नए बाजार के बदलते स्वाद पर सबसे ज्यादा जोर रहता है। समय बदल रहा है। माना जा रहा है कि अब आध्यात्म की उम्र भी बदल गई है। अब 50 या 60 पार होने पर ही अध्यात्म याद नहीं आता। 25 के किशोर बहुत तेज उत्कंठा के साथ खुद को धर्म से जोड़ने लगे हैं और 30 को छूते-छूते तो वे पूरी तरह से धर्म में डूबने लगते हैं। वे तनाव में हैं। उनके लिए अध्यात्म शांति देने वाले आश्रम का काम करता है

 

ये चैनल दर्शक की आस्था की सीढ़ी बनते हैं, उनके भाग्विधाता होने का पुख्ता दावा करते हैं, पथ प्रदर्शक बनते हैं और एक ऐसे बादशाह के तौर पर खुद को स्थापित करते हैं जिसका खजाना खुशियों की अशर्फियों से लबालब है। घर बैठा दर्शक सरल-सुगम अंदाज में बतियाते बाबा लोगों को देखकर मंत्रमुग्ध होने लगता है।

 

शैलजा वाजपेयी इन्हें टीवी के मनोवैज्ञानिक मानती हैं। इन मनोवैज्ञानिकों के पास जैसे हर समस्या की चाबी है। ये आशा से लबालब दिखते हैं। ये वह सब शांत भाव से कहते जाते हैं जिसे युवा सुनना चाहता है।

 

अलग धर्मों के चैनल

 

धार्मिक चैनल दुनिया के अलग-अलग कोनों में अपनी पहचान का सिक्का जमाने लगे हैं। 2010 में मलेशिया में इस दिशा में एक अनूठी पहल की जाती है। अमरीका के अमरीकन आइडल और ब्रिटेन के एक्स फैक्टर जैसे रिएलिटी कार्यक्रमों की तर्ज पर मलेशिया का टीवी चैनल एस्ट्रो ओएसिस एक लाइव रिएलिटी प्रोग्राम इमाम मुदा के नाम से शुरू करता है। यह चैनल इस्लाम की जीवन पद्धति पर आधारित है। दस हफ्ते तक चलने वाले इस शो का मकसद होता है -10 युवाओं में से सबसे योग्य युवक का चयन करना जिसे कि बाद में इमाम बनाया जा सके। यहां योग्यता के मायने इस्लाम की समझ के अलावा बात-चीत, पहनावा और जनसंपर्क भी था। चैनल ने एक ऐसा इमाम तलाशने की उम्मीद जताई जिसमें पश्चिम की आधुनिकता के साथ ही धर्म को युवाओं के साथ जोड़ने की भी क्षमता होगी। यह दावा किया  गया कि इसके जरिए देश में इस्लाम की जड़ें और मजबूती हासिल करेंगीं और युवाओं का धर्म के प्रति आकर्षण बढ़ेगा। इन 10 युवाओं को 1000 प्रतियोगियों में से चुना गया था और फिर लाइव रिएलिटी शो इन्हीं 10 युवाओं पर केंद्रित कर दिया गया।  

 

एकदम ताजे कांसेप्ट से सामने आए इस शो में युवा प्रतियोगी नाचे-गाए नहीं बल्कि वे कुरान की आयतें सुनाते दिखाए गए। पहले चरण में सभी प्रतियोगियों को इस्लामी रीति-रिवाज से शव को नहलाने और दफनाने की रीति करनी पड़ी और यह शपथ भी लेनी पड़ी कि वे मलेशिया के युवकों को अनैतिक सैक्स और ड्रगों के सेवन से बचाने की कोशिश करेंगें। बाद के एक एपिसोड में इन युवाओं को एक अविवाहित गर्भवती को समझाने का दायित्व भी सौंपा गया। इस शो के प्रतियोगियो की उम्र 18 से 27 साल के बीच थी और ये हर हफ्ते बेहतरीन कपड़ों में, आत्म विश्वास से लबरेज दिखाई देते। ये धर्म और कर्म की बात करते हुए यह साबित करने की पुरजोर कोशिश करते कि वे इस्लाम के गहरे जानकार हैं। वे जानते थे कि जो जीतेगा, वो सिकंदर मलेशिया का सर्वोत्तम इमाम बना दिया जाएगा।

