Nov 25, 2010

गोवा की शादी


 

दिल्ली से गोवा की फ्लाइट के चलने में अभी कुछ समय बाकी है। तभी एक नजारा मिलता है। पहले दो  कर्मचारीनुमा लोग दो अलग-अलग सूट थामे हुए सावधानी से चलते हुए, फिर करीब 30 लोगों का एक परिवार जैसा एक काफिला और उनके एक कोने में ठसक के साथ चलते हुए दो पंडित। पंडितों को देखते ही मामला समझ में आ जाता है। यह लड़के की बारात है।

 

फ्लाइट चलती है। बाराती रास्ते भर कुछ नहीं खाते(क्योंकि कुछ फ्लाइटों में खाने का पैसे खर्च होते हैं) हां, खुसफुसाहट जरूर कानों में पड़ती है कि वहां का इतजाम कैसा शानदार होगा।

 

गोवा आते ही कारवां खुशी से बाहर आता है। बेहद सावधानी से दूल्हे के कपड़े उठाए उन दोनों कर्मचारियों से मैं पूछती हूं क्यों भइया, इतने ध्यान से क्या उठाए हुए है। वे शर्मा कर कहते हैं (गोया यह शादी उन्हीं की हो) कि ये भइया जी के कपड़े हैं, उनकी शादी है। मेरा मन अभी भरा नहीं है। अबकी मैं पूछ बैठती हूं, भइया कपड़े बहुत महंगे हैं क्या। उनमें से एक शर्मा कर फिर से कहता है हां, बहुत महंगे हैं।

 

खैर,एयरपोर्ट पर बारातियों का भव्य स्वागत होता है। बताया जाता है कि उनके लिए गोवा के एक शानदार होटल में चार दिन और तीन रात ठहरने का इंतजाम किया गया है। जाहिर है खर्चा लड़की वालों का ही है। एक बाराती कहता है कि इंतजाम तो खास होना ही है जी। इतना तो बनता ही है। बाराती एक विशालकाय बस में जाते हैं। प्रस्तावित दूलहा अपने दोस्ते के साथ एक बड़ी कार में। एक-एक पल की वीडियो रिकार्डिंग होती है। लड़के के बैठने, हाथ हिलाने, हंसने सभी की।

 

 

यह कारपोरेट शादी है। यहां सब कुछ पैकेज में मिलता है। हवाई यात्रा, ठहरना, खाना-पीना, घूमना, लौटते में सोने के सिक्के पाना यह सब पैकेज का हिस्सा है। मैनें तो शादी से पहले के आयोजन की एक झलक भर ही देखी, शादी में जाने क्या हुआ होगा। लाजपतनगर के एक दुकानदार की बेटे की शादी के लिए जब यह पैकेज देखा तो सोचना पड़ा कि आजकल नेताओं, सरकारी अफसरों, बड़े व्यापारियों के बेटों के लिए जाने कैसे पैकेज होते होंगा। क्या हम वाकई तरक्की कर रहे हैं? वैसे सीबीआई है कहां और कहां है इंकम टैक्स विभाग? क्या यह विभाग उन्हीं लोगों को डराने के लिए हैं जिनके पास इंकम कम और डर ज्यादा है?

Nov 18, 2010

आखिर कहां है कला के लिए जगह

 

