Dec 6, 2011

औरत

सड़क किनारे खड़ी औरत
कभी अकेले नहीं होती
उसका साया होती है मजबूरी
आंचल के दुख
मन में छिपे बहुत से रहस्य

औरत अकेली होकर भी
कहीं अकेली नहीं होती

सींचे हुए परिवार की यादें
सूखे बहुत से पत्ते
छीने गए सुख
छीली गई आत्मा

सब कुछ होता है
ठगी गई औरत के साथ

औरत के पास
अपने बहुत से सच होते हैं
उसके नमक होते शुरीर में घुले हुए

किसी से संवाद नहीं होता
समय के आगे थकी इस औरत का

सहारे की तलाश में
मरूस्थल में मटकी लिए चलती यह औरत
सांस भी डर कर लेती है
फिर भी
जरूरत के तमाम पलों में
अपनी होती है

7 comments:

नवीन रांगियाल said...

उसके नमक होते हैं शरीर में घुले हुए ... बहुत सुन्दर है कविता... , औरत के सवालों और जवाबों दोनों के साथ ... इसलिए कुछ कहना मुश्किल है.

अविनाश वाचस्पति said...

बोले तो बिंदास
पर इससे राह खुलें
नए विचारों की
माफिक बने कुछ
अच्‍छा होने लगे
मन प्रसन्‍न होगा
पर आस बनी रहेगी
विश्‍वास जुटा रहेगा
जिसने लुटना है
जिसने लूटना है
वह भी जारी रहेगा
इस पर चाहिए विराम।

sudhanshu chouhan said...

उम्दा... कविता....

सुभाष नीरव said...

वर्तिका जी,बहुत सच्चाई लिए हुए है आपकी यह कविता ! सच, औरत कभी अकेली नहीं होती…

sunil said...

very nice thoughts.........

Ashwini Kumar said...

औरत का इतना बेचारा सा, मजबूर सा चित्रण ठीक नहीं... हमारा समाज तब तक औरत को उसकी मर्यादित जगह नहीं देगा जब तक वो ख़ुद को मजबूर समझेगी... आपकी कविता शैली अच्छी है, जैसा कि पहले की कुछ कविताओं से जान पड़ा ... लिखते रहिये ... आप उम्दा लिखती हैं

नंद भारद्वाज said...

"औरत के पास / अपने बहुत से सच होते हैं /
उसके नमक होते शुरीर में घुले हुए" बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है, वर्तिका। औरत के आत्मिक संघर्ष को आपने बेहतर शब्द दिये हैं।