May 31, 2010

मंगलौर के दर्द के बीच

हादसे एक ही बात कहते हैं
मंगलौर में हो या मुंबई में
इंसान के रचे हों
या कुदरत से भुगते
कि सांसों का कोई भरोसा नहीं
सबसे अनजानी, अपरिचित सांसें ही हैं
कभी भी, कहीं भी फिसल सकती हैं
अनुलोम-विलोम के बीच
जब रोकती हूं
सांसों को कुछ पलों के लिए अंदर ही
तो लगता है कई बार
कि जाने ये सांसें
अंदर शरीर में कर रही होंगीं क्या गुफ्तगू
क्या बताती होंगी
दिल को
दिमाग को
पेट को
अंतड़ियों को
कि कब छूटने वाली है
सांसों की गठरी

इन सांसों का क्या भरोसा
हो सकता है
जाने की तैयारी का
एक पल भी न दें

अब इन सांसों से मोह भी नहीं होता
दिखती है हर रोज मौत
कितनी-कितनी बार
इनसे दिल करता है
अब खेलूं
पिट्ठूगरम
टेनिस की बॉल की तरह उठाऊं
उछाल दूं आसमान पर
लिख कर अपना पता

हादसे हर बार खुद अपने करीब ले जाते हैं
रूला जाते हैं
किसी और के हिस्से के आंसू
जब बहते हैं
अपनी आंखों से
तो मन की कितनी परतें जानो कैसे खुल-खुल जाती हैं
कितने दिन रहता है मन मुरझाया सा

हादसे रेतीली जमीन को
और पथरा जाते हैं
मौत से मिला जाते हैं गले

भरोसा नहीं अगले पल का
तब भी इतने सामान का ढोना
मौत के रूदन के सामने
इससे बड़ा हास्य भला और क्या होगा

(यह कविता 30 मई, 2010 को जनसत्ता में प्रकाशित हुई)

May 21, 2010

राजधानी के युवा और उनकी दो दुनिया

दिल्ली के एक बड़े रेस्त्रां समूह के किसी भी रेस्त्रां में गर्मी के इन महीनों में जाना बड़ा सुखद लगता है। वजह वहां के पकवान या फिर ठंडे पेय नहीं हैं। वजह है वहां पर उन युवाओं को देखना जो इन दो महीनों में यहां इंटरन्शिप के लिए आते हैं। ये युवा रिसेप्शन पर दिखाई देते हैं, खाने का आर्डर लेते हैं, सामान देते हैं, टेबल से झूठे बर्तन उठाते हैं और ग्राहक की शिकायत को भी अदब से सुनते और तर्क से उनका जवाब देते हैं। इन युवाओं के पास किसी से बतियाने का समय नहीं है। ये अपनी धुन में तल्लीन हैं। इनक पास भरपूर काम है। अगर आप इनसे बहुत इसरार करके बात करना चाहेगें तो ये कारपोरेट मुस्कान के साथ आपको बताएंगें कि ये कुछ सीखने के लिए और पूरे साल के अपने खर्च का कुछ हिस्सा कमाने के लिए यहां पर काम कर रहे हैं। इनके लिए यह काम छोटा नहीं है बल्कि कुछ कर पाने का बेहतरीन अवसर है। ज्यादा टटोलेंगे तो आपको पता चलेगा कि इनमे से कुछेक युवा सिर्फ यहीं पर काम नहीं कर रहे बल्कि वे दूसरी पारी का काम कहीं और भी कर रहे हैं और अपने काम पर इन्हें फख्र है।

इन युवाओं के इस जज्बे को सलाम करने के लिए बार-बार इनसे मिलने जाने का मन करता है। लेकिन ठीक इसी समय दिल्ली के पाश इलाकों में रहने वाले वे युवा भी याद आ जाते हैं जिनकी गर्मी की छुट्टियां थकान उतारने में ही निकल जाती हैं। इन्हें घर से बाहर आने में लू लग जाती है, सुबह जल्दी उठने से रात की बीयर का मजा बेस्वाद हो जाता है और जिनके चेहरे पर एसी के चौबीसों घंटे के पालने के बावजूद मुर्झाहट पसरी रहती है। यह दूसरे किस्म के युवा हैं। ये जिन घरों में पलते हैं, वहां पर कुत्तों और बच्चों की जिंदगी में बहती हुई सुविधाएं होती हैं और इन्हीं में से कई बाद में दलितों की बस्ती में जाकर अपने फोटू छपवा कर बड़े नेता या फिर सरकारी बाबू का दायित्व भी निभा आते हैं। ये दो अलग तरह की जिंदगियां हैं जिनसे तकरीबन रोज ही वास्ता पड़ता है लेकिन मन निराश नहीं होता। मन बार-बार कहता है कि ऐसे रेस्त्रां में काम कर रहे युवाओं की जिंदगी के संघर्ष की कहानी बार-बार दोहराती चली जाए। इसलिए नहीं कि मन उनका शुभ नहीं चाहता,बल्कि इसलिए कि मन उनका बेहद स्थाई शुभ चाहता है। रेस्त्रां में काम करते ये बच्चे जब सिविल सर्विस पास कर जाते हैं या फिर किसी बड़ी कंपनी के कर्ता-धर्ता बन बैठते हैं तो जमीनी हकीकत की पाठशाला में पढ़े सबक भी उनके साथ चलते हैं। ये नहीं भूलते कि कैसे हर रोज इनका सामना जिंदगी के कई जालों से होता था और उनसे गुजर कर कैसे इन्होंने खुद अपने पसीने से अपनी दुनिया को बुना है।