10 दिनों तक कवरेज कामनवेल्थ गेम्स के आस-पास घूमती रही। एतराज इस पर नहीं है। पर इस बात पर एतराज करने का हक तो बनता ही है कि इस कवरेज में मीडिया, खास तौर से इलेक्ट्रानिक मीडिया इस कदर लोटपोट रहा कि दिल्ली में हो रहे बहुत से  दूसरे जरूरी उत्सव उसने तकरीबन नजरअंदाज ही कर दिए। खेल महाउत्सव तो थे लेकिन उसके साए में लगा कि जैसे कवरेज का संसार भी सीमित हो गया। संगीत नाटक अकादेमी का देशपर्व इसका सटीक उदाहरण है। 10 दिन तक चले इस उत्सव को 5 हिस्सों में बांटा गया। कुलवर्णिका, नृत्य रूपा, देसज, नाट्य दर्शन और संगीत मार्ग। सभी का मकसद कलाकारों को राष्ट्रीय मंच मुहैया कराना और उन्हें प्रोत्साहित करना था। 10 दिनों तक चले इस उत्सव में करीब 1500 कलाकारों ने कला की कई ऐसी विधाएं ऐसे अद्भुत ढंग से प्रस्तुत कीं कि कई बार दर्शक खुशी के चरम को महसूस करते दिखे। संगीत, नृत्य और नाटक की भारत की इस राष्ट्रीय अकादेमी की स्थापना1952 में हुई थी और तब से यह भारत के सांस्कृतिक कलेवर में रंग भर रहा है।     

 

इसी तरह दिल्ली की साहित्य अकादमी ने कामनवेल्थ गेम्स देखते हुए दो दिवसीय राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का आयोजन किया। मीडिया यहां भी तकरीबन नदारद दिखा। इंडिया इंटरनेशनल और हैबिटैट सेंटर दो हफ्तों में कई किताबों के विमोचन करने में व्यस्त रहे लेकिन वहां भी कवरेज का हाल तकरीबन यही रहा। हां, श्री राम कला केंद्र की हर साल होने वाली रामलीला को ठीक-ठाक कवरेज जरूर नसीब हुआ।

 

 

दरअसल कवरेज का ताल्लुक सीधे इस बात से होता है कि उसकी कवरेज की अनुमति देने वाले का खुद का रूझान किसमें है और कवरेज के लिए कही जा रही घटना में टीआरपी बटोरने की कितनी ताकत है। आम तौर पर कवरेज का नियंत्रण अपने हाथ में रखने वाले आका कलाकार नहीं, पत्रकार ही होते हैं, इसलिए यहां खबर का पलड़ा भारी पड़ता है। लेकिन अगर आका के चाहने पर कवरेज हो जाए तो उस कवरेज को चलाने का अधिकार आउटपुट वाले के पास होता है जो इन्हीं मापदंडों के हिसाब से चयन करता  है। नतीजतन कला और कलाकार के बड़ी खबर बनने के आसार आम तौर पर पस्त ही होते हैं, बशर्ते उस दिन राजनीतिक, खेल या दूसरे बड़े हलकों से बड़ी खबर की पैदावर न हुई हो। दूसरे, यह भी कि कला की बीट को कवर करने वाले कई बार ऐसी हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं कि कांग्रेस या भाजपा कवर कर रहे रिपोर्टर की अदनी सी खबर के आगे अपनी स्टोरी को जगह दिलाने के लिए पूरी तरह जिरह नहीं कर पाते।

 

 

तो क्या इसका मतलब यह माना जाए कि नया थियेटर की नगीन तनवीर को तभी जाना जाएगा जब वे पीपली लाइव में चोला माटी के राम गाएंगी और लोग उस आवाज को बड़े परदे पर सुनेंगे। तब तक 30 साल की यात्रा के सहभागी सिर्फ वो मुट्ठी भर लोग होंगें जो साल दर साल ऐसे कलाकारों को मंच पर देख कर हैरानी और खुशी के भाव से बाहर आया करेगें। तो क्या कला की दुनिया को कवरेज के लिए किसी ऐसे फीके दिन का इंतजार करना होगा जिस दिन कोई न्यूज ब्रेक न हो और खबर का बाजार मंदा पड़ा हो।

 

