May 19, 2010

झोंका जो आया अतीत की खिड़की से



अनार के दाने ही थे

वो पल

गिलहरी की तरह गुदगुदाते आए

फिर बह गए

 

वो शहतूत की बेरियां

कच्चे आमों की नटखट अटखेलियां

आसमान के जितने टुकड़े दिखते

अपनेपन से भरे लगते

घर का फाटक और

फाटक के पास से गुजरते लोग

उनके चेहरे के भाव

जो घर आते, वो भी भले लगते

न आने वाले भी किसी सुख के साये में जीते ही लगते

 

असल में तब परिभाषा शायद सुख की ही थी

कहां जाना कौन थे बुद्धा, राम या रहीम

किसी का फलसफा पढ़ा ही कहां था

लेकिन मन में शांति की चादर ऐसी लंबी थी

कि तमाम सरहदें पार कर लेती

 

उन गुनगुने दिनों में रिश्ते जितने थे

अपने थे

शहरों गांवों-कस्बों की सीमाओं से परे

 

वो शहतूत अब दिखते नहीं

रिक्शे की ऊबड़-खाबर सवारी

कचनार के खिले से रंग

पेट में उठती उल्लास की हूक

हर शब्द से झरता प्यार

 

सब कुछ इतिहास क्या इतनी जल्दी हो जाता है?

 

 

5 comments:

माधव said...

बढ़िया , अच्छी कविता

http://madhavrai.blogspot.com/

http://qsba.blogspot.com/

SANJEEV RANA said...

सब कुछ इतिहास क्या इतनी जल्दी हो जाता है?
बिलकुल जी जैसे आपकी लिखी ये पोस्ट भी जल्द्दी ही इतिहास हो जायेगी

aarya said...

ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी लेलो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज की कस्ती वो बारिस का पानी
रत्नेश त्रिपाठी

राजकुमार सोनी said...

गुनगुने दिन, शहतूत, अनार,गिलहरी... क्या बात है। इतने सारे मीठे शब्द एक साथ...
आपकी कविता बहुत ही प्यारी है। ईश्वर करें आप हमेशा ही इसी तरह बेहतर लिखे।

Shah Nawaz said...

बहुत ही खूबसूरत कविता है. दिल को छू गई, बहुत खूब!