 

दुनिया में पहली बार किए जा रहे इस प्रयोग की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रसारण के पहले हफ्ते में ही फेसबुक पर स्टार हंट पर तकरीबन रोजाना रिपोर्टिंग करने लगा। शो के प्रशंसक मानने लगे कि इसने उदारवाद को एक रूप में सामने लाकर खड़ा किया है। दूसरे, इस बहाने मलेशिया जैसे उदारवादी देश को एक युवा और स्मार्ट इमाम मिलेगा और इससे दुनिया भर में इस्लाम में और खुलापन लाने का संदेश भी जाएगा। चैनल इस शो को एक तरह के आध्यात्मिक भोजन की तरह प्रचारित करने लगा। लेकिन ऐसे कई आलोचक भी थे जिन्होंने इस प्रयोग को गैर-इस्लामी और अ-गंभीर प्रयोग कहते हुए इसे आने वाले समय में इस्लाम की पुरानी परंपराओं के टूटने का भय जतलाया। लेकिन आलोचनाओं के परे इस शो ने जमकर टीआरपी बटोरी। शो इस्लाम से जुड़ी जानकारियों को इस बखूबी दिखाने लगा कि मलेशिया की एक बड़ी आबादी शुक्रवार की रात टीवी के सामने सिमटने लगी। अमेरिकन आइडल और इंडियन आइडल सरीखे कार्यक्रमों की तरह इस शो से भी हर हफ्ते एक प्रतियोगी बाहर किया जाता रहा। लेकिन यहां फैसले का अधिकार जनता के वोटों के बजाय एक पुराने इमाम, हसन महमूद, पर केंद्रित किया गया जो इन प्रतियोगियों को इस्लाम की कसौटियों पर कसता रहा। शो की शर्त के मुताबिक प्रतियोगियों को एक मस्जिद में सबसे अलग रख दिया गया जहां उनके पास न फोन था, न इंटरनेट और न ही टीवी, अखबार या मनोरंजन का कोई भी साधन ताकि वे अकेले में विचार मंथन कर सकें। इनकी हर हफ्ते इस्लाम को लेकर लिखित और मौखिक परीक्षाएं होती थीं।

प्राइम टाइम में दिखाए जाने वाले इस शो में प्रतियोगी सुंदर सूट पहनकर और एक पारंपरिक टोपी लगाकर आते और जमकर मुस्कुराते। इसलिए इनमें स्टार इमाम भले ही एक ही बना लेकिन बाकी के लिए निकाह के प्रस्तावों की बाढ़ लग गई। स्विस अखबार तागेसेंजर ने तो इन्हें सुपर स्टार ही कह दिया क्योंकि इन पर दुनिया भर की सैंकड़ों लड़कियों की नजरें टिकी थीं।  

आखिरकार 26 साल का असिरफ मोहम्मद रिजवान इसमें विजयी साबित हुआ और उसे ईनाम के तौर पर देश की सबसे प्रमुख मस्जिद में इमाम बनाए जाने के अलावा उसके लिए मक्का की मुफ्त यात्रा का इंतजाम किया गया, सऊदी अरब के एक विश्वविद्यालय में स्कॉलरशिप , 6400 डॉलर नकद, एक कार और एक लेपटॉप भी भेंट में दिया गया। चैनल ने बाद में इस बात पर खुशी जताई कि उनकी इस कोशिश से यह साबित हुआ कि युवाओं का धर्म में अब भी रूझान है और दूसरे यह कि वे एक युवा इमाम को पाने की से रोमांचित थे। मलेशिया की कुल आबादी का करीब 60 प्रतिशत मुसलमान हैं। ऐसे में इस इमाम हंट के नतीजों ने चैनल को काफी प्रोत्साहित किया। [8]