इस तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि सांस्कृतिक बाजार को लेकर प्रिंट और उससे भी ज्यादा वेबमीडिया में काफी सरोकार दिखाई देता है।गेम्स को लेकर लगातार बनी अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बीच भी वेब मीडियाकाफी हद तक अपने संतुलन को बनाए रखने में कायम रहा है। ब्लागरों की नई उपजी फौज चहुंमुखी कवरेज में भरपूर मुस्तैद दिखती रही। हां, उनकी तुलना टीवी या प्रिंट से करना सही नहीं क्योंकि वहां पैसे की ऐसी बंदिश होती नहीं, इसलिए वो आजादी लुभावनी भी लगती है।   

 

असल में हर माध्यम की अपनी उपयोगिता और अपनी सीमाएं हैं। इसलिए समुचित कवरेज न पाने वालों को भी नए सिरे से इस बात का अवलोकन करना चाहिए कि कौन से ऐसे माध्यम ईजाद किए जाएं जिनके जरिए सूचना का संप्रेषण सटीक, तुरंत और ज्यादा कारगर हो। कला का क्षेत्र प्रयोगधर्मिता का क्षेत्र है। जब मंच के हर कोण में प्रयोगधर्मिता के नए फार्मूले ईजाद किए जा सकते हैं तो फिर कवरेज को लेकर क्या परहेज।

 

(यह लेख 24 अक्तूबर, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)

 


स्त्री

 

कविता का ये दरवाजा नितांत निजी तरफ जाता है

मत आओ यहां

बाहर इनकी हवा आएगी नहीं

अंदर सुखी हैं ये अपनी गलबहियों में

 

ये कविताएं बुहार रहीं हैं अंदर आंगन

बतिया रही हैं आपस में

कुछ कर रहीं हैं गेहूं की छटाई

कुछ चरखे पर कात रही हैं सूत

और कोई लगाती लिपस्टिक सूरज को बनाए आईना

 

 

अंदर बहुत चेहरे हैं

शायद मायावी लगें ये तुम्हें

अंदर जंगल हैं कई, झीलें, नदियां, उपवन, शहर, गंवीली गलियां

कमल, फूल, सब्जियां और चरती-फकफकती बकरियां भी

 

इन संसार का नक्शा किसी देश के किसी मंत्रालय ने पास नहीं किया

यहां की लय, थरकन, स्पंदन दूसरा ही है

कहीं तुम अंदर आए

तो साथ चली आएगी बाहर की बिनबुलाई हवा

बंध जाएंगे यहां के सुखी झूले

 

स्त्री के अंदर की दुनिया

अंदर ही बुनी जाती है

रोज दर रोज

दस्तावेज नहीं मिलेंगें इनके कहीं

मिलेगी सिर्फ पायल की गूंज

ठकठकाते दिलों की धड़कन

खिलखिलाते चेहरे

सपनों की गठरियां

और उनके कहीं भीतर जाकर चिपके

बहुत से आंसू

Nov 3, 2010

गुल्लक

 

हवा रोज जैसी ही थी

लेकिन उस रोज हुआ कुछ यूं

कि हथेली फैला दी और कर दी झटके से बंद

हवा के चंद अंश आएं होंगे शायद हथेली में

गुदगुदाए

फिर हो गए उड़नछू वहीं, जहां से आए थे

 

फूल भी क्यारी में रोज की तरह ही थे

लेकिन उस रोज जाने क्यों

एक पत्ते को उंगलियों में लिया

किताब की गोद में सुला दिया

लिख दिया उस पर तारीख, महीना, साल

पत्ता इतिहास हुआ पर दे गया कोई सुकून

कि जैसे

इतिहास को बांध लिया हो किताब की कब्र में

 

पल भी कई बार ऐसे ही समेटे कई बार

याद है शादी का वो अलबम

पहली किलकारी की तस्वीरें

होश में आते दिनों के ठुमकते दिन

 

मौसमों को भी कई बार बाहुपाश में समेटा

सर्द दोपहर की घाघरे सी फैली धूप में

बाहर बैठे

कैसे बातें लिपटती गईं थीं

इतिहास की तह में जाकर भी

वो दोपहरें आबाद थीं

 

जाने क्यों इस जीवन को छोड़ने का मन ही नहीं करता