और मजे की बात यह कि ये मेहनतकश युवा मीडिया की कवरेज के लायक तब तक नहीं बनते, जब तक इनके हाथ में कोई तमगा आ नहीं जाता। दूसरी तरफ झुनझुने वाले नवाबजादे खबर तब बनते हैं जब किसी रात शराब के नशे में वे किसी फुटपाथी को कुचल कर भाग रहे होते हैं और फिर उनके पिता उन्हें बचाने की जुगत में लगते हैं।

ये दो अलग-अलग किस्म के युवा असल में इंडिया और भारत हैं। इन दोनों से मिल कर देखिए। जिंदगी का फलसफा समझ में आने लगेगा।  

(यह लेख 21 मई, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)

May 19, 2010

झोंका जो आया अतीत की खिड़की से

अनार के दाने ही थे
वो पल
गिलहरी की तरह गुदगुदाते आए
फिर बह गए

वो शहतूत की बेरियां
कच्चे आमों की नटखट अटखेलियां
आसमान के जितने टुकड़े दिखते
अपनेपन से भरे लगते
घर का फाटक और
फाटक के पास से गुजरते लोग
उनके चेहरे के भाव
जो घर आते, वो भी भले लगते
न आने वाले भी किसी सुख के साये में जीते ही लगते

असल में तब परिभाषा शायद सुख की ही थी
कहां जाना कौन थे बुद्धा, राम या रहीम
किसी का फलसफा पढ़ा ही कहां था
लेकिन मन में शांति की चादर ऐसी लंबी थी
कि तमाम सरहदें पार कर लेती

उन गुनगुने दिनों में रिश्ते जितने थे
अपने थे
शहरों गांवों-कस्बों की सीमाओं से परे

वो शहतूत अब दिखते नहीं
रिक्शे की ऊबड़-खाबर सवारी
कचनार के खिले से रंग
पेट में उठती उल्लास की हूक
हर शब्द से झरता प्यार

सब कुछ इतिहास क्या इतनी जल्दी हो जाता है?

Apr 28, 2010

राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाते खाली दिमाग

दिल्ली के एक मॉल में लोग फिल्म देखने गए थे लेकिन वहां उनका साक्षात्कार परदे की फिल्म की बजाय असली जिंदगी की फिल्म से ही हो गया। फिल्म शुरू होने से कुछ मिनटों पहले किसी ने एक न्यूज चैनल को एक फैक्स भेजा और धमकी लिखी कि मॉल में कुछ ही मिनटों में धमाका होने वाला है।

बस, इतना करने की देर थी कि दिल्ली पुलिस अपने लाव-लश्कर के साथ वहां पहुंच गई। फिल्म की स्क्रीनिंग कुछ समय के लिए टाल दी गई और तलाशी शुरू हो गई। तलाशी कुत्ते भी आए थे जो सूंघ-सूंघ कर बेहाल होते गए। कुछ घंटों की इस कवायद में 15 लाख रूपए का नुकसान हुआ और डॉग स्कवॉड, बम स्कवॉड से लेकर पुलिस के तमाम विशेषज्ञों का जो समय खर्च हुआ, सो अलग।

इस घटना की मीडिया में कवरेज हुई और अगले दिन की अखबारों में फोटो सहित विवरण भी मिला लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। पिछले दो दिनों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होक्स कॉल की यह छठी घटना है। जरा याद कीजए।। हर साल गर्मी कि शुरूआत होते ही खास तौर पर ऐसी होक्स कॉलों का सिलसिला जैसे चल निकलता है। ये फोन कौन करता है, क्यों करता है, इसके जरिए उसे हासिल क्या होता है। आम तौर पर ऐसी कॉलों के पीछे किसी आंतकी संगठन का हाथ शायद ही मिलता है। इन कॉलों को अक्सर वे युवा या छात्र करते हैं जिन्हें छुट्टी के दिन में करने को कुछ नहीं होता और जिन्हें रोमांच की तलाश होती है। ऐसे फोन करने के बाद या तो वे खुद मौके पर पहुंच कर कथित नजारे का मजा लेते हैं या फिर टीवी पर अपने कारनामे का लाइव तमाशा देखते हैं।

