Dec 16, 2008

रेडियो की रफ्तार

खबर है कि देश में इस समय 38 सामुदायिक रेडियो सक्रिय हैं। इनमें से सिर्फ दो को गैर-सरकारी संस्थाएं चलाते हैं जबकि बाकी का लाइसेंस शैक्षिक संस्थाओं को दिया गया है। इस साल 30 नवंबर तक नए सामुदायिक रेडियो खोलने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय तक 297 आवेदन आ चुके हैं जिनमें से 105 शैक्षिक संस्थाएं हैं और 51 कृषि विश्वविद्यालय।

यह आंकड़ा खुशी की एक वजह लगता है। खुशी इसलिए कि अब भारत में भी सामुदायिक रेडियो की उपयोगिता को समझने की धीमी शुरूआत होने लगी है लेकिन साथ ही यह भी साफ है कि टीवी और प्रिंट के उत्साहवर्धन माहौल वाले देश में रेडियो की रफ्तार को लेकर गंभीरता का माहौल अभी भी पनप नहीं सका है। यह ताज्जुब की बात ही है कि संचार के तमाम बेहद लोकप्रिय साधनों में रेडियो की पैदाइश काफी पहले हुई और विकास काफी कम। रेडियो की पहचान हाल के सालों में जो बनी भी, वह कमर्शियल रेडियो के तौर पर ज्यादा दिखी जिसका काम मनोरंजन देना था, अक्सर बहुत गंभीर खुराक देना नहीं।

पर एक सच यह भी है कि टीवी चैनलों की भीड़ ने जिस संवेदनहीन रिपोर्टिंग को बढ़ावा दिया, उसमें जनसरोकार के मुद्दे आम तौर पर सबसे पिछड़े ही दिखाई दिए हैं। शायद यही वजह है कि छोटे से इलाके में अपनी छोटी-छोटी दिक्कतों को आवाज देने के लिए सामुदायिक रेडियो की ताकत ने बहुतों को लुभाया और प्रेरणा दी। इस व्यवस्था से उत्साहित लोगों को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि सामुदायिक रेडियो का दायरा बेहद छोटा होता है। कहीं 20 किलोमीटर तो कहीं 50। इस रेडियो को चलाने और इससे फायदा पाने वाले भी बेहद आम और स्थानीय होते हैं और यहां परोसी जाने वाली सामग्री भी उन्हीं के इस्तेमाल की होती है। ये लोग जानने लगे हैं कि इस रेडियो की ताकत असीम है क्योंकि इसका संचालक, कार्यकर्ता और उपभोक्ता वह वर्ग है जो इस देश की चुनाव प्रक्रिया में सबसे महती भूमिका निभाता है।

दरअसल भारत में सामुदायिक रेडियो की लहर 90 के दशक में आई। 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि 'रेडियो तरंगें जनता की संपत्ति हैं।' यह एक शुभ समाचार था लेकिन शुरूआती दौर में सिर्फ शैक्षिक स्तर पर ही ऐसे स्टेशनों को खोलने की इजाजत दी गई। इस दिशा में चेन्नई स्थित अन्ना एफएम पहला कैंपस सामुदायिक रेडियो बना जिसे आज भी एजुकेशन एंड मल्टीमीडिया रीसर्च सेंटर चलाता है और इसके तमाम कार्यक्रमों को अन्ना विश्वविद्यालय के छात्र ही तैयार करते हैं।

लेकिन परिस्थितियों में तेजी से बदलाव नवंबर 2006 से आना शुरू हुआ जब भारत सरकार ने एक नई नीति के तहत गैर-सरकारी संस्थानों और दूसरी सामाजिक संस्थाओं को भी सामुदायिक रेडियो शुरू करने की इजाजत दे दी। नई नीति के तहत कोई व्यक्ति विशेष या फिर आपराधिक या राजनीतिक पृष्ठभूमि की संस्थाओं के अलावा कोई भी सामाजिक सरोकारों से जुड़ी संस्था सामुदायिक रेडियो के लिए आवेदन दे सकती है लेकिन चूंकि ऐसे रेडियो स्टेशनों के लिए केंद्र के स्तर से फंड नहीं मिल पाता और इनके लिए फंड जुटाने को लेकर कई कडे नियम भी हैं, ऐसे में सामुदायिक रेडियो के लिए लाइसेंस पाना भले ही आसान हो लेकिन उसे लंबे समय तक चला पाना किसी परीक्षा से कम नहीं। वैसे भी इसका लाइसेंस ऐसी संस्थाओं को ही मिल सकता है जो कम से कम तीन साल पहले रजिस्टर हुई हों और जिनका सामुदायिक सेवा का ' प्रामाणित ट्रैक रिकार्ड ' रहा हो।

पर गौरतलब है कि लाइसेंस मिलने के बाद भी दिक्कतें कम नहीं होतीं। 12 किलोमीटर के दायरे की सीमा तक में बंधे सामुदायिक रेडियो के साथ यह शर्त भी जुड़ी होती है कि उसके करीब 50 प्रतिशत कार्यक्रमों में स्थानीयता हो और जहां तक संभव हो, वे स्थानीय भाषा में हों। एक घंटे में 5 मिनट के विज्ञापनों की छूट तो है लेकिन स्पांसर्ड (प्रोयोजित) प्रोग्रामों की अनुमति नहीं है( वे केंद्र या राज्य द्वारा प्रायोजित हों तो बात अलग है।)