गॉड टीवी की आशातीत सफलता भी धर्म की सफल मार्केटिंग की एक जीवंत मिसाल है। 1995 में इंग्लैंड से शुरू हुआ गॉड टीवी अपनी शुरूआत से ही लोकप्रिय हो गया। इस चैनल की साइट आधुनिकता लिए है। इसमें पूरी तरह धार्मिक कपड़ों की जगह पाश्चात्य कपड़े पहने युवा जोड़ों की मुस्कुराती तस्वीरें हैं। इसमें डोनेशन देने की जगहें सुझाई गई हैं। अगर दर्शक चैनल के जरिए अपने लिए या अपने किसी प्रिय के लिए कोई प्रार्थना करवाना चाहता है तो उसके लिए ऑनलाइन फार्म भरने की सुविधा है। गॉड शॉप नाम के सैक्शन में चैनल की सुझाई हुई धार्मिक किताबों की सूची है। इस चैनल को देख कर लाभांवित हुए दर्शकों के कथन हैं। टेस्टीमनी के कोने में दर्शक वे घटनाएं लिख कर भेज सकते हैं जब उन्हें लगा कि ईश्वर ने उनकी मदद की। और सबसे खास बात यह है कि इस चैनल की अपनी एक कम्यूनिकेशन टीम है। साइट पर मीडिया के लिए एक आसान फार्म डाला गया है जिस पर  चैनल से संबंधित सवाल पूछ सकते हैं। टीम का दावा है कि हर सवाल का जवाब दिया जाएगा। चैनल फेसबुक और ट्विटर दोनों पर है। यानी पूरी तरह से आधुनिकता से लैस। यह चैनल अफ्रीका, एशिया, यूरोप, अमरीका और ब्रिटेन में अपनी पैठ बना चुका है।

 

इसी तरह अमरीका के शहर न्यूयार्क में शुरू हुआ ब्रिज नेटवर्क पहला ऐसा चैनल है जो अमरीका की मुस्लिम आबादी को जहन में रखकर शुरू किया गया। यहां मध्य पर्व से जुड़े समाचारों से लेकर कुरान पर किस्से-कहानियां, शैक्षिक और मनोरंजक, हर किस्म के कार्यक्रमों को देखा जा सकता है।

 

क्या है राज लोकप्रियता का

 

आखिर इन चैनलों की कामयाबी का फार्मूला था क्या। ये इतने लोकप्रिय क्यों होते चले गए। सबसे बड़ी वजह है डर। यह सारा तामझाम इंसानी फितरत की उपज है। सारा मामला डर का है। सच बात तो यह है कि खबर जितना लुभाती, सुझाती, बताती, जतलाती है, ठीक उतना ही कई बार डराती भी है। धर्म का कथित धंधा भी इसी डर की जमीन पर टिका है। यह बाहरी दुनिया में ठोस विश्वास की तलाश, आत्मविश्वास की कमी और डर के व्यापार पर टिका है। इसे गणित साबित नहीं कर सकता। यहां गणित का चुप रहना ही बेहतर है। लेकिन जिसके पास डर है, उत्कंठा है, बेचैनी की लहरें हैं, उसके लिए यह किसी संबल से कम नहीं। यही इसकी नींव है, इसका आधार है।

 

दूसरी वजह है - सामाजिक परिपाटी। उदारीकरण और वैश्विकरण के इस दौर में कई बार भारतीय समाज के विखंडित होने की बातें उठती हैं। 600 से ज्यादा चैनलों के इस देश में मनोरंजन खूब बिकता है, साथ ही बिकती है खबर भी। क्राइम, क्रिकेट और राजनीति की कॉकटेल के बीच न्यूज चैनलों में फूहड़ हास्य भी अपने पैठ बनाते जा रहे हैं। मनोरंजन के चैनल अपने अति खुलेवाद से कई बार एकल टीवी सेट के परिवारों में संकोच का भाव लाते हैं। बुजुर्गों की उपस्थिति में बिग बॉस और राखी का इंसाफ दिखाते चैनल आंखें और कान बंद करते रहने के लिए मजबूर करते हैं। ऐसे में आध्यात्मिक चैनल सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस होते हैं, फिर इनमें बड़ी चालाकी से सभी उम्र के दर्शकों के लिए सामग्री भी ऐसे करीने से सजा दी जाती है कि इन पर कुछ पल टिकना दुश्वार नहीं लगता।

 