खैर, ऐसा करने वाले अक्सर पकड़े भी जाते हैं और मैं बात इसी मुद्दे की करना चाहती हूं। जो पकड़े जाते हैं, उनके साथ होता क्या है। क्या उन्हें कोई सजा होती है, क्या उन पर कोई मुकद्दमा चलता है या उन पर कोई बड़ा जुर्माना लगाया जाता है या फिर उनका कोई सार्वजनिक बहिष्कार होता है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इनमें से शायद कुछ भी ठोस होता ही नहीं। पुलिस की फटकार मिलती है, समाज अगले दिन ऐसा करने वालों को भुला देता है और आस-पास के युवाओं की नजर में ऐसा करने वाला एक हीरो की तरह उभर आता है। इससे बड़ी त्रासदी और क्या हो सकती है कि हमारे यहां खाली समय के धनी लोगों की कोई कमी है ही नहीं। फिरोजपुर में इकनोमिक्स के हमारे एक टीचर होते थे- राठौर सर। वो अक्सर एक बात कहते थे। युवाओं से अगर कहा जाए कि घास उखाड़नी है तो शायद ऐसा करने में उनकी इज्जत में कमी आ जाए लेकिन अगर उन सबको मैदान में बिठा कर कोई लेक्चर सुनाने लगे तो वे अनमने भाव में शायद सारे मैदान की घास की उखाड़ डालें। यहां भी यही मामला है। हमारे यहां स्कूलों के खाली बच्चों की जमात दिखाई देती है। हां, ऐसे बच्चे भी हैं जो गर्मियों की छुट्टों में कुछ सीखने में समय लगाते हैं, रेस्त्रां में नौकरी करते हैं या किसी सामाजिक काम से जुड़ जाते हैं लेकिन शहरों में ऐसे बच्चों की तादाद काफी कम हैं। यहां के मध्यमवर्ग औऱ उच्च वर्ग के बाब लोग गर्मी की पूरी छुट्टियां थकान उतारने में ऐसे लगाते हैं मानो निराला की कविता की महिला की तरह इलाहाबाद के पथ पर पूरे साल पत्थर ही तोड़ते रहे हों। यह खाली दिमागों का शैतानी अस्तबल है। एसी रूम में बैठ कर ये अपनी बोरियत मिटाने और हीरो बनने के लिए सामाजिक-सरकारी-राष्ट्रीय पूंजियों से खेलने में इन्हें कोई परहेज नहीं होता। और विडंबना तो देखिए। ऐसी खुराफातें करने वाले जब पकड़े जाते हैं तो मीडिया में इनकी छुटकिया से खबर भी मुश्किल से आती है। ये हर बार सजा से तब तक बचते चले जाते हैं जब तक कि ये कोई ऐसा बड़ा कारनामा नहीं कर डालते जहां इनके पापा लोगों का रूतबा काम नहीं आता।

लगता यही है कि अब ऐसे तमाशे न हों इसके लिए मीडिया को होक्स कॉलों को करने वालों पर सख्ती से स्टोरीज करनी चाहिए और पुलिस और कानून को भी इन्हें किसी हाल में बख्शना नहीं चाहिए। क्योंकि अपनी बोरियत मिटाने के लिए जिस पैसे को ये उड़ा डालते हैं, वो टैक्स देने वालों के पसीने की उपज हैं। इनसे हमदर्दी करना किसी दरिंदगी से कम नहीं होगा। सोचिए कि अगर कभी ऐसा हो कि होक्स कॉल की वजह से पुलिस किसी एक कोने में सिमटी हो और असली वारदात कहीं और हो जाए तो। इसलिए अब ऐसे सिरफिरों को माफी देने का समय जा चुका है।

(यह लेख दैनिक भास्कर में 28 अप्रैल, 2010 को प्रकाशित हुआ)

Apr 25, 2010

एक ख्वाब की कब्रगाह

लो मर गई मरजानी
तब भी चैन नहीं
देह से झांक कर देख रही है तमाशा
कुनबुना रहे हैं पति
बेवजह छूट गया दफ्तर सोमवार के दिन ही
बच्चों की छटपटाहट
काश मरतीं कल शाम ही
नहीं करनी पड़ती तैयारी टेस्ट की

अब कौन लाए फूलों की माला इस तपती धूप में
नई चादर
कौन करे फोन
कि आओ मरजानी पड़ी है यहां
देख जाओ जाने से पहले कि
तुम्हें पता लगेगा नहीं
वो मरी कि मारी गई

मरजानी जानती है
नौकरानी को नहीं मिल रहा
हल्दी का पैकेट
पति को अपनी बनियान
बेटे को अपनी छिपाई सीडी
कैसे बताए मरजानी
अलमारी के किन कोनों में
सरकी पड़ी हैं चीजें

मरजानी तो अभी है
पुराने कफन में
कि मौत से पहले
गर तैयार कर लिया होता बाकी का सामान भी खुद ही
तो न होता किसी का सोमवार बेकार

कौन जाने
आसान नहीं होता मरजानी होना
चुपके से मरना
हौले-हौले मरना
दब-दब कर मरना
और मरना
ये मरना सोमवार को कहां हुआ
मरना तो कब से रोज होता रहा
मरजानी को खबर थी
घर की दीवारों को
रंगों को
चिटकनियों को
बर्तनों को
गीले तकियों को
बस उसे ही खबर नहीं थी
जिसका हो गया सोमवार बेकार

Apr 24, 2010

संवाद


नहीं सुनी बाहर की आवाज
अंदर शोर काफी था
इतना बड़ा संसार
हरे पेड़, सूखे सागर भी
बहुत सी झीलें, चुप्पी साधतीं नदियां
अंदर रौशनी की मेला भी, सुरंगों की गिनती कोई नहीं
अपने कई, अपनेपन से दूर भी
खिलखिलाहटें अंतहीन, नाजुक लकीरें भी
सपने भर-भर छलकते रहे
नहीं समाए अंजुरी में
इस शोर में बड़ी तेज भागी जिंदगी
अंदर का हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो
चित्रकार-कलाकार
अंदर इतनी मछलियां, इतनी चिड़िया, इतने घोंसले
बताओ तुमसे बात कब करती
और क्यों?

