Apr 24, 2010

संवाद


नहीं सुनी बाहर की आवाज

अंदर शोर काफी था

इतना बड़ा संसार

हरे पेड़, सूखे सागर भी

बहुत सी झीलें, चुप्पी साधतीं नदियां

अंदर रौशनी की मेला भी, सुरंगों की गिनती कोई नहीं

अपने कई, अपनेपन से दूर भी

खिलखिलाहटें अंतहीन, नाजुक लकीरें भी

सपने भर-भर छलकते रहे

नहीं समाए अंजुरी में

इस शोर में बड़ी तेज भागी जिंदगी

अंदर का हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो

चित्रकार-कलाकार

अंदर इतनी मछलियां, इतनी चिड़िया, इतने घोंसले

बताओ तुमसे बात कब करती

और क्यों?

 

6 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

शोर का बहुत सुन्‍दर चित्रण. धन्‍यवाद.

दिलीप said...

waah Vartika ji maan gaye....sach hai antarman ke shor ko bahar ki awazo se kya matlab...

M VERMA said...

अंदर इतनी मछलियां, इतनी चिड़िया, इतने घोंसले
बताओ तुमसे बात कब करती
और क्यों?

सवाल जायज है कहीं शोर और भीड़ में बात होती है भला.
सुन्दर रचना

sansadjee.com said...

अच्छी रचना है।

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

मनोज कुमार said...

बहुत मार्मिक कविता।