आसानी ये कि इनके लिए अप्रवासियों का अटूट सतत सहयोग बना रहता है। इस वजह से वीडियो लाइब्रेरी बनाना भी आसान है। फिर, यहां कुछ भी बासी नहीं होता और लोग धर्म और अध्यात्म की कथित दुकान में बिक रहे उत्पाद को भी दिमाग से नहीं, दिल से देखते हैं। इसीलिए सिंगल कैमरे के शूट की सीमाओं, कच्चे शॉट्स की तमाम कमियों, तकनीकी गडमड, टेढे-मेढ़े दृश्य संयोजन य वीडियो एडिटिंग, अटपटे संगीत वगैरह को आराम से अनदेखा कर देते हैं। उनके लिए सर्वोपरि होती है भावना और शुद्धता। परखने की फुर्सत और इच्छा यहां किसी को नहीं। देखा जाए तो इस वर्ग विशेष में खर्च अठन्नी और आमदनी रूपया है। फिर यहां बाबा लोग भी आसानी से मिल जाते हैं। नए-नवेले बाबा तो अपना ब्रांड बनाने के चक्कर में खुद यहां चक्कर काटते हैं और चैनल से पैसा लेने की बजाय उन्हें पैसा देते हैं। स्टूडियो का खर्च भी न के बराबर ही रहता है। एक छोटे से कमरे को तकनीक से भरा, बाबाओं को बाबा वाले कपड़े पहनाए, ग्राफिक्स सजाए और लीजिए शूट शुरू। ब्रेकिंग न्यूज का कोई झंझट नहीं और न ही बार-बार सुपर बदलने का। लाइव फोनो में शहर के बाहर से फोन न लिए जा सक रहे हों तो अपने शहर पर टिके रहिए। कोई दिक्कत नहीं।

 

फिर यहां रिपीट भी खूब होता है। एक ही प्रवचन चारों स्लाटों को उलट-पुलट के दिखा दीजिए या फिर सुबह 8 के प्रवचन को उसी दिन दोबारा 1 बजे भी दिखा दीजिए तो भी दर्शक बिदकेगा नहीं।

 

बाबाओं का बाजार

 

टीवी पर भागती धर्म की इस रेलमपेल के चलते बाबाओं का एक नया ग्रह बस गया है। ये जनता और सियासत के पुल के साथ ही जनता और सियासत दोनों के लिए ईश्वर के पुल की तरह भी खुद को प्रस्तुत करने लगे हैं। यह ज्ञान के अथाह भंडार, कष्टों के निवारक, उपायों के उपजेता, धर्मों के ज्ञाता और शांति के स्रोत के तौर पर उभरे हैं।

 

दुनिया के हर देश में टीवी खबर और मनोरंजन का पुट बनाकर चलते हैं लेकिन अब धीरे-धीरे इनके बीच में धर्म भी फिट हो गया है। भारत में सास-बहुओं से लेकर तमाम तरह से पारिवारिक नाटकों की लंबी फौज होने के बावजूद इन चैनलों ने धारावाहिकों के बाजार को पटखनी तो दी ही है। भले ही यह किसी एक धर्म विशेष की नुमांइंदगी करते दिखें लेकिन साथ ही यह एहतियात भी बरती जाती है कि दूसरे धर्मों की गरिमा को ठेस न पहुंचे। अयोध्या और गोधरा देख चुके इस देश में धर्म का यह नया स्वरूप शोध का विषय है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सितंबर 11 और इराक को झेल चुकी दुनिया में धर्म के चैनल चैन की बांसुरी बजाने का दावा करते दिखते हैं।

 

 

 

 

ये बाबा लोग खूब कहानियां सुनाते हैं। इनकी उस भाषा पर पकड़ है जिसे जनता समझे और सराहे। ये  जानते हैं कि टीवी पर कहानी वाचन परंपरा को बनाए रखने से ही अपना झंडा टिका रहेगा। यहां सामाजिक ड्रामे की पृष्ठभूमि तय की जाती है, एजेंडा सेट किया जाता है, रूझान तय होता है और होती है काम चलाने योग्य पूंजी के आगमन की सुखदायक आश्वस्ति। ये बाबा लोग आरामदायक तकिए का काम करते हैं। वे जनता को इत्मीनान और शांति का आभास कराने की कोशिश (काफी हद तक यंत्रवत कोशिश) करते हैं। इसलिए कई बार ये टीवी पर आध्यात्मिक मनोवैज्ञानिक के तौर पर दिखने लगते हैं। [9] ये नए जमाने के धर्म के ब्रांड एंबैसेडर हैं जिनकी अनदेखी की ही नहीं जा सकती। उनके पास हर मर्ज की रेडी टू यूज की रेसिपी है।