Apr 13, 2010

आतंक के महिमामंडन से घबराया मंत्रालय

                    

 

जब से दंतेवाड़ा की घटना से सब सहमे हुए हैं,देश का सूचना और प्रसारण मंत्रालय अब आतंकियों के महिमामंडन को लेकर जाग उठा है। हाल ही में मंत्रालय ने देश के सभी टीवी चैनलों को निर्देश दिया कि वे आतंकवादियों और आतंकवादी संगठनों को जरूरत से ज्यादा कवरेज न दें और साथ ही उनसे जुड़ी घटनाओं को अतिरिक्त जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ कवर किया जाए। हालांकि यह निर्देश दंतेवाड़ा की घटना के पहले का है लेकिन इस घटना के बाद वह और भी ज्यादा प्रासंगिक हो उठा है।

 

इस निर्देश में आतंकियों के साथ इंटरव्यू दिए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा गया है कि ऐसा होने से आंतकियों को अपना राजनीतिक एजेंडा स्थापित करने में मदद मिल सकती है। इस निर्देश में कड़ाई की आवाज को मिलाने के लिए केबल टीवी अधिनियम 1995 के प्रोग्राम कोड का हवाला भी दिया गया है। इसके साथ ही मंत्रालय ने यह सफाई भी दी है कि यह सुझाव राष्ट्रीय हित में और गृह मंत्रालय की सलाह पर दिए गए हैं।

 

यहां दो मुद्दे दिखाई देते हैं। एक तो है आतंक के दैत्यीकरण का और दूसरे उसके अप्रत्यक्ष तौर पर महिमामंडन का। जैसे फिल्मों में पुलिस के देर से आने की छवि पक चुकी है, वैसे ही आतंकवादी के आधुनिक, युवा और तकनीक में पारंगत होने की छवि ने अपनी पक्की जगह बना ली है। आतंकी मीडिया के भरपूर दोहन की कहानी समझ चुका है और हैरानी की बात यह कि कई बार वह संवेदना भी बटोर ले जाता है। कसाब की सुरक्षा पर हो रहा खर्च या उसे फांसी पर लटकाया जाना मानव अधिकार की विभिन्न परिधियों में आकर बहस की वजह बन सकता है।

  

 

लेकिन यहां एक मुद्दा और भी है और वह है खुद पत्रकारों की सुरक्षा का। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि दुनियाभर में पत्रकारों को आतंकवाद की एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है। अल्जीरिया,कोलंबिया,स्पेन से लेकर फिलीपींस तक में बहुत से पत्रकारों का अपहरण हुआ है,हत्याएं हुई हैं। वॉल स्ट्रीट जरनल के पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या ने खोजी पत्रकारिता से जुड़े जोखिम को जैसे उधेड़ कर ही रख दिया था। भारत में भी पत्रकार लगातार ऐसे जोखिमों से खेलते रहे हैं चाहे वो कश्मीर के मामले में हो या नक्सलवाद के मामले में। पत्रकारिता से जुड़े जोखिम से निपटने के लिए सरकारी स्तर पर कभी बहुत हंगामा होते नहीं देखा गया।  

 

खैर,बात हो रही थी सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जारी हिदायत की। दरअसल पिछले दो-चार साल में मंत्रालय की तरफ से ऐसी हिदायतों को जारी करने का मौसम काफी जोर पकड़ चुका है। मुंबई हमले की लाइव कवरेज के दौरान जब दुनिया भर की नजरें हमारी कवरेज पर थीं, तब भी कवरेज के गैर-जिम्मेदाराना हो जाने की बातें उठी थीं। कहा गया कि टीवी पर अपराध लाइव प्रस्तुतिकरण की वजह से बचाव कार्य में बाधा तो आती ही है, साथ ही सुरक्षा पर सेंध लगाए जाने के आसार भी कई गुणा बढ़ जाते हैं। यह कहा गया कि मीडिया कई बार अपराध और आतंक को किंग साइज इमेज दे देता है जो सिविल सोसाइटी के लिए खतरनाक हो सकता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि किसी बच्चे को तेज कंप्यूटर गेम खेलने की आदत पड़ जाए और फिर बड़े होने पर वो खुद भी सड़क पर कुछ वैसे ही उच्छृंखल अंदाज में अपनी गाड़ी को दौड़ाने लग जाए और डरे भी न।

 

लेकिन यहां कुछ बातें समझ में नहीं आतीं। भारत में सूचना और प्रसारण से संबंधी तमाम नीतिगत अधिकार सूचना और प्रसारण मंत्रालय के पास हैं और मंत्रालय के गठन से लेकर आज तक कभी भी मंत्रालय के आदेशों में न तो पूरी गंभीरता दिखाई दी और न ही कड़ाई। दूसरे, हिदायतें भी आधी-अधूरी ही दिखाई दीं और तीसरे, कभी भी इस बात का खुलासा ठीक से हुआ नहीं कि हिदायत के ठीक से लागू न होने पर मंत्रालय ने क्या एक्शन लिया।

 

यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवाद चाहे किसी भी किस्म का हो, खबर बनता ही है। लेकिन उस खबर का आकार क्या हो, इसे तय करने का अधिकार अब एडिटोरियल के हाथों से सरक कर अब अखबार की पूरी व्यवस्था के एख बड़े तंत्र के हाथों में पहुंच गया है।
 

इसके अलावा प्रेस की स्वतंत्रता की परिधि क्या हो, यह भी तय नहीं हो सका है। इसलिए लगता यही है कि समय हिदायतें देने या बंदिशें लगाने का नहीं है बल्कि एक खुले माहौल की जमीन को तैयार करने का है।

 

 

( यह लेख 11 अप्रैल, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)

