संसार की इस शाह का बस एक ही फसाना है एक धुंध से आना है, एक धुंध में जाना है।
बी. आर. चोपड़ा की फिल्म 'धुंध' 1973 में आई थी।
साहिर साहब ने जब इस गाने को लिखा होगा, उस समय
उनके अपने दिल की टीस, दर्द और कसक किसी गहराई तक रही होगी। दुनिया में पाठक होते हैं, दर्शक हो, श्रोता और राहगीर भी और कुछ ऐसे होते हैं जो दर्द के बीच में जीते हुए रोज़ किसी धागे से किसी चीज़ को बुनते हैं, उधेड़ते हैं और फिर बुनने लग जाते हैं। उदास दिल का साहिर, एक उदास अमृता, एक उदास इमरोज और ऐसे ही बहुत से और उदास शायर, गीतकार, फनकार इन सब ने अपनी उदासियों के बीच में कुछ ऐसा गढ़ा कि फिर वो कभी मिट ना पाया। साहिर का ये गाना उसी की एक मिसाल है।
Poster: Jagtar Singh Audio Edit: Dr. Suchit Narang

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