 

लेकिन दूसरी तरफ कुछ बाबा लोग जानबूझकर डराने वाले फार्मूले पर भी काम करते हैं। वे रातों की नींद भी उड़ा सकते हैं लेकिन इसके पीछे मंशा होती है कि दर्शक उनकी शरण में आ जाए। वे दर्शक के अंदर बेचैनी पैदा करते हैं। वर्तमान से भविष्य की यात्रा को डर से भर देते हैं और यह भाव प्रवाहित करते हैं कि उनके बताए हुए पायों को लागू करे बिना और कोई चारा ही नहीं।  

 

लेकिन खुद चैनल के आका स्वीकार करते हैं कि कुछेक इसे वाकई जन सेवा की भाव से भी करते हैं। लेकिन अगर उन्हें परे कर दें तो बाबा लोगों की दुनिया किसी रोचक और रहस्यमयी फिल्मी दुनिया से कम नहीं। बाबा लोग अपने ब्रांड को बनाने और संवारने पर खूब समय लगाते हैं। यहां एक-एक कदम फूंक-फूंक कर लिया जाता है। खुद को जल्द से जल्द एक ब्रांड बनाने की बाकायदा रणनीति तय की जाती है।

 

फिल्मी सितारों की तरह इनका बड़ा सहयोगी स्टाफ होता है। एक्सलूसिव अपायमेंट देने से पहले याचक के कद और उसके जरिए कहीं पहुंचने की संभावनाओं को टटोलने के अलावा उनका बैकग्राउंड और दूसरे खेमे से संवाद की गुंजाइश की भी पड़ताल की जाती है। यहां पूरे 360 डिग्री में जनसंचार के हतियारों का इस्तेमाल किया जाता है। ये बाबा लोग अपनी इमेज के हर अंश पर नजर रखते हैं और यह भी भांपते चलते हैं कि कहीं दूसरे बाबा की कमीज उनसे ज्यादा सफेद और कलफदार तो नहीं दिखने लगी।

 

 

ये बाबा लोग नई तकनीक के ज्ञानी हैं। ये फेसबुक ट्विटर लिंकड इन, ईमेल, स्काइप इनका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। ये पीआर का महत्व भी जानते हैं और अपने संपर्कों की फेहरिस्त की लंबाई को फटाफट बढ़ाते जाने के जादू को समझते हैं। लोकल, नेशनल, इंटरनेशनल सभी की जरूरतों से  ये वाकिफ हैं। कस्बे का विधाक हो या राज्य का मुख्यमंत्री, देश का प्रधानमंत्री हो या अमरीका का राष्ट्रपति कोशिश होती है कि उन्हें किसी न किसी तरह अपने खेमे की तरफ खींच लिया जाए। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। इन्हें खींचते समय इस बात पर भी तवज्जो दी जाती है कि उनकी उपस्थिति की व्यापक कवरेज और चर्चा हो। सिर नवाते वाजपेयी का पुराना शॉट या साष्टांग प्रणाम करती वसुंधरा राजे इन तस्वीरों को बार-बार किसी दीवार में चिपका दिया जाता है। किसी सेलिब्रेटी के बटे-बेंटी की शादी में आशीर्वाद देते बाबा की तस्वीर भी खूब काम की होती है। इससे मार्केट वैल्यू कई गुणा बढ़ जाती है।

 

इस मुकाम तक पहुंचने के लिए इन बाबा लोग ने भरपूर तैयारी की है। यह स्टारडम कई पापड़ बेलने  के बाद नसीब हुआ है।

 

लेकिन बाबा लोगों की निजी जिंदगी की परतें आसानी से खुलती नहीं। न ही पता चल पाता है उन्हें मिलने वाले चंदे का वजन। यह जानना असंभव-सा होता है कि बाबा लोगों और उनके स्टाफ और खास चेलों की अनवरत विदेशी यात्राओं के खर्च किस खजाने से चल कर वहां तक आता है।

 