Apr 3, 2010

वो बत्ती, वो रातें

बचपन में
बत्ती चले जाने में भी
गजब का सुख था
हम चारपाई पे बैठे तारे गिनते
एक कोने से उस कोने तक
जहां तक फैल जाती नजर
हर बार गिनती गड़बड़ा जाती
हर बार विशवास गहरा जाता
अगली बार होगी सही गिनती
बत्ती का न होना
सपनों के लहलहा उठने का समय होता
सपने उछल-मचल आते
बड़े होंगे तो जाने क्या-क्या न करेंगें
बत्ती के गुल होते ही
जुगनू बनाने लगते अपना घेरा
उनकी सरगम सुख भर देती
पापा कहते भर लो जुगनू हथेली में
अम्मा हंस के पूछती
कौन-सी पढ़ी नई कविता
पास से आती घास की खुशबू में
कभी पूस की रात का ख्याल आता
कभी गौरा का
तभी बत्ती आ जाती
उसका आना भी उत्सव बनता
अम्मा कहती
होती है जिंदगी भी ऐसी ही
कभी रौशन, कभी अंधेरी
सच में बत्ती का जाना
खुले आसमान में देता था जो संवाद
उसे वो रातें ही समझ सकती हैं
जब होती थी बत्ती गुल।


Mar 8, 2010

बहुत हुआ


बस
अब रंगों जैसा ही हो जाना है
घुल जाना है

पानी जैसे
बह जाना है

पहाड़ जैसे
टिक जाना है

शहर जैसे
चल पड़ना है

बर्तन जैसे
बन जाना है

रिश्ते जैसे
निभ जाना है

मर्द  जैसा
बेवफा होना है

सब कुछ होना आसान ही है शायद
पर औरत होना
खुद अपने जैसा होना !!!!!


Feb 16, 2010

तमाशे को मीडिया ने फिर से जिंदा किया

क्या शाहरूख खान और बाल ठाकरे हमारी सांसे हैं जिनके बिना जीया नहीं जा सकता। आपका जवाब न हो सकता है लेकिन इस पूरे हफ्ते जो कवरेज दिखी,उसने आभास तो कुछ ऐसा ही दिया।

 

अब इस बात पर यकीन नहीं होता जो जतलाती है कि टीवी के लिए एयरटाइम कोकेन की तरह है,यानी कि बेशकीमती। प्रिंट के पास जगह की कमी है और लोगों के पास टिक कर पढ़ने की। तो फिर सवाल यह है कि अगर वाकई ऐसा है तो इतनी सस्ती चीजें क्यों और कैसे दिखाई जाने लगी हैं।

 

यह पूरा हफ्ता ठाकरे,शाहरूख खान और कुछ राहुल गांधी के नाम रहा। ठाकरे के पुराने पड़ चुके तमाशे को मीडिया ने पुरानी-बासी रोटी को बार-बार गरम घी में सेकने की तरह इस्तेमाल किया। पूरा मीडिया ही ठाकरेमय होता दिखा। लगा कि ठाकरे को एकाएक कवरेज का बादशाह बना दिया गया। दूसरी तरफ अपनी पीआर एजेंसी की बदौलत खुद को किंग मानने लगे शाहरूख खान ने बिन खर्चे की पब्लिसिटी पाई, नेताओं की तरह बड़ी-बड़ी बातें कीं, खुद को एक शहीद की तरह दिखाने की कोशिश की और मदर टेरेसा बने रहे। टीवी पर जितनी भी बहसें दिखीं, वो बहसों के साथ-साथ जरूरत न होने पर भी फिल्म की क्लिपिंग दिखाते चले गए। देखते ही देखते देश भर में उनकी नई फिल्म को लेकर ऐसी लहर चल निकली कि विवाद की नीयत पर ही शक होने लगा। टीवी ने इतनी बार सिनेमा हालों के बाहर तैनात पुलिस वाले दिखाए कि लगा कि देश के सामने एक बड़े संकट की घड़ी खड़ी पैदा हो गई है। माई नेम इज खान का इस से बढ़िया मुफ्त प्रचार और भला क्या होता। जनता भी इस इमोश्नल अत्याचार का हिस्सा बनी और उसने मंदी से मंद हुई अपने जेबों से पैसा निकाल फिल्म को सेहत बनाने का पूरा मौका दिया। फिल्म के नाम पर देश प्रेम के गाने गाए जाने लगे और ऐसा महसूस करवाया जाने लगा कि जैसे करगिल युद्ध ही छिड़ गया हो।  

 

दरअसल थ्री इडियट्स के बहाने इस बार प्रचार के फार्मूलों पर जो बहस छिड़ी है,वह काबिलेतारीफ है। प्रचार के इस खेल में कुछ उन टुटपुंजी लेखकों ने भी बहती गंगा में हाथ धोने की कोशिश की जिनका नाम उनके मोहल्ले के लोग भी शायद ठीक से नहीं जानते। इसी गड़बड़झाले में चेतन भगत का नाम उन लोगों को भी याद हो गया जिन्होंने पढ़ाई छोड़ने के बाद फिर कभी कोई किताब पढ़ी ही नहीं थी।

 

इस बहस से एक नतीजा साफ तौर से निकल कर सामने आया। प्रचार जरूरी है और प्रचार सिर्फ किताबी व्याकरण के हिसाब से करने से अब काम नहीं चलता। प्रचार के लिए विवाद, अपवाद, सवाल, जवाब, नाराजगी, खुशी, नकल, षड्यंत्र, हेराफेरी और इडियटपने के तरीके भी खुद उसे ही निजात करने होंगे जो प्रचार चाहता है। उसके बाद समय मीडिया को पटाने पर खर्च करना है और फिर घर बैठ कर कोरियोग्राफी देखनी है। सब नाचते हुए ही दिखाई देंगे।

