Oct 29, 2010

पाकिस्तान, आतंकवाद और सूचना मंत्रालय


 

1980 के आस-पास के सालों में पंजाब के छोटे-से शहर फिरोजपुर में रहते हुए एक छवि जो मन में बसी, वो आज भी कायम है। वो छवि थी चुस्त-दुरूस्त पीटीवी यानी पाकिस्तान टीवी की। पीटीवी पंजाब में बहुत लोकप्रिय था। दूरदर्शन से भी ज्यादा। मनोरंजन के नाम पर पाकिस्तान टीवी पर भरपूर सामान रहता था लेकिन इसी के साथ जो चौंकाता था,वो था पीटीवी पर भारतविरोधी बयानबाजी। पीटीवी के समाचारों के बड़ा हिस्सा भारत के ही नाम रहता और वो एकतरफा भड़काऊ पक्ष बड़ी महारत से रखता। दूसरी तरफ भारतीय दूरदर्शन के शाम के क्षेत्रीय समाचार और रात के राष्ट्रीय समाचार संतुलित पक्ष तो देते लेकिन बेहद थके और ऊबाऊ लगते।

 

इस बात पर इतनी हैरानी नहीं होती जितनी इस पर होती है कि पिछले 30सालों से भारत का सूचना प्रसारण मंत्रालय आज भी इस भारत विरोधी मुहिम से बचने का कोई कारगर तरीका खोज नहीं पाया है।

 

 

ताजा खबर के मुताबिक मंत्रालय अब फिर सक्रिय हो उठा है। मंत्रालय को आभास है कि पड़ोसी देशों की सीमा से सटे इलाकों और नक्सल प्रभावित राज्यों में प्रसारण दे रहे दूरदर्शन और आकाशवाणी को आतंकवादी और माओवादी लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। इनसे निपटने के लिए अब केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय एक रणनीति तैयार कर रहा है। देश भर से मिली रिपोर्टों के आधार पर मंत्रालय अब इस सच को स्वीकार कर चुका है कि सीमापार से आतंकवाद झेल रहे जम्मू कश्मीर सहित पंजाब, अरूणाचल प्रदेश, मघालय, असम और नक्सल प्रभावित छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार के संवेदनशील जिलों में मंत्रालय को अब अतिरिक्त मुस्तैदी दिखानी होगी। इसके लिए दो स्तरों पर तैयारी की जा रही है। पहली एक विस्तृत रणनीति बनाते हुए दूरदर्शन और आकाशवाणी के एफएम रेडियो को नए सिरे से तैयारी करते हुए रौडमैप बनाने का काम सौंप दिया गया है। दूसरे, टीवी और रेडियो सिग्नल के माध्यम से प्रसारित हो रहे देश विरोधी अभियान को ब्लॉक करने की कारर्वाई पर गंभीर चिंतन किया जा रहा है। मंत्रालय अवगत है कि पीटीवी और पाक रेडियो के जरिए सीमावर्ती इलाकों में भारत विरोधी कार्यक्रम प्रसारित हो रहे हैं। लेकिन चिंता सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। सरकार के गले का फांस बने हुए नक्सली भी अब सूचना तकनीक में माहिर होने लगे हैं। नतीजतन वे अपने रेडियो स्टेशनों के जरिए पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जिलों में अपनी मर्जी के मुताबिक कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं। इससे निपटने के लिए मंत्रालय ने हाई पावर ट्रासमीटर लगाने की पहल कर दी है।

 

इसी कड़ी में नौशेरा, श्रीनगर, सोपोर, जम्मू लेह, राजौरी में भी ट्रांसमीटर लगाने का काम शुरू हो गया है। अरूणाचल प्रदेश, असम और मेघालय के कुछ जिलों में भी दस वॉट की क्षमता वाले ट्रांसमीटर लगाए जाएंगें। इनसे दूरदर्शन और आकाशवाणी के सिग्नल पहले से बेहतर होगें ही, साथ ही विरोधी तत्वों के लिए इन्हें क्षीण करना असंभव होगा।

 

लेकिन इन कदमों से ज्यादा अकलमंदी मंत्रालय के इस कदम में दिखाई देती है कि अब नक्सलग्रस्त इलाकों में कम्युनिटी रेडियो के पनपने का बेहतर माहौल बनाया जाएगा। इन राज्यों में इस साल के अंत तक 100 से ज्यादा ब्रॉडकास्टिंग टावर स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय ब्रॉडकास्टिंग को ज्यादा लोकप्रिय बनाने के लिए ही जम्मू कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों में डीडी की डीटीएच सेवा को घर-घर पहुंचाने के लिए मुफ्त में सेट टॉप बॉक्स भी बांटे जा रहे हैं।

 

लेकिन असल मुद्दा दूरदर्शन-आकाशवाणी को लोगों तक पहुंचाना और विरोधियों के प्रसारण को रोकने भर से हल होने वाला नहीं है। मंत्रालय को अब यह समझ लेना होगा कि लोग सरकारी चैनल को तब ही देखेंगें जब उनमें चुस्ती,फुर्ती और बदलते समय के साथ चलने का दम-खम होगा। इतने सालों से सरकारी चैनल सत्तारूढ़ सरकार की प्यारी गुल्लक की तरह ही देखे जाते रहे हैं और मामला यहीं आकर पस्त पड़ जाता है।   

  

(यह लेख 25 अक्तूबर, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

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