इनके आश्रमों में राजनीतिक समीकरण भी तय होते हैं। इनका राजनीतिक दायरा कई बार इस कदर गहरा हो जाता है कि ये बड़ी-बड़ी कुर्सियों की उठक-पठक में मौन ही मौन में बड़े खेल रच जाते हैं। इशारों में बातें हो जाती हैं और ये बातें राडिया से भी जरा आगे की बातें होती हैं पर लीक नहीं होतीं। बड़ी वजह इसका एक सुरक्षित क्षेत्र में होना ही है।

 

यह एक दूसरे किस्म बॉलीवुड है। यहां बाबानुमा स्टारों की मंडी लगी है। सब का रेट कार्ड बना हुआ है। यह रेट कार्ड पब्लिक नहीं होता लेकिन पब्लिक इसे लेकर कयास लगाने के लिए आजाद है। यह जीवंत स्टार हैं। कई मामलों में बालीवुडी सितारों से भी आगे क्योंकि वे भी तो इनके दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं लेकिन ये वहां नहीं जाते। इनका स्टारडम रहस्य और हैरानी का विषय बना रहता है लेकिन इन पर ज्यादा छींटे नहीं पड़ते, इनके प्रेम-प्रसंगों के किस्से छपते नहीं क्योंकि यहां का मामला काफी नाजुक है।

 

 

तो शुरूआती दिनों में कई बाबा लोग चैनलों के चक्कर काटा करते थे। टीवी पर नयनाभिराम दिखने के लिए ट्रेनिंग लिया करते थे। अपने ज्योतिषी ज्ञान को मांझा करते थे। वैसे तो ज्यादातर चैनलों में नए गुरूओं के ज्ञान को मापने का कोई थर्मामीटर होता नहीं लेकिन कुछ चैनल अपवाद जरूर हैं। जैसे कि आज तक के न्यूज डायरेक्टर और भारतीय टीवी के वरिष्ठतम टीवी कर्मियों में से एक क़मर वहीद नक़वी खुद ज्योतिष के एक बड़े जानकार हैं और गोल्ड मेडलिस्ट हैं। वे बाबाओं को टीवी पर लाने से पहले खुद उनका टेस्ट ले लेते हैं। उन्हें तमाम कसौटियों पर कसा जाता है और खरे उतरने पर ही उन्हें ऑन एयर जाने का सौभाग्य मिलता है। लेकिन यह महारत शायद किसी भी और खबरिया चैनल के टॉप अधिकारी के पास नहीं है। कई जगहों पर बाबाओं का चोगा, उनका स्टाइल और वाक्पटुता ही बड़ी भूमिका निभाती है। बाबाओं को चुने जाने के बाद उनके कपड़ों पर खास काम किया जाता है। मोटी माला, अंगूठियां, रत्न धारण किए, दिव्य से लगते आकर्षक गेट-अप वाले पंडितों को शायद जनता भी पसंद करती है। इसलिए उन्हें हर लिहाज से दर्शक-फेंडली बनाया जाता है।

 

लेकिन मजे की बात यह है कि जो चैनल ब्रांड बनाता है, वही कई बार पोल-खोल भी कर देता है। आज तक अपने क्रीएट किए हुए शनिधाम दाती महाराज के खिलाफ सुबूत मिलने पर उन्हीं के खिलाफ  स्ट्रिंग भी कर देता है। आसाराम बापू के आश्रम में हुई संदिग्ध मौत को भी चैनल दिखाते हैं और समय-समय पर कई आश्रमों में होने वाले सेक्स स्कैंडल भी।

 

बाबाओं की कई परतें हो सकती हैं। एक परत में बाबा रामदेव, आसाराम बापू, श्री श्री रविशंकर, पंडित रवि प्रकाश, माता अमृतानंदमयी हो सकते हैं तो दूसरी तरफ दीपक चोपड़ा, शिव खेड़ा, अनिल कुमार, विकास मलकानी हो सकते हैं जो अंग्रेजी में मोटिवेशनल स्पीच देते हैं और अक्सर अपने नाम के साथ गुरू शब्द का जोड़ा जाना पसंद करते हैं, तीसरे में अध्यापक श्रेणी के वक्ता हैं। जैसे कि आज तक में ऐसे कार्यक्रम करने वाले पंडित एस गणेश और दीपक कपूर सालों से दिल्ली के भारतीय विद्या भवन में पढ़ा रहे हैं। पवन सिंहा दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं जबकि सुरेश कौशल सरकारी नौकरी से वीआरएस लेने के बाद इस काम में जुटे हैं। ऐसे लोगों के बायोडेटा पहले से ही मजबूत होते हैं। उनकी बताई भविष्यवाणी सही होती है या नहीं, यह दूसरी बात है लेकिन यह जरूर है कि उनकी गंभीरता पर कोई सवाल नहीं खड़े कर सकता।