 

कई साल पहले दक्षिण अफ्रीका में जब हीरे की बिक्री काफी कम होने लगी तो इस व्यापार से जुड़ी दुनिया की सबसे बड़ी खनन कंपनी ने एक विज्ञापन एजेंसी की सेवा ली। एजेंसी ने लोगों की सोच का गहनता से अध्ययन किया और आखिर में जिस अभियान को जन्म दिया, वो था हीरे हैं सदा के लिए। यह लोगों के लिए एक भावनात्मक संदेश साबित हुआ। कई लोग एकाएक यह मानने और महसूस करने लगे कि अगर हीरा है सदा के लिए तो प्रेम के इजहार का भला इससे सटीक प्रतीक और क्या हो सकता है। अचानक हीरे से प्यार की बारिश होते दिखने लगी,हीरे की बिक्री काफी बढ़ गई और हीरा एक बार फिर मान-प्रतिष्ठा का सूचक बन गया। जो अपनी प्रेयसी को हीरा नहीं दे सकता था, उसके लिए हीरा एक चुनौती बनकर खड़ा हो गया और जिसके हाथ में हीरे की अंगूठी थी, वह मुमताज की तरह इठला सकती थी।

 

लेकिन वो हीरा था। ये फिल्म है। पर दोनों का मर्म तकरीबन एक है जनता को भावुक करना और फिर उसकी भावुकता से अपनी जेब को धीरे से भर कर मुस्कुरा देना। फिर यह भी कहना कि (स्व)प्रेम और युद्ध में सब जायज होता है।

 

सोचने की बात है कि महंगाई से बुरी तरह जूझ रहे इस देश के लिए शाहरूख खान की फिल्म क्या इतनी जरूरी चीज है कि उसके लिए देश के तमाम बड़े चैनल अपनी घिसाई शुरू कर दें और जनता को तस्वीरें कुछ इस अंदाज में दिखाएं कि जैसे देश पर कोई बड़ी आफत ही आ गई हो। दूसरे ये कि अगर यह बहस सिर्फ क्षेत्रीय राजनीति के आस-पास की थी तो क्या फिल्म को पब्लिसिटी दिए बिना क्या इस पर कोई सार्थक बहस नहीं की जा सकती थी। वही टीवी जिसके पास सूखे और बाढ़ के लिए कवरेज करने का समय नहीं होता, जिसे पैसे का संकट सदाबहार रहता है, वह इस तरह की पब्लिसिटी क्या किसी साधुवाद के तहत कर रहा होगा। खुद ही सोचिए। वैसे समझ में ये नहीं आता कि जब देश पर असल में कोई संकट आया होगा तो न जाने कवरेज का क्या हाल होगा। अब यह देखने का भी मन है कि आने वाले कुछ दिनों में सितारे अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए कौन-से नए पैंतरे ईजाद करते हैं और कैसे नेता कुछ ऐसे बयान देने लगते हैं जिससे उनकी बासी पड़ रही दुकान में फिर से नया खून बहने लगे।

 

(यह लेख 16 फरवरी, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)


Feb 6, 2010

मन


अभी भी मन करता है
घूम आऊं किताबों के मेले में
पलटूं एक-एक पन्ना
और घर आऊं
तो तैयार मिले मां के हाथों का खाना
पिता की चिंता

लौटूं
तो इत्मीनान से खोलूं
किताबों का थैला
महसूसूं खुशबू ताजे छपे पन्नों की
उनकी जिल्द पर जडूं इतिहास होता वर्तमान-
अपना नाम, तारीख, साल

फिर उन्हें दूं जिल्द का तकिया
उन्हें सहलाऊं
तकिए के पास रख
मजे से सो जाऊं

सुबह पहली नजर फिर जाए
इन्हीं मीठे बेरों पर
उन्हें बता दूं छुअन से
दफ्तर से आते ही
दिमागी सैर करूंगी इनके साथ

अभी भी मन करता है
न जाने क्या-क्या

Feb 3, 2010

मीडिया का चरित्र और उसकी मजबूरियां

अंग्रेजी के एक अखबार के पत्रकार ने जब अपने यहां छपने वाली किसी स्टोरी विशेष की विश्वसनीयता पर आपत्ति जताई तो उसे जवाब संपादक से नहीं,बल्कि अखबार के मार्केटिंग हेड की तरफ से मिला। वैसे वह जवाब कम और सख्त हिदायत ज्यादा थी। उक्त महोदय ने जुझारू पत्रकार से कहा कि अखबार एक धंधा है। हम सब यहां पर धंधा करने बैठे हैं, अगरबत्ती जलाने नहीं। इसलिए आप वही लिखिए और वही देखिए जो बिकने लायक हो। अगर आपकी स्टोरी बिकने लायक नहीं होगी तो आप भी अखबार के लायक नहीं होंगे। दूसरी बात, हम भी कई बार आपको स्टोरी बताएंगे। वो स्टोरीज आपको करनी होंगी और याद रखिए, हम नहीं चाहेंगें कि उन स्टोरीज पर काम करते हुए आप अपने दिमाग को भी इस्तेमाल में लाएं।

 