दरअसल सामुदायिक रेडियो पर सबसे ज्यादा बातें सुनामी के समय हुईं। उस समय जबकि प्रसारण के तमाम हथियार ढीले पड़ गए थे, सामुदायिक रेडियो के जरिए हो रही उद्घघोषणाओं के चलते ही अंडमान निकोबार द्वीप समूह में करीब 14,000 लापता लोगों को आपस में जोड़ा जा सका था।

यह भी कम हैरानी की बात नहीं कि दुनिया के कई देशों में सामुदायिक रेडियो काफी पहले से ही सक्रिय रहा है। अकेले लेटिन अमरीका में ही इस समय 2000 से ज्यादा सामुदायिक रेडियो सक्रिय हैं और अमरीका में 2500 से ज्यादा गैर व्यावसायिक रेडियो स्टेशन अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कनाडा में भी 70 के दशक में सामुदायिक रेडियो की शुरूआत हो गई थी। 50 के दशक में कनाडा ने फार्म पर आधारित रेडियो कार्यक्रमों को प्रसारित कर जोरदार सफलता हासिल की थी। तब से अब तक कनाडा ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा है। इसी तरह श्रीलंका, नेपाल (नेपाल में 1997 में रेडियो सागरमाथा की शुरूआत हुई थी) और बांग्लादेश जैसे छोटे देश भी एक अर्से पहले ही इस माध्यम की शक्ति को पहचान कर काफी आगे बढ़ चुके हैं लेकिन भारत को सीख लेने में काफी समय लगा।

सामुदायिक रेडियो की एक खासियत यह है कि इसमें कार्यक्रम तैयार करते समय स्थानीय भाषा या रूचियों के साथ समझौते नहीं किए जाते। इनमें वह सब शामिल करने की कोशिश की जाती है जो स्थानीय लोगों के विकास और सेहमतमंद मनोरंजन के लिए जरूरी है। देश के कई छोटे-छोटे गांवों में चल रहे ऐसे अभियान भारतीयों का संचार के इस नए चेहरे से साक्षात्कार करा रहे हैं। आम तौर पर तकनीकी उपकरणों के नाम पर इन गांवों के पास एक टेप रिकार्डर और माइक से ज्यादा कुछ नहीं होता। यह अपने रिपोर्टरों की टीम खुद बनाते हैं, रनडाउन( स्टोरीज का क्रम) तैयार करते हैं और प्रसारण से जुड़े फैसले लेते हैं। यानी निर्माण के लिए कच्चे माल को तैयार करने से लकेर इन्हें तकनीकी रूप से अंतिम आकार देने तक-हल कड़ी में संबद्ध गांववालों की सीधी भूमिका और पहरेदारी बनी रहती है। ऐसी टोलियों में भले ही निरक्षरों की तादाद काफी ज्यादा हो लेकिन कुछ नया सीखने से इन्हें परहेज नहीं। इस तरह के प्रयोगों ने भारत के कई गांवों की जिंदगी का रूख ही जैसे बदल डाला है।

बेशक भारत में सामुदायिक रेडियो का भविष्य सुनहरा है लेकिन स्थाई सफलता के लिए जरूरी होगा कि सामुदायिक रेडियो जैसे विकास के वाहनों के साथ ऐसे लोगों को जोड़ा जाए जो इस तरह की कोशिशों का हिस्सा बनने की इच्छा रखते हों क्योंकि किसी भी बड़े सपने के लिए तकनीकी और आर्थिक जरूरतें भले ही बाहर से बटोरी जा सकती हैं लेकिन आंतरिक ऊर्जा को तो खुद ही पनपाना होगा।

इसके अलावा भारत में भी वर्ल्ड एसोसिएशन आफ कम्यूनिटी रेडियो ब्राडकास्टर्स जैसी संस्थाओं के अनुभवों को आत्मसात करने की कोशिशें होनी चाहिए। इसकी स्थापना 1983 में हुई थी और 110 देशों के 3000 देश इसके सदस्य बन चुके हैं। इस संस्था का एक मुख्य मकसद कम्यूनिटी रेडियो के प्रोत्साहन के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जमीन तैयार करना है।

लेकिन इन सबसे ज्यादा जरूरी होगा सरकारी और सामाजिक सोच को बदलना। जरा सोचिए। इस देश में चौबीसों घंटे बजनेवाले चैनलों को कभी भी, कहीं भी औऱ कुछ भी कहने की अनकही छूट दे दी गई और समाचारों का आकाश उनके लिए खोल दिया गया है लेकिन एक ऐसा माध्यम जो पैसे के खेल से परे है, वहां आज भी न्यूज के संसार को खोलने में सरकार को डर लगता है। उद्दंड़ता पर उतर आए मीडिया को जन्म देने के बाद अब सरकार एक बच्चे को फर वाला खिलौना देने में भी घबराती है।

वैसे भी सामुदायिक रेडियो फैशनेबल नहीं है, न ही धन-उगाही का साधन। इसलिए इस पर बड़ी चर्चाएं नहीं होतीं और न ही इन पर ज्यादा लिखा जाता है। अगर सोच की खिड़कियां कुछ खुल जाएं और इनके लिए माहौल बनाया जाए तो सनसनी फैलाते मीडिया से परे विकास का एक नया संसार सजाया जा सकता है। इसे फिलहाल तो एक सपना ही मीनिए।


(यह लेख 16 दिसंबर, 2008 को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ)

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