 

बरेली के बाजार में धर्म का झुमका

 

बहुत से बाबाओं का संसार उजलेपन पर विश्वास को पुख्ता करता है। कई सकारात्मक बाबाओं के इस राशि मिलन से समाज की किस्मत की लकीरों पर पड़ने वाला असर साफ दिखाई देता है। फीका पड़ता योग का बाजार जैसे फिर से जी उठा है। कपाल भाति, सूर्य नमस्कार, कुंजल एसएमएस युगीन दुनिया की रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन गए हैं। यह शब्दकोष में फिर से झाड़-पोंछ के बाद मजबूती से उभरे हुए अक्षर हैं। पिज्जा संस्कृति के लिए चुनौती बनकर खड़े हुए हैं। बूढ़े सुबह पार्कों में ठहठहा लगाते हैं। युवा मैदे से परहेज करते हैं। शांति की तलाश में वे बाबा लोगों से मिलने को आतुर रहते हैं और दफ्तर से समय मिलते ही लैपटॉप के आगे बैठकर ध्यान लगा लेते हैं। सेहत को लेकर जागरूकता की जबरस्त लहर चल पड़ी है। सेहत को विज्ञान और मनोविज्ञान से जोड़कर देखा जाने लगा है। पश्चिम से एक बयार भी भारत की तरफ उठ आई है। आश्रमों में गोरी चमड़ी वाले कतारों में दिखने लगे हैं जेब में विदेशी मुद्रा भर कर भजनों पर झूमते हुए। इन मुद्राओं ने आश्रमों और बबाओं दोनों के ही दिन फेर दिए हैं।

 

इसका एक मजेदार असर यह भी पड़ा कि जिन भारतीयों को पश्चिम नयनाभिराम लगने लगा था, वे भी हवा को उलटी दिशा में बहते देख अपने गिरेबां में झांक इस दिव्य ज्योति को नमन करने लगे। उन्हें भी ख्याल हो आया है कि भारत सफेद कबूतरों का देश रहा है। धर्म के इस भव्य, मोबाइल और स्मार्ट होते बाजार ने कई बार ऐसे शानदार नुस्खे दिए हैं जिसने व्यकितगत लाभ भले ही न दिए हों लेकिन मानव-पशु जाति का कुछ उद्धार जरूर किया है, साथ ही पर्यावरण का भी। गाय,काले कुत्ते या चिड़िया को रोटी खिलाना, किसी जरूरतमंद का पेट भरना, तुलसी के पौधे या पीपल के पेड़ को पानी देना यह सब यह सब उन पुरानी मान्यताओं की तरफ लोगों को मोड़ते हैं जो ग्लोबल दुनिया जाने कब की भूल गई होती।

 

                 

लेकिन यहां कई पेच भी हैं। पहला पेच तो धन का ही है। बहुत से गुरूओं के मामले में यह जानना कुएं में छलांग लगाकर बालटी में पानी लाने जैसा ही है कि यहां आने वाली दान की राशि किन स्रोतों से, कब और किन-किन कारणों से आती है। फिर उनका खर्च कैसे और कहां होता है और तीसरे उन पर कोई टैक्स, अगर बनता है, तो क्या वह अदा किया जाता है या नहीं। टीवी पर राशिफल बताने वाले कई गुरू चैनल को पैसा देते हैं और इसके बदले में उनका फोन नंबर टीवी पर बार-बार बताया जाता है। ये गुरू अपना ज्ञान देने से पहले याचक को अपनी फीस बताते हैं और फिर पैसा सीधे अपने अकाउंट में मंगवाते हैं। उसके बाद कहानी आगे बढ़ती है। लेकिन इस तमाम फीस के बाद किसी काम के होने की कोई गारंटी नहीं और न ही काम न होने पर फीस के वापिस मिलने के कोई आसार।