यह नए समय की पत्रकारिता की सच्ची तस्वीर है। टैगलाइन चाहे जो भी कहे, अंदरूनी सच यही है कि पत्रकारिता अब पूरा सच नहीं बल्कि काफी हद तक व्यापार है। अखबार व्यापार कर रहा हो, इससे शायद किसी को बड़ी आपत्ति न हो लेकिन अफसोस इस बात पर तो हो सकता हो जब अखबार सिर्फ व्यापार ही बन कर रह जाए। हाल के महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव के तुरंत बाद द हिंदू के ग्रामीण संपादक पी साईंनाथ की खोजपरक रिपोर्ट ने जब यह साबित किया कि कैसे उस समय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण के पक्ष में सरकारी खर्च पर सकारात्मक स्टोरीज छापी गईं, तो राजनीतिक हलकों में इसे लेकर तनाव पैदा हुआ। कई खबरों में अशोक चव्हाण की तुलना सम्राट अशोक तक से की गई थी। यह खबरें उस समय पर छपीं थीं जब कि चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और जाहिर तौर पर आचार संहिता लागू हो गई थी। इन खबरों को नियम के मुताबिक कहीं भी एडवरटोरियल के रूप में छापा नहीं गया (ताकि पाठक को इस बात का अहसास तक न हो कि उन्हें खबर के रूप में जो दिया जा रहा है, वह असल में एक प्रायोजित मामला है)। इस तरह जनता के जो पैसे सरकारी खजाने में जमा होते रहते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा इन दिनों राजनेता अपनी इमेज एंड लुक को चमकाने में खर्च करने लगे हैं, वो भी कुछ इस अंदाज में कि जेब जनता की ढीली हो औप मकसद वे साधें।

 

यह ठीक है कि बाजार में टिके रहने के लिए व्यापार तो करना ही होगा लेकिन व्यापार की भी कुछ शर्तें और मर्यादाएं होती हैं। ऐसा कतई नहीं है कि कोला से कीटनाशक उड़नछू हो गए हैं। वे आज भी उन्हीं बोतलों में मौजूद हैं। इनमें कीटनाशक होने की जो छोटी-मोटी खबरें कुछ साल पहले हुईं थीं, उनका सीधा फायदा यह हुआ कि कई गांवों में किसानों ने कोला को अपने खेतों पर एक कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया (और इससे खूब लाभान्वित भी हुए) लेकिन मीडिया को क्या हुआ। इन कीटनाशकों को मीडिया ने क्यों हजम किया। क्या मीडिया इस बात  आश्वस्त हो गया कि कोला स्वास्थ्यवर्धक है, हानिकारक नहीं। यहां मीडिया की चुप्पी की वजह तर्क और प्रमाण पर आधारित परिणाम नहीं था, बल्कि सिक्कों की खनक और मुंह से टपकती लार थी। स्वाद और ठंडे के नाम पर कीटनाशक देने वाली ये कंपनियां चैनलों और अखबारों को बने रहने के लिए मोटी रकम देती हैं। कुछ दिनों तक हाथी के दांतों से गुस्सा दिखाने के बाद मीडिया सहमत हो गया कि कीटनाशकों के चक्कर में मोटे लालाओं और आकाओं से नाराजगी मोल लेने से जन हित सुखाय पत्रकारिता भले ही हो जाएगी लेकिन मीडिया मालिक सुखाय नहीं। वैसे भी यह दौर 1940 का नहीं है जब महात्मा गांधी सरीखे व्यक्तितत्व सोचते थे कि मीडिया और विज्ञापन एक-दूसरे से जितना दूर रहें, उतना ही भला है।  

 

तो फिर किया क्या जाए। पूरा सच कहीं भी नहीं है और पसरे हुए पूरे झूठ को ढूंढना मुश्किल नहीं। ऐसे में जरूरी हो जाती है मीडिया शिक्षा जो किसी को भी दी जा सकती है। सूचना क्रांति के इस विस्फोटक दौर में मीडिया के चरित्र और उसकी मजबूरियों को समझाने के लिए कुछ प्रयास किए ही जाने चाहिए। जब तक ऐसा हो पाता है, तब तक एक आम दर्शक और पाठक को इतना तो जान ही लेना चाहिए कि वह जो देखे-पढ़े, उस पर विश्वास करने से पहले अपनी समझ को भी इस्तेमाल में लाए। सीधा मतलब यह कि अगर वह खुद भी थोड़ा पत्रकार बन सके तो कोई हर्ज नहीं। यह किसने कहा कि हथियार की समझ तभी बढ़ानी चाहिए जब खुद के पास हथियार हो।
 

(यह लेख 3 फरवरी, 2010 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित हुआ)    

Jan 17, 2010

अपराध और हंसी

एक हंसी भगत सिंह,सुखदेव,राजगुरू की थी। फांसी पर हंसते-हंसते झूल गए। एक हंसी राठौर की है। बकौल राठौर उन्होंने मुश्किल में हंसना नेहरू से सीखा लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि फलां-फलां काम उन्होंने किससे सीखा।

खैर, जिस दिन राठौर हंसी देखी, एक और तल्ख हंसी याद गई। यह हंसी 1999 में देखी थी। लेकिन असल घटना घटी थी जनवरी 1996 में।

उस दिन संतोष सिंह दिल्ली के एक घर में घुस कर वहां अकेली मौजूद 22 वर्षीय प्रियदर्शिनी मट्टू से बलात्कार करता है और उसे बिजली की तारों और मोटर साइकिल के हेलमेट से मार डालता है। प्रियदर्शिनी दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून की छात्रा थी और कई बार पुलिस से शिकायत कर चुकी थी कि उसका सहपाठी संतोष उसे परेशान करता है। पुलिस खामोश रहती है क्योंकि संतोष के पिता उस समय दिल्ली के ज्वाइंट कमिश्नर आफ पुलिस थे।

