Nov 4, 2008

भारतीय मीडिया- समय दिशा-निर्धारण का

36 खरबपतियों और 36 करोड़ बेहद गरीब लोगों के इस देश में मीडिया एक महाशक्ति का आकार लेने लगा है। दुनिया के नक्शे पर अब भारत की पहचन सिर्फ एक बड़ी आबादी वाले 60 वर्षीय आजाद देश के रूप में ही नहीं है। लगातार सक्रियता के बाद अब वह एक ताकत के रूप में उभर रहा है और इसकी एक वजह यह भी है कि दुनिया के सबसे ज्यादा युवाओं वाले इस देश की गिनती उन विरले देशों में भी होती है जिसका मीडिया सबसे ज्यादा सक्रिय, विस्तृत और ऊर्जावान है।

फिक्की की ताजा रिपोर्ट इस विश्वास को और पुख्ता करती है। रिपोर्ट कहती है कि मीडिया के मामले में फिलहाल भारत का कोई सानी नहीं। मीडिया का विज्ञापन बाजार 22 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। टेलीविजन की विकास दर 17 प्रतिशत है जबकि रेडियो की 24 प्रतिशत। प्रिंट मीडिया 16 प्रतिशत की दर से अपनी सेहत बना रहा है जो कि दुनिया में सबसे ज्यादा है।


इलेक्ट्रानिक मीडिया में निजी पंखों के आने के बाद बदलाव की एक बयार चली है। साठ या सत्तर के दशक का दर्शक खबर की सुर्खियां और थोड़ी-बहुत फुटेज देख कर परम सुख अनुभव कर लेता था। उसकी सोच की खिड़कियां छोटी थीं और उनसे उसे बाहर की जो सिमटी हुई सीमित तस्वीर मिलती थी, वह उसे ही काफी मान लेता था क्योंकि उसका इससे बेहतर विकल्पों से सामना हुआ ही नहीं था। कई बार खास मौकों पर उसके जहन में यह विचार जरूर आता था कि काश वह इससे ज्यादा कुछ जान-देख पाता लेकिन चूंकि वह प्रतियोगिता का दौर नहीं था और न ही दुनिया भर के दूसरे विकल्पों की सुलभ जानकारी थी, वह कुंए के मेंढक की तरह जो दिया गया, उसी में भक्ति-भाव से लीन रहा।


लेकिन इससे एक और बात साबित होती है। भारतीय दर्शक की भूख और ललक अब कई गुना बढ़ गई है। इंदिरा गांधी की हत्या के समय उसे एक सफदरजंग से एक जगह चिपका-से गए कैमरे से शॅाट्स दिखाए गए। कैमरा जब थोड़ा-बहुत अंदर-बाहर घूमा तो से कुछ विवधता दिखी, वह उसी में धन्य हो गया। चर्चित हस्तियों पर बरसों उसे बहुत सामग्री नहीं मिली। शायद इसीलिए वह प्रभावशाली लोगों से जरा भयभीत भी रहा। प्रिंट मीडिया जरूर समय-समय पर उसे खबरों के नए-नए पकवान परोसता रहा लेकिन टेलीविजन की दुनिया का पिछड़ापन लंबे समय तक बना रहा।

लेकिन तकनीक बदलती गई। खाड़ी युद्ध घर की बैठक में बैठकर देख भारतीय दर्शक की जो आंखें खुलीं, वो उसके लिए एक नए अध्याय की शुरूआत थी। मैकलुहान ने बरसों पहली अपनी चर्चित किताब में जिस ग्लोबल विलेज की बात कही थी, वह आज पूरे विस्तार के साथ साकार होती दिख रही है। अब रिमोट का बटन उसे यह विश्वास दिलाता है कि यह दुनिया वाकई एक छोटा गांव है। एक आम भारतीय घर बैठकर टीवी के जादुई रिमोट से अंतरिक्ष की सैर कर आता है, वह देखता है कि उसके जैसे लोग स्टूडियो में माइक लगाए बड़ी-बड़ी बातें कह डालते हैं। अब न हिचक है, न रोक। इलेक्ट्रानिक मीडिया ने एकाएक उसे ताकतवर, बेताब और बेबाक बना डाला है। वह अब सबकी खबर लेता है लेकिन इस बेबाकी के बावजूद एक सच यह भी है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया जिस समाज के लिए ज्यादा फिक्रमंद दिख रहा है, वह मध्यम वर्ग है क्योंकि भारत के मध्यम वर्ग की आबादी अमरीका की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है। इसलिए उसे लुभाना लाजमी भी है और फायदेमंद भी।

