Feb 7, 2011

भावनाओं की अभिव्यक्ति की उम्मीदें

 

उत्सव 8 फरवरी तक न्यायिक हिरासत में है। उस पर हत्या की कोशिश का मामला दायर हो चुका है। राजेश तलवार पर हमला करने के बाद जब उसे गाजियाबाद की डासना जेल में लाया गया तो उसने जेल अधिकारियों से जानना चाहा कि निठारी का मुख्य आरोपी मोनिंदर सिंह पंढेर जेल में कहां पर है। उसके इतने पूछने भर से जेल अधिकारियों के पसीने छूट गए क्योंकि पंढेर इसी जेल में है। उत्सव की दिमागी हालत को देखते हुए उसे जेल के अस्पताल में रखा गया है जहां पंढेर को भी इंसुलिन के इंजेक्शन के लिए नियमित तौर पर लाया जाता है। मजे की बात यह है कि अब जेल अधिकारी बाकी कामों के अलावा इस काम में खास तौर पर लगे हैं कि उत्सव और पंढेर का आमना-सामना कतई न हो और अगर हो भी जाए तो उत्सव को पढेर से कम से कम 50 मीटर की दूरी पर रखा जाए।

 

इस बीच एक और दिलचस्प बात हुई है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डाइन ने यह साफ कर दिया है कि वह उत्सव पर किसी भी तरह की कारर्वाई करने के मूड में नहीं है और दूसरी तरफ सोशल नेटवर्किंग साइट्स में उत्सव एक हीरो के तौर पर उभर कर आ गया है। बहुत से युवा उसकी हिमायत में सामने आए हैं और उन्होंने उत्सव की इस कथित हिम्मत की दाद दी है। उनके लिए उत्सव वह क्रांतिकारी है जिसके जिस्म में अब भी गर्म लहू बहता है और जो समाज की दीमक खाती व्यवस्था के खिलाफ बगावती होकर खड़ा हो गया है।

 

लेकिन यह बात भी है कि कानून को हाथ में लेने की हिमायत तो नहीं की जा सकती और न ही आरोप के साबित होने तक किसी को भी गुनहगार कहा या माना जाना चाहिए पर इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था बहुत ही धीमे रफ्तार से आगे बढ़ती है। एक साइट में किसी युवा की टिप्पणी थी मुझे हैरानी नहीं होगी अगर डीजीपी राठोर को 2 साल की और उत्सव शर्मा को 10 साल की सजा दे दी जाए। यह व्यवस्था पर एक क्रूर टिप्पणी है और यह भी एक विद्रूप सच है कि व्यवस्थाएं इन तीखी टिप्पणियों से आसानी से विचलित होती भी नहीं।

 

ढाई साल से चल रहे आरूषि कांड में उत्सव जब फारसे के हमले के साथ खबर के बीच मैदान पर उतर आता है तो खुद खबरें भी जैसे एक पल के लिए सकपका जाती हैं। उत्सव किसी फिल्म का किरदार नहीं है, वह हकीकी दुनिया का एक युवा नायक है जो उद्वेलित है। वह खबरों को गौर से देखता है। खबर में छिपी हुई खबर को पहचानता है और ढीली पड़ती न्यायिक व्यवस्था पर हाथ मसोस कर बैठ जाने की बजाय अपने गुस्से को ज्वालामुखी की तरह फटने देता है।

 

लेकिन यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि टीवी पर दोहराव के साथ आने वाली तस्वीरें और शब्द कई बार वाकई दूरगामी असर करती हैं। उत्सव घंटों खबरें देखता था और फिर बहुत सी खबरों की जुगाली करता था। टीवी पर आने वाली ऐसी कई तस्वीरें दिमाग पर चिपकती हैं और उत्सवों को उकसाती भी हैं। टीवी पर लगातार दिखता नकारात्मक रवैया, हारी हुई प्रणालियां, हांफता कानून, लाचार सरकारें युवा की हताशा को कई गुना बढ़ाने की क्षमता रखती हैं। सनसनी और अपराध कवरेज का यही मर्म है जो टीवी पर अपराध को बिकाऊ, टिकाऊ और सुखाऊ बनाता है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि मीडिया इन खबरों को न दिखाए। मतलब सिर्फ यह है कि इनके साथ आशा की किरणों को भी दिखाए। आखिर हर पल धड़कते इस समाज में बहुत कुछ सकारात्मक भी तो हो रहा है।

 

 