प्रियदर्शिनी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस पर चोट के 19 निशान पाए गए। चेहरा पहचान से परे था। संतोष शायद आसानी से बच जाता लेकिन मीडिया की वजह से दिल्ली पुलिस और बाद में सीबीआई को मुस्तैदी दिखानी पड़ती है और संतोष गिरफ्तार होता है। फोरंसिक साइंस लैब भी मानता है कि सबूतों के साथ जानबूझकर बरती गई लापरवाही से आरोपी को लाभ मिलने के आसार पनपे। मौके पर पड़ा हैलमेट टूटे हुए सेफ्टी ग्लास में पाया गया। उंगलियों के निशान बेतरतीब थे। पुलिस ने दावा किया कि संतोष को हत्या से ठीक पहले देखने वाले नौकर का कोई सुराग नहीं मिल रहा है( जबकि कुछ ही दिनों बाद एक पत्रकार उस नौकर को बिहार के एक गांव में खोज कर उसका इंटरव्यू भी छाप देता है)

खैर, निचली अदालत में जज जी पी थरेजा 453 पन्नों के फैसले में कहते हैं, 'लगता है कि कानून के रखवालों के बच्चों पर कोई कानून लागू नहीं होता ...मैं जानता हूं कि संतोष ही वह व्यक्ति है जिसने यह अपराध किया है लेकिन तब भी मैं सबूतों की कमी के आधार पर उसे बरी कर रहा हूं। 'तत्कालीन राष्ट्रपति के आर नारायणन ने इस फैसले पर टिप्पणी की कि न्याय के मंदिर अब कसीनों में तब्दील होने लगे हैं।

उस दोपहर फैसला सुनने से पहले संतोष हंसते हुए दाखिल हुआ और फिर दोगुनी हंसी के साथ बाहर आया। वो खुशी से हाथ हिला रहा था। मैं उस समय एनडीटीवी में थी और हमारे सिवा आज तक को भी उस क्रूर हंसी के शाट्स मिले थे। उसी शाम स्टोरी के चलते प्रियदर्शिनी के घर गई तो पता चला कि उसका परिवार वहां से जा चुका है।

बाद में अक्तूबर 2006 को दिल्ली उच्च न्यायालय संतोष सिंह को रेप और हत्या का दोषी पाया जाता है। उसे सजाए मौत सुनाई जाती है। इस समय तक शादीशुदा संतोष एक वकील बन चुका होता है। देश में पहली बार रेप मामले में नियमित सुनवाई से महज 42 दिनों में फैसला सुना दिया जाता है।

 बाद में संतोष की अपील पर फरवरी 2007 में मौत की सजा को स्थगित कर दिया जाता है लेकिन बलात्कार की सजा बने रहती है। इस बीच प्रियदर्शिनी को न्याय दिलाने की दरकार करते हुए इंडिया गेट के पास मोमबत्तियां भी जलती हैं लेकिन ताज्जुब की बात यह कि संतोष की उस विद्रूप हंसी के शॉट्स उस तेजी से बार-बार देखने को नहीं मिलते जैसा कि राठौर के मामले में हुआ।

लेकिन हंसने वाला राठौर अकेला नहीं है। याद कीजिए गोलियां चलाते, झूठ बोलते कसाब की हंसी। याद कीजिए रोमेश शर्मा, हर्षद मेहता, सुशील शर्मा, लालू यादव,पप्पू यादव की हंसी। कहीं अपराध से बच निकलने की हंसी तो कहीं कानून के साथ कामेडी करने की हंसी।

इस बार मीडिया की सक्रियता और विजिलेंट जनता की वजह से राठौर चपेट में आए हैं। लेकिन उन भ्रष्टाचारों-बलात्कारों का क्या जो बस्तियों-मुहल्लों में होते हैं। ये अपमान मीडिया लैंस से दूर हैं, इसलिए न्याय से भी। ये पार्ट टाइम अपराधी भी राठौर की हंसी ही हंसते हैं। छोटा राजन की पार्टी में शरीक हुए पुलिस वाले भी हंस रहे थे। इन लोगों में हंसी की हिम्मत इसलिए आती है क्योंकि इनके अंदर अपने कुकर्मों का अट्ठाहस बहुत ऊंचा है और मीडिया की पहुंच कम। इनके खिलाफ इंडिया गेट में मोमबत्तियां नहीं जलतीं। अगर याद हो तो मनु शर्मा के हाल के पांच सितारे के हंगामे के मामले में दिल्ली पुलिस आयुक्त के बेटे की मौजूदगी पर भी सवाल उठे थे लेकिन उन्हें दबा दिया गया। कानून के रखवाले अपने मचान से यह सब देख हंस कर लोटपोट होते रहते हैं।

थ्री इडियट्स में जब एक छात्र टीचर के कड़े अनुशासन के चलते आत्महत्या कर लेता है तो रैंचो धीमे से उस टीचर को याद दिलाता है कि यह आत्महत्या नहीं, हत्या है। हमें भी जरूरत रैंचो की ही है जो सच को सच कह सके। लेकिन फिलहाल तो लगता यही है कि  इस हंसी को देखकर रावण भी किसी कोने में बैठा शर्मसार हो रहा होगा।

(यह लेख 17 जनवरी, 2010 को दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित हुआ)