Jan 19, 2009

प्रेम

मुमकिन है बहुत कुछ
आसमान से चिपके तारे अपने गिरेबां में सजा लेना
शब्दों की तिजोरी को लबालब भर लेना

देखो तो इंद्रधनुष में ही इतने रंग आज भर आए
और तुम लगे सोचने
ये इंद्रधनुष को आज क्या हो गया!

सुर मिले इतने कि पूछा खुद से
ये नए सुरों की बारात यकायक कहां से फुदक आई?

भीनी धूप से भर आई रजाई
मन की रूई में खिल गए झम-झम फूल

प्रियतम,
यह सब संभव है, विज्ञान से नहीं,
प्रेम में आंखें खुली हों या मुंदी
जो प्रेम करता है
उसके लिए कुछ सपना नहीं
बस, जो सोच लिया, वही अपना है।

8 comments:

Nirmla Kapila said...

jo prem karta hai uske liye -----bahut sunder bhaav hain

विनय said...

सार्थक शब्दों के प्रयोग से कविता के रंग निखरते रहते हैं

---मेरा पृष्ठ
तख़लीक़-ए-नज़र

बवाल said...

ये नए सुरों की बारात यकायक कहां से फुदक आई?
सुन्दर कविता की जान लगीं हमें ये पंक्तियाँ। बहुत ख़ूब।

सुशील कुमार छौक्कर said...

प्रेम में आंखें खुली हों या मुंदी
जो प्रेम करता है
उसके लिए कुछ सपना नहीं
बस, जो सोच लिया, वही अपना है।

वाह बहुत उम्दा।

Udan Tashtari said...

जो प्रेम करता है
उसके लिए कुछ सपना नहीं
बस, जो सोच लिया, वही अपना है।

--बहुत गहरी बात लिए एक सुन्दर रचना, बधाई.

रंजना said...

Bahut hi sundar bhaav aur mohak abhivyakti.
Sundar rachna hetu badhai.

gangesh srivastav said...

prem par apne kuchh likha, thanks
gangesh sri

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

वर्तिका नन्दा जी
"जो प्रेम करता है
उसके लिए कुछ सपना नहीं
बस, जो सोच लिया, वही अपना है।"

बहुत ही सुन्दर॥ आपकी यह चार लाईनो ने मेरा मन मोह लिया। बधाई अच्छा लिखने के लिये।