मीडिया की जरूरत से ज्यादा रिपोर्टिंग, न्याय की बेहद ढिलाई और डर पर पनपता खबर का व्यवसाय सामाजिक सेहत को कमजोर कर रहा है। उत्सव न्यूज चैनल देख कर परेशानी महसूस करता था। उसे सब कुछ काला दिखने लगा था। बतौर उसकी मां के, वह किसी लड़की पर अत्याचार नहीं देख सकता। एक ऐसा समाज जहां महिला पर अत्याचार फैशन और रोज के खाने जैसा जरूरी कर्म है, वहां उत्सव का यह बयान चौंकाता है।

 

 

दरअसल न्यूज मीडिया पहले खबर की तलाश में जुटा रहता है और फिर बड़ी खबर के आने पर और अगली खबर के आने तक मजबूरीवश उसके साथ ऐसा चिपका रहता है कि वह मानस पर हावी ही होने लगता है। जाने कितने उत्सवों ने इस उत्सव का कारनामा देख कर कोई प्रेरणा ली होगी। याद कीजिए बुश, आसिफ अली जरदारी, वेन जियाबाओ, अरूणधति राय और बाद में पी चिदंबरम पर चले जूते। एक जूते ने दुनिया भर में कई लोगों को जूता चलाने का मंत्र सा दे दिया था। बाद में तो हालत यह हो गई कि कई प्रेस कांफ्रेसों में पत्रकारों से अपने जूते बाहर उतारने के लिए कहा जाने लगा। लेकिन जूतों का फेंका जाना पूरी तरह से रूका नहीं और वो डर आज भी बदस्तूर कायम है।

 

दरअसल जूते हो या फारसे, तस्वीरों के बार-बार के दोहराव से एक मानसिक जमीन को तैयार करते हैं। मीडिया अगर डर के पोषण या डर की तलाश का काम करता है तो जनता भी मीडिया के जरिए अपनी दबी हुई भावनाओं की सहज अभिव्यक्ति की उम्मीदें पालती है। हताश होता युवा इसका सबसे बड़ा शिकार बनता है क्योंकि उसके पास युवा होने के आई कार्ड के सिवा कुछ नहीं। टीवी पर लगातार दिखने वाली काली तस्वीरें उसे यह मानने के लिए मजबूर करती चलती हैं कि पूरी दुनिया में हर तरफ, हर समय सिर्फ गोरखधंधा ही होता है। यहां शांत करने वाली, सुकून देती, सकारात्मक तस्वीरों की कमी हमेशा रहती है। डर, विद्रोह, विक्षोभ की तस्वीरों का यह पिटारा कभी तो हड़बड़ाते हुए फैसले सुनाए बिना जरा सब्र करे।    

 

(यह लेख 7 फरवरी, 2011 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)



1 comment:

Anonymous said...

prasasnik, nyayik or rajnatik taur par khokhale ho chuke is desh main ye to ab hona hi hai.
yaha nyay pana utna hi kathin hai jitna bhuse ki quintel bhar dher main sui dhondhna. itni kagzi karwahi, date pe date padna, insaan khatam ho jaye,sarir ki damri nikal jaye, lekin nyay nahi mil payega yaha. chota sa chota kesh bhi salo saal khichta hi rehta hai.prashnik or rajnetik shaktiya bhi apni swarth sidhi ke chalte inme krantikari sudhaar nahi lana chahti hai. warna sudhrne main to puri vyavastha ko sudhra ja sakta hai. media ko bhi utsav jaise ladke tabhi nazar aate hai jab wo hathiyaar utha kar kisi apradhi ki naak , kaan or gala kaat dete hai. wo bhi un apradhiyo ka jo ki high profile hone ke chalte tv ki surkhiya bane hue hai. un ladkiyo ka kya hoga jo roz chote sehro or gawo main aabru khoti hai, un logo ke liye kaun utsav aakar apradhiyo ki naak katega jo apno ko khone ka gum dil main rakh kar subak rahe hai. iske liya zaruri hai vyavastha ka badlana. ab wakt aa gaya hai jab desh ka saksham varg udarwadi mauj masti ki zindagi se thoda bahar aakar inse ekjut hokar lade, tabhi uddhaar ho sakta hai anyatha nahi.... is visay main mahakavya ya granth likha ja sakta hai. jo main nahi chahta..... waise bhi is desh ki kahani andher nagri or chaupat raja wali hai. kash wo din kareeb aaye jab main bhi is vyavastha ke sudhar main swam ka sudhar karte hue jur sako.....tab tak sirf akhbaar padh kar hi kaam chalata rahunga......

aapka chota
kapil