और इस फायदे के फंदे में मीडिया लगातार जकड़ता जा रहा है।

ग्लोकल, लोकल और फोकल हुआ मीडिया नए जमाने के साथ भाग रहा है। लेकिन मीडिया की दिशा क्या हो, इस पर आज भी न तो आम सहमति बन पाई है और न ही कोई सीधा रास्ता। दूरदर्शन आज भी जनहित सेवा प्रसारण की अपनी छवि पर कायम है। उसे आज भी बोरियत भरे सरकारी प्रवक्ता के रूप में देखा जाता है और माना जाता है कि जो सत्ता में होगा, वह उसी का महिमामंडन करेगा। दूसरी तरफ निजी इलेक्ट्रानिक मीडिया आज भी काफी हद तक पैने दांतों वाले माध्यम के तौर पर देखा जा रहा है जिसके बारे में जनता मानती है कि वह कभी भी किसी को काट सकता है। जनता अब सरकारी दफ्तरों में अपनी फरियाद देने की बजाय अब अक्सर पत्रकारों के करीब जाकर अपनी बात कहने लगी है। लेकन यह तस्वीर का एक सीमित पहलू है। दूसरा पहलू है- चैनलों में राजनीतिक हस्तक्षेप की राजनीति। इसके साथ ही चैनलों की विज्ञापनों पर निर्भरता ने जन सेवा की मूल धारणा को काफी हद तक हाशिए पर धकेल दिया है। यही वजह है कि पत्रकारों का एक बड़ा कुनबा यह विश्वास करने लगा है कि मीडिया मिशन नहीं, कमीशन है।

भारत में इस समय मीडिया 20 प्रतिशत की वार्षिक दर से फैल रहा है। अब टीवी न्यूज चैनल देश के चप्पे-चप्पे में पहुंचने के काफी करीब हैं लेकिन इस पहुंच से सिर्फ व्यापार साधने की मंशा रही तो इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने से पहले सोचना होगा। इसलिए लगता यही है कि दुनिया के इस सबसे सक्रिय माध्यम के लिए अब नीति तय करने का समय आ गया है। वह पूरी तरह से जनसेवक भले ही न बन पाए लेकिन अगर जनसेवा के लिए एक तयशुदा हिस्सा तय कर लिया जाए तो मीडिया की विकास की दर सामाजिक विकास के लिए भी मील का एक पत्थर साबित हो सकेगी। इससे पहले कि न्यूज मीडिया बोरियत की सीमा के करीब आ जाए और जन सेवा एक 'आउट डेटिड' शब्द बन जाए, मीडिया की रूपरेखा पर कुछ बुनियादी चिंतन हो ही जाना चाहिए।

3 comments:

COMMON MAN said...

कल "आज तक" पर सोने के सिक्के के लिये सवाल था, कि किस जगह की पुलिस ने छात्र की हत्या कर दी. इस पर भी विचार करना चाहिये.

ajay kumar jha said...

ek media person se aisee baatein sun kar main chakit hoon ,mujhe yakeen hai ki yadi ye sanjeedgee ,samajh aur jimmedaaree kuchh aur log samajh jaayein to ye teesraa stambh nischit hee majboot ho jaayega. nispaksh aur utkrisht aalek ke liye dhanyavaad.

aditya said...

aapne bahut sahi kaha lekin is takat ko apni simaayen bhi tay kar leni chahiyen. kahin aise na ho apni shakti ke mad me chur hokar ye un sab raston se hi bhatak jaye jin par chalne ki soch ki wajah se hi ye paida huaa hai..