 

लेकिन एक मामला इन सबसे बड़ा है। वह है आरोपों का। आश्रमों के सेक्स के अखाड़े बनने से लेकर हत्याओं, जोर-जबरदस्ती, अपहरण और भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगते रहे हैं। चाहे आसाराम बापू के आश्रम में चार लोगों की रहस्यमयी मौत का मामला हो या फिर बाबा रामदव पर गुरू शंकर देव की हत्या पर शक या स्वामी नित्यानंद का सेक्स स्केंडल, ये सारे मामले उजले कपड़ों पर छींटे डालते हैं। न्यूज चैनल भी इन पर सीधे हाथ डालने में थोड़ा डरते हैं, ठीक उसी तरह जैसे क बाबा लोगों का संवाद भी नाप-तौल के कई पैमानों से होकर गुजरता है। इन बाबा लोगों ने शुरूआती दिनों में कोक और पेप्सी पर भी ताने कसे लेकिन वे जान गए कि कारपोरेट जगत को नाराज न करने में ही भलाई है।

   

इन सबके बीच नैतकिता के दायरे से कई सवाल उभर कर आते हैं। यह बात जरूर सोचने की है कि क्या जरूरत से ज्यादा परोसे जाने वाला यह डर, विश्वास या अंधविश्वास न्यूज चैनलों के कर्तव्यों की परिधि में आता है। बाबा लोगों के पास धार्मिक चैनलों का प्लैटफार्म है ही और वे ब्रांड एंबैसेडर के तौर पर वहां अपना तंबू तान कर दिन भर बैठते भी हैं। ऐसे में न्यूज चैनलों को क्या अपनी खुद की गढ़ी इस मजबूरी से बाहर आने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कभी राजू का मसखरापन तो कभी राखी की नौटंकी दिखाते इन चैनलों को क्या अब न्यूजवाला बने रहने का पाठ दोबारा याद करने की जरूरत तो नहीं। क्या अब यह सोचने का वक्त नहीं है कि उन्हें अब वही करना चाहिए जिसके लिए भारत सरकार ने उन्हें लाइसेंस दे रखा है।

 

 

दुनिया में ज्यादातर लड़ाइयां विवाद धर्म और धन की वजह से ही हुए हैं। सितंबर 11 की तस्वीरों का भी असर अब भी पूरी दुनिया पर है। लोग इराक को भूले नहीं है। ऐसे माहौल में धर्म और आध्यात्म के बाजार ने अभी अपने पंख खोलने शुरू ही किए हैं। इसके लिए बाजार भी है, पैसा भी, अवसर भी, प्रोत्साहन भी। लेकिन नीयत में नेकनियती का भाव कितना है, इसे तौला नहीं जा सकता। धर्म का पैकेज आकर्षक लिफाफों में लिपट कर सामने है। बाजार चलाने वाले बखूबी जानते हैं कि तमाम चैनलों का मजाक उड़ाता रिमोट जब अध्यात्म पर पहुंचता है तो विश्लेषण का बटन बंद हो जाता है। आस्था के इसी फार्मूले पर यह चैनल टिके हैं और लंबे समय तक टिके रहेंगें लेकिन यहां सवालों की नई फसलें भी पैदा होती जा रही हैं। यह सवाल तीखे हैं। जनता को पूछने में हिचक है जबकि पूछने की ताकत रखने वाला मीडिया खुद ही राडियानामे के चलते मुंह लटकाए खड़ा है।

 

(यह लेख कथादेश की मीडिया वार्षिकी में अप्रैल 2011 को प्रकाशित हुआ है)



संदर्भ- [1] बुद्धू बक्से के जादू का आगाज़
20 Jul 2008, 0000 hrs IST,
नवभारत टाइम्स, प्रस्तुति- आलोक सिंह भदौरिया

[2] नवभारत भदौरिया

[6] http://www.televisionpoint.c>om/news2007/newsfullstory.php?id=1177604273

[7] (खबरों के माध्यम पर लगा सूर्यग्रहण, वर्तिका नन्दा,दैनिक हिंदुस्तान,9 जनवरी, 2011 )



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Dr Vartika Nanda
Head, Department of Journalism
Lady Shri Ram College
New Delhi

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