Featured book on Jail

Book Launch at Hindi Bhawan: 16 May, 2026

Jan 28, 2009

चलते-चलते यूं ही ..

(1)

बड़े घर की बहू को कार से उतरते देखा
और फिर देखीं अपनी
पांव की बिवाइयां
फटी जुराब से ढकी हुईं
एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में -
दोनों की आंखों के पोर गीले थे

(2)

फलसफा सिर्फ इतना ही है कि
असीम नफरत
असीम पीड़ा या
असीम प्रेम से निकलती है
गोली, गाली या फिर
कविता

10 comments:

Shuaib said...

बढीया है।

प्रताप नारायण सिंह (Pratap Narayan Singh) said...

दोनों ही क्षणिकाएं बहुत अच्छी हैं .--
एक बात तो मिलती थी फिर भी उन दोनों में -
दोनों की आंखों के पोर गीले थे
-----------
असीम नफरत
असीम पीड़ा या
असीम प्रेम से निकलती है
गोली, गाली या फिर
कविता
बहुत सुंदर

रवीन्द्र प्रभात said...

सुन्दर ब्लॉग...सुन्दर रचना...बधाई !!

अविनाश वाचस्पति said...

अच्‍छे हैं।

पर गोली, गाली

या कविता की

जगह गीत

अधिक उपयुक्‍त

लगता सिर्फ

राय यह मेरी है।

varsha said...

achchi hein kshanikaen.

Shikha Deepak said...

चलते चलते यूँ ही..............सही कहा आपने।

Shikha Deepak said...

सुंदर।

सुशील छौक्कर said...

ये क्या हुआ बिना कमेट किए ही कमेट चला गया।
वैसे आपका लिखा पढकर भी तो नि:शब्द ही हूँ।

महेश लिलोरिया said...

बहुत खूब!
कम शब्दों में फलसफे को बड़ी गहराई से समझाया है आपने।

आलोक साहिल said...

दूसरी वाली क्षणिका अच्छी लगी......
आलोक सिंह "साहिल"